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10/03/2020

ध्येय परिवार की ओर से आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं

04/03/2020
13/02/2020

आज विश्व रेडियो दिवस है। यह दिवस रेडियो के महत्व के बारे में आम जनता और समाचार माध्यमों में जागरूकता बढ़ाने तथा रेडियो के जरिये सूचना उपलब्ध कराने के लिए नीति-निर्माताओं को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से मनाया जाता है। यह दिवस दुनिया भर के लोगों के जीवन को प्रभावित करने और उन्हें परस्पर जोड़ने की रेडियो की अद्भुत क्षमता को याद करने का अवसर भी होता है।
आपको बता दें स्पेन रेडियो अकैडमी ने 2010 में पहली बार इस दिवस को मनाने का प्रस्ताव रखा था।इसके बाद 2011 में यूनेस्को की महासभा के 36वें सत्र में 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस घोषित किया गया। 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस के तौर पर यूनेस्को की घोषणा को संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने 14 जनवरी, 2013 को मंजूरी प्रदान की। इसके लिए 13 फरवरी की तारीख रखने का विशेष कारण यह था कि संयुक्त राष्ट्र संघ के अपने यू एन रेडियो की स्थापना 13 फरवरी 1946 को हुई थी। तब से प्रतिवर्ष 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाया जाने लगा।

इस वर्ष का थीम है- रेडियो और विविधता।
विश्व रेडियो दिवस के इस थीम तीन मुख्य उप-विषयों में विभाजित किया गया है:
सार्वजनिक, निजी और सामुदायिक प्रसारकों को शामिल कर रेडियो में विविधता को बढ़ाना;
टीम में समाज के विभिन्न समूहों को शामिल कर न्यूजरूम में प्रतिनिधित्व को प्रोत्साहित करना
संपादकीय सामग्री और कार्यक्रम की विविधता को बढ़ावा देना जो दर्शकों की विविधता को प्रदर्शित करें

भारत में रेडियो
भारत में रेडियो प्रसारण की पहली शुरुआत जून 1923 रेडियो क्लब मुंबई द्वारा हुई थी लेकिन इंडियन ब्रॉडकास्ट कंपनी के तहत देश के पहले रेडियो स्टेशन के रूप में बॉम्बे स्टेशन तब अस्तित्व में आया जब 23 जुलाई 1927 को वाइसराय लार्ड इरविन ने इसका उद्घाटन किया, लेकिन 8 जून 1936 को इंडियन स्टेट ब्राडकास्टिंग सर्विस को ‘ऑल इंडिया रेडियो’ का नाम दे दिया गया जिस नाम से यह आज तक प्रचलित है।
हमारे देश में तकनीकी रूप से तीन प्रकार के रेडियो प्रसारण केन्द्र काम कर रहे हैं- मीडियम वेव, शोर्ट वेव और एम.एम. प्रसारण केन्द्र। इन प्रसारणों की तरंगों की फ्रीक्वेंसी अलग-अलग होती है। वर्तमान समय में इंटरनेट रेडियो या डिजिटल रेडियो का भी प्रचलन काफी तेजी से बढ़ रहा है। आपको बता दें उदारीकरण के बाद निजी रेडियो चैनलों की संख्या में काफी तेजी से वृद्धि हुई। इसके साथ-साथ भारत में सामुदायिक रेडियो का भी विकास हो रहा है।

