इस बड़े मंगल 10 जून को हनुमान जी की उपासना पूजा और हनुमान चालीसा का पाठ करने से जीवन की कई सारी समस्याओं से समाधान पाया जा सकता है इस बार मंगलवार को बड़ा ही प्रभावकारी योग बन रहा है अतः अपने जीवन में उन्नति और सुख शांति प्राप्त करने के लिए इस मंगलवार को हनुमान जी की कृपा प्राप्त करें इसके साथ ही कुछ और भी दुर्लभ योग बन रहे हैं जीन से आप सभी देखेंगे की एक-दो दिन पहले और एक-दो दिन बाद दुनिया में कुछ बड़े विनाशकारी परिणाम भी दिखाई देने के योग बना रहे हैं अतः इन समस्याओं से बचने के लिए हनुमान जी की उपासना ही एकमात्र उपाय है
जय भोले शंकर
Astro-Science and Services
यहां पर कुंडली और ज्योतिष से संबंधित सभी प्रकार के परामर्श दिए जाते हैं
30/05/2024
चार धाम यात्रा कार्यक्रम संपन्न हुआ 28 - 5 -24 को वापस लखनऊ में आगमन हुआ
27/05/2024
यकीनन
कुछ ही घंटों में रोने की आवाज पूरी तरह से बंद हो जाएगी ..
रिश्तेदारों
के लिए खाना बनवाने या मंगवाने में जुटे जायेगा परिवार,
परिवार के लोग या रिश्तेदार सोने से पहले चाय की दुकान पर टहलने निकल जाएंगे !
कोई
रिश्तेदार आपके बेटे या बेटी से फोन पर बात करेगा कि आपात स्थिति के कारण वह व्यक्तिगत रूप से नहीं आ पा रहा है ..
और
तो और इधर आपका मृत शरीर चिता पर जल रहा होगा,
उधर
आपको अंतिम विदाई देने आए लोगों में से कोई फोन पर किसी से बतिया रहा होगा,
कोई
वाट्स एप, फेसबुक पर व्यस्त होगा तो दूर झुंड बनाकर बैठे कुछ लोग घर परिवार,
व्यवसाय, खेल आदि अन्य विषयों पर चर्चा कर रहे होंगे .
अगले
दिन रात के खाने के बाद,
कुछ रिश्तेदार कम हो जाएंगे,
और कुछ लोग सब्जी में पर्याप्त नमक नहीं होने की शिकायत करते होंगे।
भीड़
धीरे धीरे छंटने लगेगी ,
आपका कार्यालय या आपकी व्यवसाय में आपकी जगह कोई और ले लेगा !!
महीने
के अंत तक आपका जीवनसाथी कोई कॉमेडी शो देख कर हंसने लगेगा !!
सबका
जीवन सामान्य हो जाएगा ..
आपको
इस दुनिया में आश्चर्यजनक गति से भुला दिया जाएगा।
इस
बीच आपकी प्रथम वर्ष पुण्यतिथि भव्य तरीके से मनाई जाएगी।
पलक
झपकते ही साल बीत गए और आपके बारे में बात करने वाला कोई नहीं है .
एक
दिन बस पुरानी तस्वीरों को देखकर आपका कोई बेहद करीबी आपको याद कर सकता है !
लोग
आपको आसानी से भूलने का इंतजार कर रहे हैं,
फिर
आप किसके लिए दौड़ रहे हो ❓
और आप किसके लिए चिंतित हैं?
क्या
आप अपने घर, परिवार, रिश्तेदार को संतुष्ट करने के लिए जीवन जी रहे हैं ?
जिंदगी
एक बार ही होती है, बस इसे जी भर के जी लो…
और
जितना हो सके इसके परम उद्देश्य के जितना निकट पहुंच सको,
पहुंचने
का प्रयास करें.!
किसी
और से जलन ईर्ष्या बदले की भावना अपने दिल में न आने दें !!
तभी
हमें महसूस होगा जीवन कितना अच्छा और सार्थक है ..
