DYUS IAS

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"Official page of DYUS IAS INSTITUTE" Bhopal (Madhya Pradesh) & Ahmadabad (Gujarat)

09/04/2026

*विचार: पश्चिम एशिया-बिना समाधान वाली शांति*




होर्मुज जलमार्ग इस घटनाक्रम का एक अहम पहलू बनकर उभरा। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत ऊर्जा संसाधनों की ढुलाई इसी मार्ग के जरिये होती है।

आनंद कुमार। अमेरिका और ईरान के बीच घोषित हुआ नाजुक युद्धविराम किसी संघर्ष का अंत नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया की राजनीति के एक और जटिल एवं अनिश्चित चरण की शुरुआत है। जो घटनाक्रम सामने आया, वह किसी स्पष्ट सैन्य विजय का परिणाम नहीं, बल्कि राजनीतिक दबावों, रणनीतिक भूलों और बदलते वैश्विक समीकरणों का मिश्रण है।

हालांकि युद्धविराम से ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर कुछ तात्कालिक राहत मिली हो, किंतु इसके गहरे निहितार्थ एक ऐसी स्थिति का संकेत करते हैं जहां भारी सैन्य दबाव के बावजूद ईरान अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में उभरता दिखा। इस संघर्ष की जड़ें ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसके क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर लंबे समय से चली आ रही चिंताओं में निहित हैं। इजरायल इसे अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता रहा और उसने उसकी परमाणु क्षमता को कमजोर करने के उद्देश्य से सैन्य कार्रवाई को उचित ठहराया। अमेरिका इस रणनीति के साथ हमेशा खड़ा दिखाई दिया, खासतौर से ट्रंप के दौर में और मजबूती से। इसके पीछे एक व्यापक लक्ष्य ईरान की इस्लामिक व्यवस्था को कमजोर करना या उसे बदलना भी था।

यह मान लिया गया था कि बाहरी सैन्य दबाव ईरान के भीतर असंतोष भड़का देगा और जनता सरकार के खिलाफ उठ खड़ी होगी। इस धारणा के उलट हमलों ने ईरानी समाज में एक तरह की एकजुटता पैदा कर दी और लोग सरकार के पीछे लामबंद हो गए। युद्ध में अपेक्षाओं की पूर्ति न होने के कारण अमेरिका को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार के लिए विवश होना पड़ा। ईरान की परमाणु क्षमता नष्ट नहीं हुई। उसकी राजनीतिक व्यवस्था बरकरार रही और उसकी सैन्य शक्ति को निर्णायक रूप से कमजोर नहीं किया जा सका। जैसे-जैसे संघर्ष लंबा खिंचता गया, वैसे-वैसे अमेरिका के लिए उसकी लागत बढ़ती गई, वह भी सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी। अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनावों ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया।

ट्रंप प्रशासन के लिए यह जरूरी हो गया था कि वह एक ऐसे युद्ध से बाहर निकले जो घरेलू स्तर पर लोकप्रिय नहीं था। ट्रंप के समर्थक वर्ग में भी इस युद्ध को लेकर असहजता दिखाई देने लगी थी। इसके अलावा, ईरान के नागरिक ढांचे पर हमले की धमकियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध अपराधों को लेकर बहस को जन्म दिया, जिससे अमेरिका की नैतिक स्थिति भी कमजोर हुई। मौजूदा माहौल में युद्धविराम किसी कूटनीतिक सफलता से ज्यादा एक रणनीतिक मजबूरी जैसा प्रतीत होता है। इस प्रक्रिया में पाकिस्तान और चीन की भूमिका का सामने आना भी वैश्विक राजनीति के शक्ति संतुलन में बदलाव को दर्शाता है। पाकिस्तान का मध्यस्थ के रूप में उभरना ध्यान देने योग्य है। वहीं, चीन की भूमिका यह दिखाती है कि वह अब सिर्फ आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि कूटनीतिक रूप से भी प्रभावशाली है।

होर्मुज जलमार्ग इस घटनाक्रम का एक अहम पहलू बनकर उभरा। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत ऊर्जा संसाधनों की ढुलाई इसी मार्ग के जरिये होती है। युद्धविराम के बाद भी यदि ईरान इस मार्ग पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखता है, तो यह वैश्विक शक्ति संतुलन में एक बड़ा बदलाव होगा। भले ही यह नियंत्रण औपचारिक रूप से घोषित न हो, पर यदि जहाजों की आवाजाही ईरान की निगरानी या शर्तों के तहत होती है, तो इससे उसकी रणनीतिक स्थिति मजबूत होगी। संभव है ईरान होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क लगाए। इसका सीधा असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ेगा। तेल की कीमतों में वृद्धि, परिवहन लागत में इजाफा और बीमा प्रीमियम में बढ़ोतरी हो सकती हैं, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगी।

भारत जैसे देश के लिए इसके गहरे निहितार्थ होंगे, जो अपनी आवश्यकता का अधिकांश तेल एवं गैस आयात करता है। भारत को अपनी कूटनीतिक रणनीति बेहद संतुलित रखनी होगी, क्योंकि उसके संबंध ईरान, इजरायल और अमेरिका, तीनों के साथ महत्वपूर्ण हैं। इस संघर्ष विराम के साथ ही भारत में इसे लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। कुछ विपक्षी नेताओं का कहना है कि इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान ने कूटनीतिक बढ़त हासिल कर ली। हालांकि यह तर्क आंशिक रूप से राजनीतिक है, पर आज के दौर में, जहां मध्यम शक्तियां भी क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित कर रही हैं, वहां भारत के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह अपनी कूटनीतिक उपस्थिति को और मजबूत करे। यह युद्धविराम हमें यह सिखाता है कि केवल सैन्य शक्ति के बल पर जटिल भू-राजनीतिक समस्याओं का समाधान संभव नहीं है।

