Pawan

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16/06/2021

१९४७ में भारत जब आज़ाद हुआ और हमारे पुरखों ने शासन चलाने की “लोकतान्त्रिक प्रणाली” को स्वीकार किया तो पहले उस प्रणाली के “भारतीय मॉडल” को वर्णित एवं विकसित किया गया। इस महान काम के लिए हम सभी सदैव अपने संविधान निर्माताओं के लिए कृतज्ञ रहेंगे क्यूंकि उन्होंने इसे उसी समय काफी खुला बनाया, जिससे इसमें समय- समय पर महत्वपूर्ण परिवर्तन होते रहे और यह परिष्कृत होता रहा। संविधान निर्माण करने वाले सभी लोग भारत के स्वाधीनता आंदोलन के शिखर महापुरुष थे, वह सभी राजनैतिक अथवा सामजिक आंदोलनो से निकले हुए लोग थे, वह भारत की विविधिताओं से भली-भांति परिचित थे और इसीलिए उन्होंने शासन प्रणाली को इतना लचीला बनाया की भविष्य में समाज के तमाम वंचित और पिछड़े तबके जो उस समय परिधि के बाहर थे वह लोग भी वक्त आने पर गोलबंदी करके उस दुर्ग में न सिर्फ घुस सकें अपितु वहां कब्ज़ा भी कर सकें। डा. राजेंद्र प्रसाद, जवाहर लाल नेहरु, बाबा साहेब अंबेडकर और तमाम विद्वान महापुरुष जो संविधान निर्माण के कार्य में लगे उन सभी की विद्वता का ही नतीजा है जो आज भारत में लोकतंत्र की जड़ें इतनी गहरी हो पाईं हैं। आज समाज के हर तबके को शासन प्रणाली में शामिल किया जा चुका है जो पहले सिर्फ़ चर्चाओं में ही थे।

हालाँकि ऐसा भी नहीं हुआ है कि हमने “आदर्श व्यवस्था” को हासिल कर लिया है किन्तु ऐसा भी नहीं है कि हमारी आँखों से उस “आदर्श व्यवस्था” का ख्वाब मिट गया है। महात्मा बुद्ध कहते थे, "रास्ता ही मंज़िल है" तो इस लिहाज से हम सही रास्ते पर चल रहे हैं। हम यह बात ज़रूर कहेंगे कि यह रास्ता तमाम उतार-चढ़ावों से भरा हुआ है लेकिन यह गलत नहीं है। आदर्श व्यवस्था से हमारा तात्पर्य समाजवादियों के पुराने किंतु बेहद सच्चे नारे से है, “जिसकी जितनी हिस्सेदारी उसकी उतनी भागीदारी”।

राजनीति कि प्रकृति को परिभाषित करते हुए महान प्रो रजनी कोठारी जी कहते थे कि यह दरअसल में एक ऐसी स्पर्धात्मक करवाई कि तरह है जिसका उद्देश्य कुछ निश्चित लक्ष्यों को भेदने के लिए सत्ता प्राप्त करना होता है। राजनीति, गोलबंदी करने और अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए पहले से मौजूद और उभरती हुई निष्ठाओं कि शिनाख्त करती है और फिर उनका अपने हक़ के लिए इस्तेमाल करती है। इसके लिए सबसे जरूरी है कि संगठन और उसके समर्थन का आधार सुस्पष्ट हो। भारतीय समाज में जातिगत संरचनाओं के माध्यम से पहले ही संगठन बनाने और उसकी गोलबंदी करने कि सुविधा है और यही मुख्य वजह है कि यहाँ राजनीति, जाति आधारित गोलबंदी कि कोशिश करती है।”राजनीति में जातिवाद" कि परिघटना को दरअसल में "जातियों के राजनीतिकरण" से समझा जाना चाहिए।

