धैर्य
एक गरीब किसान को उसके एक मित्र ने कुछ बीज दिये और उसे बताया कि ये बीज बांस के पेड़ की उस प्रजाति के हैं, जो चीन में पाए जाते है. इन पेड़ों की ऊँचाई 90 फीट तक होती है.
किसान ने वे बीज अपने मित्र से ले लिए और उन्हें अपने खेत में बो दिये. उसे आशा थी कि जिस दिन वे बांस के ऊंचे पेड़ बन जायेंगे, उन बांसों को बेचकर उसे अच्छी आमदनी होगी और उसका परिवार एक अच्छा जीवन जी पायेगा.
वह उन बीजों को पानी देता, दिनभर उनकी देखभाल करता और रात में भगवान से प्रार्थना करता कि उसके सपने पूरे हो जाये और उसे इन बीजों से 100 प्रतिशत परिणाम मिले. वह रोज अपने खेत में जाकर देखता कि बीज अंकुरित हुए हैं या नहीं. लेकिन उसे उनमें कोई भी परिवर्तन दिखाई नहीं पड़ता. इसी तरह एक वर्ष बीत गया. लेकिन उन बीजों से अंकुर नहीं फूटे.
अन्य बीज सामान्यतः एक सप्ताह में अंकुरित हो जाते थे और कुछ महीनों में ही फसल आ जाती थी. उस फसल के द्वारा ही किसान के परिवार का भरण-पोषण होता था. किसान सोचा करता कि इस तरह आज तो उसका गुजारा चल सकता है, लेकिन उसके सपने पूरे नहीं हो सकते और न ही उसका भविष्य संवर सकता. बांस के पेड़ों की बदौलत वह अपने सुनहरे भविष्य के सपने देखने लगा.
लेकिन समय बीतने के बाद भी वे बीज अंकुरित नहीं हुए और किसान को अपने सपने और आशायें टूटती हुई नज़र आने लगी. उसके मन में शंका उत्पन्न होने लगी कि कहीं वे बीज सड़ तो नहीं गए हैं.
एक वर्ष और बीता. लेकिन बीज अंकुरित नहीं हुए. दूसरे किसान और गांव वाले उसका मजाक उड़ाने लगे कि वह उन बेकार के बीजों पर अपना समय और परिश्रम व्यर्थ गंवा रहा है. सबके ताने सुनकर किसान विचलित होने लगा. उसने मन में यह भय समाने लगा कि कहीं सचमुच ही वह अपना समय और परिश्रम ऐसे कार्य में तो नहीं लगा रहा, जिससे उसे कोई प्रतिफल नहीं मिलने वाला है.
एक साल और बीत गया. लेकिन बीजों के अंकुरित होने के कोई चिन्ह दिखाई नहीं पड़े. लोगों ने किसान का मजाक उड़ाना जारी रखा. लेकिन किसान ने आंशिक भय के बाद भी अपने मन में छोटी सी आस बांध कर रखी थी. इसलिए उसने लोगों की बातों को दरकिनार कर उन बीजों की देखभाल करना जारी रखा.
ऋतुयें बीतती गई और किसान एक चमत्कार की उम्मीद में बीजों को रोज़ पानी देता रहा और उनकी देखभाल करता रहा. लेकिन चार साल बीत जाने के बाद भी एक भी बीज अंकुरित नहीं हुए. जिससे किसान की उम्मीदें थोड़ी और कम हो गई. लेकिन फिर भी वह उन बीजों को पानी देता रहा. यद्यपि समय के साथ किसान की आशा कम होती चली जा रही थी. लेकिन भगवान पर उसका विश्वास अटल था. उसका विश्वास था कि भगवान उसके परिश्रम का फल उसे अवश्य देंगें.
5 वर्ष बीत जाने के बाद अचानक एक सुबह गाँव के लोगों को उस किसान के चिल्लाने की आवाज़ सुनाई पड़ी. वे सभी अपने घरों से बाहर निकल आये. उन्होंने देखा कि वह किसान अपने खेत के सामने खड़ा होकर खुशी से चिल्ला रहा है. पास जाकर देखने पर सभी गाँव वालों की आँखें फटी की फटी रह गई. किसान के खेत में बांस के बीज अंकुरित हो गए थे. किसान की खुशी की कोई सीमा नहीं थी. पांच साल बाद उसकी मेहनत सफल हुई थी.
वह खेत गाँववालों के आकर्षण का केंद्र बन गया. बांस के पेड़ तेजी से बढ़ रहे थे. 5 फ़ीट…10 फ़ीट….20 फ़ीट…..50 फ़ीट……70 फ़ीट…..80 फ़ीट…और 90 फ़ीट. 5 सालों से खाली पड़ा किसान का खेत मात्र 5 सप्ताह में 90 फ़ीट बांस के पेड़ों से भर गया. इस चमत्कार को देखकर सभी दंग थे. उधर किसान खुशी से फूला नहीं समा रहा था. वे बांस के पेड़ न केवल उसके परिवार का बल्कि उसकी कई पीढ़ियों का भरण-पोषण करने वाले थे. वह रह-रहकर भगवान का धन्यवाद कर रहा था.
उसे यह भी समझ आ गया था कि जो सीख उसे मिली है, वह अमूल्य है.
उसने सपनों का बीज बोने और उसे यथार्थ में परिणित करने के लिए रोज़ उसका पोषण और देखभाल करने की सीख मिल गई थी. उसने लोगों की नकारात्मक बातों पर ध्यान न देने का पाठ भी पढ़ लिया था. उसने अपने भय और शंकाओं से परे हटकर अनवरत परिश्रम करने का महत्व समझ लिया था. साथ ही भगवान पर उसका विश्वास और अटल हो गया था.
किसान ने पूरे गाँव के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत कर दिया. जिसके बाद गाँव के अन्य किसान भी अपने खेतों में बांस का पेड़ उगाने लगे और धैर्य से हर दिन उसकी देखभाल करने लगे.
दोस्तों, किसान ने तो अपने सपनों पर विश्वास बनाये रखा. आपका क्या? आप अपने सपनों को पूरा करने के लिए किस हद तक परिश्रम करने के लिए तैयार हैं? आपमें कितना धैर्य है?