जहां अमेरिका और इजरायल जैसे शक्तिशाली देश पूरी ताकत लगाने के बावजूद अपने सभी उद्देश्यों को हासिल नहीं कर सके, वहीं ईरान ने अपनी स्थिति को न केवल बनाए रखा, बल्कि उसे मजबूत भी किया। आने वाले दिन तय करेंगे कि यह युद्धविराम स्थायी शांति की ओर बढ़ता है या फिर एक और बड़े संघर्ष की भूमिका तैयार करता है। फिलहाल भले ही शांति हो गई हो, पर तनाव अभी भी है। वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा के रूप में उभरा होर्मुज अब एक ऐसे क्षेत्र में बदल चुका है, जहां शक्ति संतुलन और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा साफ दिखाई देती है। देखना होगा कि यह अस्थायी शांति स्थायी समाधान का रास्ता बनती है या एक और टकराव का कारण।

(लेखक मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान में फेलो हैं)

08/04/2026

*केंद्रीय बलों में आईपीएस की तैनाती का सवाल*
(आरके विज)
(साभार दैनिक जागरण)




इन दिनों संसद की ओर से पारित केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक चर्चा में है। इस विधेयक का उद्देश्य आईपीएस अधिकारियों की केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) में प्रतिनियुक्ति पर तैनाती का नियमितीकरण करना है।
इसमें यह प्रविधान है कि पुलिस महानिरीक्षक स्तर के 50 प्रतिशत पद आईपीएस अफसरों की प्रतिनियुक्ति से भरे जाएंगे। इसी प्रकार अतिरिक्त महानिदेशक स्तर के न्यूनतम 67 प्रतिशत पद आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति से भरे जाएंगे। जहां तक विशेष महानिदेशक एवं महानिदेशक के पदों का प्रश्न है, समस्त अर्थात सौ प्रतिशत पद आईपीएस अधिकारियों के लिए प्रतिनियुक्ति हेतु आरक्षित रहेंगे।
चूंकि उप-महानिरीक्षक एवं कनिष्ठ स्तर के पदों के संबंध में विधेयक मौन है, इसलिए यही लगता है कि इन पदों के संबंध में नियम पूर्व अनुसार ही लागू रहेंगे। प्रस्तावित नियम पांच प्रकार के केंद्रीय बलों क्रमशः सीआरपीएफ, बीएसएफ, आइटीबीपी, सीआइएसएफ और सशस्त्र सीमा बल पर लागू होंगे।
दशकों से केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में आईपीएस अधिकारी तैनात रहकर अपना योगदान देते आ रहे हैं। केंद्रीय बलों की मुख्य भूमिका आंतरिक सुरक्षा, सीमा सुरक्षा और औद्योगिक सुरक्षा है। ये बल राज्य पुलिस बलों की सहायता के लिए तैनात किए जाते हैं। केंद्र और राज्यों के बलों में बेहतर समन्वय के लिए जरूरी है कि केंद्रीय बलों में आईपीएस अधिकारी तैनात रहें।
भारत में संघीय प्रणाली लागू है। संविधान के अनुच्छेद 312 के तहत अखिल भारतीय सेवाओं का प्रविधान इसी उद्देश्य से किया गया था ताकि केंद्र और राज्यों में वे अपनी जिम्मेदारियों का निष्पादन कर सकें। केंद्रीय सशस्त्र बल माओवाद प्रभावित इलाकों, जम्मू कश्मीर और उत्तर-पूर्वी राज्यों में आतंकवाद से निपटने के लिए राज्यों की सहायता के लिए तैनात हैं।
उक्त विधेयक को सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के संबंध में मई 2025 में दिए गए निर्णय के खिलाफ समझा जा रहा है। मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों को ऑर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विसेज मानते हुए कुछ वित्तीय लाभ देने के आदेश दिए थे और केंद्रीय बलों के अधिकारियों की पदोन्नति के अवसरों को बढ़ाने के लिए पुलिस महानिरीक्षक स्तर तक प्रतिनियुक्ति को आगामी दो साल में धीरे-धीरे कम करने का कहा था।
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के आधार पर केंद्रीय बलों के सेवानिवृत्त अधिकारियों ने यह मांग रख दी कि उनकी सर्विसेज संगठित प्रकार की होने से प्रतिनियुक्ति को समाप्त किया जाए और उन्हीं के अधिकारी उनके बलों को नेतृत्व प्रदान करें। केंद्रीय बलों के कुछ अधिकारियों ने भी प्रतिनियुक्ति के खिलाफ मोर्चा सा खोल दिया। यह किसी भी अनुशासित बल को शोभा नहीं देता।
सुप्रीम कोर्ट ने 2025 के अपने आदेश में कहा था कि केंद्रीय बलों के काडर की समीक्षा की जाए और उनके भर्ती नियमों और सेवा शर्तों में आवश्यक बदलाव किया जाए। इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय बलों को एक संगठित ग्रुप मानते हुए यह नहीं कहा था कि आईपीएस अफसरों की प्रतिनियुक्ति न की जाए। इसके बजाय सुप्रीम कोर्ट ने यह माना था कि केंद्र एवं राज्यों में बेहतर तालमेल के लिए आईपीएस अफसरों को प्रतिनियुक्ति पर इन बलों में तैनात करना एक नीतिगत निर्णय है, जो सरकार को लेना है।
केंद्रीय बलों को आईपीएस अफसरों द्वारा नेतृत्व प्रदान करने और वरिष्ठ पदों पर तैनात होने पर न तो सुप्रीम कोर्ट ने कुछ कहा और न ही यह विवाद का मुद्दा था। इसलिए महानिदेशक सहित वरिष्ठ पदों पर तैनाती के मुद्दे पर किसी बहस का प्रश्न नहीं उठता। वैसे भी राज्यों में आपरेशन संबंधी गतिविधियों के समन्वय के लिए अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक या विशेष पुलिस महानिदेशक स्तर के अधिकारी तैनात रहते हैं।
आईपीएस अधिकारी अति कठिन राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा के माध्यम से सर्विस में दाखिल होते हैं। उनके विशिष्ट प्रशिक्षण और मैदानी अनुभव के कारण उनकी केंद्रीय सशस्त्र बलों में तैनाती एक उचित निर्णय है। अखिल भारतीय सेवाओं के जनक और स्वतंत्र भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा भारतीय पुलिस सेवा का गठन इस उद्देश्य से किया गया था, ताकि संघीय प्रणाली सुचारु रूप से चल सके।
आईपीएस अफसरों ने बीते दशकों में सरदार पटेल के सपनों को साकार किया है। उनके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इन अफसरों ने केंद्रीय बलों को सींचा है और उन्हें सक्षम नेतृत्व प्रदान किया है। जहां तक महानिरीक्षक स्तर तक प्रतिनियुक्ति को कम करने का प्रश्न है, यह सरकार का एक नीतिगत निर्णय है और सुप्रीम कोर्ट का इसमें दखल देना उचित प्रतीत नहीं होता।
न्यायपालिका का क्षेत्राधिकार कानून की व्याख्या करना है, न की नीति बनाना या उसमें हस्तक्षेप करना, जब तक कि वह संविधानप्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न करे या वह मनमानी हो। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार यह स्पष्ट किया है कि कोर्ट को नीतिगत निर्णय में दखल देने की आवश्यकता नहीं है और न ही वह अपने को अपीलीय प्राधिकार के रूप में रख सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने ‘इंडियन एक्स-सर्विसमैन मूवमेंट बनाम यूनियन आफ इंडिया’ (2022) मामले में भारत सरकार की ‘वन रैंक-वन पेंशन’ सिद्धांत को नीतिगत निर्णय कहते हुए उसमें दखल देने से मना किया था। अतः केंद्र का केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में आईपीएस अफसरों को प्रतिनियुक्ति पर आपरेशनल और फंक्शनल आवश्यकता के अनुसार तैनात करने का अधिकार एक नीतिगत निर्णय है।
संसद में केंद्रीय मंत्री द्वारा बताया गया कि केंद्रीय पुलिस बलों के अफसरों के पदोन्नति के चार अवसर लगभग सुनिश्चित हैं। इसके अलावा उनकी बड़ी संख्या में एक साथ भर्ती करने के बजाय प्रत्येक वर्ष भर्ती कर पदोन्नति के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। इस प्रकार केंद्र सरकार द्वारा उपरोक्त विधेयक द्वारा आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति के संबंध में समस्त पुराने विवादों को समाप्त करने के उद्देश्य से यह एक स्वागतयोग्य कदम है।
(लेखक छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी हैं)

