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06/06/2023

यह बदलते भारत की तस्वीर है...
मैं नहीं जानता ये कहाँ का स्टोर है पर इन्होंने जानदार पहल की है, यही होना चाहिए।
जिनको नहीं पता कौन सा सामान स्वदेशी है और कौन सा विदेशी, इससे उन्हें बहुत सुविधा मिलेगी खरीदने मे।
गोरखपुर वाले बाबा

03/06/2023

अठारह बच्चों का ग्रुप गया था मनाली जिसमें लड़के लड़कियाँ दोंनो शामिल थे। दिन भर घूमने के बाद लड़के तो जहाँ इकट्ठे होते बीयल शराब की बोतलें खुल जाती और लडकियाँ भी अक्सर उनका साथ देने से पीछे नहीं हटतीं । पीना -पिलाना तो अब क्या लड़के क्या लड़कियाँ सबके लिए एन्टरटेनमेंट के साथ साथ स्टेटस सिम्बल भी बन गया है।
एक और क्रेज़ जो दीवानगी की हद तक नवयुवाओं खासतौर पर लड़कियों में कुछ ज्यादा ही हावी हो गया है वो है कुछ न कुछ नयापन विशिष्टता लिए हुए "सैल्फी" को सोशल मीडिया पर पोस्ट करना और फिर उन पर ज्यादा से ज्यादा लाइक्स कमेन्ट की दीवानगी का जुनून।
यही कारण था कि वे इतने खूबसूरत स्थल पर होते हुए भी प्राकृतिक दृश्यों के सौन्दर्य -अनुभवन को महसूस करने की बजाए अपना अधिकतर समय फेवरेट स्पाॅट ढूंढ कर नये नये पोज़ बना कर सैल्फी लेने में सारी क्रियेटिविटी खर्च करतीं रहतीं ।
अब पिक्स लेना मात्र आत्मप्रशंसा और आत्ममुग्धता का मापदंड ही नहीं रह गया है अब तो सोशल मीडिया के लाइक्स तय करते हैं कि कितनी हिट है उसकी सैल्फी।
यही क्रेज उन्हें इतना भ्रमित कर देता कि वो इसके लिए नए से नए खतरनाक ,अलभ्य,दुर्गम स्पाॅट को अपना सैल्फी प्वाइंट बनाने तलाशती रहतीं ।
ऐसे ही एक पहाड़ी के सिरे पर खड़े होकर जहाँ कि पाश्रर्व में खाई और आसपास सहारा लेने को कोई चट्टान तक नहीं थी , रिद्धि ने उस लोकेशन , बैकग्राउंड के उस व्यू से प्रभावित होकर अपने "फोटो सैशन " के लिए सैलेक्ट किया।
उसने वहाँ टाइटेनिक स्टाइल में खड़े होकर अपनी दोनों बाँहे फैलाकर ,मुँह ऊपर कर आँखे बंद कर उस समां को महसूस कर लेने का पोज़ बनाकर अपनी फ्रैन्ड निया को पिक क्लिक करने को कहा। निया भी अपनी फोटोग्राफी की समग्र कलात्मकता दिखाते हुए उससे अलग अलग पोज़ बनवाती रही।कभी "रिद्धि थोड़ा लैफ्ट" कभी "रिद्धि मुँह थोड़ा और ऊपर" कभी "राइट पैर आगे कभी कुछ तिरछे"इस तरह अलग अलग एन्गल से फोटो क्लिक की जा रही थी और फिर अचानक !!!! पलक झपकने से पहले ही !! एक क्षण भी नहीं लगा बस्सस!!! जरा सा संतुलन बिगड़ा और सबकी आँखो के सामने ही रिद्धि खाई में ।
अविश्वसनीय,ह्रदय विदारक, रूह को कँपा देने वाली अनहोनी !!
एक पल में क्या से क्या हो गया।
--लेकिन उस अनहोनी या इस तरह और भी होने वाले हादसों में क्या उन सबकी अपनी भी गलती नहीं ?
इस तरह की घटनाओं के लिए सिर्फ असावधानी या "नियति"को दोष नहीं दिया जा सकता ।
आए दिन इस तरह के समाचार सुनने के बावजूद भी लाइक्स पाने का जुनून और सोशल मीडिया पर पापुलर होने का पागलपन नहीं क्या ये ?
ये पोस्ट उन बच्चों को आगाह करने के लिए ही है -- जिन लाइक्स के लिए तुम जिन्दगी का रिस्क लेते हो ऐसे हादसे हो जाने पर वे सोशल मीडिया फ्रैन्डस तुम्हारी पोस्ट पर लाइक्स कर और R.I.P लिखकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेंगे लेकिन तुम्हारे माता पिता का क्या ?--
जिनके लाइक भी तुम ,लव भी तुम ,गुरूर भी तुम--
आस भी तुम ,उम्मीद भी तुम ,कोहिनूर भी तुम---