13/02/2020

भारत कोकिला, महान स्वतंत्रता सेनानी सरोजिनी नायडू की जयंती पर शत-शत नमन💐💐💐💐💐

सुप्रसिद्ध कवयित्री,महान स्वतंत्रता सेनानी और नारीवादी आंदोलन की प्रखर नेता के रूप में सरोजिनी नायडू का नाम हमेशा भारतीय इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से लिखा जाएगा। आपको बता दें सरोजनी नायडू देश के स्वतंत्रता आंदोलन में अग्रणी नेताओं में शुमार थी एवं वह अपने साथियों और भारतीय नव युवकों के लिए प्रेरणा स्रोत का काम करते थे।
सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फ़रवरी, 1879 को हुआ था। उनकी पिता का नाम अघोरनाथ चट्टोपाध्याय और माता का नाम वरदा सुन्दरी था। उनके पिता उन्हें विज्ञान क्षेत्र में आगे बढ़ना देखना चाहते थे लेकिन उनकी दिलचस्पी इस क्षेत्र में नहीं थी। उन्होंने 12 साल की उम्र में ही मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद उच्चतर शिक्षा के लिए उन्हें इंग्लैंड भेज दिया गया। इंग्लैंड में उन्होंने लंदन के 'किंग्ज़ कॉलेज' और 'कैम्ब्रिज के गर्टन कॉलेज' में शिक्षा ग्रहण की।
आपको बता दें उन्होंने मात्र 13 वर्ष की आयु में कविता 'द लेडी ऑफ लेक' लिखी थी। उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में गोल्डन थ्रैशोल्ड, द बर्ड ऑफ टाइम, द ब्रोकन विंग, नीलांबु', ट्रेवलर्स सांग, इत्यादि शामिल है। सरोजिनी नायडू के कविता संग्रह बर्ड ऑफ टाइम तथा ब्रोकन विंग ने उन्हें एक सुप्रसिद्ध कवयित्री बना दिया।
एक महान कवयित्री की तरह सरोजिनी नायडू एक महान स्वतंत्रता सेनानी भी थी। 1902 में सरोजनी नायडू ने कलकत्ता में एक ओजस्वी भाषण दिया जिससे गोपालकृष्ण गोखले बहुत प्रभावित हुए। गोखले ने उन्हें राजनीति में आगे बढ़ाने के लिए मार्गदर्शन किया। इसके साथ ही सरोजिनी नायडू की मुलाकात गांधी जी से सन् 1914 में लंदन में हुई। गांधी जी से मिलने के बाद सरोजिनी नायडू की राजनीतिक सक्रियता काफी बढ़ गई एवं वह कांग्रेस की एक ओजस्वी प्रवक्ता बन गई। उन्होंने कांग्रेस की बहुत सारी समितियों में काम किया एवं देशभर में स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति जागरूकता फैलाने का कार्य किया। जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में उन्होंने अपना 'कैसर-ए-हिन्द' का ख़िताब वापस कर दिया। सरोजिनी नायडू ने 1925 के कानपुर कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता की। इसके अलावा उन्होंने रॉलेट एक्ट का विरोध किया। सन् 1930 के प्रसिद्ध नमक सत्याग्रह में सरोजिनी नायडू गांधी जी के साथ चलने वाले स्वयंसेवकों में से एक थीं। आपको बता दें जब बातचीत करने के लिए जब महात्मा गांधी को गोलमेज कांफ्रेंस' में आमंत्रित किया गया तो महात्मा गांधी के प्रतिनिधि मंडल में सरोजिनी नायडू भी शामिल थीं। पुनः जब 1932 में महात्मा गांधी जब जेल भेजा गया तो गांधीजी ने आंदोलन को गति एवं दिशा देने का उत्तरदायित्व सरोजिनी नायडू को दे दिया। 8 अगस्त सन् 1942 को जब गांधी जी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ प्रारंभ करते हुए 'करो या मरो' का आदेश दिया। 8 अगस्त की मध्यरात्रि में हीं गांधी जी और कांग्रेस कार्यकारी समिति के प्रमुख सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया गया। महात्मा गांधी जी को गिरफ्तार करके उनके निजी मंत्री महादेव देसाई और सरोजिनी नायडू के साथ पुणे के आगा ख़ाँ महल में रखा गया। इसके अलावा सरोजनी नायडू ने कई मौकों पर कांग्रेस पार्टी के भीतर उठे विवादों को हल करने में महती भूमिका निभाई। भारत की आजादी के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त किया एवं राज्यपाल पद पर नियुक्ति पाने वाली प्रथम भारतीय महिला का गौरव भी उन्हें प्राप्त हुआ।
एक महान कवियत्री, महान स्वतंत्रता सेनानी के अलावा सरोजनी नायडू नारी-मुक्ति आंदोलन की भी शीर्ष नेता थी। उनको नारी की दुखद स्थिति का एहसास था। उन्होंने नारी के प्रति होने वाले अन्याय के विरुद्ध ना केवल आवाज उठाई बल्कि उन्होंने महिलाओं को मूलभूत अधिकारों से दूर रखने वाले तात्कालिक प्रचलित व्यवस्था का भी विरोध किया। भारत की सबसे पुरानी और महत्त्वपूर्ण नारी संस्था 'अखिल भारतीय महिला परिषद' (आल इंडिया विमेन्स कान्फ्रेंस) से सरोजिनी नायडू जुड़ गई । आपको बता दें आज भारत की नारियों को जो राजनीतिक, आर्थिक और क़ानूनी अधिकार प्राप्त हैं, उन्हें दिलाने में इस संस्था का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इस संस्थान को भारत की कोई अग्रणी महिला नेताओं की सेवाएं मिली जिनमें शामिल है लेडी धनवती रामा राव, विजयलक्ष्मी पंडित, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, लक्ष्मी मेनन, हंसाबेन मेहता इत्यादि। भारतीय नारी मुक्ति के आंदोलन में सरोजिनी सरोजिनी नायडू के योगदान को देखते हुए अखिल भारतीय महिला परिषद के नई दिल्ली स्थित केन्द्रीय कार्यालय को 'सरोजिनी हाउस' नाम प्रदान किया गया है।
2 मार्च सन् 1949 को भारत माता के इस अमर बेटी का निधन हो गया। 13 फ़रवरी, 1964 को भारत सरकार ने उनकी जयंती के अवसर पर एक डाक टिकट भी चलाया। भारतीय इतिहास में इस महान नायिका को आगे आने वाली पीढ़ियों के द्वारा 'भारत कोकिला', 'राष्ट्रीय नेता' और 'नारी मुक्ति आन्दोलन की समर्थक' के रूप में सदैव याद किया जाता रहेगा।

