10/03/2024
प्यार सबको आजमाता हैं,
सोलह हज़ार एक सौ आठ रानियों से मिलने वाला श्याम, बस एक राधा को तरस जाता हैं।
राधा और कृष्ण कदंब की डाल में झूला डाले शायद ऊपर लिखी पंक्तियों को गलत बता हमें समझा रहे हैं की प्रेम का मतलब सिर्फ पा लेना नहीं होता -
यदि प्रेम का मतलब सिर्फ पा लेना होता,
तो हर हृदय में राधा-कृष्ण का नाम नही होता।
CraftVala.com के कलाकारों द्वारा हैंडलूम घीचा सिल्क टेबल डाई साड़ी पर हाथों द्वारा चित्रित यह मधुबनी पेंटिंग राधा और कृष्ण के उसी सच्चे प्रेम को समझने वालों को समर्पित है l
04/06/2023
मिथिला चित्रकला से विलुप्त हो चुके तंत्र पेंटिंग को पुनर्जीवित करने के इस प्रयास में आप सभी का स्वागत है l कार्यशाला में सहभागिता वास्ते नीचे दिए गए लिंक का उपयोग करें या फिर QR कोड स्कैन करके भी इस कार्यशाला से जुड़ सकते हैं l 
इस कार्यशाला की विषिष्टता -
संस्कृत में लिखी गई तंत्रशास्त्र के पुस्तकों में वर्णित यंत्र निर्माण विधि (यंत्रोद्धार) का संस्कृत के स्कॉलर द्वारा विस्तृत विश्लेषण और इनके दिशा-निर्देश में प्रमाणिक यंत्रों के चित्रण का प्रशिक्षण सिद्धस्त मास्टर ट्रेनर आर्टिस्ट के द्वारा l ताकि जो भी यंत्र बने उसके प्रमाणिकता पर कोई संदेह ना रहे l
https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSc8NU6jpRMJkWlbSCgDnA0UVpQdqcONuWs4j1m2V3tX5SQDtA/viewform?usp=sf_link
25/05/2023
पुस्तक "मिथिला चित्रकला का सिद्धांत" का विमोचन मुख्य अतिथि आदरणीय संजय झा, मंत्री जल संसाधन सह सूचना जनसंपर्क मंत्री बिहार सरकार के हाथों शुक्रवार दिनांक 26/5/23 दिन के 3 बजे 11-स्ट्रैंड रोड, पटना पर होना तय हुआ है l आप सभी सम्मनित जन से आग्रह है की इस कार्यक्रम में अपनी गरिमामयी उपास्थिति रूपी आशीर्वाद दे हमें कृतार्थ करें l
राकेश झा
लेखक -मिथिला चित्रकला का सिद्धांत
16/05/2023
यह पुस्तक विश्व प्रसिद्ध भारतीय लोककला मधुबनी चित्रकला अथवा मिथिला चित्रकला के सैद्धान्तिक विश्लेषण पर आधारित है। मिथिला जो बिहार का सांस्कृतिक क्षेत्र है, मिथिला चित्रकला उसी मैथिल समाज की चित्रात्मक अभिव्यक्ति है। इसलिए पुस्तक में सभी तथ्य मिथिला की सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के आधार पर लिखे गए हैं। अब तक जितने भी मिथिला चित्रकला पर किताबें लिखी हैं, वो कहीं न कहीं किसी मिथिला पेंटिंग कलाकार या इस कला के किसी खास पक्ष पर लिखा गया है। ऐसे में मेरा यह मानना है की यह पहली किताब है जो मिथिला चित्रकला के सैद्धान्तिक पक्ष और उनका मिथिला के साथ सांस्कृतिक संबंध पर प्रामाणिकता के साथ के साथ लिखी गई है । मिथिला चित्रकला में किस विषय को कब, कहाँ, क्यों और कैसे चित्रित किया गया है, इसे पढ़ने के बाद पाठकों को इसका उत्तर मिल जाएगा ऐसा मेरा विश्वास है l amazon और google play book के माध्यम से आप इस पुस्तक की प्रति को अपने लिए सुरक्षित कर सकते हैं जहाँ यह बिक्री के लिए उपलब्ध है l
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Mithila Chitrakala Ka Sidhant by RAKESH KUMAR JHA - Books on Google Play
Mithila Chitrakala Ka Sidhant - Ebook written by RAKESH KUMAR JHA. Read this book using Google Play Books app on your PC, android, iOS devices. Download for offline reading, highlight, bookmark or take notes while you read Mithila Chitrakala Ka Sidhant.
