Astromancy

Astromancy

Share

Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Astromancy, Chander Nagar Road, New Tagore Nagar, Ludhiana.

19/10/2019

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥

भावार्थ : तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो॥

English Translation of Sanskrit Quote:

Your right is to the duty only, not to the fruits thereof.
Do not act for the results of your deeds. Never be attached to not doing the duty.

18/09/2019

पुराणों की उत्पत्ति

पुराण, हिंदुओं के धर्मसंबंधी आख्यानग्रंथ हैं जिनमें सृष्टि, लय, प्राचीन ऋषियों, मुनियों और राजाओं के वृत्तात आदि हैं। ये वैदिक काल के काफ़ी बाद के ग्रन्थ हैं, जो स्मृति विभाग में आते हैं। भारतीय जीवन-धारा में जिन ग्रन्थों का महत्वपूर्ण स्थान है उनमें पुराण भक्ति-ग्रंथों के रूप में बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। अठारह पुराणों में अलग-अलग देवी-देवताओं को केन्द्र मानकर पाप और पुण्य, धर्म और अधर्म, कर्म और अकर्म की गाथाएँ कही गई हैं। कुछ पुराणों में सृष्टि के आरम्भ से अन्त तक का विवरण किया गया है। इनमें हिन्दू देवी-देवताओं का और पौराणिक मिथकों का बहुत अच्छा वर्णन है।

ब्रम्ह पुराण में 10000 श्लोक है ,
नारदिए पुराण में 25000 श्लोक हैं,
पदम् पुराण में 55000 श्लोक है ,
विष्णु पुराण में 23000 श्लोक है ,
शिव पुराण में 24000 श्लोक है ,
श्री मद भागवत पुराण में 18000 श्लोक है ,
मार्कंडेय पुराण में 9000 श्लोक है ,
अग्नि पुराण में 15400 श्लोक है ,
भविष्य पुराण में 14500 श्लोक है ,
लिंग पुराण में 11000 श्लोक है ,
वराह पुराण में 24000 श्लोक है ,
इस्कंद पुराण ने 81100 श्लोक है ,
वामन पुराण में 10000 श्लोक है ,
कुर्म पुराण में 17000 श्लोक है ,
ब्रम्हा वैवर्त पुराण में 18000 श्लोक है ,
मत्सत्य पुराण में 14000 श्लोक है ,
गरुण पुराण में 19000 श्लोक है ,
ब्रह्माण्ड पुराण में 12000 श्लोक है ,
इस प्रकार सब पुराणों की श्लोक संख्या 4 लाख होती है भगवद जी की श्लोक संख्या 18000 है और कुल स्कंद 12 है जिनमे 326अध्याय है तथा इन 326 अध्यायों के अंतर्गत 763 कथाये।।

सनातन धर्म की जय हो।

विशेष निवेदन:-
अगर आप इस पेज के पोस्टों को सच में पसंद करते हैं और चाहते हैंकि इस पेज की पहुॅच सर्वाधिक समाज तक हो सके तो कृपया
कर इस पेज को ज्यादा से ज्यादा लाइक एवं शेयर कर अपना बहुमूल्य योगदान प्रदान करे ताकि हम सर्व समाज में ज्ञान का विस्तार करने में सफल हों सकें ।

