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29/04/2026
29/04/2026
31/12/2025

कर्नाटक के इस गाँव ने पेश की मिसाल! 📱🚫
​क्या आप सोच सकते हैं कि आज के दौर में कोई पूरा गाँव एक साथ मोबाइल और टीवी बंद कर दे? कर्नाटक के बेलगावी जिले के हलगा गाँव ने यह कर दिखाया है!
​यहाँ हर शाम 7 बजे सायरन बजते ही लोग अपने स्मार्टफोन और टेलीविजन बंद कर देते हैं। रात 9 बजे तक चलने वाले इस 'डिजिटल ऑफ' समय का उद्देश्य बहुत ही प्रेरणादायक है:
​✅ बच्चों की पढ़ाई: शोर और डिजिटल व्याकुलता के बिना बच्चे शांति से पढ़ाई कर सकें।
✅ पारिवारिक संवाद: परिवार के सदस्य स्क्रीन में खोने के बजाय आपस में बातचीत करें।
✅ मानसिक स्वास्थ्य: सोशल मीडिया की भागदौड़ से दूर कुछ समय सुकून के साथ बिताना।
​रात 9 बजे दोबारा सायरन बजने पर ही लोग अपने डिवाइस वापस ऑन करते हैं। अनुशासन और सामुदायिक एकता का यह उदाहरण बताता है कि अगर हम चाहें, तो तकनीक के गुलाम बनने के बजाय उसे नियंत्रित कर सकते हैं।
​इस बेहतरीन पहल के बारे में आपका क्या सोचना है? क्या हमारे शहरों और मोहल्लों में भी ऐसी शुरुआत होनी चाहिए?
​💬 कमेंट में अपनी राय जरूर दें और इस सकारात्मक खबर को शेयर करें!

30/12/2025

अपमान को बनाया ताकत: महाराष्ट्र के 'माउंटेन मैन' बापूराव ताजने की अद्भुत गाथा! 🙏🔥
​दोस्तों, क्या आपने कभी सोचा है कि एक इंसान का आत्मसम्मान क्या कुछ नहीं करवा सकता?
​महाराष्ट्र के वाशिम जिले के एक छोटे से गांव में रहने वाले बापूराव ताजने की कहानी आज हर किसी के लिए प्रेरणा है।
​📍 क्या थी घटना?
जब बापूराव की पत्नी को "ऊँची जाति" के कुएं से पानी लेने से रोका गया और उनका अपमान किया गया, तो बापूराव ने बहस नहीं की। उन्होंने ठान लिया कि अब वो किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएंगे।
​💪 अकेले किया असंभव को संभव:
​जहाँ गांव वालों ने मजाक उड़ाया और उन्हें 'पागल' कहा...
​जहाँ पथरीली जमीन पर पानी मिलना नामुमकिन था...
​वहाँ बापूराव ने अकेले ही कुदाल उठाई और लगातार 40 दिनों तक हर रोज 6 घंटे खुदाई की।
​💧 परिणाम: 40 दिनों की कड़ी तपस्या के बाद धरती मां ने पानी दे दिया! आज वो कुआं न केवल उनके परिवार की, बल्कि पूरे दलित समुदाय की प्यास बुझा रहा है।
​सीख: इतिहास गवाह है, जब-जब किसी का अपमान हुआ है और उसने उसे अपनी ताकत बनाया है, तब-तब एक नया इतिहास लिखा गया है। बापूराव ताजने का यह जज्बा हमें सिखाता है कि "अगर इरादा पक्का हो, तो पत्थर से भी पानी निकाला जा सकता है।"
​सलाम है ऐसे महानायक को!