कही भी यदि जनाधारित राजनीति होगी तो जनसमर्थन को संगठन के जरिये ही व्यक्त किया जाएगा और संगठन के झंडे तले विशाल जनसमूह गोलबंद किये जाते हैं इसलिए भारत में जो राजनीति करेगा उसे अपनी जाति के राजनीतिकरण के फेर में पड़ना ही होगा। आधुनिकीकरण के हामी विद्वान् बुद्धिजीवी बहुधा पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होने के चलते सदैव राजनीति एवं भारतीय समाज कि खूबियों को नज़रअंदाज़ करते हैं और इस वजह से वह अपने विरोधी के सैद्धांतिक जाल में फँस जाते हैं। समाज और राजनीति कि अन्योन्य क्रिया सदैव चलने वाली है इसमें कोई भी एक अपनी प्रकृति बदलने वाली नहीं है मतलब न ही समाज से जातिव्यवस्था का अंत होने वाला है और न ही राजनीति में लोग गोलबंदी करना समाप्त करेंगे सो हमें किसी भी तरह के संदेह से बाहर आकर अपने समाज, अपने देश, अपने संवैधानिक एवं लोकतान्त्रिक मूल्यों कि जड़ो को और गहरा करने के लिए सभी का राजनीतिकरण का प्रयास करना चाहिए। यह बुनियादी बात है जिसे समाज के हर नागरिक को समझनी चाहिये। किसी भी दल को यदि प्रासंगिक रहना है तो उसे और उसके समर्थकों-कार्यकर्ताओं को यह बात भली-भाँति याद कर लेनी चाहिए।आप चाहे तो इस पैमाने पर कांग्रेस, भाजपा, सपा या किसी भी अन्य दल का अवलोकन कर सकते हैं, उत्तर वही मिलेगा जो ऊपर लिखा है।

धन्यवाद
पवन यादव

12/11/2020

मालवीय जी के बारे में कुछ और:

मालवीय जी के पुरखे मालवा से आकर इलाहाबाद में बस गए और इसी कारण मालवीय कहलाने लगे ठीक वैसे जैसे नहर के किनारे बसने के कारण पंडित जवाहर लाल के पुरखे नेहरु कहलाए। भूगोल हमेशा से उपनाम देता रहा है। इस वाक्य पर बहुत डिटेल में एक लेख लिखना है।

ख़ैर 1886 में महज़ पच्चीस साल की उम्र में युवा मदन मोहन ने दादाभाई नैरोजी की अध्यक्षता में हुई कांग्रेस की बैठक को संबोधित किया था। युवा मदन के भाषण की तारीफ़ सभा में मौजूद कांग्रेस के संस्थापक सदस्य ए ओ ह्यूम तक ने की थी। उस भाषण के बाद मदन मोहन देश भर में प्रसिद्ध होने लगे, यही वह क्षमा जब उन्होंने अपनी वृहद राजनैतिक यात्रा शुरु की। सन् 1909 में आप पहली दफ़ा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनें। उसके बाद 1918, 1932 और फिर 1933 में वापस से कांग्रेस अध्यक्ष बनें। मदन जी ने ‘सेवा समिति’ के नाम से एक स्काउट दल का भी गठन किया था।

1916 में महामना ने बनारस में एक बगिया बनाई जहां भारतीय मेधा से प्रकाशित तमाम सुंदर पुष्प खिले, जो पूरे देश को गौरवान्वित करने वाला संस्थान बना। उस बगिया का नाम है, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय।

गांधी जी के विचारों से प्रभावित होकर महामना, बापू के साथ हो लिए और राष्ट्र की स्वाधीनता के लिए तपस्वी की भाँति जुट गए। तमाम बार जेल गए।1919 में जलियाँवाला बाग कांड में वह अंग्रेज़ी अत्याचार के ख़िलाफ़ अदालत गए और बेहद मज़बूती से ब्रिटिश अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। 1931 के गोलमेज़ सम्मेलन में भाग लेने लंदन तक गए। भारत का स्वतंत्रता आंदोलन हमारे देश के वृहद् अतीत का बेहद सुंदर अध्याय है। उस दौरान ना सिर्फ़ एक ग़ुलाम मुल्क अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा था बल्कि वह तमाम सामाजिक कुरीतियों के ख़िलाफ़ भी अपनी आवाज़ उठा रहा था। उन्हीं कुरीतियों में से एक थी (दुर्भाग्य से अभी भी है) जातिप्रथा। महामना जीवन पर्यन्त जातिप्रथा से लड़ते रहे। कालांतर के मंदिर में रथ यात्रा के दौरान महामना ने दलितों को मंदिर में प्रवेश दिलाने के लिए संघर्ष किया और कामयाबी पाई। ऐतिहासिक पूना पैक्ट पर महामना एक दल थे जहां दूसरी ओर बाबा साहेब थे।

महामना की तारीफ़ करते हुए गुरुदेव टैगोर जी ने कहा था, “तुम्हारे तूर्यनाद ने देश के अनेक भागों को जगाया है और तमाम वीरों को तुम्हारे इर्द गिर्द इकट्ठा कर दिया है।”

मालवीय जी अपने भाषणों में अक्सर कहते थे, अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वै न दैन्यं न पलायनम। अर्थात् अर्जुन की दो प्रतिज्ञाएँ है- वह ना तो किसी के सामने दीनता दिखाएगा और ना ही पलायन करेगा।

