08/03/2023
Gen-Next Study Madhubani
A study centre for the students studying between class 4 and class 10. Thorough learning, authentic study materials, motivation, career counseling etc.
are the main objectives here. Once you come never you forget.
08/03/2023
07/12/2021
बताया जाता है कि ये फोटो हांगकांग के एक अपार्टमेंट की है। कंक्रीट के जंगल का साकार रूप
भयावह...
PC जंगल कथा
28/11/2021
#हारा_वही_जो_लड़ा_नहीं
पिछले दिनों एक पेंगुइन की वीडियो वायरल हुई। अंटार्टिका के बर्फीले पानी वाले समुद्र में कुछ सैलानी नौका पर घूम रहे थे। तभी उनकी नजर समुंदर के सबसे खतरनाक शिकारी "किलर व्हेल" पर पड़ी। उन्होंने देखा कि कुछ किलर व्हेल्स मिलकर पेंगुइनों का शिकार कर रही हैं। एक पेंगुइन के पीछे किलर हाथ धोकर पड़ गयी। पेंगुइन अपनी पूरी ताकत लगाकर भाग रही थी पर विशाल किलर व्हेल से दूरी घटती ही जा रही थी। पर उसने हार नहीं मानी।
कुछ देर किलर को छकाते रहने के बाद जब उसे लगने लगा कि जिंदगी डूबने वाली है तभी उसने आखिरी मौके पर शिकस्त स्वीकारने के बजाय एक अनोखा फैसला किया। वो सैलानियों के बोट की तरफ मुड़ी और किसी क्रूज मिसाइल की तरह बोट के उपर छलांग लगा दिया। छलांग मिस हो गयी और वो बोट से टकराकर वापस पानी मे गिर गयी जहाँ किलर व्हेल उसे मुंह मे लपकने ही वाली थी। पर यह पेंगुइन अलग ही मिट्टी की बनी थी। मौत के मुंह मे सामने से पहले उसने हार नहीं मानी। तुरन्त पूरी ताकत बटोरकर उसने दुबारा छलांग भरी। छलांग जिंदगी की। अगले पल वो बोट के ऊपर थी। किलर व्हेल की मृत्यु दायक पहुंच से दूर, सैलानियों के बीच। वो कुछ देर उनके बीच बैठी रही। मौत और जिंदगी की भाग-दौड़ के बीच वो थोड़ी देर के लिए सुस्तायी होगी। पर वो ज्यादा देर रुकी नहीं। न डर का कोई लक्षण था।
किलर व्हेल कुछ दूर बोट का पीछा करने के बाद वापस लौट गई। तब तक पेंगुइन भी दम ले चुकी थी। वो पुनः बोट के डेक पर चढ़ी और किसी हीरो की तरह वापस अंटार्टिका के बर्फीले समुंदर में कूद पड़ी जो उसकी कर्मस्थली है। कूदते समय ऐसा लग रहा था जैसे वो सबको बाय बोल रही हो। मानो कह रही हो, "कुछ नहीं हुआ गाईज़! यह तो रोज का काम है।"
जब एक पेंगुइन इतनी साहसी हो सकती है तो मनुष्य कितना जिसके लिए कहा गया है-
"कोई दुख
मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं
हारा वही
जो लड़ा नहीं।"
Sunil Kumar Sinkretik
21/10/2021
आज अल्फ्रेड नोबेल का जन्मदिन है।
अल्फ़्रेड नोबेल डायनामाइट के आविष्कारक थे (बोफ़ोर्स कम्पनी भी अल्फ़्रेड नोबेल ने ही आरम्भ की थी)। नोबेल ने डायनामाइट बना कर खूब पैसा कमाया। इस विस्फ़ोटक ने खदानों के उत्पादन में क्रांतिकारी बढोतरी की थी। लेकिन जैसा कि अक्सर होता है... इस फूल के साथ कांटे भी थे। डायनामाइट का प्रयोग हथियारों में भी होने लगा... खुद नोबेल ने बोफ़ोर्स को एक स्टील उत्पादक कम्पनी से बदल कर एक तोप-निर्माता कम्पनी बना दिया। नोबेल के डायनामाइट ने नोबेल पर पैसा और पूरे संसार पर मौत बरसानी शुरु कर दी।
..और लोगों ने नोबेल को "मौत का सौदागर" कहना शुरु कर दिया।