#नियति
पूनम अरोड़ा

Most Welcome all friends
10/05/2023

Most Welcome all friends

06/12/2022
29/07/2022

बिना ठाकुर(सामन्त/जागीरदार) के किसी भी गाँव की कल्पना ही नही की जा सकती थी। हर गाँव की रक्षा हेतु किसी राजपूत को ठाकुर का पद दे दिया जाता था न कि सिर्फ लगान वसूलने के लिए इसी बात पर एक किस्सा पेश कर रहा हूँ
अंग्रेजो ने दिल्ली के अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को बन्दी बना लिया और मुगलो का जम कर कत्लेआम किया । सल्तनत खत्म होने से मुगल सेना कई टुकड़ो में बिखर गयी और देश के कई हिस्सों में जान बचा कर छुप गयी । पेट भरने के लिए कोई रोजगार उन्हें आता नही था क्योंकि मुगल सदैव चोरी लूटपाट और बलात्कार जेसे गन्दे और घ्रणित कार्यो में ही व्यस्त रहे इसलिए वो छोटे गिरोह बना कर लूटपाट करने लगे ।
बीकानेर रियासत में न्याय प्रिय राजा गंगा सिंह जी का शासन था जिन्होंने गंग नहर(सबसे बड़ी नहर) का निर्माण करवाया जिसको कांग्रेस सरकार ने इन्दिरा गांधी नहर नाम देकर हड़प लिया बनवाई थी ।
उन्ही की रियासत के गाँव आसलसर के जागीरदार श्री दीप सिंह जी शेखावत की वीरता और गौ और धर्म रक्षा के चर्चे सब और होते थे ।
"तीज" का त्यौहार चल रहा था और गाँव की सब महिलाये और बच्चियां गांव से 2 किलोमीटर दूर गाँव के तालाब पर गणगौर पूजने को गयी हुई थी और तालाब के समीप ही गांव की गाये भी चर रही थी उसी समय धूल का गुबार सा उठता सा नजर आया और कोई समझ पाता उससे पहले ही करीब 150 घुड़सवारों ने गायों को घेर कर ले जाना शुरू कर दिया । चारो तरफ भगदड़ मच गयी और सब महिलाये गाँव की और दौड़ी , उन गौओ में से एक उन मुगल लुटेरो का घेरा तोड़ कर भाग निकली तो एक मुसलमान ने भाला फेक मारा जो गाय की पीठ में घुस गया पर गाय रुकी नही और गाँव की और सरपट भागी ।
दोपहर का वक्त था और आसल सर के जागीरदार दीप सिंह जी भोजन करने बेठे ही थे की गाय माता की करुण रंभाने की आवाज सुनी , वो तुरन्त उठे और देखते ही समझ गए की मुसलमानो का ही कृत्य है उन्होंने गाँव के ढोली राणा को नगारा बजाने का आदेश दिया जिससे की गाँव के वीर लोग युद्ध के लिए तैयार हो सके पर सयोंगवश सब लोग खेतो में काम पर गए हुए थे , केवल पांच लोग इकट्ठे हुये और वो पाँच थे दीप सिंह जी के सगे भाई ।
सब ने शस्त्र और कवच पहने और घोड़ो पर सवार हुई तभी दो बीकानेर रियासत के सिपाही जो की छुटी पर घर जा रहे थे वो भी आ गए , दीप सिंह जी उनको कहा की आप लोग परिवार से मिलने छुट्टी लेकर जा रहे हो ,आप जाइये ,पर वो वीर कायम सिंह चौहान जी के वंशज नही माने और बोले हमने बीकानेर रियासत का नमक खाया है हम ऐसे नही जा सकते | युद के लिए रवाना होते ही सामने एक और वीर पुरुष चेतन जी जाट भी मिले वो भी युद्ध के लिए साथ हो लिए । इस तरह आठ "8" योद्धा 150 मुसलमान सेनिको से लड़ने निकल पड़े और उनके साथ युद्ध का नगाड़ा बजाने वाले ढोली राणा जी भी ।