वर्ना तो
अपनी अपनी अपनी सोंच और फिलॉसफी तो हईयै है ‼️
ॐ का अर्थ :-
ॐ का शब्दार्थ नहीं है क्योकि वस्तुत: ॐ शब्द ही नहीं है जब से श्रृष्टि हुई और श्रृष्टि से बने है और ये वही बता सकते है जो श्रृष्टि मय है किन्त समस्त श्रृष्टि ॐ में है इसलिए ॐ शब्द अतीत है इसका अर्थ जाना नहीं जा सकता केवल अनुभव किया जा सकता है और ॐ का अनुभव तभी होगा जब व्यक्ति के मन में कोई विचार कोई इच्छा कोई स्वप्न न हो कोई अपेक्षा न हो मन पूर्णतः शांत हो स्मरण रहे ॐ का निर्माण नहीं किया जा सकता ना किया गया क्योकि श्रृष्टि की निर्माती ॐ से हुई है (धर्माचार्य प्रियंकर उपाध्याय -9450653600)
पूजा करने का तात्पर्य-
पूजा वो विधि है जिसके द्वारा हम अपने ऊर्जा को एकत्रित करके ब्रह्मांड की महा ऊर्जा से जोड़ते हैं ब्रह्मांड की महा ऊर्जा से जुड़ने के पश्चात ही एकाग्रता आती है एकाग्रता हमारे लिए ज्ञान के द्वार खोलती है और ज्ञान हमें शरीर और भौतिक संसार की निरर्थकता को समझता है हमें व्यष्टि से समष्टि की ओर ले जाता है हमारा मन स्वार्थ क्रोध काम और अन्य कामनाओं से उठकर हमें वास्तविकता के समीप ले जाता है जहां इस समस्त संसार का सत्य निहित है अपने अंतह से निहित होकर जितना बाहर देखेंगे उतना ही भटकेंगे और भटकने का अर्थ है पाप की ओर अग्रसर होना क्योंकि तुम्हारे बाहर खड़ा भौतिक संसार तुम्हारी आवश्यकताओं हेतु सदैव तत्पर रहता है वह तुम्हारे सामने आवश्यकताए पैदा करता चला जाएगा और तुम उन आवश्यकताओं की पूर्ति करने हेतु उचित और अनुचित को भूलकर कब प्राप्त कर्मों में लिप्त हो जाओगे है तुम्हें पता ही नहीं चलेगा इसलिए केवल ज्ञान ही व्यक्ति का और समाज का हित कर सकता है किंतु ये तभी संभव है जब इसे निष्काम भावना से प्राप्त किया जा सके (धर्माचार्य - प्रियंकर उपाध्याय 9450653600)
15/03/2024
आज सुबह बनारस धाम में स्नान और दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ
|| प्रियंकर उपाध्याय भारद्वाज - 09450653600
भरद्वाज-भारद्वाज वंश/गोत्र परिचय __
भरद्वाज ऋषि ऋग्वेद के छठे मंडल के दृष्टा जिन्होंने 765 मंत्र लिखे हैं। वैदिक ऋषियों में भरद्वाज ऋषि का अति उच्च स्थान है। ऋषि भरद्वाज के वंशज भारद्वाज कहलाते है
अंगिरा वंशी भरद्वाज के पिता - बृहस्पति और माता ममता थीं। बृहस्पति ऋषि - अंगिरा के पुत्र होने के कारण ये वंश अंगिरा वंश भी कहलाया जा सकता है। ऋषि भरद्वाज ने अनेक ग्रंथों की रचना की उनमें से यंत्र सर्वस्व और विमानशास्त्र की आज भी चर्चा होती है।
चरक ऋषि ने भरद्वाज को 'अपरिमित' कहा है। भरद्वाज ऋषि चंद्रवंशी काशी राज दिवोदास के पुरोहित थे। वे दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन के भी पुरोहित थे और फिर प्रतर्दन के पुत्र क्षत्र का भी उन्हीं ने यज्ञ संपन्न कराया था। वनवास के समय प्रभु श्रीराम इनके आश्रम में गए थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का संधिकाल था।
ऋषि भरद्वाज के प्रमुख पुत्रों के नाम हैं- ऋजिष्वा, गर्ग, नर, पायु, वसु, शास, शिराम्बिठ, शुनहोत्र, सप्रथ और सुहोत्र। उनकी 2 पुत्रियां थी रात्रि और कशिपा। इस प्रकार ऋषि भारद्वाज की 12 संतानें थीं। सभी के नाम से अलग-अलग वंश चले। भरद्वाज गोत्र की वंशावली में अधिकतर उत्तर भारत के ब्राह्मण पाये जाते है, किन्तु कुछ स्थानों पर क्षत्रिय भी इस गोत्र में सम्मिलित है ।
विन्ध्याचल पर्वत शृंखला के उत्तरीय भूभाग में ऋषि भरद्वाज से जो वंश परंपरा प्रारंभ हुआ वे सभी वंशज भारद्वाज गोत्रीय कहलाए
भारद्वाज गोत्र की कुलदेवी - बन्धुकशानिदेवी/श्रीमाता के नाम से जानी जाती है
भारद्वाज गोत्र का वेद - यजुर्वेद है
अतः इस गोत्र के वंशजों को यजुर्वेद पूजा स्थान में रखना चाहिए और समय आने पर इसे जेष्ठ पुत्र को सौंप दें
भारद्वाज गोत्र का उपवेद - धनुर्वेद है
गोत्र के वंशज धनुर्वेद को पूजा स्थान में रखें और समय आने पर इसे कनिष्ठ पुत्र को सौंप दें