11/02/2020

11 फरवरी को ‘इंटरनेशनल डे ऑफ वूमेन एंड गर्ल्स इन साइंस’ (विज्ञान में महिलाओं और बालिकाओं हेतु अंतरराष्ट्रीय दिवस) मनाया जाता है। विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र में महिलाओं की सशक्त भूमिका सुनिश्चित करने के साथ-साथ लैंगिक सशक्तिकरण को बढ़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा के द्वारा 22 दिसंबर 2015 को इस दिवस को मनाने की घोषणा की गई थी। इस दिवस को यूनेस्को और संयुक्त राष्ट्र महिला संघ( यूएन वूमेन) के द्वारा संयुक्त रूप से मनाया जाता है।
आपको बता दें सतत विकास 2030 के घोषित लक्ष्यों में विज्ञान और लैंगिक समानता दोनों ही महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ दशकों में विज्ञान में महिलाओं और लड़कियों की भूमिका को बढ़ाने हेतु काफी सारे प्रयास किए गए हैं लेकिन अभी भी महिलाओं और लड़कियों की भूमिका विज्ञान क्षेत्र में काफी सीमित है। अगर हम आंकड़ों पर नजर डाले तो वर्तमान में शोधकर्ता महिलाओं की हिस्सेदारी 30% से भी कम है। यूनेस्को के आंकड़ों (2014 से 2016) पर हम नजर डालें तो हमें पता चलता है कि कुल महिला छात्रों में से मात्र 30% महिलाएं उच्च शिक्षा में STEM(विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी और गणित -एसटीईएम या स्टेम) क्षेत्रों का चयन करती हैं। अगर हम STEM क्षेत्र में महिलाओं का नामांकन देखे तो निम्न तथ्य सामने आते हैं-आईसीटी (3 प्रतिशत), प्राकृतिक विज्ञान, गणित और सांख्यिकी (5 प्रतिशत) और इंजीनियरिंग, विनिर्माण और निर्माण (8 प्रतिशत)। 2015 के ‘जेंडर बायस विदाउट स्टडीज’की रिपोर्ट के अनुसार STEM क्षेत्रों की नौकरियों में महिलाओं का हिस्सा मात्र 12% था।
इस प्रकार हमारे सामने जो निष्कर्ष आता है वह यही दर्शाता है कि विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका काफी कम है एवं इसे बढ़ाने के लिए इस दिशा में सभी को सम्मिलित प्रयास करना होगा। आपको बता दे लैंगिक रूढ़िवादी दृष्टिकोण, रोल मॉडल का अभाव और सहयोग न देने वाली या प्रतिरोधी नीतियां एवं पितृसत्तात्मक मानसिकता उन्हें इन क्षेत्रों में अपना भविष्य बनाने से रोकती हैं।
विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी और गणित (एसटीईएम या स्टेम) में महिलाओं की कम हिस्सेदारी को देखते हुए भारत सरकार के द्वारा छात्राओं में इन क्षेत्रों के प्रति रुचि विकसित करने और इन विषयों के अध्ययन के लिए कई सारी योजना समय-समय पर लाई गई है
विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका बढ़ाने हेतु महत्वपूर्ण कार्यक्रम:
-‘किरण’ (तालीम के माध्यम से अनुसंधान विकास में ज्ञान भागीदारी) योजना
-‘क्यूरी’ (महिला विश्वविद्यालयों में नवाचार और उत्कृष्टता के लिए अनुसंधान कार्यों का समेकन) कार्यक्रम
-महिला वैज्ञानिक योजना (WOS)
-STEMM में महिलाओं के लिए इंडो-यूएस फैलोशिप
-इंस्पायर योजना और इंस्पायर अवार्ड मानक योजना
-बायो-टेक्नोलॉजी करियर एडवांसमेंट एंड रेओरिएंटशन (बायो -केयर ) स्कीम;