जब कभी कोई छात्र मालवीय जी से ऑटोग्राफ़ माँगने जाता तो वह उसकी डायरी में लिखा करते थे,

सत्येन ब्रह्मचर्येण व्यायामेनाय विद्यया
देशभक्तया आत्मत्यागेन समानर्हं सदाभव

अर्थात् सत्य से, ब्रह्मचर्य से, विद्या से, देशभक्ति से तथा आत्मत्याग से सर्वदा सम्मान पाने योग्य बनो।

मालवीय जी ‘मकरंद’ नाम से कविताएँ भी लिखा करते थे। आपकी पहली कविता ‘राधिका रानी’ नाम से प्रकाशित हुई। बताते चलें कि मालवीय जी को भगवान कृष्ण से विशेषानुराग था।

मालवीय जी कहते थे कि भारतवर्ष की जो साझी संस्कृति और साझी राष्ट्रीयता है वह हमारे देश की अत्यंत महत्वपूर्ण एवं शक्तिशाली विरासत है। जब कभी कोई शरारती तत्व इस मूल्य पर चोट करने की कोशिश करते हैं तो हमारे देश के लोगों को अपनी गाढ़ी एकता का प्रदर्शन करते हुए उन्हें करारा जवाब देना चाहिए।

12 नवंबर 1946 को जब देश आज़ादी के मुहाने पर खड़ा था उसी समय आपका देहावसान हो गया।बापू ने आपको श्रद्धांजलि देते हुए ‘हरिजन सेवक’ में लिखा था, उनका जीवन अत्यंत पवित्र था। वह दया के सागर थे। उनका शास्त्रीय ज्ञान असीम था। भागवत उनकी सबसे प्रिय पुस्तक थी। वह दक्ष प्रवक्ता थे। उनकी स्मरण शक्ति अद्भुत थी और वह बेहद सादा एवं सरल जीवन जिए।

अकबर इलाहाबादी ने महामना के लिए लिखा था-

हज़ार शेख़ ने दाढ़ी बढ़ाई सन-की-सी
मगर, वो बात कहाँ मालवी मदन की-सी

महामना को उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर कृतज्ञ भविष्य की ओर से कोटि कोटि प्रणाम।

02/11/2020

"The child is father of the Man;
And I could wish my days to be
Bound each to each by natural piety."
There was a time when meadow, grove, and stream,
The earth, and every common sight,
To me did seem
Aparelled in celestial light,
The glory and the freshness of a dream.
It is now as it hath been of yore;-
Turn wheresoe'er I may,
By night or day,
The things which I have seen I now can see no more
The Rainbow comes and goes,
And lovely is the Rose
The Moon doth with delight.
Ode by Wordsworth, William.
Intimations of immortality from recollections of early childhood.

02/11/2020

लोकनायक बुद्ध :
भिक्षा पात्र लिए हुए बुद्ध यहाँ-वहाँ घूमे। एक जगह ज्यादा समय तक रुके नहीं। यही नियम अपने शिष्यों और आगामी भिक्षुओं के लिए भी बनाया।
अपना सब कुछ ध्वस्त कर, जलाकर-तपाकर कोई मनुष्य भिक्षुक बनता है।
वह सबकी सुनता है, खूब सुनता है। बुद्ध ने भिक्षुओं को 'बहुश्रुत' होने का परामर्श दिया। सुत्तनिपात यही बताता है।
वे सबके बारे में सोचते थे, सबके कल्याण के लिए उनकी करुणा का द्वार खुला हुआ था। सब उनको प्यार करते थे इसलिए ललितविस्तर उन्हें 'लोकनायक' कहता है।
Ramashankar Singh

