TnKaushal
Ex. Indian foreign service officer
यहाँ फ्री में मोटिवेशन का antivirus मिलता है.
अगला संघर्ष इस बात के लिए होगा कि हमारी जाति का सही डाटा नहीं दिया गया.
लोकतंत्र की मृत्यु कोई एक दिन में नहीं होती।
वह धीरे-धीरे होती है —
पहले विचार मरते हैं,
फिर संवाद,
फिर असहमति,
और अंततः — नागरिक।
उसके बाद जो बचता है,
वह सत्ता होती है —
बिना आत्मा की सत्ता।
कहीं ऐसा न हो कि टोटल जनसंख्या से ज्यादा जातियों (उपजातियों) की संख्या निकल आए.
(या अल्लाह, गौड़ों में भी कौन से गौड़)
कोयला कभी हीरा नहीं बनता।
कितनी ही बार सुना होगा — "दबाव में कोयला भी हीरा बन जाता है।"
Reality check? नहीं बनता।
कोयला अलग है, हीरा अलग।
हीरा बनने के लिए जो शुद्धता, जो परिस्थितियाँ चाहिए — वो कोयले के आसपास नहीं होती।
कोयला और हीरा दोनों कार्बन से बने होते हैं,लेकिन अलग प्रकार के कार्बन और अलग परिस्थितियों में.
कोयला बनता है
—पेड़-पौधों के सड़ने और दबने से, सतह के पास,
जबकि
हीरा बनता है —
पृथ्वी के 150–200 किलोमीटर अंदर,
बहुत अधिक दबाव और तापमान में,
और शुद्ध कार्बन स्रोत से (जैसे ग्रेफाइट या कार्बोनेट चट्टानें)।
हर कोई हीरे की तरह चमकने के लिए नहीं होता,
कुछ को बस
सुलगना पड़ता है
- कोयले की तरह.
हम जिस 'वर्तमान' को जीते हैं, वह वास्तव में बीते हुए अनुभवों की परछाईं है। हमारा मस्तिष्क हर क्षण को अतीत के अनुभवों, स्मृतियों, धारणाओं, और उम्मीदों के चश्मे से देखता है। इस कारण हम "शुद्ध वर्तमान" में नहीं होते, बल्कि उस पर "समय की परतें" चढ़ी होती हैं।
मनुष्य का मस्तिष्क एक प्रेडिक्टिव मशीन (predictive machine) की तरह काम करता है — वह हर नए अनुभव की व्याख्या पुराने डेटा के आधार पर करता है। इसलिए नया भी पुराना लगता है। यही कारण है कि हम "अब" में नहीं जी पाते, बल्कि "अब जैसा अतीत" जीते रहते हैं।
आइंस्टीन का भी यह कहना था कि समय एक मनोवैज्ञानिक अनुभव है। यानी समय का अनुभव केवल मस्तिष्क की प्रोसेसिंग है — जब हम अतीत की परतों से भरे होते हैं, तो वर्तमान हमें धीमा, विकृत या बोझिल लग सकता है। लेकिन जब मन खाली होता है, तो समय रुक सा जाता है — और वही होता है शुद्ध वर्तमान।
काफ़्का, प्रुस्त और हेडेगर जैसे दार्शनिकों ने स्मृति और वर्तमान के द्वंद्व को इंसानी अस्तित्व की सबसे बड़ी उलझन माना है।
जब तक हम अतीत की मनोवैज्ञानिक परतों को नहीं उतारते, तब तक हम न तो वर्तमान को ठीक से देख सकते हैं, न ही उसमें हो सकते हैं.
