26/11/2025
ॐ तत्सत्
सर्वतोभद्र चक्र और नक्षत्र आधारित प्राचीन ज्योतिष का शेयर मार्किट ट्रेडिंग में सटीक उपयोग.. ⭐
आज का शेयर बाजार केवल तकनीक, डेटा और वैश्विक संकेतों पर नहीं चलता अपितु मानसिकता, भावनाएँ और सामूहिक “ nakshtra energy-patterns” भी इसमें उतनी ही भूमिका निभाती हैं।
✨ भारतीय ज्योतिष में एक अत्यंत शक्तिशाली उपकरण है — सर्वतोभद्र चक्र (SBC), जो नक्षत्रों, राशियों और ग्रह–ऊर्जाओं के माध्यम से दिन–विशेष के बाजार का मूड, दिशा और वोलैटिलिटी बता देता है।
यह चक्र केवल भविष्यवाणी नहीं, बल्कि ट्रेंड–पूर्वानुमान का वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक मॉडल है।
⭐सर्वतोभद्र चक्र 9×9 की 81 कोशिकाओं का एक ऊर्जा–मानचित्र है, जिसमें: 27 नक्षत्र, 12 राशियाँ, 7 ग्रह, वर्ण मातृका और तिथियाँ- सब एक समन्वित रूप में व्यवस्थित होते हैं।
यह चक्र चारों दिशाओं से शुभ–अशुभ ऊर्जा की आवक–जावक को दर्शाता है। इसे “Samagra Energy Grid” भी कह सकते हैं। सर्वतोभद्र चक्र के द्वारा हम किसी भी व्यक्ति के शुभ अशुभ कालखंड का निर्धारण सहज़ ही कर सकते है। वास्तव मे ये एकचैतन्य विज्ञान है जो भारतीय ज्योतिष तंत्र की अद्भुत देन है।
ऑप्शन ट्रेडिंग में SBC का मुख्य सिद्धांत
SBC में सबसे महत्वपूर्ण हैं:
⭐ नक्षत्र का प्रकार- चल, स्थिर, उग्र, मृदु, क्रूर, शुभ, अशुभ।
ये सीधे–सीधे बाजार की गति और दिशा पर असर डालते हैं।
⭐ ग्रह किस नक्षत्र में है:
ग्रह की ऊर्जा + नक्षत्र की प्रकृति = उस ग्रह से संबंधित सेक्टर का movement
उदाहरण:
👉 बुध खराब → IT, बैंकिंग में confusion
👉 मंगल कठोर नक्षत्र में → वोलैटिलिटी
👉शुक्र मृदु नक्षत्र में → FMCG, Auto में liquidity
⭐ चन्द्रमा की स्थिति (सबसे महत्वपूर्ण)
चन्द्रमा = Market Sentiment
दिन का मूड और भावनात्मक दिशा 60% तक चन्द्रमा देता है।
⭐ वेध (Veedha)
कोई ग्रह किसी नक्षत्र को काटता है तो उसे वेध कहते हैं।
वेध = trend का टूटना, reversal, sudden spike.
🌟 नक्षत्र आधारित मार्केट मूड (SBC दृष्टि से)
🔵 मृदु नक्षत्र:
रोहिणी, मृगशिरा, अनुराधा
→ स्थिरता, funds inflow, calm trends
Trend: Bullish / Sideways-Bullish
🔴 उग्र/क्रूर नक्षत्र:
ज्येष्ठा, पूर्वाशाढ़ा, भरणी
→ तेज वोलैटिलिटी, reversal
Trend: Bearish / Volatile
🟢 चर नक्षत्र:
पुनर्वसु, स्वाति, शतभिषा
→ तेजी से बदलने वाले trends
Trend: दोपहर बाद reversal
🔶 धनिष्ठा विशेष (SBC में Active):
→ liquidity बढ़ती है
→ bullish bias
→ लेकिन मंगल/बुध से प्रभावित होने पर sudden reversals भी संभव
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🌕 चन्द्रमा + नक्षत्र = Intraday Mood (SBC का हृदय):
✔ चन्द्रमा धनिष्ठा →
Bullish bias, but volatile
शर्त: ग्रह समर्थन करें
✔ चन्द्रमा ज्येष्ठा →
Market irritated & confused
Stops hit होते हैं
Trend: sell-on-rise
✔ चन्द्रमा रोहिणी →
Stable, strong trend
Trend: pure bullish
✔ चन्द्रमा शतभिषा →
Market cold + algorithmic
Trend: algorithm-driven reversals
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🔥 सर्वतोभद्रचक्र के 4 मुख्य नियम ट्रेडिंग में
1️⃣ दिन का नक्षत्र = Trend का मूल स्वरूप
जैसा नक्षत्र, वैसी मार्केट की अंतर्बुद्धि।
2️⃣ ग्रह–वेध = Intraday reversal signal
