Via Devendra Prasad Tewari ji:
"भूली बिसरी यादें-:)
1965 से 1970 का वह दौर जब मुझे मेरे बड़े भाई ने 1965 में निशातगंज नार्मल स्कूल जो आज राजकीय इण्टर कालेज के नाम से जाना जाता है से हटाकर आगे की पढ़ाई के लिये महानगर ब्वायज हाई स्कूल में दाखिल करवा दिया। उस समय यह स्कूल ट्रांस गोमती क्षेत्र का हाई स्कूल तक का सबसे अच्छा विद्या मन्दिर हुआ करता था। अन्य अच्छे स्कूलों में सिटी मोंटेसरी स्कूल ही था जो अपनी शैशवावस्था में था औऱ प्राइमरी शिक्षा तक ही सीमित था। उस समय इस स्कूल में आसमानी नीली (फिरोजी) हाफ पैंट, सफेद कमीज, काले जूते सफेद मोजे, टाई बैल्ट ही यूनिफार्म थी। सख्त अनुशासन जिससे विद्यार्थी थर्राते थे औऱ अनुशासनहीनता पर रिस्टिकेशन तक हो जाया करते थे। ब्रदर ब्रिटो उस समय स्कूल प्रिन्सिपल थे जो गोरे चिट्टे थे औऱ सारे ब्रदर लोग़ सफेद चोंगा पहनते थे स्कूल छोड़ने तक हमने बिना चोंगे के कभी भी किसी ब्रदर को नहीं देखा। हर सोमवार को वीकली टैस्ट होते थे उसके बाद सितम्बर में क्वार्टरली, फिर वीकली औऱ दिसम्बर में हाफइयर्ली फिर वीकली औऱ मार्च अप्रैल में वार्षिक परीक्षा औऱ रिजल्ट के बाद गर्मी की छुट्टियाँ ।
स्कूल की फैकल्टी में जिनके सम्पर्क में हम लोग़ रहे उनमें सर्वश्री सर जनार्दन पन्त, लल्लू राम शुक्ला, पी डी पन्त, योगेन्द्र पाठक, सालिग राम त्रिवेदी, दिवाकर शर्मा, हरीश चन्द्र श्रीवास्तव, बुक क्राफ्ट के नकी सर, चित्रकला के सर खान, नथानी जी, तकी रजा, दुबे (नाटे वाले जो बाद में स्कूल छोड़कर बीएड टीचर होकर चले गये थे), एनसीसी के ई जी डेविड, गवर्नमेंट के पीटीआई जे एस पी दुबे, ओ पी शर्मा प्रथम, ओपी शर्मा द्वितीय आदि प्रमुख हैं। महिला शिक्षकों में हमें सिक्स्थ क्लास में मात्र मिसेज सिंह ने ही अंग्रेजी पढ़ाई थी औऱ उनके मातृत्व अवकाश पर जाने पर उनकी जगह एक मिसेज सिन्हा ने हमें अंग्रेजी पढ़ाई थी। इसके अलावा सुश्री मिस मालकी, मिस कुमार, मिस लाल आदि को हम पहचानते थे।
सर जनार्दन पन्त से जो साइन्स औऱ गणित पढ़ाते थे सारे विद्यार्थियों के लिये खौफ का पर्याय थे याने विद्यार्थियों में उनके प्रति सम्मान भी था औऱ उनसे खौफ भी खाते थे। सर तकी रजा ने हमको पढाया तो नहीं पर वे शाँत, मृदु भाषी औऱ अच्छे शिक्षक थे। जिन विद्यार्थियों को उन्होंने पढाया वे बताते हैं कि वे गुस्सा कम ही करते थे लेकिन जब भी वे किसी पर अधिक गुस्सा हो जाते थे तो उनका अधिकतम दण्ड एक मिनट तक खड़े रहने का हुआ करता था।
स्कूल से पढ़ा शायद ही कोई छात्र होगा जिसने सर नकी से बुक क्राफ्ट के अन्तर्गत लिफाफा, फ़ाइल कवर, जुजबंदी की सिलाई, फुल्ली लगाना, ग्लेज्ड पेपर से चटाई, झंडी बनाना, लेई बनाना व दिवालगिरी (दीवार पर लगाने वाला फूलदान) बनाना न सीखा हो। विभिन्न प्रकार के कागजों के नाम, स्टैंन्सिल चाकू औऱ ब्रश व उनके उपयोग भी हमको उन्होंने ही सिखाए थे जो अब तक याद हैं। वो बाज़ार से लेई, लाल बाइंडिंग क्लॉथ, आइलेट्स, क्रेप पेपर खरीदना भी खूब याद है। आर्ट वाले सर खान की वजह से ही हम पेंसिल कितने प्रकार की होती है जान पाये जैसे HB, 2H, 2B आदि उस समय हमने सबसे पहले हरे रँग की कोहिनूर पेंसिल देखी औऱ जानी उसके बाद तो नटराज, अप्सरा, कैम्लिन कई ब्रांड आ गये। 👌🏾👍🏽👏🏾