मुस्लिम सेना की टुकड़ी के चाल धीमी पड़ चुकी थी क्योंकि गायो को घेर कर चलना था । और उनका पीछा कर रहे जागीरदार दीप सिंह जी ने जल्दी ही उन मुगल सेनिको को "धाम चला" नामक धोरे पर रोक लिया , मुस्लिम टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे मुखिया को इस बात का अंदाज नही था की कोई इतनी जल्दी अवरोध भी सामने आ सकता है ? उसे आश्चर्य और घबराहट दोनों महसूस हुई , आश्चर्य इस बात का की केवल आठ 8 लोग 150 अति प्रशिक्षित सैनिको से लड़ने आ गए और घबराहट इस बात की कि उसने आसल सर के जागीरदार दीप सिंह जी की वीरता के चर्चे सुने थे , उस मुसलमान टुकड़ी के मुखिया ने प्रस्ताव रखा की इस लूट में दो गाँवों की गाये शामिल है अजितसर और आसलसर , आप आसलसर गाँव की गाय वापस ले जाए और हमे निकलने दे पर धर्म और गौ रक्षक श्री दीप सिंह जी शेखावत ने बिलकुल मना कर दिया और कहा की "" ऐ मलेच्छ दुष्ट , ये गाय हमारी माता के सम्मान पूजनीय है कोई व्यपार की वस्तु नही ,तू सभी गौ माताओ को यही छोडेगा और तू भी अपने प्राण यही त्यागेगा ये मेरा वचन है " मुगल टुकड़ी के मुखिया का मुँह ये जवाब सुनकर खुला ही रह गया और फिर क्रोधित होकर बोला की "मार डालो सबको" ।
आठो वीरो ने जबरदस्त हमला किया जो मुसलमानो ने सोचा भी नही था कई घण्टे युद्ध चला और 150 मुसलमानो की टुकड़ी की लाशें जमीन पर आठ वीर योद्धाओ ने बिछा थी, ।
सभी गऊ माता को गाँव की और रवाना करवा दिया और गंभीर घायल सभी वीर पास में ही खेजड़ी के पेड़ के निचे अपने घावों की मरहमपट्टी करने लगे और गाँव की ही एक बच्ची को बोल कर पीने का पानी मंगवाया ,.| सूर्य देव रेगिस्तान की धरती को अपने तेज से तपा रहे थे और धरती पर मौजूद धर्म रक्षक देव अपने धर्म से ।।
सभी लोग खून से लथपथ हो चुके थे और गर्मी और थकान से निढाल हो रहे थे ,
आसमान में मानव मांस के भक्षण के आदि हो चुके सेंकडो गिद्द मंडरा रहे थे ., इतने ज्यादा संख्या में मंडरा रहे गीधों को लगभग 5 किलोमीटर दूर मौजूद दूसरी मुस्लिमो की टुकड़ी के मुखिया ने देखा तो किसी अनहोनी की आशंका से सिहर उठा ,उसने दूसरे साथियो को कहा " जरूर कोई खतरनाक युद्ध हुआ है वहां और काफी लोग मारे गए है इसलिए ही इतने गिद्ध आकाश में मंडरा रहे है " उसने तुरन्त उसी दिशा में चलने का आदेश दिया और वहां का द्रश्य देख उसे चक्कर से आ गए, 150 सेनिको की लाशें पड़ी है जिनको गिद्ध खा रहे है और दूर खेजड़ी के नीचे 8 आठ घायल लहू लुहान आराम कर रहे है ।
'" अचानक दीप सिंह शेखावत जी को कुछ गड़बड़ का अहसास हुआ और उन्होंने देखा की 150 मुस्लिम सेनिक बिलकुल नजदीक पहुँच चुके है । वो तुरन्त तैयार हुए और अन्य साथियो को भी सचेत किया , सब ने फिर से कवच और हथियार धारण कर लिए और घायल शेर की तरह टूट पड़े ,,