और जब तक हम वर्तमान में नहीं हैं, तब तक सचेत रहना — या होश में रहना — एक भ्रम है।
तमिलनाडु गवर्नर प्रकरण: गवर्नर के विवेकाधिकार और संस्थागत संतुलन का संकट
तमिलनाडु गवर्नर और राज्य सरकार के बीच उत्पन्न विवाद अब केवल राजनीतिक टकराव नहीं रह गया है। सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ द्वारा दिया गया निर्णय, जिसमें गवर्नर को मंत्रिपरिषद की सलाह पर "अनिवार्य रूप से" कार्य करने वाला बताया गया, ने एक बड़ा संवैधानिक प्रश्न खड़ा कर दिया है: क्या संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों को विवेक की कोई स्वतंत्रता नहीं है?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में जो दृष्टिकोण अपनाया, वह गवर्नर की भूमिका को यंत्रवत बनाता है। यह व्याख्या भारत के संवैधानिक संघवाद की उस भावना के विपरीत जाती है, जिसमें राज्यपाल को न केवल केंद्र का प्रतिनिधि, बल्कि राज्य के संविधान संरक्षक की भूमिका भी दी गई है।
संविधान के अनुच्छेद 163(1) स्पष्ट रूप से कहता है कि कुछ विषयों पर राज्यपाल को अपने विवेक से निर्णय लेने का अधिकार है। यदि इस विवेक को पूरी तरह नकार दिया जाए, तो यह संविधान की मूल संरचना को चुनौती देना होगा।
राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल – ये सभी प्रतीकात्मक से अधिक संस्थागत विवेक के वाहक हैं।
न्यायालय का यह संकेत कि गवर्नर का कर्तव्य मंत्रिपरिषद की बात मानने तक सीमित है, इन पदों को "रबड़ स्टैम्प" बना देता है। यह न केवल लोकतंत्र में शक्ति संतुलन को कमजोर करता है, बल्कि न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप के रूप में भी देखा जा सकता है।
न्यायिक व्यवस्था में यह तर्क देना कि "विवेक का प्रयोग संविधान में नहीं लिखा है, इसलिए नहीं होगा", तर्कसंगत नहीं। संविधान मौन है, निषेधात्मक नहीं।
भारत जैसे लोकतंत्र में, जहाँ संस्थाएं आपसी संतुलन और नियंत्रण (checks and balances) से चलती हैं, वहाँ किसी भी पदाधिकारी को यंत्रवत बना देना लोकतंत्र को कमजोर करता है।
गवर्नर का विवेक सीमित हो सकता है, लेकिन शून्य नहीं। संविधान की आत्मा न्यायिक विवेक और कार्यकारी विवेक – दोनों के बीच संतुलन की मांग करती है।
न्यायपालिका को संविधान पीठ के माध्यम से इस संवैधानिक भ्रम को सुलझाना चाहिए।
यह मामला केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं है। महाराष्ट्र, पंजाब, केरल, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव सामने आ चुके हैं। ऐसे में, गवर्नर की भूमिका को लेकर एक सुस्पष्ट और संतुलित मार्गदर्शन आवश्यक है, जो केवल संविधान पीठ द्वारा ही दिया जा सकता है।
लोगों के पास काम का और स्टूडेंट्स के पास पढ़ाई का बोझ कम है. रील्स देखने, न्यूज़ की चुस्की लेने और वस्तुओं को जमा करने का दबाव ज्यादा.
इसके पीछे हैं विज्ञापन और इसे ही कहते हैं -उपभोक्तावाद
उत्सुकता मनुष्य को बेहतर बनाती है पर इसके लिए कौतूहल और जिज्ञासा के अंतर को समझना जरूरी है
कौतूहल एक क्षणिक उत्तेजना है, एक हल्की सी तरंग, जो किसी नई बात को देखकर, सुनकर या महसूस कर उत्पन्न होती है। यह किसी रहस्य को देख चौंकने जैसा है, किसी रोचक तथ्य को सुनकर विस्मित होने जैसा है।उदाहरण: कोई बच्चा पहली बार जादू का खेल देखता है और उसमें कौतूहल पैदा होता है कि यह कैसे हुआ।
वहीं, जिज्ञासा उस कौतूहल से आगे बढ़ती है। यह केवल चौंकाती नहीं, बल्कि व्यक्ति को उत्तर खोजने की दिशा में प्रवृत्त करती है।
उदाहरण: एक वैज्ञानिक किसी बीमारी के कारणों की जिज्ञासा के चलते गहराई से शोध करता है।
कौतूहल देखने तक सीमित रह सकता है, पर जिज्ञासा खोजने को विवश करती है।
कौतूहल से मनोरंजन संभव है, पर जिज्ञासा से आत्म-विकास।
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