धन्यवाद ।

राधेकृष्ण
श्री राधा विजयते नमः

Photos from Astromancy's post 11/09/2019

हिन्दूधर्म के अनुसार, प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारम्भ में माता-पिता, पूर्वजों को नमस्कार प्रणाम करना हमारा कर्तव्य है, हमारे पूर्वजों की वंश परम्परा के कारण ही हम आज यह जीवन देख रहे हैं, इस जीवन का आनंद प्राप्त कर रहे हैं।श्राद्ध हमारे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने का एक सनातन वैदिक संस्कार हैं। जिन पूर्वजों के कारण हम आज अस्तित्व में हैं,जिनसे गुण व कौशल , आदि हमें विरासत में मिलें हैं । उनका हम पर न चुकाये जा सकने वाला ऋण हैं। उन्होंने हमारे लिए हमारे जन्म के पूर्व ही व्यवस्था कर दी थी। वे हमारे पूर्वज पूजनीय हैं , उन्हें हम इस श्राद्ध पक्ष में स्मरण कर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं। वास्तव में, वे प्रतिदिन स्मरणीय हैं। श्राद्ध पक्ष विशेषतः उनके स्मरण हेतु निर्धारित किया गया हैं। इस धर्म मॆं, ऋषियों ने वर्ष में एक पक्ष को पितृपक्ष का नाम दिया, जिस पक्ष में हम अपने पितरेश्वरों का श्राद्ध, तर्पण, मुक्ति हेतु विशेष क्रिया संपन्न कर उन्हें अर्ध्य समर्पित करते हैं।

पितृ पक्ष का नाम लेते ही हमारे मन में आस्था और श्रद्धा स्वतः ही प्रकट हो जाती है। पितृ अर्थात हमारे पूर्वज, जो अब हमारे बीच में नहीं हैं, उनके प्रति सम्मान का समय होता है पितृपक्ष अर्थात महालय। अपने पूर्वजों को समर्पित यह विशेष समय आश्विन मास के कृष्ण पक्ष से प्रारंभ होकर अमावस्या तक के 16 दिनों की अवधि पितृ पक्ष अर्थात श्राद्ध पक्ष कहलाती है। हिंदू धर्म पुनर्जन्म की अवधारणा में विश्वास रखता है और इसलिए ऐसी मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान हमारे पितृ अर्थात हमारे पूर्वज जो अपना देह त्याग चुके होते हैं, पृथ्वी लोक पर अपने सगे-संबंधी और परिवार के लोगों से अपनी मुक्ति और भोजन लेने के लिए मिलने आते हैं। वास्तव में अपने पूर्वजों के निमित्त श्रद्धा पूर्वक किया हुआ कार्य ही श्राद्ध है।

ज्योतिष के अनुसार पितृ पक्ष
वैदिक ज्योतिष के अनुसार जब सूर्य का प्रवेश कन्या राशि में होता है तो, उसी दौरान पितृ पक्ष मनाया जाता है। पंचम भाव हमारे पूर्व जन्म के कर्मों के बारे में इंगित करता है और काल पुरुष की कुंडली में पंचम भाव का स्वामी सूर्य माना जाता है इसलिए सूर्य को हमारे कुल का द्योतक भी माना गया है।

कन्यागते सवितरि पितरौ यान्ति वै सुतान,
अमावस्या दिने प्राप्ते गृहद्वारं समाश्रिता:
श्रद्धाभावे स्वभवनं शापं दत्वा ब्रजन्ति ते॥

इस का सामान्य अर्थ यह है कि जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है तो सभी पितृ एक साथ मिलकर अपने पुत्र और पौत्रों (पोतों) यानि कि अपने वंशजों के द्वार पर पहुंच जाते हैं। इसी दौरान पितृपक्ष के समय आने वाली आश्विन अमावस्या को यदि उनका श्राद्ध नहीं किया जाता तो वह कुपित होकर अपने वंशजों को श्राप देकर वापस लौट जाते हैं। यही वजह है कि उन्हें फूल, फल और जल आदि के मिश्रण से तर्पण देना चाहिए तथा अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार उनकी प्रशंसा और तृप्ति के लिए प्रयास करना चाहिए।

व्यक्ति अपने कर्मों के अनुसार ही अपनी गति प्राप्त करता है। यह गति तीन प्रकार की होती है: उर्ध्व गति अर्थात स्वर्ग लोक प्राप्त करना, अधोगति अर्थात बुरे कर्मों के कारण मानव जीवन से नीचे की योनियों में जाना तथा स्थिर गति, जिसमें उन्हें मानव जीवन प्राप्त हो सकता है। जिस प्रकार मानव शरीर को उसका कंकाल आकार देता है और रीड़ की हड्डी मजबूती देती है, ठीक उसी प्रकार हमारे कर्म भी हमारे जीवन को प्रभावित करते हुए आने वाले समय की व्याख्या करते हैं।