07/04/2026

*विश्व की परस्पर आर्थिक निर्भरता और युद्ध की कीमत*
(अमिता बत्रा)
(साभार बिजनस स्टैन्डर्ड)




परंपरागत समझ के तहत यही माना जाता है कि अगर विभिन्न देश आर्थिक रूप से एक दूसरे पर निर्भर हों तो उनके बीच सैन्य संघर्ष नहीं होते हैं और अगर हो रहा हो तो वह समाप्त हो जाता है। यूरोपीय संघ में शांति और समृद्धि का लंबा इतिहास, जो आर्थिक एकीकरण के सर्वोच्च चरण तक पहुंचने वाला एकमात्र क्षेत्रीय समूह है, इसका सटीक उदाहरण है।
1950 में फ्रांस के प्रधानमंत्री द्वारा प्रस्तुत शूमन योजना का उद्देश्य दो पूर्ववर्ती विरोधी महाशक्तियों यानी फ्रांस और जर्मनी के बीच परस्पर निर्भरता पैदा करना था, जिसके तहत उनके कोयला और इस्पात उत्पादन को एक एकल अधिराष्ट्रीय प्राधिकरण के अधीन रखा गया। इस प्रकार युद्ध की संभावना को ‘केवल अकल्पनीय ही नहीं बल्कि भौतिक रूप से असंभव’ बना दिया गया।
सहयोगात्मक आर्थिक लाभों को भविष्य के संघर्षों के विरुद्ध एक प्रमुख निवारक कारक माना गया। फ्रांस और तत्कालीन पश्चिम जर्मनी का गठजोड़ समय के साथ मजबूत होता गया और दोनों देशों के नेताओं की मजबूत राजनीतिक साझेदारी ने इसमें मदद की। इस प्रकार यूरोप का आर्थिक एकीकरण अपने उच्चतम स्तर पर जा पहुंचा और यूरोपीय संघ सामने आया।
हालांकि आर्थिक परस्पर निर्भरता के लाभ कभी-कभी केवल सीमांत स्तर पर महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं और रणनीतिक हित प्रमुख हो जाते हैं। यह विशेष रूप से तब सच होता है जब द्विपक्षीय संबंध, शक्ति की विषमता और विरोधी राजनीतिक व्यवस्थाओं की विशेषता वाले होते हैं, या जब अत्यधिक शक्तिशाली राष्ट्र कमजोर राष्ट्र की व्यापक वैश्विक आर्थिक परस्पर निर्भरता का लाभ उठाने की क्षमता को कम आंकता है। ऐसी शक्ति असंतुलन की स्थितियों में, श्रेष्ठ शक्ति के लिए यह आकर्षक हो सकता है कि वह कमजोर शक्ति को अनुपालन के लिए मजबूर करने हेतु आर्थिक साधनों या सैन्य कार्रवाई का उपयोग करे।
ईरान, जो 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से पश्चिम एशिया में अमेरिका का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी रहा है, दशकों से अमेरिका द्वारा प्राथमिक और द्वितीयक प्रतिबंधों यानी आर्थिक, वित्तीय, वैज्ञानिक और सैन्य प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। फिर भी, ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम और तकनीक को विकसित करने के साहसी प्रयास में लगातार दृढ़ता दिखाई है। इस प्रक्रिया में उसने न केवल एकमात्र वैश्विक महाशक्ति अमेरिका, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति बनने की आकांक्षा रखने वाले इजरायल की नाराजगी भी झेली।
ईरान के खिलाफ अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की हालिया सैन्य कार्रवाई उनके दूरदृष्टि से रहित और विस्तारवादी विदेश नीति एजेंडा को दर्शाती है। ईरान की आर्थिक क्षमताओं को अलग-थलग करके किए गए आकलनों ने अमेरिका को इस क्षेत्र में इस गलत साहसिक कदम से अपेक्षित रणनीतिक लाभों का भ्रमित अतिमूल्यांकन करने की ओर धकेल दिया। ईरान के सामरिक जलमार्ग यानी होर्मुज स्ट्रेट को बाधित करने की क्षमता और इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण, खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) की अर्थव्यवस्थाओं के भौगोलिक निकटता का लाभ उठाने की उसकी क्षमता को कम करके आंका गया।
साल 2024 में, लगभग 84 फीसदी कच्चा तेल और 83 फीसदी एलएनजी जो होर्मुज स्ट्रेट से गुजरा वह एशिया की ओर जा रहा था। ऐसे में चीन, भारत, जापान, ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे सभी प्रमुख क्षेत्रीय तेल आयातक राष्ट्र आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और कमी का दबाव महसूस कर रहे हैं, लेकिन आसियान देशों की छोटी अर्थव्यवस्थाएं विशेष रूप से असुरक्षित हैं। वियतनाम, थाईलैंड और फिलिपींस में पहले ही आपात ऊर्जा-बचत उपाय लागू किए जा चुके हैं। जैसे-जैसे संघर्ष बिना रुके जारी रहेगा, ईंधन आपूर्ति में लगातार व्यवधान और मुद्रास्फीति का दबाव क्षेत्र में विनिर्माण और आर्थिक गतिविधियों पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव डालेगा।