यदि चन्द्रमा का नक्षत्र वेधित हो →
पहला 1 घंटा trap,
फिर असली trend आता है।
3️⃣ बुध–मंगल नियम (SBC में अत्यंत महत्वपूर्ण)
बुध खराब → Trend टिकता नहीं
मंगल उग्र → Stop-loss hunting
दोनों एक साथ खराब → VIX spike + whipsaw
4️⃣ पिछले दिन का candle + आज का नक्षत्र
SBC में इसे “द्वन्द्व” और “समांतर गति” कहते हैं।
⭐ उदाहरण:
यदि आज बाजार चढ़ा हो और अगले दिन उग्र/क्रूर नक्षत्र हो:
→ Continuation नहीं होता → Reversal day
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🌟 Astro-Trading Decision Model (SBC आधारित)
नीचे दिया हुआ मॉडल ट्रेडिंग में तुरंत लागू किया जा सकता है:
✔ Step 1 — चन्द्रमा का नक्षत्र
→ दिन का मूड, volatility
✔ Step 2 — बुध और मंगल
→ direction टिकेगी या टूटेगी
✔ Step 3 — वेध
→ किसी भी समय होने वाला reversal
✔ Step 4 — आज का price structure
→ continuation बनाम reversal
✔ Step 5 — opening 30 minutes
→ astro prediction को confirm/negate करता है
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🎯 SBC का सार: मार्केट “संवेग” से चलता है
सर्वतोभद्र चक्र यही बताता है कि बाजार केवल तकनीकी चार्ट आधारित नहीं है, न यांत्रिक डेटा मात्र, (क्युकि सभी चार्ट इण्डिकेटर हो चुके घटना आधारित है) अपितु नक्षत्रीय संवेदनाओं, ग्रहों की ऊर्जा, और सामूहिक भावना पर आधारित एक जीवंत क्षेत्र है।
☝️ जब आप चन्द्रमा + बुध + मंगल + नक्षत्र–प्रकृति + वेध.. को एक साथ पढ़ते हैं…
आपको अगला दिन:
✔ bullish / bearish
✔ sideways
✔ trap day
✔ high volatility
✔ trend reversal
बहुत सटीक दिखने लगता है।
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🌟 अंतिम निष्कर्ष
SBC + नक्षत्र + ग्रह = सबसे शक्तिशाली Astro-Trading मॉडल ।
☝️Institutions भी cycles देखते हैं
☝️Algorithms भी patterns follow करते हैं
जबकि नक्षत्र energy cyclef low दर्शाते हैं
इसीलिए सर्वतोभद्र चक्र
आधुनिक ट्रेडिंग में वैदिक ज्योतिष का सबसे वास्तविक, सटीक और वैज्ञानिक मॉडल है।
साथ ही ये भी सत्य है कि सर्वतोभद्र चक्र को यथार्थ जानने वाले ऋषि वर्तमान मे बहुत कम है.. ॐ 🌷
. By Guru Satyanand
Sanatan Vidya Peeth
13/09/2025
✨ नवम भाव ज्योतिष में धर्म, भाग्य, पिता, गुरु, उच्च शिक्षा और विदेश यात्रा का प्रतीक माना जाता है।
👉 जब राहु इस नवम भाव में स्थित होता है तो जातक का जीवन एक नई दिशा लेता है।
👉 क्या यह स्थिति परंपरागत धर्म से विमुख करती है या व्यक्ति को विदेशी मान्यताओं और गूढ़ साधनाओं की ओर खींच ले जाती है?
👉 राहु के नवम भाव में होने से भाग्य, पिता, गुरु, शिक्षा, यात्राएँ और आध्यात्मिक जीवन पर क्या-क्या प्रभाव पड़ते हैं – यही विषय इस विशेष लाइव सत्र में हम विस्तार से जानेंगे। Guru Satyanand जी से..
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राहु जब नवम भाव मे हो.. live
✨ नवम भाव ज्योतिष में धर्म, भाग्य, पिता, गुरु, उच्च शिक्षा और विदेश यात्रा का प्रतीक माना जाता है।👉 जब राहु इस नवम भा.....
25/08/2025
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शुक्र राहु ग्रह स्वभाव प्रभाव विवेचन - live class
शुक्र और राहु के स्वभाव प्रभाव पर विशेष चर्चा । इन ग्रहों के स्वभाव, जीवन और निर्णयों पर उनके असर, और कैसे ज्योतिष म.....