एक बार किसी ने अखबार में जानबूझ कर नोबेल की मृत्यु के बारे में लिख दिया। लोग चाहते थे कि लोगों को मारने की बजाय नोबेल खुद ही मर जाएँ। इससे दुखी होकर और अपने ऊपर से "मौत का सौदागर" का ठप्पा हटाने की कोशिश में नोबेल ने अपनी सारी सम्पदा को नोबेल पुरस्कार के लिए दान कर दिया। उन्होनें अपनी वसीयत में लिखा कि इस सम्पदा के ब्याज से ऐसे लोगों को नोबेल पुरस्कार दिए जाएँ जो मनुष्य जाति के लिए सर्वाधिक लाभदेय कार्य करे। आरम्भ में नोबेल पुरस्कार भौतिकी, रसायन शास्त्र, मेडिसिन, साहित्य और शांति के लिए दिए जाते थे। बाद में इस सूची में अर्थशास्त्र को भी शामिल कर दिया गया। प्रत्येक पुरस्कार में करीब सात करोड़ रुपए दिए जाते हैं -- संयुक्त रूप से पुरस्कृत लोगों के बीच यह राशि बराबर बाँट दी जाती है।
नोबेल ने कभी विवाह नहीं किया। उनके पास 350 से भी अधिक पेटेंट्स थे। नोबेल ने सेकेण्डरी स्कूल की शिक्षा भी प्राप्त नहीं की थी लेकिन फिर भी उन्होने स्विडिश, फ़्रेंच, रूसी, अंग्रेज़ी, जर्मन और इटालियन में महारत हासिल की थी।
कौन थे अल्फ्रेड नोबेल?
अल्फ्रेड बर्नहार्ड नोबेल (Alfred Bernhard Nobel) का जन्म स्वीडन के स्टॉकहोम में 21 अक्टूबर 1833 को हुआ था। अल्फ्रेड के पिता इमानुएल नोबेल एक प्रख्यात अविष्कारक थे मगर वो पढ़े-लिखे नहीं थे। 16 साल की उम्र तक अल्फ्रेड की शिक्षा घर पर ही हुई। उनके पिता को दिवालिया हो जाने के कारण स्वीडन से रुक जाना पड़ा जहां वह रूसी सरकार से रक्षा हथियारों का कॉन्ट्रैक्ट प्राप्त करने में सफल हो गए। 1842 में जब नोबेल सिर्फ 9 साल के थे वह अपनी माता आंद्रिएता एहल्सेल के साथ अपने नाना के घर सेंट पीटर्सबर्ग चले गए। यहां रह कर अल्फ्रेड ने रसायन विज्ञान और संबंधित भाषाओं की शिक्षा प्राप्त की। कुछ नया खोजने का स्वभाव रखने वाले अल्फ्रेड ने स्वीडिश, रूसी, अंग्रेजी, फ्रेंच और जर्मन भाषाएं सीखी।
अल्फ्रेड के पिता ने साल 1850 में उन्हें केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के लिए विदेश भेज दिया। इस दौरान अल्फ्रेड ने स्वीडन, जर्मनी, फ्रांस और अमेरिका की यात्राएं की। अल्फ्रेड को साहित्य में भी काफी रूचि थी। अल्फ्रेड के पिता एक इंजीनियर और आविष्कारक थे जो न केवल बिल्डिंग और फूल डिजाइन करते थे बल्कि भिन्न प्रकार के प्लास्टिक चट्टानों का भी परीक्षण किया करते थे। अल्फ्रेड की रूचि साहित्य में थी लेकिन उनके पिता चाहते थे कि वह उन्हीं की तरह काम करें, इसलिए उन्हें केमिकल इंजीनियरिंग पढ़ने बाहर भेजा था।
‘क्रीमिया युद्ध’ के दौरान दिखाई अपनी प्रतिभा
1853 से 18 सो 56 के बीच क्रीमिया युद्ध के दौरान अल्फ्रेड ने रूस के सम्राट जार और जनरल ओं को विश्वास दिलाया कि समुद्री खदानों के इस्तेमाल से दुश्मनों को सीमा में घुसने से रोका जा सकता है। उनका दानों की मदद से ब्रिटिश रॉयल नेवी को सेंड पीटरसन की सीमा पर ही रोक दिया गया थे।
ऐसे बनाया डायनामाइट
अल्फ्रेड ने पेरिस की एक निजी शोध कंपनी में काम किया जहां उनकी मुलाकात इतावली केमिस्ट अस्कानियो सोब्रेरो से हुई। सोब्रेरो ने अति विस्फोटक तरल ‘नाइट्रोग्लिसरीन’ का आविष्कार किया था। यह व्यावहारिक इस्तेमाल की लिए बेहद खतरनाक पदार्थ था। यहीं से अल्फ्रेड की रूचि ‘नाइट्रोग्लिसरीन’ में हुई, जहां उन्होंने निर्माण कार्यों में इसके इस्तेमाल के विषय में सोचा।