खून की कमी तेज गर्मी और गंभीर घायल वीर योद्धा एक एक कर वीरगति को प्राप्त होने लगे , दीप सिंह जी छोटे सगे भाई रिड़मल सिंह जी और 3 तीन अन्य सगे भाई वीरगति को प्राप्त हुए पर तब तक इन वीरो ने मुगल सेना का बहुत नुकसान कर दिया था ।
"7 " सात लोग वीरगति को प्राप्त कर चुके थे और युद्ध अपनी चरम सीमा पर था , अब जागीरदार दीप सिंह जी अकेले ही अपना युद्ध कोशल दिखा कर मलेछो के दांत खट्टे कर रहे की तभी एक मुगल ने धोखे से वार करके दीप सिंह की गर्दन धड़ से अलग कर दी ।
और और मुगल सेना के मुखिया ने जो द्रश्य देखा तो उसकी रूह काँप गयी । दीप सिंह जी धड़ बिना सिर के दोनों हाथो से तलवार चला रहा था धीरे धीरे दूसरी टुकड़ी के 150 मलछ् में से केवल दस ग्यारह मलेच्छ ही जिन्दा बचे थे । बूढ़े मुगल मुखिया ने देखा की धड़ के हाथ नगारे की आवाज के साथ साथ चल रहे है उसने तुरंत जाकर निहथे ढोली राणा जी को मार दिया । ढोली जी के वीरगति को प्राप्त होते ही दीप सिंह का शरीर भी ठंडा पड़ गया ।
वो मुग़ल मुखिया अपने सात" 7" आदमियो के साथ जान बचा कर भाग निकला और जाते जाते दीप सिंह जी की सोने की मुठ वाली तलवार ले भागा ।
लगभग 100 किलोमीटर दूर बीकानेर रियासत के दूसरे छोर पर भाटियो की जागीरे थी जो अपनी वीरता के लिए जाने पहचाने जाते है। मुगल टुकड़ी के मुखिया ने एक भाटी जागीरदार के गाँव में जाकर खाने पीने और ठहरने की व्यवस्था मांगी और बदले में सोने की मुठ वाली तलवार देने की पेशकश करी ।। भाटी जागीरदार ने जेसे ही तलवार देखी चेहरे का रंग बदल गया और जोर से चिल्लाये ,,"" अरे मलेछ ये तलवार तो आसलसर जागीरदार दीप सिंह जी की है तेरे पास कैसे आई ?"
मुसलमान टुकड़ी के मुखिया ने डरते डरते पूरी घटना बताई और बोला ठाकुर साहब 300 आदमियो की टुकड़ी को गाजर मूली जेसे काट डाला और हम 10 जने ही जिन्दा बच कर आ सके । भाटी जागीरदार दहाड़ कर गुस्से से बोले अब तुम दस भी मुर्दो में गिने जाओगे और उन्होंने तुरंत उसी तलवार से उन मलेछो के सिर कलम कर दिए ।।
और उस तलवार को ससम्मान आसलसर भिजवा दिया।।
ये सत्य घटना आसलसर गाँव की है और दीप सिंह जी जो इस गाँव के जागीरदार थे आज भी दीपसिंह जी की पूजा सभी समाज के लोग श्रदा से करते है। और हाँ वो "धामचला " धोरा जहाँ युद्ध हुआ वहां आज भी युद्ध की आवाजे आती है और इनकी पत्नी सती के रूप में पूजी जाती है और उनके भी चमत्कार के चर्चे दूर दूर तक है।
आज जो टीवी फिल्मो के माध्यम से दिखाया जाता है किसी भी गाँव के जागीरदार या सामंत सिर्फ शोषण करते थे और कर वसूल करते थे उनके लिए करारा जवाब है । गाँव के मुखिया होते हुए भी इनकी जान बहुत सस्ती हुआ करती थी कैसी भी मुसीबत आये तो मुकाबले में आगे भी ठाकुर ही होते थे। गाँव की औरतो बच्चो गायों और ब्राह्मणों की रक्षा हेतु सदैव तत्पर रहते थे। सत् सत् नमन है ऐसे वीर योद्धाओ को अपनी प्रजा के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर देते थे।