Everything Is Possible
If money is your hope for independence you will never have it. The only real security that a man will have in this world is a reserve of knowledge, experie
#कर्ज़...✍
#विवाह के दो वर्ष हुए थे जब सुहानी गर्भवती होने पर अपने घर पंजाब जा रही थी...पति शहर से बाहर थे ।
जिस रिश्ते के भाई को स्टेशन से ट्रेन मे बिठाने को कहा था वो लेट होती ट्रेन की वजह से रुकने में मूड में नहीं था , इसीलिए समान सहित प्लेटफॉर्म पर बनी बेंच पर बिठा कर चला गया ।
#गाड़ी को पांचवे प्लेटफार्म पर आना था ...
गर्भवती सुहानी को सातवाँ माह चल रहा था. सामान अधिक होने से एक कुली से बात कर ली ,
#बेहद दुबला पतला बुजुर्ग...पेट पालने की विवशता उसकी आँखों में थी ...' एक याचना के साथ सामान उठाने को आतुर '
#सुहानी ने उसे पंद्रह रुपये में तय कर लिया और टेक लगा कर बैठ गई....तकरीबन डेढ़ घंटे बाद गाडी आने की घोषणा हुई ...लेकिन वो बुजुर्ग कुली कहीं नहीं दिखा ।
कोई दूसरा कुली भी खाली नज़र नही आ रहा था.....ट्रेन छूटने पर वापस घर जाना भी संभव नही था ।
#रात के साढ़े बारह बज चुके थे ..सुहानी का मन घबराने लगा ...
तभी वो बुजुर्ग दूर से भाग कर आता हुआ दिखाई दिया .... बोला चिंता न करो बिटिया हम चढ़ा देंगे गाडी में ...भागने से उसकी साँस फूल रही थी ..उसने लपक कर सामान उठाया ...और आने का इशारा किया
सीढ़ी चढ़ कर पुल से पार जाना था कयोकि अचानक ट्रेन ने प्लेटफार्म चेंज करा था जो अब नौ नम्बर पर आ रही थी
वो साँस फूलने से धीरे धीरे चल रहा था और सुहानी भी तेज चलने हालत में न थी
गाडी ने सीटी दे दी
भाग कर अपना स्लीपर कोच का डब्बा ढूंढा ....
डिब्बा प्लेटफार्म खत्म होने के बाद इंजिन के पास था। वहां प्लेटफार्म की लाईट भी नहीं थी और वहां से चढ़ना भी बहुत मुश्किल था ....
सुहानी पलटकर उसे आते हुए देख ट्रेन मे चढ़ गई...तुरंत ट्रेन रेंगने लगी ...कुली अभी दौड़ ही रहा था ...
हिम्मत करके उसने एक एक सामान रेलगाड़ी के पायदान के पास रख दिया ।
अब आगे बिलकुल अन्धेरा था ..
जब तक सुहानी ने हडबडाये कांपते हाथों से दस का और पांच का का नोट निकाला ...
तब तक #कुली की हथेली दूर हो चुकी थी...
उसकी दौड़ने की रफ़्तार तेज हुई ..
मगर साथ ही ट्रेन की रफ़्तार भी ....
वो बेबसी से उसकी दूर होती खाली हथेली देखती रही ...
और फिर उसका हाथ जोड़ना नमस्ते
और आशीर्वाद की मुद्रा में ....
उसकी गरीबी ...
उसका पेट ....
उसकी मेहनत ...
उसका सहयोग ...
सब एक साथ सुहानी की आँखों में कौंध गए ..
उस घटना के बाद सुहानी डिलीवरी के बाद दुबारा स्टेशन पर उस #बुजुर्ग कुली को खोजती रही मगर वो कभी दुबारा नही मिला ...
आज वो जगह जगह दान आदि करती है मगर आज तक कोई भी दान वो कर्जा नहीं उतार पाया उस रात उस बुजुर्ग की कर्मठ हथेली ने किया था ...
सच में कुछ #कर्ज ऐसे भी होते हैं जो कभी नही उतारे जा सकते......
#सब का मालिक एक
शहर में एक अमीर सेठ रहता था। उसके पास बहुत पैसा था। वह बहुत फैक्ट्रियों का मालिक था ।
एक शाम अचानक उसे बहुत बैचेनी होने लगी । डॉक्टर को बुलाया गया सारे जाँच करवा लिये गये । पर कुछ भी नहीं निकला । लेकिन उसकी बैचेनी बढ़ती गयी । उसके समझ में नहीं आ रहा था कि ये क्या हो रहा है । रात हुई, नींद की गोलियां भी खा ली पर न नींद आने को तैयार और ना ही बैचेनी कम होने का नाम ले ।
वो रात को उठकर तीन बजे घर के बगीचे में घूमने लगा । घुमते -घुमते उसे लगा कि बाहर थोड़ा सा सुकून है तो वह बाहर सड़क पर पैदल निकल पड़ा ।
चलते- चलते हजारों विचार मन में चल रहे थे । अब वो घर से बहुत दूर निकल आया था । और थकान की वजह से वो एक चबूतरे पर बैठ गया ।उसे थोड़ी शान्ति मिली तो वह आराम से बैठ गया ।
इतने में एक कुत्ता वहाँ आया और उसकी चप्पल उठाकर ले गया । सेठ ने देखा तो वह दूसरी चप्पल उठाकर उस कुत्ते के पीछे भागा । कुत्ता पास ही बनी जुग्गी-झोपड़ीयों में घुस गया । सेठ भी उसके पीछे था ,सेठ को करीब आता देखकर कुत्ते ने चप्पल वहीं छोड़ दी और चला गया । सेठ ने राहत की सांस ली और अपनी चप्पल पहनने लगा । इतने में उसे किसी के रोने की आवाज सुनाई दी ।
वह और करीब गया तो एक झोपड़ी में से आवाज आ रहीं थीं । उसने झोपड़ी के फटे हुए बोरे में झाँक कर देखा तो वहाँ एक औरत फटेहाल मैली सी चादर पर दीवार से सटकर रो रही हैं । और ये बोल रही है ---हे भगवान मेरी मदद कर ओर रोती जा रहीं है ।
सेठ के मन में आया कि यहाँ से चले जाओ, कहीं कोई गलत ना सोच लें । वो थोड़ा आगे बढ़ा तो उसके दिल में ख़्याल आया कि आखिर वो औरत क्यों रो रहीं हैं, उसको तकलीफ क्या है ? और उसने अपने दिल की सुनी और वहाँ जाकर दरवाजा खटखटाया ।
उस औरत ने दरवाजा खोला और सेठ को देखकर घबरा गयी । तो सेठ ने हाथ जोड़कर कहा तुम घबराओं मत ,मुझे तो बस इतना जानना है कि तुम रो क्यों रही हो ।
वह औरत के आखों में से आँसू टपकने लगें । और उसने पास ही गोदड़ी में लिपटी हुई उसकी 7-8 साल की बच्ची की ओर इशारा किया । और रोते -रोते कहने लगी कि मेरी बच्ची बहुत बीमार है उसके इलाज में बहुत खर्चा आएगा । और में तो घरों में जाकर झाड़-ूपोछा करके जैसे-तैसे हमारा पेट पालती हूँ । में कैसे इलाज कराउ इसका ?