09/04/2025
ॐ तत्सत्
काल प्रभाव ... 🪷
शनि, बुध, राहु, शुक्र की युति अत्यंत निकट हो रही... वृषभ, तुला, कन्या, मिथुन, मकर, कुम्भ लग्न/राशि वाले जातक बल, बुद्धि, विद्या, कर्म के अतिरेक प्रभाव के प्रति सचेत रहें...
शनि, बुध शुक्र के साथ ग्रहण योग जानिए 🪷
सद्गुरु स्तुति नाम जप, विष्णु सहस्त्र नाम.. हनुमान चालीसा.. रामचरित मानस का मास पारायण.. गणपतिअथर्वशीर्ष का पाठ आदि से बुद्धि बल सहित अपने कर्म को व्यवस्थित रखने का प्रयास अपेक्षित... 🪷
25/12/2024
ॐ तत्सत्
मेषादि द्वादश लग्नों में उत्पन्न मनुष्यों के शुभाशुभ ग्रह... 🪷
मेष :- मेष लग्न में उत्पन्न जातक के लिए भौम अष्टमेश होने पर भी अशुभ फल नही देता अपितु शुभ फल दायक ग्रह का सहायक होता है । पापग्रह की दशा में पापफल को न्यून करता है । शनि, बुध और शुक्र तीनों पापफलद होते हैं।
सूर्य और गुरु शुभ फलद होते हैं। शनि, गुरु केवल योगमात्र से ही शुभ फलदायक नही हो जाता ।
गुरु पाप ग्रह साहचर्य होने पर पाप प्रभाव देते हैं । मुख्य रूप से शुक्र मारक होता है। शनि आदि क्रूर ग्रह पापी होते हैं।
मारकेश शुक्र से सम्बन्ध होने पर शनि एवं बुध भी मारक होते हैं।
वृषभ लग्न में उत्पन्न जातक का शुभाशुभ ग्रह --
गुरु, शुक्र और चंद्र पापफलद होते हैं। शनि तथा सूर्य शुभ फलप्रद होते हैं। शनि योगकारक होता है। बुध स्वल्प शुभप्रद तथा गुरु, शुक्र और मंगल ग्रह मारक होते हैं ।
मिथुन लग्न हेतु शुभाशुभ ग्रह :- मिथुन लग्न वाले जातक के लिए भौम, गुरु, सूर्य पापफलद और शुक्र शुभ फलद होता है। शनि नवमेश होकर भी अष्टमेश होने के कारण शाहचर्य बश फल देता है। चंद्रमा मुख्य मारक होता है।
कर्क लग्न:- कर्क लग्नोत्पन्न जातक हेतु शुक्र, बुध पापी एवं भौम, गुरु, चंद्र शुभप्रद होते हैं। मंगल पूर्णयोगकारक होता है, अतः मंगलदायक है। शनि पूर्णमारक होता है। सूर्य साहचर्य अनुसार फल देता है।
सिंह लग्न :- सिंह लग्न हेतु बुध, शुक्र, शनि पापफलदायक एवं भौम, गुरु, सूर्य शुभ फलदायक होते हैं। गुरु और शुक्र सम्बन्ध मात्र से योगकारक नही होते हैं। शनि मारक होता है। चंद्रमा साहचर्य अनुसार फल देता है।
कन्या लग्न :- कन्या लग्न में भौम, गुरु, चंद्रमा पापप्रभाव वाला तथा बुध, शुक्र शुभ फल वाला होता है। शुक्र बुध सम्बन्ध योगकारक परिणाम देता है । शुक्र मारक भी है, और सूर्य साहचर्य में विशेष मारकत्व प्रस्तुत करता है।
तुला लग्न:- तुला लग्न वालों के लिए गुरु, सूर्य, भौम पाप फलद और शनि, बुध शुभ फलद होते हैं। शनि योगकारक ग्रह है। चन्द्र बुध सम्बन्ध भी योगकारक होता है। भौम मारक तथा गुरु आदि पाप ग्रह भी मारक लक्षण वाले होते हैं। शुक्र सम प्रभाव रखता है।
वृश्चिक लग्न:- शुक्र, बुध, शनि पाप फलदायक, गुरु और चंद्र शुभ फलदायक एवं चंद्र-सूर्य योगकारक होते हैं। भौम सम एवं शुक्र राहु आदि पापीग्रह मारक लक्षण वाले होते हैं।
धनु लग्न:- धनु लग्न के जातक के लिए शुक्र पापी एवं भौम, सूर्य शुभ होते हैं। सूर्य बुध सम्बन्ध योगकारक और शनि मारक होता है। गुरु सम और शुक्र मारक लक्षण वाला होता है।