Page:-क्षत्रीय सोलंकी बन्ना मैवाड

29/07/2022

*"नेशनल हेराल्ड" केस क्या है आसान शब्दों में जानिए ?*

★ नेहरू जी ने नेशनल हेराल्ड नामक अखबार 1930 में शुरू किया। धीरे-धीरे इस अखबार ने 5000/- करोड़ की संपत्ति अर्जित कर ली। आश्चर्य की बात ये है कि इतनी संपत्ति अर्जित करने के बावजूद भी सन् 2000 में यह अखबार घाटे में चला गया और इस पर 90 करोड़ का कर्जा हो गया।

★ "नेशनल हेराल्ड" की तत्कालीन डायरेक्टर्स, सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और मोतीलाल वोरा ने, इस अखबार को यंग इंडिया लिमिटेड नामक कंपनी को बेचने का निर्णय लिया।

★ अब मज़े की बात सुनो, यंग इंडिया के डायरेक्टर्स थे, सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, ऑस्कर फेर्नाडीज़ और मोतीलाल वोरा।

★ डील यह थी कि यंग इंडिया, नेशनल हेराल्ड के 90 करोड़ के कर्ज़ को चुकाएगी और बदले में 5000 करोड़ रुपए की अचल संपत्ति यंग इंडिया को मिलेगी।

★ इस डील को फाइनल करने के लिए नेशनल हेराल्ड के डायरेक्टर मोती लाल वोरा ने "तत्काल" यंग इंडिया के डायरेक्टर मोतीलाल वोरा से बात की, क्योंकि वह अकेले ही, दोनों ही कंपनियों के डायरेक्टर्स थे।

★ अब यहाँ एक और नया मोड़ आता है। 90 करोड़ का कर्ज़ चुकाने के लिए यंग इंडिया ने कांग्रेस पार्टी से 90 करोड़ का लोन माँगा।

★ इसके लिये कांग्रेस पार्टी ने एक मीटिंग बुलाई जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष और कांग्रेस पार्टी के महासचिव शामिल हुए।

★ और यह वरिष्ठ लोग कौन थे.......?
सोनिया, राहुल, ऑस्कर और मोतीलाल वोरा।

★ कांग्रेस पार्टी ने लोन देना स्वीकार कर लिया और इसको कांग्रेस पार्टी के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा ने पास भी कर दिया और यंग इंडिया के डायरेक्टर मोतीलाल वोरा ने ले लिया और आगे नेशनल हेराल्ड के डायरेक्टर मोतीलाल वोरा को दे दिया।

★ अभी कुछ और मज़ा बाकी था...

★ अब कांग्रेस पार्टी ने एक मीटिंग और बुलाई जिसमें सोनिया, राहुल, ऑस्कर और वोरा साहब सम्मलित हुए।

★ उन्होंने मिलकर यह तय किया कि नेशनल हेराल्ड ने आज़ादी की लड़ाई में बहुत सेवा की है इसलिए उसके ऊपर 90 करोड़ के कर्ज़ को माफ़ कर दिया जाए और इस तरह 90 करोड़ का छोटा सा कर्ज माफ़ कर दिया गया।

★ और इस तरह से यंग इंडिया जिसमें 36 प्रतिशत शेयर सोनिया और राहुल के हैं और शेष शेयर ऑस्कर और वोरा साहब के हैं, को, 5000 करोड़ की संपत्ति मिल गई...

★ जिसमें, एक 11 मंज़िल बिल्डिंग जो बहादुर शाह जफ़र मार्ग दिल्ली में और उस बिल्डिंग के कई हिस्सों को अब पासपोर्ट ऑफिस सहित कई ऑफिसेस को किराये पर दे दिया गया है।

इसको कहते हैं राख के ढेर से महल # खड़ा कर लेना।

★ *राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी इसी नेशनल हेराल्ड केस में #5000 करोड़ के घोटाले में जमानत पर हैं...*

ये शेयर कर सभी तक पहचायें ताकि इन कांग्रेसियों का फर्जीवाड़ा और चरित्र सभी के सामने आए... ...............

28/07/2022

आज से लगभग दो दशक पहले व्यापार शुरू किया था।
व्यापार जगत में कदम रखा तो अपनी उम्र से दुगनी या तिगुनी उम्र के भद्रजनों के साथ उठना बैठना शुरू हुआ।
जवानी का दौर था। मन .......मस्तिष्क अपरिपक्व था। खुश होते थे तो बहुत खुश होते थे......उदास होते थे तो उदासी घेर लेती थी......कहीं ना नहीं किरदार में एक संतुलन नहीं था।
उन दिनों व्यापार के सिलसिले में पिताजी की उम्र के एक व्यक्ति से परिचय हुआ।
रोजाना मिलते रहे।
खूब बातचीत हुई और उनसे काफी कुछ सीखने को मिला।

उन दिनों व्यापार में काफी मंदा आ गया था। कठिन समय था। निजी जीवन में भी काफी उतार चढ़ाव हो रहे थे। ना व्यापार में कामयाबी मिल रही थी और निजी जीवन तो ......बेपटरी सा हो चुका था। मैं व्यथित था.....कुंठित था।

कुल मिला कर मुझमें जिजीविषा समाप्त होती जा रही थी।

मैं चुपचाप सा ......गुमसुम सा रहने लगा।

उन दिनों हम दोनों शाम को स्विमिंग के लिऐ जाते थे।
उन्होंने एक दो बार मुझसे पूछा के क्या दिक्कत है?
मैंने कोई जवाब नहीं दिया।
एक दिन उनके काफी पूछने पर मैं फूट पड़ा।

मेरी अंदर की परेशानी बाहर आ गई। निजी जीवन से लेकर व्यापार से जुड़ी काफी समस्याओं का जिक्र मैंने उनसे कर दिया।

वह मुस्कुराए।

बोले ........तू क्या चाहता है?