सेठ ने कहा--- तो किसी से माँग लो । इसपर औरत बोली मैने सबसे माँग कर देख लिया खर्चा बहुत है कोई भी देने को तैयार नहीं । तो सेठ ने कहा तो ऐसे रात को रोने से मिल जायेगा क्या ?
तो औरत ने कहा कल एक संत यहाँ से गुजर रहे थे तो मैने उनको मेरी समस्या बताई तो उन्होंने कहा बेटा---तुम सुबह 4 बजे उठकर अपने ईश्वर से माँगो ।बोरी बिछाकर बैठ जाओ और रो -गिड़गिगिड़ाके उससे मदद माँगो वो सबकी सुनता है तो तुम्हारी भी सुनेगा ।
मेरे पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था । इसलिए में उससे माँग रही थीं और वो बहुत जोर से रोने लगी ।
ये सब सुनकर सेठ का दिल पिघल गया और उसने तुरन्त फोन लगाकर एम्बुलेंस बुलवायी और उस लड़की को एडमिट करवा दिया । डॉक्टर ने डेढ़ लाख का खर्चा बताया तो सेठ ने उसकी जवाबदारी अपने ऊपर ले ली ,और उसका इलाज कराया । और उस औरत को अपने यहाँ नौकरी देकर अपने बंगले के सर्वेन्ट क्वाटर में जगह दी । और उस लड़की की पढ़ाई का जिम्मा भी ले लिया ।
वो सेठ कर्म प्रधान तो था पर नास्तिक था । अब उसके मन में सैकड़ो सवाल चल रहे थे ।
क्योंकि उसकी बैचेनी तो उस वक्त ही खत्म हो गयी थी जब उसने एम्बुलेंस को बुलवाया था । वह यह सोच रहा था कि आखिर कौन सी ताकत है जो मुझे वहाँ तक खींच ले गयीं ?क्या यहीं ईश्वर हैं ? और यदि ये ईश्वर है तो सारा संसार आपस में धर्म ,जात -पात के लिये क्यों लड़ रहा है । क्योंकि ना मैने उस औरत की जात पूछी और ना ही ईश्वर ने जात -पात देखी । बस ईश्वर ने तो उसका दर्द देखा और मुझे इतना घुमाकर उस तक पहुंचा दिया । अब सेठ समझ चुका था कि कर्म के साथ सेवा भी कितनी जरूरी है क्योंकि इतना सुकून उसे जीवन में कभी भी नहीं मिला था ।
तो दोस्तों मानव और प्राणी सेवा का धर्म ही असली इबादत या भक्ति हैं । यदि ईश्वर की कृपा या रहमत पाना चाहते हो तो इंसानियत अपना लो और समय-समय पर उन सबकी मदद करो जो लाचार या बेबस है । क्योंकि ईश्वर इन्हीं के आस -पास रहता हैं ।।
{दोस्तो स्टोरी कैसी लगी... ?}
िता_का_दर्द.....
आज पूनम लव मैरिज कर अपने पापा के पास आयी, और अपने पापा से कहने लगी पापा मैंने अपनी पसंद के लड़के से शादी कर ली, उसके पापा बहुत गुस्सें में थे, पर वो बहुत सुलझें शख्स थे,
उसने बस अपनी बेटी से इतना कहा, मेरे घर से निकल जाओं, बेटी ने कहा अभी इनके पास कोई काम नही हैं, हमें रहने दीजिए हम बाद में चलें जाएगें, पर उसके पापा ने एक नही सुनी और उसे घर से बाहर कर दिया.........
कुछ साल बित गयें, अब पूनम के पापा नही रहें, और दुर्भाग्यवश जिस लड़के ने पूनम ने शादी की वो भी उसे धोखा देकर भाग गया, पूनम की एक लड़की एक लड़का था, पूनम खुद का एक रेस्टोरेंट चला रही थी, जिससे उसका जीवन यापन हो रहा था.........
पूनम को जब ये खबर हुई उसके पापा नही रहें, तो उसने मन में सोचा अच्छा हुआ, मुजे घर से निकाल दिया था, दर_दर की ठोकरें खाने छोड़ दिया, मेरे पति के छोड़ जाने के बाद भी मुजे घर नही बुलाया, मैं तो नही जाऊंगी उनकी अंतिम यात्रा में, पर उसके ताऊ जी ने कहा पूनम हो आऊ, जाने वाला शख्श तो चला गया अब उनसे दुश्मनी कैसी, पूनम ने पहले हाँ ना किया फिर सोचा चलों हो आती हूं, देखू तो जिन्होने मुजे ठुकराया वो मरने के बाद कैसे सुकून पाता हैं...............
पूनम जब अपने पापा के घर आयी तो सब उनकी अंतिम यात्रा की तैयारी कर रहें थें, पर पूनम को उनके मरने का कोई दुख नही था, वो तो बस अपने ताऊजी के कहने पर आयी थी, अब पूनम के पापा अंतिमयात्रा शुरू हुई, सब रो रहें थे पर पूनम दूर खड़ी हुई थी, जैंसे तैसे सब कार्यकम निपट गया, आज पूनम के पापा की तेरहवी थी, उसके ताऊ जी आए और पूनम के हाथ में एक खत देते हुये कहा, ये तुम्हारे पापा ने तुम्हें दिया हैं, हो सके तो इसे पढ़ लेना.............