26/12/2022
Sketch Practice by Student
17/10/2020
आप सबों को शारदीय नवरात्र की हार्दिक शुभकामना 🙏🙏
11/10/2020
School Time
Join @ www.mithilaschoolofart.com
08/10/2020
मिथिला चित्रकला का सबसे विवादित और अशुद्ध बनाये जाने वाला अरिपन - अष्टदल अरिपन
हम सभी जानते हैं कि किसी भी पूजा में देवताओं का आवाह्न अकेले नही होता है । इनका आवाह्न अङ्ग देवता, अस्त्र-शस्त्र, वाहन एवं पारिवार के संग होता है । इसलिए मन्त्र में कहा भी गया है- साङ्गसायुधसवाहनसपरिवार
इस प्रकार उनके स्थान के चारों ओर घेर कर उनके अंग देवता अप्रत्यक्ष रूप में अपने-अपने निर्धारित स्थान पर खुद ही स्थापित हो जाते हैं जो मुख्य देवता के आवरण के रूप में चारों ओर रहते हैं । सभी अस्त्र-शस्त्र, परिवार के सदस्य देवता, वाहन सभी का अरिपन में स्थान के साथ ही इनकी संख्या भी निर्धारित है । इसी कारण से मिथिला में पूजा के समय अरिपन देने की परंपरा है । इस अरिपन के माध्यम से पूजा क्रम में किसी भी तरह से कोई सैद्धान्तिक त्रुटि ना हो या कोई परिवारिक देवता को पूजा हेतू स्थान ना मिले इन सब कमियों से बचा जाता है ।
अरिपन की संरचना एवं उसके अंग - मिथिला चित्रकला में प्रयुक्त अरिपन मूल रूप से किसी ना किसी देवताओं को समर्पित यंत्र है । शास्त्रानुसार कर्णिका, केशर, दल और भूपुर ये यंत्र के चार अंग होते हैं । पर अरिपन में भूपुर का अंकन अब खत्म हो चुका है परंतु कर्णिका, केशर आ दल का अंकन प्रचलन में है । हाँ जहाँ केवल यंत्र का चित्रण होता है वहाँ भुपुर का भी निरूपण होता है ।
अरिपन के निरूपण में कर्णिका के स्वरूप, केसर की संख्या और दल के संख्या मे अज्ञानतावश भी परिवर्तन से पूरा का पूरा शास्त्रीय एवं कर्मकांडीय विध-व्यवहार ही उलट-पलट हो जाता है । क्योकि पूजा के दौरान मुख्यदेवता के परिजन देवता की संख्या जब निर्धारित है तब उसमे किसी भी तरह का परिवर्तन से पूरा यांत्रिक गणना ही असफल हो जाएगी ।
पंडित भवनाथ झा के अनुसार मिथिला मे देवी पूजा मे षट्दल और पुरुष देवता के पूजा मे अष्टदल अरिपन का प्रचलन है । इसलिये सत्यनारायण भगवान के पूजा मे अष्टदल अरिपन दिया जाता है । इतना ही नहीं, महादेव के विशेष पूजा मे, जैसे रुद्राभिषेक आदि मे भी अष्टदल अरिपन का निरूपण होना चाहिए । इसकी परम्परा मिथिला मे रही है । गौरीशंकर, जमुथरिक महादेव आ हाजीपुर के गौरीशंकर और अन्य जगह भी महादेव शिवलिंग स्थापना अष्टदल पर हुवा है ।
अष्टदल अरिपन के निर्माण के प्रथम चरण मे कर्णिका भी आठकोण वला होना चाहीये । जिसका निरूपण चित्र संख्या 1 के अनुसार होना चाहिए ।
इसके बाद कर्णिका को अष्टकोणीय बनाती एक रेखा दूसरी रेखा से मिलानी चाहिए जिससे चित्र संख्या 2 के हिसाब से आकृति बने ।
