10/11/2023
America से भारत लौटे युवक ने बताया प्रधानमंत्री मोदी ने भारत को कितना बदल दिया | All India News
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03/04/2023
शिक्षा सबकाअधिकार केअध्यक्ष दुर्गेश तिवारी से मिलकर संवाददाता दिनेश राजपूत की@Nstv24 news channel
आज हमारे संवाददाता दिनेश राजपूत पहुंचे शिक्षा सबका अधिकार के अध्यक्ष दुर्गेश तिवारी के पासदुर्गेश तिवारी अध्यक.....
23/07/2022
https://youtu.be/b34lBofI5lQ
Be Aimed
Serve for Nation
Jai Hind
शिक्षा सबकाअधिकार केअध्यक्ष दुर्गेश तिवारी से मिलकर संवाददाता दिनेश राजपूत की@Nstv24 news channel
आज हमारे संवाददाता दिनेश राजपूत पहुंचे शिक्षा सबका अधिकार के अध्यक्ष दुर्गेश तिवारी के पासदुर्गेश तिवारी अध्यक.....
06/03/2022
शिक्षा सबका अधिकार (iios Trust)
संस्था के सभी सम्मानित सदस्यों द्वारा किये गए Shiksha Sabka Adhikar (iios Trust)के लिए निस्वार्थ भाव के साथ कार्यो में योगदान स्वरूप सम्मान समारोह कार्यक्रम में प्रशस्तिपत्र वितरण का आयोजन किया गया,।
संस्था उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए आने वाले समय मे संस्था के द्वारा किये जाने वाले कार्यों का विस्तार कैसे किया जायेगा?
कैसे आने वाली पीढ़ी को शिक्षा से विमुख होने न दिया जाय?
कैसे प्रत्येक व्यक्ति के अंदर मानवता के प्रति जागरण हो?
इन विषयों पर चर्चा के साथ संस्था द्वारा किये गए विगत 4 वर्षों मेंकार्यो की चर्चा का विश्लेषण किया गया।
मुख्य रूप से संस्था द्वारा निर्देशित किया गया कि सभी कार्यकर्ताओं को अभियान में किन बातों का विशेष ध्यान रखना है।
* संस्था के विस्तार के लिए कार्यकारिणी का निर्माण किया जाय।
* हम न सोचें मिला क्या है हमको,
हम ये सींचे किया क्या है अर्पण।
पंक्तियों को आधारस्तंभ मानते हुए देश निर्माण में सहयोग।
* संस्था में किसी भी राजनीतिक चर्चा का स्थान नगण्य रखा गया है, शिक्षा के लिए कार्य पर विशेष महत्व।
* संस्था द्वारा विलुप्ति की ओर बढ़ रही भाषा संस्कृत तथा मानवता के उत्थान पर विशेष प्रयास।
अध्यक्ष श्री दुर्गेश तिवारी जी द्वारा सम्मानित हुए उपस्थित सदस्य
श्री अतुल कुमार सचान, लखनऊ
श्री राजेश अवस्थी, हरदोई
श्री मनोज यादव, लखनऊ
श्री आदित्य राजपूत, लखनऊ,
श्री सूरज प्रजापति, लखनऊ
श्री भरत शुक्ला, रायबरेली,
श्री अमित श्रीवास्तव, बस्ती
श्री सर्वेश यादव, मलिहाबाद
श्री दिनेश राजपूत, काकोरी,
श्री आलोक यादव, लखनऊ,
श्री आशीष सहाय, लखनऊ,
संस्था सभी के उज्ज्वल भविष्य की कामना करती है।
जय हिंद
29/12/2021
Shikha sabka Adhikar (iios Trust)
Hand togather
We are thankful for those who contributed for SSA directly or indirectly.
Coz
We want to become voice, not only notice.
We thankful for participating
Globe Capital Market Ltd.
Lal School, naubasta, Lucknow,
We specialy thankful with heart.
Mr Durgesh Tiwari (guru ji)
Mr. Asif Iqbal and team,
Mr. Manoj Yadav ji,
Mr. Sonu Saini ji,
Mr. Atul Karan Yadav,
Mr. Sanjay Yadav,
Mr. Atul Sachan
Mr. Rajeev Yadav,
Mr. Dr.Mujib Khan,
Mr. Abhishek Yadav,
Mr. Alok Yadav,
Mr. Suraj Prajapati,
Mr. Aditya Rajpoot,
Ma'am Rashida Khatun and all staff,
Ma'am Ragini Tiwari,
Ma'am Namrata
Ma'am Shanti,
Ma'am Komal,
And all well wishers of Shiksha Sabka Adhikar
Your Support is our Strength.