जिन लोगों के वंश में हमने जन्म लिया वे हमारे पूर्वज हैं इसलिए श्रद्धा पूर्वक उनके लिए अन्न आदि का दान करना हमारा कर्तव्य भी है और इसी के कारण हम उन्हें एक प्रकार से धन्यवाद भी देते हैं।

जो लोग अपने पितरों का विधि पूर्वक श्राद्ध कर्म नहीं करते और उनकी पूजा-अर्चना नहीं करते, उनकी कुंडली में पितृ दोष का निर्माण होता है और उसके द्वारा व्यक्ति को जीवन पर्यंत अनेक प्रकार के कष्टों को भोगना पड़ता है।

पितृ पक्ष 2019 श्राद्ध तिथियां (Shradh Tithi 2019)

13 सितंबर- पूर्णिमा श्राद्ध
14 सितंबर- प्रतिपदा
15 सितंबर- द्वितीया
17 सितंबर- तृतीया
18 सितंबर- चतुर्थी , महा भरणी
19 सितंबर- पंचमी
20 सितंबर - षष्ठी
21 सितंबर - सप्तमी
22 सितंबर - अष्टमी
23 सितंबर - नवमी
24 सितंबर - दशमी
25 सितंबर - एकादशी, द्वादशी
26 सितंबर - मघा श्राद्ध, त्रयोदशी
27 सितंबर - चतुर्दशी
28 सितंबर - सर्वपित्र अमावस्या

11/09/2019

धेनुकासुर राक्षस का वध क्यों किया बलराम ने?
वृंदावन में रहते हुए अब बलराम और श्रीकृष्ण ने पौगण्ड-अवस्था में अर्थात छठे वर्ष में प्रवेश किया। बलरामजी और श्रीकृष्ण के सखाओं में एक प्रधान गोपबालक थे श्रीदामा। एक दिन उन्होंने बड़े प्रेम से बलराम और श्रीकृष्ण से बोला कि - हम लोगों को सर्वदा सुख पहुंचाने वाले बलरामजी। आपके बाहुबल की तो कोई थाह ही नहीं है। हमारे मनमोहन श्रीकृष्ण। दुष्टों को नष्ट कर डालना तो तुम्हारा स्वभाव ही है।

यहां से थोड़ी ही दूर पर एक बड़ा भारी वन है। उसमें बहुत सारे ताड़ के वृक्ष हैं। वे सदा फलों से लदे रहते हैं। वहां धेनुक नाम का दुष्ट दैत्य भी रहता है। उसने उन फलों पर रोक लगा रखी है। वह दैत्य गधे के रूप में रहता है। श्रीकृष्ण। हमें उन फलों को खाने की बड़ी इच्छा है।

अपने सखा ग्वालबालों की यह बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी दोनों हंसे और फिर उन्हें प्रसन्न करने के लिए उनके साथ तालवन के लिए चल पड़े। उस वन में पहुंचकर बलरामजी ने अपनी बांहों से उन ताड़ के पेड़ों को पकड़ लिया और बड़े जोर से हिलाकर बहुत से फल नीचे गिरा दिए। जब गधे के रूप में रहने वाले दैत्य ने फलों के गिरने का शब्द सुना, तब वह बलराम की ओर दौड़ा।

बलरामजी ने अपने एक ही हाथ से उसके दोनों पैर पकड़ लिए और उसे आकाश में घुमाकर एक ताड़ के पेड़ पर दे मारा। घुमाते समय ही उस गधे के प्राणपखेरू उड़ गए। धेनुकासुर को जिस तरह मारा, ग्वालबाल बलराम के बल की प्रशंसा करते नहीं थकते। धेनुकासुर वह है जो भक्तों को भक्ति के वन में भी आनंद के मीठे फल नहीं खाने देता। बलराम बल और शौर्य के प्रतीक हैं, जब कृष्ण हृदय में हो तो बलराम के बिना अधूरे हैं। बलराम ही भक्ति के आनंद को बढ़ाने वाले हैं। ग्वालबाल अब मीठे फल भी खा रहे हैं।....
जय श्री बलराम कृष्ण की....
जय श्री राधे

10/09/2019

श्री वामन द्वादशी की शुभकामनाऐं।

According to the Hindu Scriptures, the significance of Vamana Jayanti increases if it falls on Shravan Nakshatra. Devotees worship the idol of Lord Vamana with rituals. A devotee who worships him with full devotion gets freedom from all sufferings and attains salvation.