मैंने झल्लाते हुए कहा ...... मैं अपनी प्रॉब्लम्स से छुटकारा चाहता हूं। सारी प्रॉब्लम्स से छुटकारा चाहता हूं।

हम उस समय शहर के एक फ्लाईओवर से गुजर रहे थे।

उन्होंने पुल से बीचों बीच गाड़ी रोक दी।

मुझे गाड़ी से उतरने को कहा।

मैं सकपका गया। उन्होंने गाड़ी को एक किनारे लगाया।

गाड़ी से उतरे।

पुल से नीचे की ओर इशारा किया।
पुल के नीचे शमशान घाट था।
मृत शरीर को मुखाग्नि दी जा रही थी।

हम करीबन दो तीन मिनट वहां खड़े रहे।
फिर गाड़ी में बैठे।

कुछ दूर गए।

"प्रॉब्लम्स से छुटकारा यहीं मिलेगा। सुकून .......आराम ......यहीं मिलेगा.......इससे पहले नहीं मिलेगा.... इससे पहले चिंता भी रहेगी....परेशानियां भी रहेंगी .....संघर्ष भी रहेगा.....इस बात को जितनी जल्दी समझ लेगा उतनी चिंता कम होगी।" उन्होंने मेरी आखों में आखें डाल कर कहा।

उनकी बात का मर्म समझने में कई साल लग गए। एक अर्से बाद समझ आया की समस्याओं के बिना यह जीवन संभव नहीं है और धरा पर कोई ऐसा जीव हैं नहीं को समस्याओं से ना घिरा हो।

जलती हुई चिता की ओर उनका इशारा नहीं था........वह इशारा मेरी ओर था। वह समझाना चाह रहे थे की इन्ही समस्याओं इन्हीं उलझनों के बीच खुशियों को ढूंढना ही जीवन है।

समस्याओं से रहित ......परेशानियों से रहित इंसान तभी होगा जब वह चिता पर लेटा होगा।

कई बार ऐसा होता है के व्यक्ति के रूप में स्वयं नारायण इशारा करते हैं.......उस दिन शमशान की चिता की ओर इंगित करती वह उंगली स्वयं नारायण का संदेश था।
मैं उस संदेश को देर से समझा इस बात का आज तक मलाल है।

यूं ही चलेगा जीवन।

दिक्कतों ......परेशानियों.....उलझनों के बीच से खुशियों के लम्हों को चुरा लेना है।

व्यथाओं को ठेंगा दिखा कर .....जी लेना है।

इस तथ्य को आत्मसात कर लेना है की जीवन का संघर्ष परेशानियों से मुक्ति पाना नहीं है। उलझनों में तो हम तब तक उलझे रहेंगे जब तक आखरी सांस बाकी है।

जीवन का असली संघर्ष इन दिक्कतों के बीच ......इन उलझनों के बीच ......खुशी और आनंद के उन लम्हों को तालाश करना है जो हमें सुकून दे सकें।

हंसिये।

मुस्कुराईये।

क्योंकि जटिलताओं के आगे मुस्कुरा कर खड़े होने का साहस बहुत कम लोग कर पाते हैं।

28/07/2022

हाल मे हॉलीवुड की एक फिल्म 'द ग्रे मॅन' रिलीज हुई। फिल्म का निर्माण व्यय 200 मिलियन डाॅलर याने 1500-1600 करोड रूपए बताया जाता है। फिल्म मे हॉलीवुड के बडे सितारे है और आँखे चौधियाने वाले दृश्यो सहित वह सब है जो दर्शको को आकर्षित करे। अंतिम फिल्म मे हुई जेम्स बांड की मृत्यु के बाद उत्पन्न हुए रिक्त स्थान को भरने का इरादा भी 'द ग्रे मॅन' के निर्माताओं का हो सकता है।

फिल्म मे भारतीय सितारे धनुष की भी भूमिका है - छोटी है लेकिन सम्माननीय और सराहनीय है। उन्हे हाशिए पर नही डाला, जैसा अन्य कलाकारो के साथ पहले हो चुका है। धनुष की सफलता हिन्दी फिल्मो मे सामान्य रही किन्तु दक्षिण मे वह बडे सितारे है एवं महानायक रजनीकांत के दामाद भी।