18/12/2020
Shiksha Sabka Adhikar
(iios Trust)
Here, we are showing two images for our social evaluation where all living.
In first view..
Some labour are painting road barrier for their livelihood and also making beautiful our city..
But some ill minded....
In second view..
That clean road barrier is spit by bad cultured or ill minded people. That's wrong..
We have to keep clean our society and it's our duty to keep it beautiful..
If you made it by mistake or planned, please stop it for our clean city...
Jai Hind
Shiksha Siksha Sabka Adhikar
(iios Trust)
05/09/2020
शिक्षा सबका अधिकार (iios Trust).
5 सितंबर भारतवर्ष में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।
डॉ राधाकृष्णन का जन्म तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेन्सी के चित्तूर जिले के तिरूत्तनी ग्राम के एक तेलुगुभाषी ब्राह्मण परिवार में 5 सितम्बर 1888 को हुआ था। तिरुत्तनी ग्राम चेन्नई से लगभग 64 कि॰ मी॰ की दूरी पर स्थित है और १९६० तक आंध्र प्रदेश में था और वर्तमान में तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले में पड़ता है। उनका जन्म स्थान भी एक पवित्र तीर्थस्थल के रूप में विख्यात रहा है। राधाकृष्णन के पुरखे पहले कभी 'सर्वेपल्ली' नामक ग्राम में रहते थे और 18वीं शताब्दी के मध्य में उन्होंने तिरूतनी ग्राम की ओर निष्क्रमण किया था।
डॉ॰ राधाकृष्णन एक निर्धन किन्तु विद्वान ब्राह्मण की सन्तान थे। उनके पिता का नाम 'सर्वपल्ली वीरासमियाह'और माता का नाम 'सीताम्मा' था। उनके पिता राजस्व विभाग में काम करते थे। उन पर बहुत बड़े परिवार के भरण-पोषण का दायित्व था। वीरास्वामी के पाँच पुत्र तथा एक पुत्री थी। राधाकृष्णन का स्थान इन सन्ततियों में दूसरा था।
राधाकृष्णन का बाल्यकाल तिरूतनी एवं तिरुपति जैसे धार्मिक स्थलों पर ही व्यतीत हुआ। उन्होंने प्रथम आठ वर्ष तिरूतनी में ही गुजारे। यद्यपि उनके पिता पुराने विचारों के थे और उनमें धार्मिक भावनाएँ भी थीं, इसके बावजूद उन्होंने राधाकृष्णन को क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लुथर्न मिशन स्कूल, तिरूपति में 1896-1900 के मध्य विद्याध्ययन के लिये भेजा। फिर अगले 4 वर्ष (1900 से 1904) की उनकी शिक्षा वेल्लूर में हुई। इसके बाद उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज, मद्रास में शिक्षा प्राप्त की। वह बचपन से ही मेधावी थे।
इन 12 वर्षों के अध्ययन काल में राधाकृष्णन ने बाइबिल के महत्त्वपूर्ण अंश भी याद कर लिये। इसके लिये उन्हें विशिष्ट योग्यता का सम्मान प्रदान किया गया। इस उम्र में उन्होंने स्वामी विवेकानन्द और अन्य महान विचारकों का अध्ययन किया। उन्होंने 1902 में मैट्रिक स्तर की परीक्षा उत्तीर्ण की और उन्हें छात्रवृत्ति भी प्राप्त हुई। इसके बाद उन्होंने 1904 में कला संकाय परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। उन्हें मनोविज्ञान, इतिहास और गणित विषय में विशेष योग्यता की टिप्पणी भी उच्च प्राप्तांकों के कारण मिली। इसके अलावा क्रिश्चियन कॉलेज, मद्रास ने उन्हें छात्रवृत्ति भी दी। दर्शनशास्त्र में एम०ए० करने के पश्चात् 1918 में वे मैसुर महाविद्यालय में दर्शनशास्त्र के सहायक प्राध्यापक नियुक्त हुए। बाद में उसी कॉलेज में वे प्राध्यापक भी रहे। डॉ॰ राधाकृष्णन ने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से विश्व को भारतीय दर्शन शास्त्र से परिचित कराया। सारे विश्व में उनके लेखों की प्रशंसा की गयी।