07/02/2020

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में शचींद्रनाथ सान्याल का नाम स्वर्णिम अक्षरों से लिखा जाएगा। चाहे वह लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने का मुकदमा हो या गदर क्रांति या फिर काकोरी ट्रेन डकैती का मुकदमा हो, इन सब में एक ही नाम समान था और वह था शचींद्रनाथ सान्याल।
भारत मां के इस वीर सपूत ने अपना पूरा जीवन ही स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अर्पित कर दिया। अपने जीवन में शचींद्रनाथ सान्याल ने दो बार काले पानी की सजा काटी। काले पानी की सजा समेत उन्होंने ब्रिटिश शासन के द्वारा विभिन्न जेलों में बंद किया गया। इस पर उन्होंने अपनी स्मृति ‘बंदी जीवन’ को लिखा जो क्रांतिकारियों की प्रेरणादाई ग्रंथ के रूप में जाने जाने लगी।
शचींद्रनाथ सान्याल का जन्म 3 जून 1893 को बनारस में हुआ था | हरनाथ सान्याल उनके पिता और क्षीरोदा बासनी देवी उनकी माता थी। शचींद्र के पिता का बहुत जल्दी ही देहांत हो गया। इसके बावजूद पूरा परिवार आजादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाई। आपको बता दें महान क्रांतिकारी जतिंद्रनाथ एवं भूपेंद्र नाथ, शचींद्र नाथ के ही भाई थे।
ढाका अनुशीलन समिति से प्रभावित होते हुए शचींद्रनाथ सान्याल ने बनारस में इसकी एक शाखा स्थापित की। बाद में उन्होंने इसका नाम “यंगमेन एसोसिएशन” रख दिया| वह यहां पर शारीरिक शिक्षा एवं खेलकूद के द्वारा युवकों में क्रांतिकारी गतिविधियों को बढ़ावा देने का काम करते थे।
बाद में शचींद्र रासबिहारी बोस के संपर्क में आए। लॉर्ड हार्डिंग पर दिल्ली में बम फेंके जाने के बाद रासबिहारी बोस शचींद्रनाथ सान्याल के साथ रहने लगे। उस समय बनारस ग़दर क्रांतिकारियों का केंद्र बन गया। विष्णु पिंगले के आने के उपरांत बनारस में गदर क्रांति के हजारों कार्यकर्ता बनारस के इस केंद्र से जुड़ गए। शचींद्रनाथ सान्याल और विष्णु गणेश पिंगले गदर आंदोलन के समर्थन के लिए पंजाब गए जहां पर वह करतार सिंह सराभा के नेतृत्व में क्रांतिकारी से मुलाकात की।
21 फरवरी 1915 को सेना ग़दर क्रांति के लिए तैयार थी जिसे बाद में 19 फरवरी कर दिया गया था। हालांकि गदर आंदोलन अपेक्षित सफलता हासिल न कर सका एवं अंग्रेजों को इसकी भनक लग गई। बहुत सारे क्रांतिकारियों को ब्रिटिश के द्वारा गिरफ्तार किया गया। अस्त्र शस्त्र प्राप्ति हेतु रासबिहारी बोस जापान चले गए जिसके बाद संगठन का सारा उत्तरदायित्व शचींद्रनाथ सान्याल पर आ गया। 1915 में अपने भाई समेत शचींद्रनाथ सान्याल अंग्रेजो के द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए। उन्हें काला पानी की सजा सुनाई गई और अगस्त 1916 में अंडमान भेज दिया गया। 1920 में आम माफी के दौरान उनको छोड़ दिया गया। उन्होंने काला पानी की सजा काट रहे क्रांतिकारियों को रिहा कराने हेतु कांग्रेस के साथ काम किया एवं कांग्रेस के मंच से यह प्रस्ताव पारित कराया।
सचिंद्र नाथ सान्याल ने हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन के तहत बिखरे हुए क्रांतिकारियों को एकत्रित किया। गिरफ्तारी से बचने के लिए वह फ्रांसीसी सरकार के बुलावे पर चंदननगर चले गए । वहां से उन्होंने ‘पीला पर्चा एवं द रिवॉल्यूशनरी’ पत्रिकाओं का प्रकाशन किया | उन्होंने भारतीय की स्वतंत्रता के पक्ष में ना केवल प्रचार किया बल्कि कई लोगों को स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने हेतु भारत में भी भेजा।
पुनः शचींद्रनाथ सान्याल के कोलकाता लौटने पर उन्हें देशद्रोह के आरोप में 2 साल का कठोर कारवास का दंड दिया गया | इसी दौरान काकोरी डकैती की घटना घटी जिसमें शचींद्रनाथ सान्याल को अभियुक्त बनाते हुए आजीवन कारावास का दंड दे दिया गया। 1937 तक उनका समय विभिन्न जेलों में ही बीता। इस दौरान उन्होंने अपनी आत्मकथा के रूप में पुस्तक “बंदी जीवन” को लिखा| जेल से छूटने के उपरांत वह इंडियन नेशनल कांग्रेस के सदस्य बने| 1940 में उन्हें पुनः गिरफ्तार कर लिया गया। यहां तक आते-आते उनका शरीर जर्जर हो चुका था एवं क्षय रोग से पीड़ित हो चुके थे। अंततोगत्वा 7 फरवरी 1942 को भारत मां के वीर सपूत ने भारत माँ को स्वतंत्र कराने का अपूर्ण स्वप्न दुनिया को अलविदा कह दिया लेकर वह चला गया |