उस समय निशातगंज में कापी किताबों की एकमात्र दुकान गुप्ता बुक डिपो हुआ करती थी बाद में करामत स्कूल की बाउंड्री से लगी हुयी गुलशन बुक डिपो प्रसिद्ध हुयी। बाद में एक और दुकान खुली थी, विद्यार्थी की। कालान्तर में निशातगंज गुरुद्वारे पर विश्व बुक डिपो खुला औऱ अब उनकी जगह युनिवर्सल बुक डिपो ने ले ली है। हर सैशन की शुरुआत में प्रिन्सिपल रूम के बगल में पार्लर रूम में पर एक बुक स्टाल लगा करता था औऱ वहाँ से कापी किताबें खरीदने में गौरव का अनुभव करते थे क्योंकि शायद वहाँ से जिल्द के लिये ब्राउन पेपर औऱ स्कूल लेबल फ्री मिलते रहे होंगे। हम लोग़ नये जौमेट्रि बॉक्स, केमल वाटर कलर बाद में गिटार ट्यूब कलर...निब, पेन, कैमल इंक औऱ बाद में चेल्पार्क इंक का लोभ संवरण नहीं छोड़ पाते थे। डॉट पेन से लिखने पर पाबंदी थी क्योंकि उससे राइटिंग खराब होने का अंदेशा रहता था। हमने तो ब्रदर बैन्जामिन की केन भी देखी है औऱ कभी कभार खाई भी है। ब्रदर बेंजामिन जब क्लास में रिपोर्ट कार्ड बाँटते थे तो पीछे से शुरू होते थे याने 42, 41, 40 करते हुए 15 तक तो केन पड़ती ही थी क्योंकि हरेक विद्यार्थी किसी ना किसी विषय में फेल होता ही था औऱ 14 से नीचे लड़के बिना केन के रिपोर्ट कार्ड पा जाते थे 🤭😜
स्कूल में अक्सर प्रोजेक्टर से फिल्म भी दिखाई जाती थी। एक बार प्रेयर वाली जगह पर दिन के समय टेंट लगाकर "स्वयं भुगतान के आधार पर "जागृति" फिल्म का प्रदर्शन हुआ था। बाद में जब हाल बन गया तब उसमें दीवार को पर्दा बनाकर फिल्में दिखलायी जाने लगीं। मेंहदी लगाये खान साहब का साइकिल स्टैण्ड औऱ रीटा आइस क्रीम वाले वृद्ध शर्मा जी जो नरही से हस्तचालित डिब्बेवाला ठेला खींचकर लाते थे आज भी याद आते हैं। उस समय नरही की "रीटा आइसक्रीम" लखनऊ में नम्बर दो पर थी जबकि लालबाग की "इण्डिया आइसक्रीम" टॉप पर थी।
वर्ष में एक बार सालाना स्पोर्ट्स मीट होती थी जिसमें तरह तरह की प्रतियोगिताएं हुआ करती थी जैसे विभिन्न प्रकार की रेस 100 मीटर से लेकर 1000 मीटर, पग बाधा रेस (हर्डल रेस), रिले रेस, लौंग जम्प, हाई जम्प, शॉट पुट, जैव्लिन थ्रो, डिस्कस थ्रो, पिलो फाइट, स्लो साइकिलिंग, फास्ट साइकिलिंग आदि इवेंट्स होते थे। सारे बच्चों को चार हाउस में बाँटा जाता था जिनके झंडे का रँग आज की ही भाँति लाल, हरा, नीला औऱ केसरिया ही होता था पर यदि मैं गलत नहीं हूँ तो उनके नाम सैंट जोन, सैंट गैब्रियल, सैंट पॉल औऱ सैंट मौण्टफोर्ट हुआ करते थे। हर हाउस का एक कैप्टन होता था औऱ एक स्कूल कैप्टन होता था जो वार्षिकोत्सव पर मार्च पास्ट में सबसे आगे स्कूल का झंडा लेकर चलता था औऱ उसके पीछे हर हाउस कैप्टन अपने हाउस का झंडा लेकर चलता था।"
Thank you for sharing, Tewari ji :)
Mahanagar Boys' Inter College, Lucknow
Fan page for my alma mater: Mahanagar Boys' Inter College.
07/01/2017
This is among the most useful, beautiful, & inspiring pieces that i've ever read. I'd be glad if it adds any value to your life. Please have a dekko.
http://www.cracked.com/blog/6-harsh-truths-that-will-make-you-better-person/
6 Harsh Truths That Will Make You a Better Person You're going to hate hearing this. My only defense is that this is what I wish somebody had said to me around 1995 or so.
May you have a happy and prosperous new year 2017... keep rocking, boys!
14/05/2015
Mr DP Tewari's class. 6th & 8th standard. circa 1966-68! I'm told that Mr Salik Ram Trivedi was the class-teacher.
05/03/2015
Happy Holi!
May you all have a happy and prosperous year.
Narendra Modi supporters, like this post to give him an aye! :)
16/03/2014
Happy Holi boys! Be merry; Play safe. :)
14/02/2014
Happy Valentine's Day boys. Here's a toast to all your loved ones. Cheers! :-)
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