शिक्षा का प्रभाव जहाँ प्रत्येक व्यक्ति पर निश्चित रूप से पड़ता है, वहीं शैक्षिक संस्थान की गुणवत्ता भी अपना प्रभाव छोड़ती है। क्रिश्चियन संस्थाओं द्वारा उस समय पश्चिमी जीवन मूल्यों को विद्यार्थियों के भीतर काफी गहराई तक स्थापित किया जाता था। यही कारण है कि क्रिश्चियन संस्थाओं में अध्ययन करते हुए राधाकृष्णन के जीवन में उच्च गुण समाहित हो गये। लेकिन उनमें एक अन्य परिवर्तन भी आया जो कि क्रिश्चियन संस्थाओं के कारण ही था। कुछ लोग हिन्दुत्ववादी विचारों को हेय दृष्टि से देखते थे और उनकी आलोचना करते थे। उनकी आलोचना को डॉ॰ राधाकृष्णन ने चुनौती की तरह लिया और हिन्दू शास्त्रों का गहरा अध्ययन करना आरम्भ कर दिया। डॉ॰ राधाकृष्णन यह जानना चाहते थे कि वस्तुतः किस संस्कृति के विचारों में चेतनता है और किस संस्कृति के विचारों में जड़ता है? तब स्वाभाविक अंतर्प्रज्ञा द्वारा इस बात पर दृढ़ता से विश्वास करना आरम्भ कर दिया कि भारत के दूरस्थ स्थानों पर रहने वाले ग़रीब तथा अनपढ़ व्यक्ति भी प्राचीन सत्य को जानते थे। इस कारण राधाकृष्णन ने तुलनात्मक रूप से यह जान लिया कि भारतीय आध्यात्म काफ़ी समृद्ध है और क्रिश्चियन मिशनरियों द्वारा हिन्दुत्व की आलोचनाएँ निराधार हैं। इससे इन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि भारतीय संस्कृति धर्म, ज्ञान और सत्य पर आधारित है जो प्राणी को जीवन का सच्चा सन्देश देती है।
डॉ॰ राधाकृष्णन ने यह भली भाँति जान लिया था कि जीवन बहुत ही छोटा है परन्तु इसमें व्याप्त खुशियाँ अनिश्चित हैं। इस कारण व्यक्ति को सुख-दुख में समभाव से रहना चाहिये। वस्तुतः मृत्यु एक अटल सच्चाई है, जो अमीर ग़रीब सभी को अपना ग्रास बनाती है तथा किसी प्रकार का वर्ग भेद नहीं करती। सच्चा ज्ञान वही है जो आपके अन्दर के अज्ञान को समाप्त कर सकता है। सादगीपूर्ण सन्तोषवृत्ति का जीवन अमीरों के अहंकारी जीवन से बेहतर है, जिनमें असन्तोष का निवास है। एक शान्त मस्तिष्क बेहतर है, तालियों की उन गड़गड़ाहटों से; जो संसदों एवं दरबारों में सुनायी देती हैं। वस्तुत: इसी कारण डॉ॰ राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति के नैतिक मूल्यों को समझ पाने में सफल रहे, क्योंकि वे मिशनरियों द्वारा की गई आलोचनाओं के सत्य को स्वयं परखना चाहते थे। इसीलिए कहा गया है कि आलोचनाएँ परिशुद्धि का कार्य करती हैं। सभी माताएँ अपने बच्चों में उच्च संस्कार देखना चाहती हैं। इसी कारण वे बच्चों को ईश्वर पर विश्वास रखने, पाप से दूर रहने एवं मुसीबत में फँसे लोगों की मदद करने का पाठ पढ़ाती हैं। डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने यह भी जाना कि भारतीय संस्कृति में सभी धर्मों का आदर करना सिखाया गया है और सभी धर्मों के लिये समता का भाव भी हिन्दू संस्कृति की विशिष्ट पहचान है। इस प्रकार उन्होंने भारतीय संस्कृति की विशिष्ट पहचान को समझा और उसके काफ़ी नज़दीक हो गये।
डॉ॰ राधाकृष्णन समूचे विश्व को एक विद्यालय मानते थे। उनका मानना था कि शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है। अत: विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबन्धन करना चाहिए। ब्रिटेन के एडिनबरा विश्वविद्यालय में दिये अपने भाषण में डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था- "मानव को एक होना चाहिए। मानव इतिहास का संपूर्ण लक्ष्य मानव जाति की मुक्ति तभी सम्भव है जब देशों की नीतियों का आधार पूरे विश्व में शान्ति की स्थापना का प्रयत्न हो।" डॉ॰ राधाकृष्णन अपनी बुद्धि से परिपूर्ण व्याख्याओं, आनन्ददायी अभिव्यक्तियों और हल्की गुदगुदाने वाली कहानियों से छात्रों को मन्त्रमुग्ध कर देते थे। उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में उतारने की प्रेरणा वह अपने छात्रों को भी देते थे। वह जिस भी विषय को पढ़ाते थे, पहले स्वयं उसका गहन अध्ययन करते थे। दर्शन जैसे गम्भीर विषय को भी वह अपनी शैली से सरल, रोचक और प्रिय बना देते थे। इसलिये इनके जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के रूप मे मनाते है।