रात हो चुकी थी सारें मेहमान जा चुके थे, पूनम ने वो खत निकाला और पढ़ने लगी,
उसने सबसे पहले लिखा था, मेरी प्यारी गुड़िया मुजे मालूम हैं, तुम मुजसे नराज हो, पर अपने पापा को माफ कर देना, मैं जानता हूं, तुम्हें मैंने घर से निकाला था, तुम्हारे पास रहने की जगह नही थी, तुम दर_दर की ठोकरे खा रही थी, पर मैं भी उदास था, तुम्हें कैसे बताऊँ,,,,,,
"याद हैं तुम्हें जब तुम पाँच साल की थी, तब तुम्हारी माँ हमें छोड़ के चली गयी थी, तब तुम कितना रोती थी, डरती थी, मेरे बिना सोती नही थी, रातों को उठकर रोती थी, तब मैं भी सारी रात तुम्हारे साथ जागता था, तुम जब स्कूल जाने से डरती थी, तब मैं भी सारा वक्त तुम्हारे स्कूल के खिडकी पर खड़ा होता था, और जैसे ही तुम स्कूल से बाहर आती थी, तुम्हें सीने से लगा लेता था, वो कच्चा_पक्का खाना याद हैं, जो तुम्हें पसंद नही आता था, मैं उसे फेंक कर फिर से तुम्हारे लिए नया बनाता था, की तुम भूखी ना रहों, याद हैं तुम्हें जब तुम्हें बुखार आया था, तो मैं सारा दिन तुम्हारे पास बैठा रहता था, अंदर ही अंदर रोता था, पर तुम्हें हंसाता था, की तुम ना रोओ वरना मैं रो पड़ता था,
वो पहली बार हाईस्कूल की परीक्षा जब तुम रात भर पढ़ती थी, तो मैं सारी रात तुम्हें चाय बनाकर देता था,
याद है तुम्हें जब तुम पहली बार कालेज गयी थी, और तुम्हें लड़को ने छेंड था, तो मैं तुम्हारे साथ कालेज गया और उन बदतमीज लड़को से भीड गया, उम्र हो गयी थी, और मैं कमजोर भी, कुछ चोटे मुजे भी आयी थी, पर हर लड़की की नजर में पापा हीरों होते हैं, इसलिए अपना दर्द सह गया................
"याद हैं तुम्हें वो तुम्हारी पहली जीन्स वो छोटे कपड़े, वो गाड़ी, सारी कालोनी एकतरफ थी की ये सब नही चलेगा, लड़की छोटे कपड़े नही पहनेगी, पर मैं तुम्हारे साथ खड़ा था, किसी को तुम्हारी खुशी में बाधा बनने नही दिया, तुम्हारा वो रातों को देर से आना कभी_कभी शराब पीना, डिस्को जाना, लड़को के साथ घूमना, इन सब बातों को कभी मैंने गौर नही किया, क्यूकि जिस उम्र में थी उस उम्र मे ये सब थोड़ा बहुत होता हैं, ......................
पर एक दिन तुम एक लड़के से शादी कर आयी, वो भी उस लड़के से जिसके बारे में तुम्हें कुछ भी पता नही था, तुम्हारा पापा हूं, मैंने उस लड़के के बारे मे सब पता किया, उसने ना जाने वासना और पैंसे के लिए कितनी लड़कियों को धोखा दिया, पर तुम तो उस वक्त प्रेम में अंधी थी, तुमने एक बार भी मुजसे नही पूछा, और सीधा शादी कर के आ गयी, मेरे कितने अरमान थें, तुम्हें डोली में बिठाऊ, चाँद, तारों की तरह तुम्हें सजाऊ, ऐसी धूमधाम से शादी करूँ की लोग बोल पड़े वो देखों शर्माजी जिन्होने अपनी बच्ची को इतने नाजों से अकेले पाला हैं, पर तुमने मेरे सारे ख्वाब तोड़ दियें, "खैर" इन सब बातों का कोई मतलब नही हैं,
मैंने तो तुम्हारें लिए खत इसलिए छोड़ा है की कुछ बात सकूं.....................
मेरी "गुड़िया" आलमारी में तुम्हारी माँ के गहने और मैंने जो तुम्हारी शादी के लिए गहने खरीदें तो वो सब रखें हैं, तीन चार घर और कुछ जमीने है मैंने सब तुम्हारे और तुम्हारे बच्चों के नाम कर दी हैं, कुछ पैसें बैंक में है तुम बैंक जाकर उसे निकाल लेना,
"_और आखिरी में बस इतना ही कहूंगा गुडिया काश तुमने मुजे समझा होता मैं तुम्हारा दुश्मन नही था, तुम्हारा पापा था, वो पापा जिसने तुम्हारी माँ के मरने के बाद भी, दूसरी शादी नही की लोगो के ताने सुने, गालियाँ सुनी, ना जाने कितने रिश्तें ठुकराय पर तुम्हें दूसरी माँ से कष्ट ना हो इसलिए खुद की ख्वाहिशें मार दी.......................
अंत में बस इतना ही कहूंगा मेरी गुड़िया, जिस दिन तुम शादी के जोड़े पर घर आयी थी ना, तुम्हारा बाप पहली बार टूटा था, तुम्हारे माँ के मरने के वक्त भी उतना नही रोया जितना उस वक्त और उस दिन से हर दिन रोया इसलिए नही की समाज_जात_परिवार_रिश्तेदार क्या कहेंगें,,,
इसलिए वो जो मेरी नन्ही सी गुड़िया सु_सु तक करने के लिए, सारी रात मुजे उठाती थी, पर जिसने शादी का इतना बड़ा फैसला लिया पर मुजे एक बार भी बताना सही नही समझा, गुड़िया अब तो तुम भी माँ हो औलाद का दर्द खुशी सब क्या होता हैं, वो जब दिल तोड़ते हैं तो कैसा लगता हैं, ईश्वर तुम्हें कभी ना ये दर्द की शक्ल दिखाए, एक खराब पिता ही समझ के मुजे माफ कर देना मेरी गुड़िया, तुम्हार पापा अच्छा नही था, जो तुमने उसे इतना बड़ा दर्द दिया, अब खत यही समाप्त कर रहा हूं, हो सकें तो माफ कर देना, और खत के साथ एक ड्राइंग लगी थी जो खुद कभी पूनम ने बचपन में बनाई थी, और उसमें लिखा था आई लव यू मेरे पापा मेरे हिरो मैं आपकी हर बात मानूंगी, ....................