02/11/2020

"गाते-गाते लोग चिल्लाने लगें" तो कान बन्द करना एक उपाय है। दूसरा उपाय है गाना।
जब पड़ोस, मित्रता और रिश्ते खत्म होने लगें तो खुद को बंद कर लेना एक उपाय है। दूसरा है फिर से पड़ोसी, दोस्त और रिश्तेदारों को ढूंढना।
जब लोग हाल-चाल पूछने की बजाय दिखाने लगें, और व्हाट्सएप स्टेटस लोगों की ज़िंदगी की हक़ीक़त छिपाने लगे, तब खुद भी हक़ीक़त छिपाना एक उपाय है, दूसरा उपाय है हाल-चाल फिर से पूछना और बताना।
चिट्ठियाँ मानवों के बीच संवाद के विकास का चरम थीं। फोन से लेकर सोशल मीडिया आदि के आने से सार्थक संवाद का पतन ही हुआ है। उस पतन से खुद मानवता का पतन हुआ है।
इंतज़ार में खूबसूरती थी। अमेज़न का सामान दो दिन देर से आने पर शिकायत करने में ख़ूबसूरती खो जाती है।
तस्वीरों की बाढ़ की वजह से जब आपका क्लाउड स्टोरेज भी खत्म होने लगे तब बटुए में रहने वाली या क़िताब में छिपाई गई उस अकेली तस्वीर की क़ीमत का पता चलता है।
आपके घर का दरवाज़ा आज भी बिना फोन किए कोई मित्र खटखटाता है तो आप भाग्यशाली हैं।
दो दशकों में ही दुनिया यदि बदल जाए तो उसे दुनिया का बदलना नहीं खत्म हो जाना कहना चाहिए।
उस खत्म होती या हो चुकी दुनिया को पुनर्जीवित करना हमारा कर्तव्य है। ऐसा करना पीछे जाने की नहीं बल्कि गिरने से बचने की कवायद मानी जानी चाहिए।
("कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं, गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं " - दुष्यंत कुमार)
- हितेन्द्र अनंत

02/11/2020

जाहिल हो ।।। यह लफ्ज़ हम अक्सर उसकी तरफ ढकेल देते हैं, जो हमारी राय जैसी राय नही रखता है । एक डॉक्टर के लिए जिस व्यक्ति को दवा कम्बीनेशन समझ न आए,उसे जाहिल कह देना बड़ा आसान है, भले ही वह फिलॉस्फर हो । एक वकील के लिए उसके बुने पेपर को न समझने वाले को जाहिल कह देना बड़ा आसान है, भले ही वह डॉक्टर हो । एक लेखक के लिए किसी किताब या कविता को न समझने वाले को जाहिल कह देना बड़ा आसान है, भले ही वह वैज्ञानिक हो । एक वैज्ञानिक के लिए विज्ञान की सामान्य परिभाषा न समझने वाले को जाहिल कह देना बड़ा आसान है, भले ही वह कलाकार हो । एक थियेटर आर्टिस्ट के लिए उसके नाटक के ट्विस्ट को न समझने वाले को जाहिल कह देना आसान है, भले ही वह व्यक्ति कामयाब पॉलिटिशियन हो ।
असल में हम सब अपने से अलग या हमारी बात को न समझने वालों को जाहिल की माला पहनाने को तड़पते रहते हैं । कभी एक पूरे वर्ग को जाहिल कहते हैं, कभी दिल नही भरता तो पूरे देश को जाहिल कहते हैं, कभी पूरे धर्म को जाहिल कहते हैं तो कभी पूरी जाति को जाहिल कहते हैं । हम अक्सर जिस तरफ उंगली उठाकर यह जहालत के तमगे बांट रहे होते हैं, उसे वक़्त यह तमगा हमारे माथे भी चमक रहा होता है, बस हमें दिखता ही तो नही है मगर औरों को तो दिखता ही होगा ।
चार किताब पढ़कर अगर हम बिना किताब पढ़ने वाले को जाहिल कहकर निकलेंगे,तो ज़ाहिर है,यह पहचान है कि वह चार किताबें भी हम पर असर नही कर सकी हैं, कोई बदलाव नही ला सकी हैं ।
ज्ञान को पाना जितना कठिन है, उससे कहीं ज़्यादा कठिन उसे संभालना है । ज्ञान को संभालने की एक प्रैक्टिस बताते हैं, आपको दूसरा जब तक जाहिल नज़र आए,तब तक ख़ुद में ज्ञान की खूब वृद्धि करें । खूब पढ़ें,सीखें,लोगों से मिले,यात्रा करें,जिस दिन दूसरे जाहिल नज़र आना बंद हो जाएं,जिस दिन आपके ज़िक्र में किताबों,लेखकों और भद्रजनों के नामों की जगह विचार आ जाएं,वह दिन आपकी शुरआत होगा । एक बात मेरी गिरह बाँध लें,इस ज़मीन पर जाहिल कोई नही है, क्योंकि सांसों का हिसाब रखकर उन्हें पूरा करना खुद में बहुत महान काम है, बल्कि इन्हें जाहिल समझना ही असल जहालत है...
#हैशटैग
Hafeez Bhai

12/10/2020
10/10/2020

ये मेरे इश्क़ की मजबूरियाँ मआज़-अल्लाह,
तुम्हारा राज़ तुम्हीं से छुपा रहा हूँ मैं।

मजाज़ लखनवी

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