अब मुद्दे पर आते है। धनुष (के किरदार) का परिचय फिल्म मे 'तमिल मित्र' के तौर पर किया गया है। मेरी जानकारी मे यह नया है कि किसी भारतीय को - वह काल्पनिक पात्र ही क्यो न हो - भारत के बाहर उसकी क्षेत्रीयता से जाना जाए। अब तक किसी गैर भारतीय ने पंडित रविशंकर को बंगाली सितार वादक, गावस्कर या तेंडुलकर को मराठी बल्लेबाज या नीरज चोपडा को हरयाणवी खिलाडी कह कर संबोधित नही किया था। रामानुजन, रविंद्रनाथ, लता, कलाम, बच्चन और योग गुरूओं जैसी उत्तुंग विभूतियों की पहचान भी भारतीय ही रही, उनकी क्षेत्रीयता नही। सामान्य भारतीय नागरिक को भी भारत के बाहर जाने पर यही अनुभव होता आया है।

फिर यह शुरुआत अब क्यों? बात को मामूली कह कर टालना एक विकल्प है। किन्तु दाल मे कुछ काला भी दिख सकता है। किसी अमरीकी पटकथा लेखक का भारत ज्ञान एकाएक बढ गया हो इसकी संभावना कम ही है। फिर इस के पीछे कौन? क्या यह भारत का विखंडन चाहने वाली शक्तियों ने फेंका एक छोटा दाना है? और धनुष उसे चुग गए है, जबकि वे नकार भी सकते थे। यदि मेरी आशंका सही है तो भारत को एक इकाई के बजाय हिस्सो मे परिभाषित करने के प्रयास और भी होंगे। विघटन वाद (cessationism) की मानसिकता को हवा देने के कुत्सित प्रयास के तौर पर। जहां से शुरुआत हुई वहाँ इस बीमारी का अस्तित्व रहा है यह संयोग नही लगता।

आखिरकार 1947 का विभाजन भी कुछ ही वर्षो पहले संभव नही माना जाता था। कहीं यह हमारे जनमानस मे 'आप भारतीय नही तमिल/बंगाली/सिख/कश्मीरी है' का जहर घोलने की अंतरराष्ट्रीय पहल तो नही?

20/07/2022

यह जो हाजी अली, साईं बाबा, अजमेर शरीफ, बहराइच गाजी बाबा जाकर नाक रगड़ने का हिंदुओं का चलन है यह कोई बहुत पुराना नहीं।
महज 60/70 साल पहले तक इन मुर्दों की कब्रों पर कोई हिंदू नहीं जाता था।

फिर शुरू हुआ सोचा समझा इस्लामी+वामपंथी+ स्वयंभू सरकारों की तिकड़ी का षड्यंत्र।

और इसका जिम्मा सौंपा गया हिंदी सिनेमा जगत को।

गाने शुरू हुए:-
किसी को बच्चा नहीं होता था :- या मोहम्मद भर दे मेरी झोली खाली। शिरडी वाले साईं बाबा आया है

मूर्खता, कायरपन, हीन भावना के शिकार, दब्बूपने के आपको ढेरों उदाहरण मिलेंगे। लेकिन इतिहास की वेदना और पीड़ा भूलकर अपने पूर्वजों के हत्यारों, अपनी बहन बेटियों की नीलामी करने वाले बलात्कारियों, हमारी आस्था के प्रतीक हमारे मंदिरों को तोड़ने वाले दुष्ट अधर्मियों की कब्रों पर जाने वाले हीन सिर्फ हिंदुओं में मिलेंगे। वेभी एक दो नहीं करोड़ों।

अब थोड़ी थोड़ी आंखें खुल रही हैं, लेकिन देखना यह है यह आंखें कब तक खुली रहती हैं।