पूनम रो ही रही थी, उतने में उसके ताऊजी आ गयें, पूनम ने उन्हें रोते_रोते सब बताया, पर एक बात उसके ताऊजी ने बताई, उसके ताऊजी ने कहा, पूनम वो जो तुम्हें रेस्टोरेंट खोलने और घर खरीदने के पैंसे मैंने नही दियें थें, वो पैंसे तुम्हारे पिताजी ने मुजसे दिलवाए थें, क्यूकि औलाद चाहें कितनी भी बुरी, माँ_बाप कभी बुरे नही होतें, औलाद चाहें माँ_बाप को छोड़ दे माँ_बाप मरने के बाद भी अपने बच्चों को दुआ देते हैं,
दोस्तों पूनम के पापा को सुकून मिलेगा या नही मुजे नही पता, पर उस खत को पढ़ने के बाद, शायद सारी जिंदगी, पूनम को सुकून नही मिलेंगा .....................😢
______बस इतना ही कहूंगा, आखिर में दोस्तों, लव मैरिज शादी करना कोई गलत बात नही, पर यही अपने माँ_पिताजी की मर्जी शामिल कर लें, पत्थर से पानी निकल जाता हैं, वो तो माँ_बाप है ना कब तक नही टूटेंगें अपने बच्चों की खुशी के लिए, हर बाप की एक इच्छा होती हैं अपनी बेटी को अपने हाथों से डोली में विदा करने की हो सकें तो उसे एक सपना मत रहने दीजिए ☘💕
बहन से कलाई पर राखी तो बँधवा ली,
500 रू देकर रक्षा का वचन भी दे डाला!
राखी गुजरी, और धागा भी टूट गया, इसी के साथ बहन का मतलब भी पीछे छूट गया!
फिर वही चौराहों पर महफिल सजने लगी, लड़की दिखते ही सीटी फिर बजने लगी!
रक्षा बंधन पर आपकी बहन को दिया हुआ वचन, आज सीटियों की आवाज में तब्दील हो गया !
रक्षाबंधन का ये पावन त्यौहार, भरे बाजार में आज जलील हो गया !!
पर जवानी के इस आलम में,
एक बात तुझे ना याद रही!
वो भी तो किसी की बहन होगी जिस पर छीटाकशी तूने करी !!
बहन तेरी भी है, चौराहे पर भी जाती है,
सीटी की आवाज उसके कानों में भी आती है!
क्या वो सीटी तुझसे सहन होगी, जिसकी मंजिल तेरी अपनी ही बहन होगी?
अगर जवाब तेरा हाँ है, तो सुन, चौराहे पर तुझे बुलावा है!
फिर कैसी राखी, कैसा प्यार सब कुछ बस एक छलावा है!!
बन्द करो ये नाटक राखी का, जब सोच ही तुम्हारी खोटी है!
हर लड़की को इज़्ज़त दो ,
यही रक्षाबंधन की कसौटी है
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
21/08/2018
विकल्प.....
बाज लगभग सत्तर वर्ष जीवित रहता है | परन्तु अपने जीवन के चालीसवें वर्ष में आते-आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है | उस अवस्था में उसके शरीर के तीन प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं |
पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है, तथा शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं | चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है और भोजन में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है |
पंख भारी होकर उड़ान को सीमित कर देते हैं | भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना, और भोजन खाना तीनों प्रक्रियायें अपनी धार खोने लगती हैं |
उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं :-
1. देह त्याग दे |
2. गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे |
3. या फिर "स्वयं को पुनर्स्थापित करे"
जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं, अंत में बचता है तीसरा लम्बा और अत्यन्त पीड़ादायी रास्ता |
बाज चुनता है तीसरा रास्ता और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है | वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है, एकान्त में अपना घोंसला बनाता है और तब सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार मार कर तोड़ देता है, चोंच तोड़ने से और वह प्रतीक्षा करता है चोंच के पुनः उग आने का | उसके बाद वह अपने पंजे भी उसी प्रकार तोड़ देता है, और प्रतीक्षा करता है पंजों के पुनः उग आने का | नयी चोंच और पंजे आने के बाद वह अपने भारी पंखों को एक-एक कर नोंच कर निकालता है |
और प्रतीक्षा करता है पंखों के पुनः उग आने का एक सौ पचास दिन की पीड़ा और प्रतीक्षा के बाद मिलती है वही भव्य और ऊँची उड़ान पहले जैसी इस पुनर्स्थापना के बाद वह तीस वर्ष और जीता है ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ |
एक सौ पचास दिन न सही 50 दिन ही बिताया जाये स्वयं को पुनर्स्थापित करने में | जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और नोंचने में पीड़ा तो होगी ही विस्वास रखे इस बार उड़ानें और ऊँची होंगी, अनुभवी होंगी, अनन्तगामी होंगी |
धयान रखे की बिना विध्वंस के निर्माण नहीं होता .........
पिता बेटे को डॉक्टर बनाना चाहता था।
बेटा इतना मेधावी नहीं था कि NEET क्लियर कर लेता।
इसलिए दलालों से MBBS की सीट खरीदने का जुगाड़ किया ।
ज़मीन, जायदाद, ज़ेवर सब गिरवी रख के 35 लाख रूपये दलालों को दिए, लेकिन अफसोस वहाँ धोखा हो गया।
अब क्या करें...?
लड़के को तो डॉक्टर बनाना है कैसे भी...!!
फिर किसी तरह विदेश में लड़के का एडमीशन कराया गया, वहाँ लड़का चल नहीं पाया।
फेल होने लगा..
डिप्रेशन में रहने लगा।
रक्षाबंधन पर घर आया और घर में ही फांसी लगा ली।
सारे अरमान धराशायी.... रेत के महल की तरह ढह गए....
20 दिन बाद माँ-बाप और बहन ने भी कीटनाशक खा कर आत्म-हत्या कर ली।
अपने बेटे को डॉक्टर बनाने की झूठी महत्वाकांक्षा ने पूरा परिवार लील लिया।
माँ बाप अपने सपने, अपनी महत्वाकांक्षा अपने बच्चों से पूरी करना चाहते हैं ...