Lord Vamana is one of the incarnations of Lord Vishnu. It is the fifth avatar of Lord Vishnu. Shrimudagvad Purana and Vishnu Purana have described Vamana incarnation of Lord Vishnu in great detail. It describes the glory of Lord Vamana.

As per the legends, Bali, the king of Asuras became unconscious from the attack of Lord Indra and was on the death bed. At that point of time, Shukracharya gave him life-saving herb (Sanjeevani) to all the Asuras who were unconscious and helped them to regain their life. Later, King Bali performed an austerity and became powerful than Devas. He achieved divine chariot, trident, and armor through his austerities. He went back to battle with Devas in the heaven.

Lord Indra knew about the intentions of King Bali. He will be able to conquer heaven in this battle after completing 100 yajnas. Hence, Indra went to Lord Vishnu and asked for his help. To protect Devas from the Asuras, Lord Vishnu decided to incarnate as Lord Vamana. He took the birth from the womb of Aditi, wife of Sage Kashyap on the Shukla Paksha of Bhadrapad. He was named Vamana who adopt the form of Brahmachari.

Vamana received Deerskin from Agastya, Butea rod from Mariachi, clothes from Angiras, An umbrella from Sun, Sacred thread and Kamandal from Guru Deva, Loincloth from Aditi, Rudraksha from Saraswati and bowl from Kuber. When Vamana grew up, he went to King Bali on the day of his 100th Ashwamedh Yagna. King Bali wanted to give Dakshina to Brahmin Vamana. Lord Vamana asked for three pieces of land that he could measure with his feet. Since Bali had made a promise, he could not deny it. Vamana took the first step, encompassing the whole earth. With the second step, he covered the heavens. He conquered two of the three worlds. There was no place to keep the third step hence Bali offered his head. Vamana placed his last step on Bali’s head.

Lord Vishnu was pleased by the integrity of Bali.

04/09/2019

कुरक्षेत्र के युद्ध मे दुर्योधन सहित जब सारे पुत्र मर गये तो धृतराष्ट्र खूब दुःखी हुए और विदुर से कहने लगे कृष्ण और पाण्डवो ने मिलकर मेरे सब पुत्रो का संहार कर दिया है इसका दुःख मुझसे सहन नही होता एक एक क्षण व्यतीत करना मुझे वर्षो जैसा लम्बा लग रहा है
विदुर धृतराष्ट्र को समझाते हुए कहते है जो होना होता है होकर ही रहता है आप व्यर्थ मे शोक न करो आत्मा अमर है उसके लिए मृत्यु जैसी कोई चीज नही है इस शरीर को छोडकर जो जाता है वह वापस नही आता इस बात को समझकर राम राखे तेम रहिए हे भाई शोक न करो परन्तु धृतराष्ट्र का शोक कम नही हुआ वह दृढतापूर्वक कहने लगा तुम कहते हो वह सब समझता हूँ फिर भी मेरा दुख कम नही होता मुझे अपने पुत्रो के बिना चैन नही पड रहा है पल भर को भी चित्त शांत नही रहता अज्ञानी सोचता है कि जिस प्रकार मै सोचता हूँ उसी प्रकार सब हो जाए तो मुझे सुख हो यही मनुष्य का अज्ञान है शास्त्र और संतो का कितना भी उपदेश सुनने को मिल जाए तो भी वो अपनी मान्यताओ का मोह सरलता से छोडने को तैयार नही होता विदुर का धर्मयुक्त उपदेश धृतराष्ट्र को सान्त्वना नही दे सका धृतराष्ट्र शास्त्रो से बिल्कुल अनभिज्ञ था ऐसी बात नही थी फिर भी उसका शास्त्र ज्ञान उसे पुत्रो के मोह से मुक्त नही कर सका।
जय श्री कृष्णा