1863 में, वापस स्वीडन लौटने के बाद अल्फ्रेड ने अपना पूरा ध्यान ‘नाइट्रोग्लिसरीन’ को एक विस्फोटक के रूप में विकसित करने में लगा दिया। दुर्भाग्य से, उनका यह परीक्षण असफल हो गया, जिसमें कई लोगों की मौत भी हो गई। मरने वालों में अल्फ्रेड का छोटा भाई एमिल भी शामिल था। इस घटना के बाद स्वीडिश सरकार ने इस पदार्थ के स्टॉकहोम की सीमा के अंतर्गत किसी भी प्रकार के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया। हालांकि अल्फ्रेड नहीं रुके, उन्होंने अपना प्रयोग जारी रखा। इस बार उन्होंने अपनी नई प्रयोगशाला झील में एक नाव को बनाया, जहां उनका प्रयोग सफल रहा।
कैसे हुई नोबेल पुरस्कार की शुरुआत?
नोबेल पुरस्कारों की शुरुआत 10 दिसम्बर 1901 को हुई थी। उस समय रसायन शास्त्र, भौतिक शास्त्र, चिकित्सा शास्त्र, साहित्य और विश्व शांति के लिए पहली बार ये पुरस्कार दिया गया था। इस पुरस्कार की स्थापना स्वीडन के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक और डायनामाइट के आविष्कारक डॉ अल्फ्रेड नोबेल द्वारा 27 नवम्बर 1895 को की गई वसीयत के आधार पर की गई थी। 10 दिसम्बर, 1896 को इटली के सेनरमो शहर में नोबेल की मृत्यु हो गई। अल्फेड की 92,00,000 डॉलर की संपत्ति विज्ञान और साहित्य में अच्छे कार्य करने वालों लोगो को दी जाती है। इसे ही नोबेल पुरस्कार के नाम से जाना जाता है।
04/10/2021
चार अक्तूबर का दिन मानव के अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास मे एक स्वर्णिम पृष्ठ है। इसी दिन चार अक्तूबर 1957 को पृथ्वी की सतह से पहली मानव-निर्मित वस्तु – रूसी उपग्रह ‘स्पुतनिक‘ अंतरिक्ष में छोड़ा गया। रूसी समाचार एजंसी, ‘टास’ के मुताबिक़ उपग्रह का वज़न क़रीब 84 किलोग्राम था और इसे पृथ्वी की निचली कक्षा मे स्थापित किया गया था।
विस्तार से लिंक पर :
4 अक्तूबर 1957 : ‘स्पुतनिक’ का प्रक्षेपण चार अक्तूबर का दिन मानव के अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास मे एक स्वर्णिम पृष्ठ है। इसी दिन चार अक्तूबर 1957 को पृथ्वी की स...
16/09/2021
OZONE DAY
आखिर ओजोन है क्या?
ओजोन एक हल्के नीले रंग की गैस होती है ।ओजोन परत सामान्यत: धरातल से 10 किलोमीटर से 50 किलोमीटर की ऊंचाई के बीच पाई जाती है। यह गैस सूर्य से निकलने वाली पराबैंगनी किरणों के लिए एक अच्छे फिल्टर का काम करती है।
ओज़ोन (अंग्रेज़ी: Ozone) ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बनने वाली एक गैस है जो कि वातावरण में बहुत कम मात्रा में पाई जाती है। जहाँ निचले वातावरण में पृथ्वी के निकट इसकी उपस्थिति प्रदूषण को बढ़ाने वाली और मानव ऊतक के लिए नुकसानदेह है, वहीं ऊपरी वायुमंडल में इसकी उपस्थिति परमावश्यक है। इसकी सघनता 10 लाख में 10वां हिस्सा है। यह गैस प्राकृतिक रूप से बनती है। जब सूर्य की किरणें वायुमंडल से ऊपरी सतह पर ऑक्सीजन से टकराती हैं तो उच्च ऊर्जा विकरण से इसका कुछ हिस्सा ओज़ोन में परिवर्तित हो जाता है। साथ ही विद्युत विकास क्रिया, बादल, आकाशीय विद्युत एवं मोटरों के विद्युत स्पार्क से भी ऑक्सीजन ओज़ोन में बदल जाती है।
ओजोन परत क्या है?