मैंने देखा कि कुछ माँ बाप अपने बच्चों को Topper बनाने के लिए इतना ज़्यादा अनर्गल दबाव डालते हैं
कि बच्चे का स्वाभाविक विकास ही रुक जाता है।
आधुनिक स्कूली शिक्षा बच्चे की Evaluation और Grading ऐसे करती है, जैसे सेब के बाग़ में सेब की खेती की जाती है।
पूरे देश के करोड़ों बच्चों को एक ही Syllabus पढ़ाया जा रहा है ..
For Example -
जंगल में सभी पशुओं को एकत्र कर सबका इम्तिहान लिया जा रहा है और पेड़ पर चढ़ने की क्षमता देख कर Rank निकाली जा रही है।
यह शिक्षा व्यवस्था, ये भूल जाती है कि इस प्रश्नपत्र में तो बेचारा हाथी का बच्चा फेल हो जाएगा और बन्दर First आ जाएगा।
अब पूरे जंगल में ये बात फैल गयी कि कामयाब वो है जो झट से पेड़ पर चढ़ जाए।
बाकी सबका जीवन व्यर्थ है।
इसलिए उन सब जानवरों के, जिनके बच्चे कूद के झटपट पेड़ पर न चढ़ पाए, उनके लिए कोचिंग Institute खुल गए, वहां पर बच्चों को पेड़ पर चढ़ना सिखाया जाता है।
चल पड़े हाथी, जिराफ, शेर और सांड़, भैंसे और समंदर की सब मछलियाँ चल पड़ीं अपने बच्चों के साथ, Coaching institute की ओर ........
हमारा बिटवा भी पेड़ पर चढ़ेगा और हमारा नाम रोशन करेगा।
हाथी के घर लड़का हुआ .......
तो उसने उसे गोद में ले के कहा- "हमरी जिन्दगी का एक ही मक़सद है कि हमार बिटवा पेड़ पर चढ़ेगा।"
और जब बिटवा पेड़ पर नहीं चढ़ पाया, तो हाथी ने सपरिवार ख़ुदकुशी कर ली।
अपने बच्चे को पहचानिए।
वो क्या है, ये जानिये।
हाथी है या शेर ,चीता, लकडबग्घा , जिराफ ऊँट है
या मछली , या फिर हंस , मोर या कोयल ?
क्या पता वो चींटी ही हो ?
और यदि चींटी है आपका बच्चा, तो हताश निराश न हों।
चींटी धरती का सबसे परिश्रमी जीव है और अपने खुद के वज़न की तुलना में एक हज़ार गुना ज्यादा वजन उठा सकती है।
इसलिए अपने बच्चों की क्षमता को परखें और जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें.... ना कि भेड़ चाल चलाते हुए उसे हतोत्साहित करें ......
SAVE HUMAN BEHAVIOR FIRST...
Parents love your kids as they are🙏🏻
"क्योंकि किसी को शहनाई बजाने पर भी भारत रत्न से नवाज़ा गया है"
/// लोहार की ईमानदारी ///
एक बढ़ई किसी गांव में काम करने गया, लेकिन
वह अपना हथौड़ा साथ ले जाना भूल गया।
उसने गांव के लोहार के पास जाकर कहा, 'मेरे
लिए एक अच्छा सा हथौड़ा बना दो।
मेरा हथौड़ा घर पर ही छूट गया है।' लोहार
ने कहा, 'बना दूंगा पर तुम्हें दो दिन इंतजार
करना पड़ेगा। हथौड़े के लिए मुझे अच्छा लोहा
चाहिए। वह कल मिलेगा।'
दो दिनों में लोहार ने बढ़ई को हथौड़ा बना
कर दे दिया। हथौड़ा सचमुच अच्छा था। बढ़ई
को उससे काम करने में काफी सहूलियत महसूस
हुई। बढ़ई की सिफारिश पर एक दिन एक
ठेकेदार लोहार के पास पहुंचा।
उसने हथौड़ों का बड़ा ऑर्डर देते हुए यह भी
कहा कि 'पहले बनाए हथौड़ों से अच्छा
बनाना।' लोहार बोला, 'उनसे अच्छा नहीं बन
सकता। जब मैं कोई चीज बनाता हूं तो उसमें
अपनी तरफ से कोई कमी नहीं रखता, चाहे
कोई भी बनवाए।'
धीरे-धीरे लोहार की शोहरत चारों तरफ फैल
गई। एक दिन शहर से एक बड़ा व्यापारी आया
और लोहार से बोला, 'मैं तुम्हें डेढ़ गुना दाम
दूंगा, शर्त यह होगी कि भविष्य में तुम सारे
हथौड़े केवल मेरे लिए ही बनाओगे। हथौड़ा
बनाकर दूसरों को नहीं बेचोगे।'
लोहार ने इनकार कर दिया और कहा, 'मुझे
अपने इसी दाम में पूर्ण संतुष्टि है। अपनी
मेहनत का मूल्य मैं खुद निर्धारित करना
चाहता हूं। आपने फायदे के लिए मैं किसी दूसरे
के शोषण का माध्यम नहीं बन सकता।
आप मुझे जितने अधिक पैसे देंगे, उसका दोगुना
गरीब खरीदारों से वसूलेंगे। मेरे लालच का बोझ
गरीबों पर पड़ेगा, जबकि मैं चाहता हूं कि
उन्हें मेरे कौशल का लाभ मिले। मैं आपका
प्रस्ताव स्वीकार नहीं कर सकता।'
सेठ समझ गया कि सच्चाई और ईमानदारी
महान शक्तियां हैं। जिस व्यक्ति में ये दोनों
शक्तियां मौजूद हैं, उसे किसी प्रकार का प्रलोभन अपने सिद्धांतों से नहीं डिगा
सकता।
08/08/2018
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*|| कर्मो की दौलत ||*
*एक राजा था जिसने ने अपने राज्य में क्रूरता से बहुत सी दौलत इकट्ठा करके( एकतरह शाही खजाना ) आबादी से बाहर जंगल एक सुनसान जगह पर बनाए तहखाने मे सारे खजाने को खुफिया तौर पर छुपा दिया था खजाने की सिर्फ दो चाबियां थी एक चाबी राजा के पास और एक उसकेएक खास मंत्री के पास थी इन दोनों के अलावा किसी को भी उस खुफिया खजाने का राज मालूम ना था एक रोज़ किसी को बताए बगैर राजा अकेले अपने खजाने को देखने निकला , तहखाने का दरवाजा खोल कर अंदर दाखिल हो गया और अपने खजाने को देख देख कर खुश हो रहा था , और खजाने की चमक से सुकून पा रहा था।*