29/08/2019

गाँव के कुएँ से तीन महिलाऐ पानी भर रही थी एक महिला का पुत्र वहाँ से निकला तो उसे देख कर वह महिला बोली, देखो वह मेरा पुत्र है यहाँ का सबसे बड़ा पहलवान है। फिर दूसरी महिला का पुत्र वहाँ से गुजरा जिसे देख कर वो महिला बोली, देखो ये मेरा पुत्र बड़ा विद्वान है। तभी तीसरी महिला का पुत्र वहा से जा रहा था, माँ को देख कर माँ के पास आया, पानी का घड़ा उठा लिया और बोला, चलो माँ घर चले। उस माँ की ख़ुशी भरी आँखों के सामने उन दोनो महिलाओ की नज़रे झुक गयी, वो समझ चुकी थी कि सुपुत्र कौन है।
Moral:- गुण बताये नही जाते अपने आप दिख जाते हैं।🙏🌹

16/04/2019

पुराणों की उत्पत्ति

पुराण, हिंदुओं के धर्मसंबंधी आख्यानग्रंथ हैं जिनमें सृष्टि, लय, प्राचीन ऋषियों, मुनियों और राजाओं के वृत्तात आदि हैं। ये वैदिक काल के काफ़ी बाद के ग्रन्थ हैं, जो स्मृति विभाग में आते हैं। भारतीय जीवन-धारा में जिन ग्रन्थों का महत्वपूर्ण स्थान है उनमें पुराण भक्ति-ग्रंथों के रूप में बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। अठारह पुराणों में अलग-अलग देवी-देवताओं को केन्द्र मानकर पाप और पुण्य, धर्म और अधर्म, कर्म और अकर्म की गाथाएँ कही गई हैं। कुछ पुराणों में सृष्टि के आरम्भ से अन्त तक का विवरण किया गया है। इनमें हिन्दू देवी-देवताओं का और पौराणिक मिथकों का बहुत अच्छा वर्णन है।

18 पुराणों के नाम:

1. ब्रह्मपुराण
2. पद्मपुराण
3. विष्णुपुराण
4. वायुपुराण
5. भागवतपुराण
6. नारद (बृहन्नारदीय) पुराण
7. मार्कण्डयपुराण
8. अग्निपुराण
9. भविष्यपुराण
10. ब्रह्मवैवर्तपुराण
11. लिङ्गपुराणः
12. वराहपुराण
13. स्कन्दपुराण
14. वामनपुराण
15. कूर्मपुराण
16. मत्स्यपुराण
17. गरुडपुराण
18. ब्रह्माण्डपुराण

विशेष निवेदन:-
अगर आप इस पेज के पोस्टों को सच में पसंद करते हैं और चाहते हैं कि इस पेज की पहुँच सर्वाधिक समाज तक हो सके तो कृप्या
कर इस पेज को ज्यादा से ज्यादा लाइक एवं शेयर कर अपना बहुमूल्य योगदान प्रदान करे ताकि हम सर्व समाज में ज्ञान का विस्तार करने में सफल हों सकें ।

धन्यवाद ।

राधेकृष्ण
श्री राधा विजयते नमः

10/11/2018

गागर में सागर छलक उठा, जग कहता-गागर खाली है,
मीरा पीड़ा के गीत लिखे, तुम कहते हो 'मतवाली है' !
ज़िन्दगी विवश है पतझर में, आँखें कहतीं-हरियाली है
गागर में सागर छलक उठा, जग कहता-गागर खाली है!
जो जला प्रकाश का व्रत लेकर, केवल परवाना कैसे है?
जो बिना सफ़र के मिल जाये वह मंज़िल पाना कैसे है?
दीपक पर जले पतंग मगर, इन्सान कहे-दिवाली है,
गागर में सागर छलक उठा, जग कहता-गागर खाली है!

।।राधेकृष्ण।।

10/05/2018

*हरे कृष्ण*

11 मई 2018,शुक्रवार को "अपरा एकादशी" है ।
एकादशी के दिन हरे कृष्ण महामंत्र का ज्यादा से ज्यादा जप करे ।

*पद्म पुराण* से...
"अपरा एकादशी की कथा"...

