13/07/2025
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आजकल बच्चों की पिटाई करना (शारीरिक दंड) तो दूर की बात है। अगर डाँट भी दो तो अभिभावक शिकायत ले कर आ जाते हैं । PTM में ऐसे भी case आते हैं -
"sir वो हिंदी वाली mam ने बच्चों को डाँटा होगा। तो ये डर गई है। स्कूल आने में अब डरती है। "
"बेटा आपको भी डाँटा था mam ने ?"
नहीं सर् ..
तो फिर ?
"सर् बताया तो, ये उनको देख कर डर गई थी।"
"Sir अगली बार कंप्लेंट करनी पड़ेगी उनकी! आप बात करना उनसे ।"
एक हमारा बचपन था दोस्तों । स्कूल में सुताई हुई, और इस सुताई की बात घर में पता चल गयी कि स्कूल में सूता गया है तो घर पर अलग से कैडी वाली सुताई कंफर्म है। ज़रूर कुछ किया होगा तूने ही।
बुरी तरह पीट देना जो हमारे टाइम में होता था वो गलत था। लेकिन अभी सरकार और अभिभावकों ने मिल कर अनुशासन की एकदम बत्ती बनाई हुई है ।
इतना cozy cozy विलायती बनाए रहो बच्चों को कि हल्का सा डांटने से ही उनका ego हर्ट हो जाए ।
टीचर को जब ये पता है कि फटकार लगाने से, डाँटने से, हाथ ऊपर करवा देने से उसकी नौकरी पर बन आएगी तो वो पहले अपनी नौकरी बचाता है।
बच्चा पढ़े ना पढ़े, उद्दंड बने तो बने। उसका तो आपने डर और प्रभाव ही समाप्त कर दिया। अनुशासन एकदम बचपन से बनता है। एक कच्चे घड़े पर कुम्हार द्वारा लगने वाली थाप की तरह। माता पिता को स्वयं तो टाइम है नहीं। बाप को पैसे कमाने हैं, मां को रील बनानी है, दुनिया भर के काम निपटाने हैं। बच्चों को संस्कार और अनुशासन कौन सिखाएगा ?? ये ज़िम्मा फिर टीचर पर आता था। मगर अब सिस्टम और पेरेंट्स ने टीचर का डर, उसकी छड़ी तो उनसे छीन ही ली है।
अब बच्चे गुंडे बनें या कुछ भी ...
फिर एक दिन उन्हीं अभिभावकों का कहना कि आजकल के बच्चे अनुशासन में नहीं है। घर में माँ बाप की नहीं सुनते। स्कूल में टीचर की नहीं सुनते।
सुन रहे हो मास्टर ! बहुत झोल है bhai 😄
CP