इसके अलावा, संघर्ष का विस्तार जीसीसी अर्थव्यवस्थाओं तक होना आसियान की निर्यात-उन्मुख अर्थव्यवस्थाओं के लिए दोहरी मार है। अमेरिका द्वारा लगाए गए जवाबी शुल्कों के बाद, जीसीसी देशों ने आसियान और भारत की बाजार विविधीकरण रणनीति में एक प्रमुख विकल्प के रूप में उभरना शुरू किया था। लेकिन संघर्ष ने शिपिंग और बीमा लागतों को बढ़ाने के साथ-साथ जीसीसी अर्थव्यवस्थाओं के साथ व्यापार की अनिश्चितता को भी बढ़ा दिया है।
ईरान द्वारा खाड़ी देशों की ऊर्जा और बुनियादी ढांचा सुविधाओं पर किए गए प्रतिशोधी हमलों की व्यापकता को देखते हुए युद्ध समाप्त होने के बाद उनकी आर्थिक बहाली तुरंत नहीं हो पाएगी। वास्तव में, यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो जीसीसी देशों को अपने विकास मॉडल पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है, क्योंकि यह क्षेत्र में निवेश और पर्यटन के प्रति वैश्विक विश्वास को प्रभावित करेगा।
निर्यात बाजार जोखिमों में वृद्धि और विनिर्माण गतिविधि में गिरावट की संभावनाएं आसियान अर्थव्यवस्थाओं में पहले से मौजूद ‘असमय औद्योगीकरण क्षति’ की चुनौती पर और बोझ डालती हैं। चीन से कम लागत वाले आयात की बाढ़, उसकी अतिरिक्त औद्योगिक क्षमता और पश्चिमी मांग की कमजोरी अधिकांश आसियान अर्थव्यवस्थाओं में घरेलू विनिर्माण और औद्योगिक गतिविधि के लिए विशेष रूप से हानिकारक रही है। पिछले कुछ वर्षों में थाईलैंड और इंडोनेशिया में कारखानों का बंद होना आम हो गया है।
दिलचस्प बात यह है कि जहां चल रहा संघर्ष छोटे तेल-आयातक आसियान देशों के लिए गंभीर प्रभाव डाल रहा है, वहीं चीन कई कारणों से लाभ उठा सकता है। पहला, उसने कच्चे तेल का बड़ा सामरिक भंडार जमा कर रखा है, दूसरा, रूस से प्राकृतिक पाइपलाइन गैस का निरंतर आयात जारी है और तीसरा, वह इलेक्ट्रिक वाहनों और सौर पैनलों का प्रमुख उत्पादक है। इन सबके कारण वह होर्मुज के प्रभाव से अपेक्षाकृत सुरक्षित है।
दूसरा, युद्ध ने चीन और भारत जैसे सभी बड़े शुद्ध तेल-आयातक देशों के लिए जीवाश्म ईंधन से दूर हटने और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में और अधिक निवेश करने की तात्कालिक आवश्यकता पैदा कर दी है। दुनिया के सबसे बड़े हरित प्रौद्योगिकी और उत्पाद जैसे सौर पैनल, इलेक्ट्रिक वाहन और पवन टर्बाइन निर्माता के रूप में चीन को वर्तमान में विशिष्ट लाभ प्राप्त है।
तीसरा, ईरान युद्ध में अमेरिका की लंबी सहभागिता और इसके परिणामस्वरूप सैन्य संसाधनों की कमी तथा पूर्वी एशिया से ध्यान हटना इस क्षेत्र के लिए गंभीर सुरक्षा निहितार्थ रख सकता है। उदाहरण के लिए, युद्ध ने ताइवान की कमजोरियों को उजागर किया है, जो दुनिया का अग्रणी सेमीकंडक्टर और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यातक है।
सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन ऊर्जा-गहन है और सामग्री, पुर्जों और घटकों के सुचारु हवाई और समुद्री परिवहन पर अत्यधिक निर्भर है। ताइवान के पास क्षेत्र के प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक उत्पादकों में सबसे छोटे गैस भंडार हैं। इसके अलावा, ईरानी हमलों की आशंका ने कतर की हीलियम उत्पादन केंद्रों को रोक दिया है, जो दुनिया की हीलियम आवश्यकता का एक-तिहाई आपूर्ति करती हैं। हीलियम चिप निर्माण और अन्य उच्च-प्रौद्योगिकी उद्योगों में एक महत्त्वपूर्ण इनपुट है। लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष ताइवान की अर्थव्यवस्था को गंभीर चोट पहुंचा सकता है, जिसमें चीनी हस्तक्षेप की संभावना भी शामिल हैं।
इसलिए, यह उचित कारण है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आर्थिक परस्पर निर्भरता को शांति का साधन माना गया था। युद्ध, चाहे स्थानीय ही क्यों न हो, एक सघन रूप से जुड़ी हुई दुनिया में वैश्विक अर्थव्यवस्था में खतरनाक परिणामों को जन्म देने के लिए बाध्य है। इनमें से कुछ परिणाम लंबे समय तक बने रह सकते हैं।
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(लेखिका जेएनयू के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र में प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

04/04/2026

*जागरण संपादकीय: लंबा खिंचता युद्ध*



अब जब सभी देश निष्प्रभावी दिख रहे हैं, तब फिर यह आवश्यक हो जाता है कि कहीं से कोई यह आवाज प्रबलता से उठे कि मानवता के हित में इस युद्ध का पटाक्षेप किया जाए। अच्छा होगा कि ऐसी आवाज उठाने का काम भारत करे।

अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध एक माह से जारी, संकट गहराया।

ट्रंप के शांति दावे झूठे, ईरान परमाणु केंद्र पर हमला।

भारत को मानवता के हित में युद्ध रोकने की पहल करनी चाहिए।

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध छिड़े एक माह बीत चुका है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से खुद को शांति का मसीहा बताए जाने के बाद भी पूरी दुनिया को प्रभावित करने वाला यह खतरनाक सैन्य संघर्ष खत्म होने के बजाय और खिंचता ही दिख रहा है। इसका प्रमाण है अमेरिका की ओर से ईरान के परमाणु केंद्र को निशाना बनाना।

ईरान के इस्फहान स्थित परमाणु केंद्र पर अमेरिका ने एक ऐसे समय बंकर बस्टर बम गिराया, जब ट्रंप ईरानी नेताओं से शांति प्रस्ताव पर कथित तौर पर वार्ता भी कर रहे हैं। या तो वे झूठ बोल रहे हैं अथवा ईरान के साथ-साथ पश्चिम एशियाई देशों और विश्व के साथ भी छल कर रहे हैं। पश्चिम एशिया संकट का समाधान करने के मामले में उनका इरादा कुछ भी हो, वे बिल्कुल भी विश्वसनीय नहीं रह गए हैं।

इसी कारण अमेरिका में तो उनका विरोध बढ़ता ही जा रहा है, उनके मित्र देश और यहां तक कि नाटो राष्ट्र भी ईरान के खिलाफ युद्ध में उनका सहयोग करने को तैयार नहीं। अब यह भी स्पष्ट दिख रहा है कि ट्रंप ने बिना विचारे इजरायल संग ईरान पर हमला बोलकर अमेरिका और यूरोप समेत पूरे विश्व को संकट में डाल दिया। इसके भरे-पूरे आसार हैं कि अभी तक अपनी मनमानी करते चले आ रहे ट्रंप को इस बार अपने अहंकार की कीमत चुकानी पड़ेगी।

पश्चिम एशिया संकट जिस तरह गहराता चला जा रहा है और ट्रंप इस संकट के समक्ष जिस प्रकार असहाय-निरुपाय दिख रहे हैं, उससे उनकी जगहंसाई तो हो ही रही है, अमेरिका की प्रतिष्ठा को चोट भी पहुंच रही है। यह सही समय है कि अमेरिका के नीति-नियंता और साथ ही वहां की जनता इस पर विचार करे कि उसने ट्रंप सरीखे अस्थिर प्रवृत्ति के व्यक्ति को राष्ट्रपति चुनकर क्या हासिल किया?

इसमें संदेह नहीं कि अमेरिका के साथ इजरायल की रणनीति सवालों के घेरे में है, लेकिन इसके साथ ही ईरान के रवैये को भी सही नहीं कहा जा सकता। ईरान एक तरह से यही दिखा रहा है कि अमेरिका और इजरायल का सामना करने के क्रम में उसे अपनी बर्बादी की परवाह नहीं और उसकी प्राथमिकता ऊर्जा संकट को चरम पर ले जाना और अपने पड़ोसी देशों की नाक में दम करना है। शायद उसकी इसी नीति के कारण खाड़ी के देश नुकसान उठाने के बावजूद यह चाह रहे हैं कि ईरान किसी तरह पस्त हो जाए।

इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि विश्व के प्रमुख देश अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच के घमासान को रोकने के लिए गंभीरता से कोई ठोस पहल करते नहीं दिख रहे हैं। अब जब सभी देश निष्प्रभावी दिख रहे हैं, तब फिर यह आवश्यक हो जाता है कि कहीं से कोई यह आवाज प्रबलता से उठे कि मानवता के हित में इस युद्ध का पटाक्षेप किया जाए। अच्छा होगा कि ऐसी आवाज उठाने का काम भारत करे।

04/04/2026

*विचार: लैंगिक समानता को बल देने वाली पहल*




विश्व जल दिवस के अवसर पर यह लेख वैश्विक जल संकट और महिलाओं पर इसके प्रभाव पर प्रकाश डालता है। दुनिया भर में करोड़ों लोग पेयजल से वंचित हैं, और पानी लाने की जिम्मेदारी अक्सर महिलाओं व लड़कियों पर पड़ती है, जिससे उनकी शिक्षा और अवसरों में बाधा आती है

By Ritu Saraswat

ऋतु सारस्वत। गर्मियां शुरू हो चुकी हैं और इसी के साथ जल संकट के दिन आने वाले है। ऐसे ही माहौल में बीते दिनों विश्व जल दिवस मनाया गया। 1993 से संयुक्त राष्ट्र द्वारा मनाया जा रहा यह दिवस जल को जीवन, विकास और मानव अधिकार के रूप में स्थापित करने के वैश्विक प्रयासों का प्रतीक है, किंतु इस औपचारिकता के पीछे एक कठोर सच्चाई आज भी यथावत है। यह सच्चाई केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देती है।

फिजी के एक तटीय गांव में रहने वाली छह वर्षीय लैसानी घर के पास पानी के टैंक से वर्षा जल एकत्र करती है। वह प्लास्टिक की बोतलों में पानी भरकर घर लाती है, जहां पीने से पहले उसे उबाला जाता है। उसके परिवार के लिए वर्षा जल ही सुरक्षित पानी का मुख्य स्रोत है। इसे उपयोग योग्य बनाए रखना उनके दैनिक जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि तथ्य बताते हैं कि विश्व में लगभग 1.8 अरब लोगों के घरों में पेयजल उपलब्ध नहीं है।

हर तीन में से दो परिवारों में पानी लाने की जिम्मेदारी मुख्यतः महिलाओं और लड़कियों पर होती है। पानी लाने और उसके प्रबंधन में खपने वाला समय अक्सर लड़कियों की शिक्षा में बाधा, स्वास्थ्य जोखिमों में वृद्धि और सीमित अवसरों का कारण बनता है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार वैश्विक स्तर पर महिलाएं और लड़कियां प्रतिदिन लगभग 25 करोड़ घंटे पानी एकत्र करने में व्यतीत करती हैं। यह केवल समय का आंकड़ा नहीं, बल्कि वे असंख्य अवसर हैं, जो शिक्षा, कौशल विकास, मनोरंजन या आय अर्जित करने वाली गतिविधियों में परिवर्तित हो सकते थे। आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि 15 वर्ष से कम आयु की लड़कियों (7 प्रतिशत) के पानी लाने की संभावना समान आयु के लड़कों (4 प्रतिशत) की तुलना में अधिक है। यह लैंगिक असमानता को उजागर करता है।