ओज़ोन परत(अंग्रेज़ी: Ozone Layer) पृथ्वी के धरातल से 20-30 किमी की ऊंचाई पर वायुमण्डल के समताप मंडल क्षेत्र में ओज़ोन गैस का एक झीना सा आवरण है। वायुमंडल के आयतन कें संदर्भ में ओज़ोन परत की सांद्रता लगभग 10 पीपीएम है। यह ओज़ोन परत पर्यावरण की रक्षक है। ओज़ोन परत हानिकारक पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी पर आने से रोकती है।
यदि सूर्य से आने वाली सभी पराबैगनी किरणें पृथ्वी पर पहुँच जाती तो पृथ्वी पर सभी प्राणी रोग(कैंसर जैसे) से पीड़ित हो जाते। सभी पेड़ पौधे नष्ट हो जाते।लेकिन सूर्य विकिरण के साथ आने वाली पराबैगनी किरणों का लगभग 99% भाग ओजोन मण्डल द्वारा सोख लिया जाता है। जिससे पृथ्वी पर रहने वाले प्राणी वनस्पति तीव्र ताप व विकिरण से सुरक्षित बचे हुए है। इसीलिए ओजोन मण्डल या ओजोन परत को सुरक्षा कवच कहते हैं।
पराबैगनी किरणों से नुकसान
आमतौर पर ये पराबैगनी किरण [अल्ट्रा वायलेट रेडिएशन] सूर्य से पृथ्वी पर आने वाली एक किरण है जिसमें ऊर्जा ज्यादा होती है। यह ऊर्जा ओजोन की परत को नष्ट या पतला कर रही है। इन पराबैगनी किरणों को तीन भागों में बांटा गया है और इसमें से सबसे ज्यादा हानिकारक यूवी-सी 200-280 होती है। ओजोन परत हमें उन किरणों से बचाती है, जिनसे कई तरह की बीमारियां होने का खतरा रहता है। पराबैगनी किरणों [अल्ट्रा वायलेट रेडिएशन] की बढ़ती मात्रा से चर्म कैंसर, मोतियाबिंद के अलावा शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है। यही नहीं, इसका असर जैविक विविधता पर भी पड़ता है और कई फसलें नष्ट हो सकती हैं। इनका असर सूक्ष्म जीवाणुओं पर होता है। इसके अलावा यह समुद्र में छोटे-छोटे पौधों को भी प्रभावित करती जिससे मछलियों व अन्य प्राणियों की मात्रा कम हो सकती है।
ओजोन-क्षरण के प्रभाव
मनुष्य तथा जीव-जंतु – यह त्वचा-कैंसर की दर बढ़ाकर त्वचा को रूखा, झुर्रियों भरा और असमय बूढ़ा भी कर सकता है। यह मनुष्य तथा जंतुओं में नेत्र-विकार विशेष कर मोतियाबिंद को बढ़ा सकती है। यह मनुष्य तथा जंतुओं की रोगों की लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता को कम कर सकता है।
वनस्पतियां-पराबैंगनी विकिरण वृद्धि पत्तियों का आकार छोटा कर सकती है अंकुरण का समय बढ़ा सकती हैं। यह मक्का, चावल, सोयाबीन, मटर गेहूं, जैसी पसलों से प्राप्त अनाज की मात्रा कम कर सकती है।
खाद्य-शृंखला- पराबैंगनी किरणों के समुद्र सतह के भीतर तक प्रवेश कर जाने से सूक्ष्म जलीय पौधे (फाइटोप्लैकटॉन्स) की वृद्धि धीमी हो सकती है। ये छोटे तैरने वाले उत्पादक समुद्र तथा गीली भूमि की खाद्य-शृंखलाओं की प्रथम कड़ी हैं, साथ ही ये वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड को दूर करने में भी योगदान देते हैं। इससे स्थलीय खाद्य-शृंखला भी प्रभावित होगी।
पदार्थ – बढ़ा हुआ पराबैंगनी विकिरण पेंट, कपड़ों को हानि पहुंचाएगा, उनके रंग उड़ जाएंगे। प्लास्टिक का फर्नीचर, पाइप तेजी से खराब होंगे।
विस्तार से : https://vigyanvishwa.in/2015/09/16/worldozoneday/
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