इसके बाद एक वृत्त बनायी जानी चाहिए । जो एक बिंदु से दूसरे बिन्दु को मिलाने से चित्र संख्या 3 के अनुसार बन जाता है । इसके बाद चित्र संख्या 4 के अनुसार इसके बाहर कमल के दल (पत्ते) के आकार में आठ दल का निरूपण करना चाहिए ।
इस तरह अष्टदल अरिपन का रेखांकन हो गया । इस प्रकार बने अरिपन में शुद्धता तब आती है जब चित्र संख्या 5 के अनुसार बीच का कर्णिका अष्टकोणीय होता है । अगर ऐसा नही होता है मतलब अरिपन अशुद्ध है । अष्टदल अरिपन में अष्टकोणीय कर्णिका आ षट्दल अरिपन मे षट्कोणीय कर्णिका का बनना अनिवार्य है । अगर आप सैद्धान्तिक रूप से सही बनाएंगे तो षट्कोणीय कर्णिका और अष्टकोणीय कर्णिका अपने आप बन जाता है । इस तरह केंद्र में बने कर्णिका के बाहर दो चक्र मे आठ त्रिभुज बनता है । ये दो चक्र ही अरिपन यंत्र का आवरण है । जिसे केसर कहा जाता है । इस तरह अरिपन में दो आवरण मे केसर का निरूपण अवश्य होना चाहिए । तभी शास्त्रीय दृष्टिकोण से पूजित भगवान के परिजन देवता के लिए स्थान बनता है । एक भी आवरण अगर भूलवश भी छूटता है तो वह अरिपन अशुद्ध ही होगा । इसके बाद दो केसर के बीच मे जो स्थान है उसमें देवता के अस्त्र-शस्त्र और हाथ मे धारण किये वस्तु का चित्रण होता है, तब जा कर शुद्धतापूर्वक अरिपन बनता है ।
पूजा करने वाले अरिपन में बीच वाले कर्णिका पर देवता के पैर का निरूपण होता है जो पुजारी के सामने की ओर होता है मतलब पूजित देवता पुजारी के सन्मुख अधिष्ठापित है ।
अष्टदल अरिपन में आठो दल पर शंख, चक्र, तलवार, गदा, कमल फूल, डमरू, स्वस्तिक और धनुषक का अंकन होता है । परन्तु ये चिह्न कौलिक परम्परानुसार और क्षेत्र विशेष अनुसार बदल भी सकते हैं ।
पंडित भवनाथ झा के अनुसार प्राचीन काल मे अरिपन के दल पर मातृका वर्ण लिखा जाता था, परंतु अब ये परम्परा समाप्त हो चुका है । शास्त्रीय ग्रन्थों में और स्थापित मूर्ति सब मे ये देखने को मिलता है । जैसे गौरी-शंकर मे आठो दल पर अ से ह तक का अक्षर लिखा जाता है ।
प्राचीन समय मे मिथिला की महिला को इतना लौकिक ज्ञान रहता था कि वे खुद से शास्त्र सम्मत विधानपूर्वक यन्त्र बना लेती थी , पर वर्तमान में ये परम्परा विलुप्त हो चुकी है । अब अरिपन का मतलब मात्र और मात्र खूबसूरत चित्रकारी तक सीमित हो चुकी है । अगर आप किसी को गलत चित्रण पर टोकते हैं तो बदले में कुवचन ही सुनने को मिलेगा । ऐसे में आज की पढ़ी लिखी मिथिलानियों से आशा अधिक हो जाती है कि वे अपनी संस्कृति का अध्ययन, चिंतन, मनन कर इसके प्रचार-प्रसार को आगे आये और अपनी परंपरा के संरक्षण एवं सम्वर्धन की बागडोर फिर से अपने हाथों में ले । धन्यवाद