यूएन वर्ल्ड वाटर डेवलपमेंट रिपोर्ट 2026 यह रेखांकित करती है कि जल संकट केवल संसाधनों की उपलब्धता का प्रश्न नहीं, बल्कि समान अधिकारों और अवसरों से जुड़ा हुआ एक गहरा सामाजिक प्रश्न है। घरों में सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता के अभाव का सबसे अधिक भार महिलाओं और लड़कियों पर पड़ता है, जो अधिकांश परिवारों में पानी लाने की प्राथमिक जिम्मेदारी निभाती हैं। जब सुरक्षित जल घर के निकट उपलब्ध होता है, तो लड़कियों के स्कूल में बने रहने की संभावना बढ़ती है और महिलाओं को आर्थिक एवं सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए समय मिलता है।

शहरी झुग्गी बस्तियों और ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालयों तथा मासिक धर्म स्वच्छता के लिए पर्याप्त जल का अभाव न केवल शारीरिक असुविधा का कारण बनता है, बल्कि महिलाओं और किशोरियों के लिए शर्मिंदगी, असुरक्षा और सामाजिक बहिष्करण की स्थिति भी उत्पन्न करता है। विडंबना यह है कि 50 से कम ही देशों में ऐसी नीतियां हैं, जो ग्रामीण स्वच्छता और जल संसाधन प्रबंधन में महिलाओं की भागीदारी का स्पष्ट उल्लेख करती हैं।

जहां वैश्विक स्तर पर नीतिगत असंतुलन अब भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है, वहीं भारत ने इस चुनौती का समाधान खोजने की दिशा में उल्लेखनीय पहल की है। जल जीवन मिशन के माध्यम से भारत ने न केवल जल उपलब्धता के प्रश्न को संबोधित किया है, बल्कि जल प्रबंधन में व्याप्त लैंगिक असमानता को भी दूर करने का प्रयास किया है। 2019 में प्रारंभ जल जीवन मिशन, जिसे ‘हर घर जल’ के रूप में भी जाना जाता है, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक परिवार तक नल से स्वच्छ जल पहुंचाने का एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है।

इसे दिसंबर 2028 तक बढ़ा दिया गया है। मार्च 2026 तक इस मिशन के अंतर्गत लगभग 15.82 करोड़ ग्रामीण परिवारों को उनके घरों में पाइप जल कनेक्शन उपलब्ध कराया जा चुका है, जो कुल ग्रामीण परिवारों का लगभग 81 प्रतिशत से अधिक है। इस तरह जल जीवन मिशन ने लैंगिक समानता की दिशा में एक अभूतपूर्व और अनुकरणीय कार्य किया है।

घर या घर के निकट जल उपलब्ध होने से महिलाओं का समय शिक्षा, आजीविका और अन्य उत्पादक गतिविधियों में लगता है। भारतीय स्टेट बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, ‘जल जीवन मिशन के परिणामस्वरूप लगभग नौ करोड़ महिलाओं को पानी लाने के दैनिक श्रम से मुक्ति मिली है। यह केवल श्रम में कमी नहीं, बल्कि उनके समय और ऊर्जा के पुनर्संयोजन का संकेत है। महिलाओं की कृषि एवं अन्य उत्पादक गतिविधियों में भागीदारी में वृद्धि दर्ज की गई है, जो यह स्पष्ट करती है कि जल तक आसान पहुंच सीधे तौर पर महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण से जुड़ती है।

इस मिशन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका लैंगिक दृष्टिकोण है। ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियों में 50 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी को अनिवार्य कर सरकार ने महिलाओं को केवल जल उपयोगकर्ता नहीं, बल्कि जल प्रबंधन की निर्णयकर्ता के रूप में स्थापित किया है।

जल समाधान में महिलाओं की भागीदारी और नेतृत्व को केंद्र में रखा जाना आवश्यक है, ताकि वे केवल उपयोगकर्ता नहीं, बल्कि जल प्रबंधन और नीति निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भागीदार बन सकें। भारत ने जल जीवन मिशन के माध्यम से इस विचार को व्यवहार में रूपांतरित करते हुए एक उदाहरण प्रस्तुत किया है, परंतु यह केवल आरंभ है और इस क्षेत्र में अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है।

(लेखिका समाजशास्त्री हैं)

29/03/2026

*संपादकीय: खतरे में ट्रंप की साख, युद्ध से निकलने का खोज रहे मौका*




अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ईरान के साथ युद्ध से निकलने का मौका तलाश रहे हैं, लेकिन दोनों पक्षों की शर्तें न मानने के कारण संघर्ष जारी है। ईरान के हमलों से खाड़ी देश परेशान हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के बिजली और ऊर्जा ठिकानों को तबाह करने की धमकी देने के बाद पहले जिस तरह पांच दिन तक इन ठिकानों पर हमले टालने की घोषणा की और अब कहा कि कुछ और दिन की मोहलत दे रहे हैं, उससे यही लगता है कि वे समझौते के मूड में आ गए हैं।

हालांकि रह-रहकर वे ईरान को धमकाते भी हैं, पर उन्होंने जिस तरह होर्मुज समुद्री मार्ग खोलने के लिए भी समयसीमा बढ़ा दी, उससे यही लगता है कि वे किसी तरह इस युद्ध से निकलना चाह रहे हैं। उनके ऐसे संकेतों के बाद भी यह कहना कठिन है कि अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच छिड़ा युद्ध थम जाएगा।

इसका कारण यह है कि ईरान बिना इस भरोसे अपने कदम पीछे खींचने के लिए तैयार नहीं कि उस पर फिर हमला नहीं किया जाएगा। जिस तरह ईरान अमेरिका की युद्ध विराम संबंधी शर्तें मानने के लिए तैयार नहीं हो सकता, वैसे ही अमेरिका और इजरायल के लिए भी उसकी शर्तें मानना संभव नहीं।