मकर लग्न:- मकर लग्नोत्पन्न जातक को भौम, गुरु चंद्र पाप फलद और शुक्र, बुध शुभ फलद होता है। द्वितीयेश होकर भी लग्नेश होने के कारण शनि स्वयं मारक नही होता है, अपितु भौमादि पाप ग्रह मारकत्व प्रदर्शित करते हैं। सूर्य सम फल कारक तथा शुक्र सुयोगकारक होता है।
कुम्भ लग्न:- गुरु, चन्द्र, भौम पाप फलद एवं शुक्र, शनि शुभप्रद तथा एकमात्र शुक्र योगकारक होता है। गुरु, सूर्य और भौम मारक और बुध मध्यम फलदायक होता है।
मीन लग्न:- मीनलग्नोत्पन्न जातक हेतु शनि, शुक्र, सूर्य और बुध पापप्रद तथा भौम, चंद्र शुभप्रद एवं भौम-गुरु सम्बन्ध योगकारक होता है। भौम मारक होकर भी स्वयं मारक नही होता, अपितु शनि और बुध मारक होते हैं।
इसप्रकार जन्मलग्न और भावाधिप के अनुसार ग्रहों के शुभत्व और पापत्व का प्रतिपादन महर्षि पराशर जी के मतानुसार किया गया ।
ॐ स्वस्ति 🪷
19/09/2024
ॐ तत्सत्
ज्योतिष & रोग .. क्रमांक. १
ज्योतिष एवं आयुर्वेद दोनों इस तथ्य पर सहमत हैं कि मनुष्य अपने पूर्वार्जित अशुभ कर्मो के प्रभाववश रोगी बनता है। अन्य विषयों की भांति मनुष्य को होने वाले रोगों से सम्बंधित जानकारी भी जातक के जन्मकुण्डली द्वारा जानी जा सकती है। जातक के जन्मकाल, प्रश्नकाल एवं गोचर में प्रतिकूल ग्रहों के जानकारी द्वारा सम्बंधित रोगों और परिणाम को जाना जा सकता है।
ज्योतिष शास्त्र में रोग को दो भाग में वर्गीकृत किया गया है।
१. जो रोग जन्म से साथ ही लगे रहते है उन्हें जन्मजात या सहज रोग कहते हैं । सहज रोग के दो भेद होते हैं- शारीरिक तथा मानसिक। लुलापन, लंगड़ापन, कुबड़ापन, मुकत्व, अंधत्व, बधिरत्व, नपुंसकत्व, हीनांग, एवं अधिकांग आदि शारीरिक रोग है। जड़ता, उन्माद, पागलपन, मूढ़ता, उग्रता आदि मानसिक रोग है।
२. जो रोग जन्म से नही होते किन्तु देश काल परिस्थितिवश आगंतुक रूप में प्रकट होते है वो आगंतुक रोग कहलाते है।
आगंतुक रोग भी दो प्रकार के हैं–
१. दृष्टनिमित्तजन्य - श्राप, अभिचार, घात, संसर्ग, दुर्घटना आदि प्रत्यक्ष घटनाओं से उत्पन्न रोग दृष्टनिमित्तजन्य कहलाते हैं।
२ अदृष्टनिमित्तजन्य- बाधक ग्रहयोगों के द्वारा उत्पन्न रोग अदृष्टनिमित्तजन्य रोग कहलाते हैं। इन सभी रोगों का कारण पूर्वार्जित कर्म ही माना जाता है। उपरोक्त दृष्ट तथा अदृष्ट निमित्त जन्य रोग भी शारीरिक एवं मानसिक भेद से दो प्रकार के होते हैं।
ज्योतिष में जन्मजात रोगों का विचार गर्भाधान कुण्डली एवं जन्मकुण्डली द्वारा किया जाता है। अष्टम भाव, अष्टमेश, अष्टमस्थ ग्रह, अष्टम भाव को देखने वाला ग्रह एवं अष्टमेश से युत ग्रह द्वारा जन्मजात रोग का विश्लेषण करते है । अष्टम भाव और अष्टमेश का संयोग जितना प्रभावी होगा जन्मजात रोग उतने अधिक प्रभावी होंगे।
जन्मजात मानसिक रोग के विचार में चतुर्थ भाव और भावेश का भी सम्मिलित विचार किया जाता है। भाव, भावेश के शुभत्व पापत्व आधारित बलाबल अनुसार ही रोग के प्रभाव का आकलन करना चाहिए।