06/02/2020

मोतीलाल नेहरु जी की पुण्य तिथि पर शत- शत नमन|

मोतीलाल नेहरु प्रख्यात वकील, कुशल राजनितिक और महान स्वतंत्रता सेनानी थे। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सक्रीय नेता थे, एवं 1919-1920 और 1928-1929 तक कांग्रेस का अध्यक्ष बने। नेहरु-गाँधी परिवार के वे संस्थापक कुलपति थे।

मोतीलाल नेहरू का जन्म आगरा में हुआ था। उनके पिता का नाम गंगाधर था। वह पश्चिमी शिक्षा पाने वाले प्रथम पीढ़ी के गिने-चुने भारतीयों में से थे। वह इलाहाबाद के म्योर सेण्ट्रल कॉलेज में शिक्षित हुए इसके साथ ही उन्होंने कैम्ब्रिज से "बार ऐट लॉ" की उपाधि ली और अंग्रेजी न्यायालयों में वकील के रूप में कार्य प्रारम्भ किया।

मोतीलाल नेहरू की पत्नी का नाम स्वरूप रानी था। जवाहरलाल नेहरू उनके एकमात्र पुत्र थे। उनके दो कन्याएँ भी थीं। उनकी बडी बेटी का नाम विजयलक्ष्मी था, जो आगे चलकर विजयलक्ष्मी पण्डित के नाम से मशहूर हुई। उनकी छोटी बेटी का नाम कृष्णा था। जो बाद में कृष्णा हठीसिंह कहलायीं।