भारद्वाज गोत्र की शाखा - माध्यन्दिनीय है
शाखा अर्थात उपवेद से भी छोटी इकाई
वेद और उपवेद के बाद का ग्रंथ है
भारद्वाज गोत्र का सूत्र - कात्यायन है
जब वेद उपवेद शाखा का अध्ययन भारी पड़ने लगा तब वंशजों ने सूत्र अपनाया
भारद्वाज गोत्र की शिखा परंपरा दक्षिण है
अर्थात इस गोत्र के वंशज अपनी शिखा को दाई और घुमा कर बांधते हैं
भारद्वाज गोत्र की पाद परंपरा दक्षिण है
अर्थात इस गोत्र के वंशज पहले अपना दाया पैर धोते हैं
भारद्वाज गोत्र के प्रवर है - अन्गिरस बार्हस्पत्य व भरद्वाज है
प्रवर अर्थात श्रेष्ठ
गोत्रकारों के पूर्वज और महान ऋषि को प्रवर कहा गया है
भारद्वाज गोत्र के आस्पद है द्विवेदी, पाठक, उपाध्याय, चतुर्वेदी, पांडे
आस्पद अर्थात वह प्रजातियां जो कि किसी व्यक्ति के नाम या स्थान के नाम से प्रसिद्ध हुई
भारद्वाज गोत्र के इष्टदेव - भगवान् शिव है
इस विचारधारा में समय-समय पर रुचि अनुसार परिवर्तन हुआ
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धर्माचार्य - प्रियंकर उपाध्याय भारद्वाज, लखनऊ (9450653600
भगवान् मालिश करने आयें (प्रसंग)
भक्तों की महिमा अनन्त है | हजारों ही ऐसे भक्त हैं जिन्होंने परमात्मा का नाम जप कर भक्ति करके संसार में यश कमाया | ऐसे भक्तों में "सैन भगत जी" का भी नाम आता है | वह जाति से नाई थे |सैन जी के समय में भक्ति की लहर का जोर था | भक्त मंडलियाँ काशी व अन्य स्थानों में बन चुकी थी |
भक्त मिलकर सत्संग किया करते थे |सैन नाई जी एक राजा के पास नौकर थे| वह सुबह जाकर मालिश व मुठी चापी किया करते थे | एक दिन संत आ गए | सारी रात कीर्तन होना था | प्रभु भक्ति में सैन जी इतने मग्न थे कि उन्हें राजा के पास जाने का ख्याल ही न रहा | संत सारी रात कीर्तन करते रहे |
राजा ने सुबह उठना था और उसकी सेवा होनी थी | अपने भक्त की लाज रखने के लिए भक्तों के रक्षक ईश्वर को सैन जी का रूप धारण करके राजा के पास आना पड़ा | भगवान् ने राजा की सेवा इतनी श्रद्धा के साथ की कि राजा प्रसन्न हो गयाप्रसन्न होकर उसने अपने गले का हार उतार कर सैन जी के भ्रम में भगवान् को दे दिया |
भगवान् मुस्कराए और हार ले लिया | अपनी माया शक्ति से उन्होंने वह हार सैन जी के गले में डाल दिया और उनको पता तक न लगा | प्रभु भक्तों के प्रेम में ऐसा बन्ध जाता कि वश में होकर कहीं नहीं जाता |सुबह हुई | सैन जी को होश आया कि वह महल में नहीं गए तो राजा नाराज़ हो जाएगा | यह सोच कर वह महल की तरफ चल पड़े |
आगे राजा बाधवगढ़ अपने महल में टहल रहा था |
उसने स्नान करके नए वस्त्र पहन लिए थे | सैन उदासी के साथ राजा के पास पहुँचा तो राजा ने पूछा, सैन ! अब फिर क्यों आए ? क्या किसी और चीज़ की जरूरत है ? आज तुम्हारी सेवा से हम बहुत खुश हुए हैं |सैन ने सोचा कि राजा मेरे से नाराज़ है |
उसने कांपते हुए बिनती की, महाराज ! क्षमा कीजिए, मैं नहीं आ सका | भक्त जन आ गए थे तो रात भर कीर्तन होता रहा |यह बात सुनकर राजा बहुत हैरान हुआ | उसने कहा- आज तुम्हें क्या हो गया है, यह कैसी बातें कर रहे हो, मेरे पास तुम समय पर आए | सोए को उठाया, नाख़ून काटे, मालिश की, स्नान करवाया, कपड़े पहनाए ।
तथा मैंने प्रसन्न होकर अपना हार उतारकर तुझे दिया | वह हार आज तुम्हारे गले में है |सैन ने देखा उसके गले में सचमुच ही हार था | उस समय उसे ज्ञान हुआ तथा राजा को कहने लगा, यह सत्य है महाराज ! मैं नहीं आया | मैं जिसकी भक्ति कर रहा था, उसने स्वयं आकर मेरा कार्य किया | यह माला आपने भगवान के गले में डाल दी थी।
और भगवान अपनी शक्ति से मेरे गले में डाल गए | यह तो प्रभु का चमत्कार है |यह सुनकर राजा बहुत हैरान हुआ | वह सैन जी चरणों में नतमस्तक होकर कहने लगा, भक्त जी ! अब आपको राज्य की तरफ से खर्च मिला करेगा अब आप बैठकर भक्ति किया करें | ऐसे हुए भक्त सैन नाई जी
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