वास्तव में इसी कारण युद्ध थमता नहीं दिख रहा है। जहां इजरायल ईरान को निशाना बनाने में लगा हुआ है, वहीं ईरान उस पर हमले करने के साथ ही अपने पड़ोसी देशों पर मिसाइलें दाग रहा है। यह स्वाभाविक ही है कि इससे इन देशों का धैर्य जवाब दे रहा है। ये देश इसलिए अधिक परेशान हैं कि ईरान उनके नागरिक और ऊर्जा ठिकानों को भी निशाना बना रहा है।

यदि खाड़ी के देशों ने ईरान पर जवाबी हमले करने शुरू किए तो युद्ध एक नए मोड़ पर पहुंच जाएगा। निःसंदेह ऐसा न तो ट्रंप चाहेंगे और न ही विश्व के अन्य देश, क्योंकि ऊर्जा संकट कम होने का नाम नहीं ले रहा है। इसकी चपेट में भारत समेत अन्य एशियाई देश ही नहीं, यूरोप और अमेरिका भी आ गए हैं।

इस ऊर्जा संकट के लिए प्रत्यक्ष रूप से तो ईरान जिम्मेदार है, जिसने होर्मुज जल मार्ग बाधित कर रखा है, पर परोक्ष जिम्मेदार अमेरिका ही है, जिसने बिना कुछ सोचे-समझे इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला बोल दिया। ईरान ने अपनी जवाबी कार्रवाई से न केवल अमेरिका-इजरायल को तंग किया है, बल्कि पड़ोसी देशों को भी। यदि ईरान और अधिक समय तक जवाबी कार्रवाई करने में समर्थ बना रहता है तो अमेरिकी राष्ट्रपति को अपना रुख और नरम करने के लिए बाध्य होना पड़ सकता है।

इस स्थिति में उनका प्रभाव कम ही होगा-न केवल अमेरिका में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी। ध्यान रहे कि विश्वव्यापी ऊर्जा संकट के लिए वही जिम्मेदार माने जा रहे हैं और घरेलू स्तर पर भी उनका विरोध बढ़ रहा है। ईरान युद्ध के पहले उन्होंने जिस तरह वेनेजुएला पर हमला किया और अपनी मनमानी टैरिफ नीति से अपने मित्र देशों समेत दुनिया भर को तंग किया, उसके चलते उनकी विश्वसनीयता और साख पहले ही कम हो चुकी है।

27/03/2026

*कम उम्मीदें, गहरी मतभेद: डब्ल्यूटीओ सम्मेलन से निरंतरता की ओर संकेत*
(अजय श्रीवास्तव)
(साभार बिजनस स्टैन्डर्ड)




विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (एमसी14) के लिए 166 देशों के व्यापार मंत्री 26 से 29 मार्च तक कैमरून के याउंडे में मिल रहे हैं। यह सम्मेलन वैश्विक व्यापार नियमों के लिए प्राथमिकता तय करने और उन पर बातचीत करने के लिए संगठन का सर्वोच्च मंच है।
वैश्विक व्यापार के 98 फीसदी हिस्से (35 लाख करोड़ डॉलर से अधिक मूल्य) को नियंत्रित करने वाली संस्था से इस बार उम्मीदें कम हैं, क्योंकि इसकी दिशा को लेकर गहरे मतभेद हैं। भारत, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील के नेतृत्व में एक समूह आम सहमति, समावेशिता और विकास एवं व्यापार के बीच संतुलन बनाए रखना चाहता है। दूसरी ओर विकसित देशों के नेतृत्व में दूसरा समूह त्वरित निर्णय और छोटे समूह समझौतों पर जोर दे रहा है, जो अक्सर डब्ल्यूटीओ के मूल सिद्धांतों की कीमत पर होता है।
पहला समूह चेतावनी देता है कि यह बदलाव डब्ल्यूटीओ की बहुपक्षीय नींव को कमजोर कर सकता है और विकास संबंधी चिंताओं को दरकिनार कर सकता है, प्रभावी रूप से उस सीढ़ी को हटा सकता है जिसने कभी समृद्ध देशों के औद्योगीकरण में मदद की थी। यह मतभेद डब्ल्यूटीओ वार्ताओं में अधिकांश असहमति का मूल कारण है।
सम्मेलन के छह प्रमुख मुद्दे और उनके संभावित परिणाम इस प्रकार हैं:
कृषि: यह भारत के डब्ल्यूटीओ एजेंडा का प्रमुख हिस्सा बना हुआ है, जिसमें खाद्य सुरक्षा के लिए सार्वजनिक भंडार को डब्ल्यूटीओ के अनुरूप मानने की प्रमुख मांग शामिल है। मुख्य समस्या डब्ल्यूटीओ के दोषपूर्ण सब्सिडी फॉर्मूले में निहित है, जो 1986-88 की संदर्भ कीमतों का उपयोग करता है और भारत के समर्थन अनुमानों को सात से आठ गुना बढ़ा देता है, जिससे यह कृत्रिम रूप से सीमा उल्लंघन के करीब पहुंच जाता है।
अमेरिका और यूरोपीय संघ इस फॉर्मूले में संशोधन करने में रुचि नहीं रखते और व्यापार विकृति के जोखिमों का हवाला देते हुए व्यापक छूटों का विरोध करते हैं, जिसके चलते भारत के पास 2013 से केवल एक अस्थायी ‘शांति खंड’ ही बचा है। कुछ देशों द्वारा पिछली प्रतिबद्धताओं को फिर से खोलने की कोशिश और मतभेदों के चलते, सम्मेलन में किसी सफलता की संभावना बहुत कम है।
ई-कॉमर्स पर छूट: इस पर पहली बार 1998 में सहमति बनी। यह इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन, जैसे डाउनलोड और डिजिटल सामग्री पर सीमा शुल्क को प्रतिबंधित करता है। अमेरिका के नेतृत्व में विकसित देश इसे स्थायी बनाना चाहते हैं, ताकि वैश्विक अर्थव्यवस्था के डेटा और सेवाओं की ओर बढ़ने के साथ-साथ शुल्क-मुक्त डिजिटल व्यापार सुनिश्चित हो सके।
आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के बल पर डिजिटल अर्थव्यवस्था के आज के लगभग 16 लाख करोड़ डॉलर से बढ़कर अगले दो दशकों में लगभग 50 लाख करोड़ डॉलर होने का अनुमान है। इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन के लिए यह सीमा शुल्क-मुक्त व्यवस्था मुख्य रूप से उन अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों को लाभ पहुंचाती है जो सीमा पार डिजिटल व्यापार पर हावी हैं।
भारत और अन्य विकासशील देशों का तर्क है कि व्यापार के भौतिक वस्तुओं से डिजिटल प्रारूपों में स्थानांतरित होने के कारण यह स्थगन उनके भविष्य के कर आधार को कमजोर करता है। वे इसके दायरे पर भी सवाल उठाते हैं। अधिकांश विकासशील देशों का मानना है कि डिजिटल रूप से प्रदान की जाने वाली सेवाएं इस स्थगन से बाहर हैं, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी इन्हें इसमें शामिल करना चाहते हैं। सम्मेलन में इस पर एक और अस्थायी विस्तार होने की संभावना है, जिससे असहज समझौते को बरकरार रखा जा सके।
बहुपक्षीय समझौते: ये समझौते डब्ल्यूटीओ के लिए एक प्रणालीगत चुनौती के रूप में उभर रहे हैं। भारत इनका विरोध करता है। उसका तर्क है कि ये कुछ देशों को ऐसे समझौते करने की अनुमति देकर सर्वसम्मति-आधारित नियम निर्माण को कमजोर करते हैं जिन्हें बाद में डब्ल्यूटीओ में लाया जाता है। इससे विकसित अर्थव्यवस्थाएं विकासशील देशों के लिए महत्त्वपूर्ण मुद्दों, जैसे कृषि सब्सिडी और विशेष एवं भेदभावपूर्ण व्यवहार, को नजरअंदाज करते हुए अपनी प्राथमिकताओं को आगे बढ़ा सकती हैं, जिससे कुछ देशों के प्रभुत्व वाली दो-स्तरीय प्रणाली का खतरा पैदा हो सकता है।
सम्मेलन में भारत पर विकास के लिए निवेश सुविधा (आईएफडी) समझौते का विरोध न करने का दबाव है, जो अधिक बहुपक्षीय समझौतों को अपनाने के लिए एक मिसाल कायम कर सकता है। इससे पहले के सम्मेलन में भारत को दक्षिण अफ्रीका का साथ मिला था लेकिन अब भारत अकेला पड़ सकता है क्योंकि चीन की बेल्ट ऐंड रोड पहल से जुड़े अन्य अफ्रीकी देशों के दबाव में दक्षिण अफ्रीका का रुख बदलता दिख रहा है।
विशेष एवं विभेदक व्यवहार (एसडीटी): इस पर बहस डब्ल्यूटीओ में मौजूद एक गहरी दरार को उजागर करती है। विकासशील देशों ने 1995 में बौद्धिक संपदा और सेवाओं पर कड़े नियमों को स्वीकार किया था, जिसके बदले उन्हें संक्रमण काल की लंबी अवधि और नीतिगत स्वतंत्रता जैसी लचीली व्यवस्थाएं मिली थीं। अब यह समझौता तनाव में है।
अमेरिका और यूरोपीय संघ का तर्क है कि बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अब ऐसे लाभ नहीं मिलने चाहिए और वे चाहते हैं कि एसडीटी मुख्य रूप से सबसे कम विकसित देशों तक ही सीमित रहे। भारत का कहना है कि विकास में अंतर अभी भी बहुत अधिक है और मूल समझौते पर पुनर्विचार किए बिना एसडीटी को हटाने से व्यवस्था और भी अधिक असमान हो जाएगी। यह विवाद निष्पक्षता और वैधता के मूल में है, और इस बार के सम्मेलन में इसका कोई समाधान संभव नहीं लगता है।
डब्ल्यूटीओ की विवाद निपटान प्रणाली: कभी इसका सबसे मजबूत स्तंभ रही यह प्रणाली अब कमजोर हो चुकी है। अमेरिका द्वारा नए सदस्यों की नियुक्ति पर रोक लगाने के बाद दिसंबर 2019 से अपील निकाय निष्क्रिय पड़ा है। हालांकि पैनल फैसले जारी करते रहते हैं, लेकिन अपीलें निरर्थक बनी रहती हैं, जिससे अंतिम निर्णय लेने में बाधा आती है और प्रवर्तन कमजोर हो जाता है। अंतरिम व्यवस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन वे आंशिक और खंडित हैं। भारत पूर्णतः कार्यशील दो-स्तरीय प्रणाली को बहाल करने का समर्थन करता है, लेकिन सुधारों पर व्यापक असहमति अभी भी अनसुलझी है। सम्मेलन से इसमें कोई बदलाव आने की संभावना नहीं है।
निर्णय लेने की प्रक्रिया में सुधार: यह भी उतना ही विवादास्पद मुद्दा है। विकसित देश तर्क देते हैं कि सर्वसम्मति का सिद्धांत प्रगति को धीमा करता है और वे अधिक लचीले दृष्टिकोणों की वकालत करते हैं, जिसमें बहुपक्षीय संगठनों पर अधिक निर्भरता शामिल है। भारत और अन्य देश सर्वसम्मति को इस प्रणाली की नींव मानते हैं, जो यह सुनिश्चित करती है कि सभी सदस्य देशों, चाहे वे बड़े हों या छोटे, उनको समान अधिकार प्राप्त हों। इसे कमजोर करने से शक्ति प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की ओर स्थानांतरित हो जाएगी और डब्ल्यूटीओ के विकास संबंधी आयाम कमजोर हो जाएंगे। इस मुद्दे पर भी चर्चा बिना किसी समाधान के जारी रहेगी।
सम्मेलन में सबसे संभावित परिणाम निरंतरता ही हो सकती है, न कि कोई क्रांतिकारी बदलाव। सत्र का विस्तार और अधिक वार्ताएं हो सकती हैं तथा कुछ ही निर्णय लिए जा सकते हैं। भारत के लिए नीतिगत स्वतंत्रता को बनाए रखने और तेजी से विभाजित हो रही व्यवस्था में प्रभावी गठबंधन का निर्माण करने की चुनौती होगी।
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(लेखक जीटीआरआई के संस्थापक हैं)

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