*उसी वक्त मंत्री भी उस इलाके से निकला और उसने देखा की खजाने का दरवाजा खुला है वो हैरान हो गया और ख्याल किया कि कही कल रात जब मैं खजाना देखने आया तब शायद खजाना का दरवाजा खुला रह गया होगा, उसने जल्दी जल्दी खजाने का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया और वहां से चला गया . उधर खजाने को निहारने के बाद राजा जब संतुष्ट हुआ , और दरवाजे के पास आया तो ये क्या ...दरवाजा तो बाहर से बंद हो गया था . उसने जोर जोर से दरवाजा पीटना शुरू किया पर वहां उनकी आवाज सुननेवाला उस जंगल में कोई ना था ।*
*राजा चिल्लाता रहा , पर अफसोस कोई ना आया वो थक हार के खजाने को देखता रहा अब राजा भूख और पानी की प्यास से बेहाल हो रहा था , पागलो सा हो गया.. वो रेंगता रेंगता हीरो के संदूक के पास गया और बोला ए दुनिया के नायाब हीरो मुझे एक गिलास पानी दे दो.. फिर मोती सोने चांदी के पास गया और बोला ए मोती चांदी सोने के खजाने मुझे एक वक़्त का खाना दे दो..राजा को ऐसा लगा की हीरे मोती उसे बोल रहे हो की तेरे सारी ज़िन्दगी की कमाई तुझे एक गिलास पानी और एक समय का खाना नही दे सकती..राजा भूख से बेहोश हो के गिर गया ।*
*जब राजा को होश आया तो सारे मोती हीरे बिखेर के दीवार के पास अपना बिस्तर बनाया और उस पर लेट गया , वो दुनिया को एक पैगाम देना चाहता था लेकिन उसके पास कागज़ और कलम नही था ।*
*राजा ने पत्थर से अपनी उंगली फोड़ी और बहते हुए खून से दीवार पर कुछ लिख दिया . उधर मंत्री और पूरी सेना लापता राजा को ढूंढते रहे पर बहुत दिनों तक राजा ना मिला तो मंत्री राजा के खजाने को देखने आया , उसने देखा कि राजा हीरे जवाहरात के बिस्तर पर मरा पड़ा है , और उसकी लाश को कीड़े मोकड़े खा रहे थे . राजा ने दीवार पर खून से लिखा हुआ था...ये सारी दौलत एक घूंट पानी ओर एक निवाला नही दे सकी...*
*यही अंतिम सच है |आखिरी समय आपके साथ आपके कर्मो की दौलत जाएगी , चाहे आप कितनी बेईमानी से हीरे पैसा सोना चांदी इकट्ठा कर लो सब यही रह जाएगा |इसीलिए जो जीवन आपको प्रभु ने उपहार स्वरूप दिया है , उसमें अच्छे कर्म लोगों की भलाई के काम कीजिए बिना किसी स्वार्थ के ओर अर्जित कीजिए अच्छे कर्मो की अनमोल दौलत |जो आपके सदैव काम आएगी |*
Rishte ko bachhaiye 🙏🙏🙏
कागज✍️ एक बार कहानी अवश्य पढ़ें
राधिका और नवीन को आज तलाक के कागज मिल गए थे। दोनो साथ ही कोर्ट से बाहर निकले। दोनो के परिजन साथ थे और उनके चेहरे पर विजय और सुकून के निशान साफ झलक रहे थे। चार साल की लंबी लड़ाई के बाद आज फैसला हो गया था।
दस साल हो गए थे शादी को मग़र साथ मे छः साल ही रह पाए थे।
चार साल तो तलाक की कार्यवाही में लग गए।
राधिका के हाथ मे दहेज के समान की लिस्ट थी जो अभी नवीन के घर से लेना था और नवीन के हाथ मे गहनों की लिस्ट थी जो राधिका से लेने थे।
साथ मे कोर्ट का यह आदेश भी था कि नवीन दस लाख रुपये की राशि एकमुश्त राधिका को चुकाएगा।
राधिका और नवीन दोनो एक ही टेम्पो में बैठकर नवीन के घर पहुंचे। दहेज में दिए समान की निशानदेही राधिका को करनी थी।
इसलिए चार वर्ष बाद ससुराल जा रही थी। आखरी बार बस उसके बाद कभी नही आना था उधर।
सभी परिजन अपने अपने घर जा चुके थे। बस तीन प्राणी बचे थे।नवीन, राधिका और राधिका की माता जी।
नवीन घर मे अकेला ही रहता था। मां-बाप और भाई आज भी गांव में ही रहते हैं।
राधिका और नवीन का इकलौता बेटा जो अभी सात वर्ष का है कोर्ट के फैसले के अनुसार बालिग होने तक वह राधिका के पास ही रहेगा। नवीन महीने में एक बार उससे मिल सकता है।
घर मे परिवेश करते ही पुरानी यादें ताज़ी हो गई। कितनी मेहनत से सजाया था इसको राधिका ने। एक एक चीज में उसकी जान बसी थी। सब कुछ उसकी आँखों के सामने बना था।एक एक ईंट से धीरे धीरे बनते घरोंदे को पूरा होते देखा था उसने।
सपनो का घर था उसका। कितनी शिद्दत से नवीन ने उसके सपने को पूरा किया था।
नवीन थकाहारा सा सोफे पर पसर गया। बोला "ले लो जो कुछ भी चाहिए मैं तुझे नही रोकूंगा"
राधिका ने अब गौर से नवीन को देखा। चार साल में कितना बदल गया है। बालों में सफेदी झांकने लगी है। शरीर पहले से आधा रह गया है। चार साल में चेहरे की रौनक गायब हो गई।
वह स्टोर रूम की तरफ बढ़ी जहाँ उसके दहेज का अधिकतर समान पड़ा था। सामान ओल्ड फैशन का था इसलिए कबाड़ की तरह स्टोर रूम में डाल दिया था। मिला भी कितना था उसको दहेज। प्रेम विवाह था दोनो का। घर वाले तो मजबूरी में साथ हुए थे।
प्रेम विवाह था तभी तो नजर लग गई किसी की। क्योंकि प्रेमी जोड़ी को हर कोई टूटता हुआ देखना चाहता है।
बस एक बार पीकर बहक गया था नवीन। हाथ उठा बैठा था उसपर। बस वो गुस्से में मायके चली गई थी।
फिर चला था लगाने सिखाने का दौर । इधर नवीन के भाई भाभी और उधर राधिका की माँ। नोबत कोर्ट तक जा पहुंची और तलाक हो गया।
न राधिका लोटी और न नवीन लाने गया।
राधिका की माँ बोली" कहाँ है तेरा सामान? इधर तो नही दिखता। बेच दिया होगा इस शराबी ने ?"