वे पश्चिमी रहन-सहन और विचारों से बहुत प्रभावित थे, लेकिन गांधीजी के संपर्क में आने के बाद उनके जीवन में एक बड़ा परिर्वतन आया। उन्होंने गांधीजी के आह्वान पर 1919 में अमृतसर के जलियांवाला बाग गोलीकांड के बाद वकालत छोडकर भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में कार्य करना प्रारंभ किया। 1923 में उन्होने देशबंधु चित्तरंजन दास के साथ काँग्रेस पार्टी से अलग होकर अपनी स्वराज पार्टी की स्थापना की। 1928 में कोलकाता में हुए काँग्रेस अधिवेशन के वे अध्यक्ष चुने गये। उनकी कानून पर पकड़ बहुत मजबूत थी। इस वजह से उनकी अध्यक्षता में सन् 1927 में साइमन कमीशन के विरोध में सर्वदलीय सम्मेलन ने एक समिति बनाई, जिसे भारत का संविधान बनाने का दायित्व सौंपा गया। इस समिति की रिपोर्ट को 'नेहरू रिपोर्ट' के नाम से भी जाना जाता है।

04/02/2020

विश्व कैंसर दिवस: 4 फरवरी
दिवस प्रतिवर्ष 4 फरवरी को मनाया जाता है। यह अंतर्राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण संघ (UICC) के द्वारा उठाया गया एक वैश्विक पहल है। अंतर्राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण संघ विश्व का सबसे बड़ा एवं पुराना संगठन है जो कैंसर से लड़ने के लिए क्षमता संवर्धन, सभी घटकों का संयोजन एवं कैंसर से पीड़ित समुदायों को एकजुट करता है। इसके साथ ही है यह विश्व स्वास्थ और विकास के एजेंडे में कैंसर के रोकथाम वाली गतिविधियों को बढ़ावा देता है।
विश्व कैंसर दिवस की थीम:
वर्ष 2019 से वर्ष 2021 के लिए विश्व कैंसर दिवस की थीम है ‘I Am and I Will’.
कैंसर क्या है ?
कैंसर शरीर की कोशिकाओं के समूह की असामान्य एवं अव्यवस्थित वृद्धि है। यदि समय पर जांच व इलाज न हो तो यह शरीर के दूसरे हिस्सों में भी फैल सकता है।
कैंसर क्यों होता है ?
कैंसर हमारी कोशिकाओं के भीतर डी. एन. ए. (आनुवांशिक सामग्री) की क्षति के कारण होता है। डी. एन. ए. की क्षति सभी सामान्य कोशिकाओं में होती रहती है। लेकिन इस क्षति का सुधार हमारे स्वयं के शरीर द्वारा हो जाता है। कभी कभी इस क्षति का सुधार नहीं हो पाता जिससे कोशिकाओं के गुणों में परिवर्तन हो जाते हैं। संचित डीएनए की क्षति अंत में कैंसर को जन्म दे सकती है।

01/02/2020

Remembering the first Indian origin woman to go on a space mission, on her death anniversary.
She continues to be a source of inspiration to many in India and around the world.