युधिष्ठिर ने पूछा : जनार्दन ! ज्येष्ठ मास के कृष्णपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है? मैं उसका माहात्म्य सुनना चाहता हूँ । उसे बताने की कृपा कीजिये ।

भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! आपने सम्पूर्ण लोकों के हित के लिए बहुत उत्तम बात पूछी है । राजेन्द्र ! ज्येष्ठ मास के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम ‘अपरा’ है । यह बहुत पुण्य प्रदान करनेवाली और बड़े बडे पातकों का नाश करनेवाली है । ब्रह्महत्या से दबा हुआ, गोत्र की हत्या करनेवाला, गर्भस्थ बालक को मारनेवाला, परनिन्दक तथा परस्त्रीलम्पट पुरुष भी ‘अपरा एकादशी’ के सेवन से निश्चय ही पापरहित हो जाता है । जो झूठी गवाही देता है, माप तौल में धोखा देता है, बिना जाने ही नक्षत्रों की गणना करता है और कूटनीति से आयुर्वेद का ज्ञाता बनकर वैद्य का काम करता है-- ये सब नरक में निवास करनेवाले प्राणी हैं । परन्तु ‘अपरा एकादशी’ के सेवन से ये भी पापरहित हो जाते हैं । यदि कोई क्षत्रिय अपने क्षात्रधर्म का परित्याग करके युद्ध से भागता है तो वह क्षत्रियोचित धर्म से भ्रष्ट होने के कारण घोर नरक में पड़ता है । जो शिष्य विद्या प्राप्त करके स्वयं ही गुरुनिन्दा करता है, वह भी महापातकों से युक्त होकर भयंकर नरक में गिरता है । किन्तु ‘अपरा एकादशी’ के सेवन से ऐसे मनुष्य भी सदगति को प्राप्त होते हैं ।

माघ में जब सूर्य मकर राशि पर स्थित हो, उस समय प्रयाग में स्नान करनेवाले मनुष्यों को जो पुण्य होता है, काशी में शिवरात्रि का व्रत करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, गया में पिण्डदान करके पितरों को तृप्ति प्रदान करनेवाला पुरुष जिस पुण्य का भागी होता है, बृहस्पति के सिंह राशि पर स्थित होने पर गोदावरी में स्नान करनेवाला मानव जिस फल को प्राप्त करता है, बदरिकाश्रम की यात्रा के समय भगवान केदार के दर्शन से तथा बदरीतीर्थ के सेवन से जो पुण्य फल उपलब्ध होता है तथा सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में दक्षिणासहित यज्ञ करके हाथी, घोड़ा और सुवर्ण दान करने से जिस फल की प्राप्ति होती है; ‘अपरा एकादशी’ के सेवन से भी मनुष्य वैसे ही फल प्राप्त करता है । ‘अपरा’ का उपवास करके भगवान वामन की पूजा करने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो श्रीविष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है । इसको पढ़ने और सुनने से सहस्र गौदान का फल मिलता है ।

"सभी भक्तों से विनंती है अपरा एकादशी का अवश्य व्रत करें और अपना जीवन सफल करें !"

*हरे कृष्ण*

विशेष निवेदन:-
अगर आप इस पेज के पोस्टों को सच में पसंद करते हैं और चाहते हैंकि इस पेज की पहुॅच सर्वाधिक समाज तक हो सके तो कृपया
कर इस पेज को ज्यादा से ज्यादा लाइक एवं शेयर कर अपना बहुमूल्य योगदान प्रदान करे ताकि हम सर्व समाज में ज्ञान का विस्तार करने में सफल हों सकें ।

धन्यवाद ।

राधेकृष्ण
श्री राधा विजयते नमः

Want your school to be the top-listed School/college in Ludhiana?

Click here to claim your Sponsored Listing.

Location

Culinary Team

Attire

Telephone

Website

Address


Chander Nagar Road, New Tagore Nagar
Ludhiana
141001