"चुप रहो माँ"
राधिका को न जाने क्यों नवीन को उसके मुँह पर शराबी कहना अच्छा नही लगा।
फिर स्टोर रूम में पड़े सामान को एक एक कर लिस्ट में मिलाया गया।
बाकी कमरों से भी लिस्ट का सामान उठा लिया गया।
राधिका ने सिर्फ अपना सामान लिया नवीन के समान को छुवा भी नही। फिर राधिका ने नवीन को गहनों से भरा बैग पकड़ा दिया।
नवीन ने बैग वापस राधिका को दे दिया " रखलो, मुझे नही चाहिए काम आएगें तेरे मुसीबत में ।"
गहनों की किम्मत 15 लाख से कम नही थी।
"क्यूँ, कोर्ट में तो तुम्हरा वकील कितनी दफा गहने-गहने चिल्ला रहा था"
"कोर्ट की बात कोर्ट में खत्म हो गई, राधिका। वहाँ तो मुझे भी दुनिया का सबसे बुरा जानवर और शराबी साबित किया गया है।"
सुनकर राधिका की माँ ने नाक भों चढ़ाई।
"नही चाहिए।
वो दस लाख भी नही चाहिए"
"क्यूँ?" कहकर नवीन सोफे से खड़ा हो गया।
"बस यूँ ही" राधिका ने मुँह फेर लिया।
"इतनी बड़ी जिंदगी पड़ी है कैसे काटोगी? ले जाओ,,, काम आएगें।"
इतना कह कर नवीन ने भी मुंह फेर लिया और दूसरे कमरे में चला गया। शायद आंखों में कुछ उमड़ा होगा जिसे छुपाना भी जरूरी था।
राधिका की माता जी गाड़ी वाले को फोन करने में व्यस्त थी।
राधिका को मौका मिल गया। वो नवीन के पीछे उस कमरे में चली गई।
वो रो रहा था। अजीब सा मुँह बना कर। जैसे भीतर के सैलाब को दबाने दबाने की जद्दोजहद कर रहा हो। राधिका ने उसे कभी रोते हुए नही देखा था। आज पहली बार देखा न जाने क्यों दिल को कुछ सुकून सा मिला।
मग़र ज्यादा भावुक नही हुई।
सधे अंदाज में बोली "इतनी फिक्र थी तो क्यों दिया तलाक?"
"मैंने नही तलाक तुमने दिया"
"दस्तखत तो तुमने भी किए"
"माफी नही माँग सकते थे?"
"मौका कब दिया तुम्हारे घर वालों ने। जब भी फोन किया काट दिया।"
"घर भी आ सकते थे"?
"हिम्मत नही थी?"
राधिका की माँ आ गई। वो उसका हाथ पकड़ कर बाहर ले गई। "अब क्यों मुँह लग रही है इसके? अब तो रिश्ता भी खत्म हो गया"
मां-बेटी बाहर बरामदे में सोफे पर बैठकर गाड़ी का इंतजार करने लगी।
राधिका के भीतर भी कुछ टूट रहा था। दिल बैठा जा रहा था। वो सुन्न सी पड़ती जा रही थी। जिस सोफे पर बैठी थी उसे गौर से देखने लगी। कैसे कैसे बचत कर के उसने और नवीन ने वो सोफा खरीदा था। पूरे शहर में घूमी तब यह पसन्द आया था।"
फिर उसकी नजर सामने तुलसी के सूखे पौधे पर गई। कितनी शिद्दत से देखभाल किया करती थी। उसके साथ तुलसी भी घर छोड़ गई।
घबराहट और बढ़ी तो वह फिर से उठ कर भीतर चली गई। माँ ने पीछे से पुकारा मग़र उसने अनसुना कर दिया। नवीन बेड पर उल्टे मुंह पड़ा था। एक बार तो उसे दया आई उस पर। मग़र वह जानती थी कि अब तो सब कुछ खत्म हो चुका है इसलिए उसे भावुक नही होना है।
उसने सरसरी नजर से कमरे को देखा। अस्त व्यस्त हो गया है पूरा कमरा। कहीं कंही तो मकड़ी के जाले झूल रहे हैं।
कितनी नफरत थी उसे मकड़ी के जालों से?
फिर उसकी नजर चारों और लगी उन फोटो पर गई जिनमे वो नवीन से लिपट कर मुस्करा रही थी।
कितने सुनहरे दिन थे वो।
इतने में माँ फिर आ गई। हाथ पकड़ कर फिर उसे बाहर ले गई।
बाहर गाड़ी आ गई थी। सामान गाड़ी में डाला जा रहा था। राधिका सुन सी बैठी थी। नवीन गाड़ी की आवाज सुनकर बाहर आ गया।
अचानक नवीन कान पकड़ कर घुटनो के बल बैठ गया।
बोला--" मत जाओ,,, माफ कर दो"
शायद यही वो शब्द थे जिन्हें सुनने के लिए चार साल से तड़प रही थी। सब्र के सारे बांध एक साथ टूट गए। राधिका ने कोर्ट के फैसले का कागज निकाला और फाड़ दिया ।
और मां कुछ कहती उससे पहले ही लिपट गई नवीन से। साथ मे दोनो बुरी तरह रोते जा रहे थे।
दूर खड़ी राधिका की माँ समझ गई कि कोर्ट का आदेश दिलों के सामने कागज से ज्यादा कुछ नही।
काश उनको पहले मिलने दिया होता?
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