दृष्टनिमित्तजन्य रोगों के परिज्ञान के लिए षष्ठभाव, भावेश, षष्टभावस्थ ग्रह, भाव दृष्टा ग्रह के शुभत्व पापत्व और बलाबल का सम्यक विश्लेषण करते हुए रोग की बलाबल को निर्धारित करना चाहिए।
जन्मांग में छठा भाव रोग और शत्रु का प्रतिनिधित्व करता है। जब कोई व्यक्ति शत्रु हो जाता है तब वह भय, श्राप,मारक अभिचार आदि सभी कष्टदायक साधनों का अवलम्बन लेता है। ये सब विचार षष्ठभाव और सम्बंधित ग्रहों द्वारा होते है।
सूर्यादि ग्रह मनुष्य के शरीर के समस्त अंग, धातु, वात, पित्त, कफ आदि दोष,आंतरिक संरचना सहित संचालन प्रक्रिया का प्रतिनिधित्व करते हैं। जन्मांग में जो ग्रह बाधक होता है वह शरीर के जिस अंग, धातु दोष आदि का प्रतिनिधत्व करता है, उसी में बाधा विकार उत्पन्न कर देता है। अदृष्टनिमित्तजन्य शारीरिक-मानसिक रोगों की उत्पत्ति का मुख्य कारण इन बाधक ग्रहों को माना गया है। .... क्रमशः
………….
सर्वें भवन्तु सुखिनः ... 💕
28/05/2024
ॐ तत्सत् 🌞
प्रश्न ज्योतिष में प्रवासी आगमन विचार..🌷
जब कोई व्यक्ति या बालक बिना बताए या सहमति से घर से निकल कर बाहर कही जाते हैं तब प्रश्न ज्योतिष विज्ञान के द्वारा जातक के वर्तमान स्थिति का विचार करते हैं --
👉 प्रश्नचक्र में सभी या अधिकाँश ग्रह २, ३, ५वें भाव में हों तब प्रवासी का आगमन का योग होता है ।
🌹 यदि इन्ही भावों में बुध, गुरु, शुक्र पूर्ण चंद्र युक्त हो रहे हों, तब नष्ट बस्तु की प्राप्ति होती है । प्रवासी शीघ्र घर लौटता है।
🌞 प्रश्न चक्र में ६ या ७वें भाव में कोई भी ग्रह हो और
👉 ...... गुरु केन्द्रस्थ हो तब पथिक का आगमन होता है।
👉 ....... बुध, शुक्र में कोई भी त्रिकोण में होने पर पथिक का आगमन होता है।
👉 .......मात्र बुध या शुक्र के त्रिकोण में होने पर भी प्रवासी का आगमन होता है।
🌸 प्रश्नचक्र में बली चंद्र अष्टमस्थ हो और केंद्र पापग्रह वर्जित हो तब भी प्रवासी वापसी करता है। इस स्थिति में यदि केंद्र शुभ ग्रह युक्त हो तब प्रवासी लाभ युक्त होता है और धन-धान्य, रत्न-आभूषण, स्त्री आदि के साथ वापस आता है।
🌞 प्रवासी अवस्था ज्ञान :-
☝️प्रश्नचक्र में पृष्ठोदय लग्न (मेष, वृष, कर्क, धनु, मकर) उदित होकर पाप निरीक्षित भी हो तब प्रवासी वन्धन (वध भी संभव)में है और पीड़ित है।
☝️यदि तृतीय भाव पापयुक्त और दृष्ट भी हो शुभ दृष्टि नही हो तब प्रवासी का स्थान परिवर्तन हो चुका है।
☝️ यदि पापग्रह छठें स्थान में पापविवक्षित हो और शुभ दृष्टि रहित हो तब प्रवासी की मृत्यु का संकेत होता है, अथवा मरणतुल्य कष्ट ( गम्भीर बिमारी/ दुर्घटना) में होता है।
☝️ केन्द्रस्थ पापग्रह की स्थिति और उन पर पापदृष्टि पथिक के मुषित होने (ठगे/लुटे जाने) का संकेत देती है, चोरी भी हो सकती है ।
🌺 प्रवासी आगमन समय--
प्रश्न कुंडली में जो ग्रह सर्वाधिक बली हो और आगमन योगकारक हो तब उस भाव संख्या में १२ का गुना करने पर जो संख्या प्राप्त होती है वह प्रवासी के आगमन के दिनों की संख्या होगी।
उक्त बली ग्रह जब भी वक्री होगा तब भी प्रवासी के आने की संभावना होगी ।
..........
भगवत्कृपा हि केवलम्🌹