19/07/2022

मंदिर चाहिये या रोजगार ?
इस प्रश्न में दूषित मानसिकता छिपी है। लेकिन क्या इसका उत्तर वही है, जो हम दे रहे है।
जब हम अपने परिवार के साथ मंदिर जाते है,पूजा से पहले दुकान से प्रसाद लिया , चढ़ाने के लिए माला ली, तुरंत दर्शन कर लिये ,
जिज्ञासु प्रवृत्ति से हम मंदिर के चारों तरफ घूमते है। हर दुकान , हर ठेलिया को देखते है कौन क्या बेच रहा है।
फिर सब लोग खाना-पीना करते हैं!महिलाएं अपने लिए समान लेती है पुरुष अपने लिए व बच्चो के लिए जरूरत के हिसाब से सामान लेते हैं!
फिर अचानक ध्यान आया यह मंदिर दो से ढाई हजार लोगों को रोजगार दे रहा है। यह काम तो हजार करोड़ लगाकर कोई कम्पनी नहीं कर सकती है।
लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात है। मंदिर किसको रोजगार दे रहा है ! यह वह लोग है ,जिनके पास किसी संस्थान से डिग्री नहीं है। इतना धन नहीं है कि कोई बड़ा निवेश कर सकें। अर्थव्यवस्था में समाज के निचले स्तर के लोग है।
*मंदिर*
*करोड़ो लोगों को रोजगार देते हैं।*
*कैसे...... ????*
१.धार्मिक पुस्तक बेचने वालों को और उन्हें छापने वालों को रोजगार देते हैं।
२. माला बेचने वालों को घंटी-शंख और पूजा का सामान बेचने वालों को रोजगार देते हैं।
३. फूल वालों को माला बनाने और किसानों को रोजगार देते हैं।
४. मूर्तियां-फोटुएं बनाने और बेचने वालों को रोजगार देते हैं।
५. मंदिर प्रसाद बनाने और बेचने वालों को रोजगार देते हैं।
६. कांवड़ बनाने-बेचने वालों को भी रोजगार देते हैं।
७. रिक्शे वाले गरीब लोग जो कि धार्मिक स्थल तक श्रद्धालुओं को पहुंचाते हैं उन रिक्शा और आटो चालकों को रोजगार देते हैं।
८. लाखों पुजारियों को भी रोजगार देते हैं।
९. रेलवे की अर्थव्यवस्था का १८% हिस्सा मंदिरों से चलता है।
१०. मंदिरों के किनारे जो गरीबों की छोटी-छोटी दुकानें होती है उन्हें भी रोजगार मिलता है।
११. मंदिरों के कारण अंगूठी-रत्न बेचने वाले गरीबों का परिवार भी चलता है।
१२. मंदिरों के कारण दिया बनाने और कलश बनाने वालों को भी तो रोजगार मिलता है।
१३. मंदिरो से उन ६५,००० खच्चर वालों को रोजगार मिलता है जो कि श्रद्धालुओं को दुर्गम पहाड़ों पर प्रभु के द्वार तक ले जाते हैं।
१४. भारत में दो लाख से अधिक जो भी होटल हैं और धर्मशालाएं हैं उनमें रहने वाले लोगों को मंदिर ही तो रोजगार देतें हैं।
१५. तिलक बनाने वाले- नारियल और सिंदूर आदि बेचने वालों को भी ये मंदिर रोजगार देते हैं।
१६. गुड-चना बनाने वालों को भी मंदिर रोजगार देते हैं।
१७. मंदिरों के कारण लाखों अपंग और भिखारियों और अनाथ बच्चों को रोजी-रोटी मिलती है।
१८. मंदिरों के कारण लाखों वानरों की रक्षा होती है और सांपों की हत्या होने से बचती है।
१९. मंदिरों के कारण ही हिंदू धर्म में पीपल-बरगद -पिलखन- आदि वृक्षों की रक्षा होती है।
२०. मंदिर के कारण जो हजारों मेले हर वर्ष लगते हैं- मेलों में जो चरखा-झूला चलाने वालों को भी तो रोजगार मिलता है।
२१. मंदिरों के कारण लाखों टूरिस्ट मंदिरों में घूमते हैं और छोटे-छोटे चाय-पकौडे-टिक्की बेचने वाले सभी गरीबों का जीवन यापन भी तो चलता है।
सनातन धर्म उन करोड़ों लोगों को रोजगार देता है जो गरीब हैं।
जो ज्यादा पड़े लिखे नहीं हैं और जिन के पास धन-जमीन और खेती नहीं है जो बचपन में अनाथ हो गए।
जिनका कोई नहीं उनका राम है।
उनका श्याम है उनका शिव है।
यह मंदिर कई सौ वर्ष तक रहेगा।
तब तक रोजगार देता रहेगा।
यह सामाजिक , धार्मिक उन्नयन का केंद्र है।
यदि आर्थिक दृष्टि से देखे तो मंदिर , अपने निवेश से कई हजार गुना रोजगार दे रहा है।
शायद हमनें अपनी धार्मिक आस्था के कारण इसको देखा नहीं। हमारे मंदिर , आर्थिक वितरण के बहुत बड़े , स्थाई केंद्र है।
जय सनातन हिन्दू धर्म 🚩
जय भारत महान 🇮🇳🚩

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