30/12/2025

शोले—हिंदी सिनेमा का वो अमर रत्न जो 15 अगस्त 1975 को रिलीज हुआ और आज भी थिएटर्स में खाली सीटें नहीं छोड़ता। रमेश सिप्पी के निर्देशन में बनी ये फिल्म दो छोटे-मोटे अपराधियों जय (अमिताभ बच्चन) और वीरू (धर्मेंद्र) की कहानी है, जो ठाकुर बलदेव सिंह (संजीव कुमार) के गांव रामगढ़ पहुंचते हैं। ठाकुर ने अपने हाथ गंवा दिए हैं डाकू गब्बर सिंह (अमजद खान) के हाथों, और बदला लेने के लिए इन दोनों को बुलाया है। लेकिन ये सिर्फ बदले की कहानी नहीं, दोस्ती, प्यार, हंसी-खुशी और डरावने संघर्ष का ऐसा मेल है जो पीढ़ियों को बांधे रखता है।
फिल्म की शुरुआत ही धमाकेदार है—ट्रेन पर डकैती, जिसमें जय-वीरू की जोड़ी पहली बार चमकती है। रामगढ़ पहुंचकर वीरू को बसंती (हेमा मालिनी) से प्यार हो जाता है, जो घोड़ा गाड़ी चलाती है और बक-बक नहीं रुकती। जय चुप्पी साधे राधा (जया बच्चन) की तरफ आकर्षित होता है, जो ठाकुर की बहू है। लेकिन असली हीरो है गब्बर—अमजद खान का वो किरदार जो “कितने आदमी थे?” कहकर आज भी रोंगटे खड़े कर देता है। गब्बर के दहशत भरे संवाद, कालिया को सजा देना, और ठाकुर के हाथ काटना—ये सीन आज भी मीम्स और रील्स के राजा हैं।
शूटिंग के किस्से तो और भी दिलचस्प हैं। रामनगरम (कर्नाटक) में पूरा रामगढ़ गांव बसाया गया, सड़कें बनाई गईं। फिल्म 3.5 साल चली, बजट फ overspend हो गया। धर्मेंद्र ठाकुर का रोल चाहते थे, लेकिन हेमा मालिनी के साथ रोमांस जानकर वीरू बन गए। अमजद खान को गब्बर के लिए चुना गया शायद इसलिए क्योंकि उनकी आवाज में वो खतरनाक गहराई थी। जया बच्चन प्रेग्नेंट थीं, फिर भी शूटिंग की। संजीव कुमार को हेमा से प्यार हो गया था, लेकिन उन्होंने प्रोफेशनल रहना चुना। आर.डी. बर्मन के गाने—“ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे”, “मेहबूबा”, “होली के दिन”—आज भी वायरल हैं। जय का मरना वाला सीन इतना इमोशनल है कि थिएटर में आज भी सिसकियां आ जाती हैं।
शोले ने बॉलीवुड को बदल दिया। सलीम-जावेद की स्क्रिप्ट ने राइटर्स को स्टार बना दिया। मल्टी-स्टारर फॉर्मूला यहीं से पॉपुलर हुआ। पहले वीक में फ्लॉप कहा गया, लेकिन वर्ड ऑफ माउथ से 5 साल तक थिएटर्स जमी रही। 19 साल तक सबसे ज्यादा कमाई करने वाली रही। आज 50 साल बाद भी डायलॉग्स—“बसंती, इन कुत्तों के सामने मत नाचना”, “ढाकुर न झुकता है न टूटता है”, “अरे ओ सम्भा, कितने आदमी थे?”—हर घर में गूंजते हैं। पॉप कल्चर का हिस्सा बन गई—जय-वीरू दोस्ती की मिसाल, गब्बर विलेन का सिंबल।
शोले सिर्फ फिल्म नहीं, भावनाओं का समंदर है। हंसी के ठहाके असरानी के जेलर से, रोमांस हेमा-धर्मेंद्र से, इमोशन जया-अमिताभ से, और एक्शन गब्बर से। ये फिल्म सिखाती है—दोस्ती जिंदगी से बड़ी होती है, बदला लेना होता है तो दिल से, और असली विलेन वो जो डराता नहीं, याद रह जाता है। आज भी टीवी पर आती है तो पूरा परिवार चिपक जाता है। शोले का जादू कभी फीका नहीं पड़ेगा।

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