30/01/2020

एंटी लेप्रोसी डे: 30 जनवरी
प्रतिवर्ष 30 जनवरी को एंटी लेप्रोसी डे मनाया जाता है। हालांकि विश्व कुष्ठ दिवस प्रतिवर्ष जनवरी महीने के आखरी रविवार को मनाया जाता है। भारत में महात्मा गांधी के कुष्ठ रोग के उन्मूलन के प्रयासों को देखते हुए उन्हें उनके बलिदानी दिवस पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए एंटी लेप्रोसी डे को 30 जनवरी को मनाए जाने का निर्णय लिया गया था।कुष्ठ रोग को हैनसेन रोग के नाम से भी जाना जाता है।
कुष्ठ रोग क्या है?
कुष्ठ रोग दीर्घकालिक संक्रामक रोग है, जो कि बेसिलस, माइकोबैक्टेरियम लेप्री (एम. लेप्री) के कारण होता है।कुष्ठ रोग के रोगाणु की खोज 1873 में हन्सेन ने की थी इसलिए कुष्ठ रोग को 'हन्सेन रोग' भी कहा जाता है। संक्रमण होने के बाद, औसतन पांच वर्ष की लंबी अवधि के बाद सामान्यत: रोग के लक्षण दिखाई देते है, क्योंकि एम. लेप्री धीरे-धीरे बढ़ता है। यह मुख्यत: मानव त्वचा, ऊपरी श्वसन पथ की श्लेष्मिका, परिधीय तंत्रिकाओं, आंखों और शरीर के कुछ अन्य क्षेत्रों को प्रभावित करता है।
रोग को पॉसीबैसीलरी (पीबी) या मल्टीबैसीलरी (एमबी) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, जो कि बैसीलरी लोड पर निर्भर करता है। पीबी कुष्ठ रोग एक हल्का रोग है, जिसे कुछ (अधिकतम पांच) त्वचा के घावों (पीला या लाल) द्वारा पहचाना जाता है। जबकि एमबी कई (अधिक से अधिक) त्वचा के घावों, नोड्यूल, प्लाक/ प्लैक, मोटी त्वचा या त्वचा संक्रमण के साथ जुड़ा है।
रोग कैसे फैलता है?
बैक्टीरिया संचारण के लिए अनुपचारित कुष्ठ रोग- से पीड़ित व्यक्ति एकमात्र ज्ञात स्रोत है।
• श्वसन पथ विशेषकर नाक, संक्रामक व्यक्तियों के शरीर से जीव के बाहर निकलने का प्रमुख मार्ग है।
• रोग का कारण अनुपचारित मामलों के साथ नज़दीकी और लगातार संपर्क के दौरान नाक व मुंह से उत्सर्जित बूंदों द्वारा शरीर में श्वसन प्रणाली के माध्यम से जीव का प्रवेश होता है।
• शरीर में प्रवेश करने के बाद जीव तंत्रिका और त्वचा में चला जाता है।
• यदि शुरुआती चरणों में रोग का पता नहीं लगाया जाता है, तो इससे नसों को नुकसान हो सकता है तथा यह स्थायी विकलांगता उत्पन्न करता है।
कुष्ठ रोग के संकेत और लक्षण क्या हैं?
यदि किसी व्यक्ति में निम्नलिखित संकेत व लक्षण दिखाई देते है, तो कुष्ठ रोग हो सकता है:
• सांवली-चमड़ी वाले लोगों की त्वचा पर हल्के पैच हो सकते हैं, जबकि सफ़ेद, गोरी-चमड़ी वाले लोगों में गहरे या लाल रंग के पैच हो सकते है।
• त्वचा के चकत्तों/धब्बों में संवेदना की कमी या समाप्ति।
• हाथों या पैरों में सुन्नता या झुनझुनी।
• हाथों, पैरों या पलकों की कमजोरी।
• दर्दनाक नसें।
• लोलकी या चेहरे में सूजन या गांठ।
• दर्दरहित घाव या हाथ या पैर जल जाते है।
कुष्ठ रोग के संदेहास्पद के मामलों में क्या किया जाना चाहिए?
कुष्ठ रोग के संकेत एवं लक्षणों की उपस्थिति के मामले में कृपया अपने क्षेत्र की आशा या एएनएम से संपर्क करें या नज़दीकी अस्पताल में जाएं। कुष्ठ रोग का उपचार भारत के सभी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों (डिस्पेंसरी) में नि:शुल्क उपलब्ध है।
एमडीटी (बहु-औषधि उपचार/मल्टीड्रग थेरपी) क्या है?
एमडीटी विभिन्न दवाओं का संयोजन है, क्योंकि किसी एकल एंटीलेप्रोसी दवा के साथ कभी भी कुष्ठ रोग का उपचार नहीं किया जाना चाहिए।
• किसी व्यक्ति को कुष्ठ रोग के टाईप के अनुसार प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्यकर्ता द्वारा प्रस्तावित एमडीटी का पूरा कोर्स करना चाहिए।
• दूरदराज के क्षेत्रों सहित अधिकांश सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में एमडीटी नि:शुल्क उपलब्ध है।
कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम-
राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम (एनएलईपी):
वर्ष 1955 में सरकार ने राष्ट्रीय कुष्ठ रोग नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया था। वर्ष 1982 से मल्टी ड्रग थेरेपी की शुरुआत के बाद, देश से रोग उन्मूलन के उद्देश्य से वर्ष 1983 में इसे राष्ट्रीय कुष्ठ रोग उन्मूलन कार्यक्रम (एनएलईपी) के रूप में बदल दिया गया।
वर्ष 2005 में हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर कुष्ठ रोग का उन्मूलन किया गया है; लेकिन अब भी विश्व के लगभग 57% कुष्ठ रोगी भारत में रहते हैं। कुल 682 जिलों में से 554 जिलों (81.23%) ने मार्च 2017 तक उन्मूलन प्राप्त कर लिया हैं।
रोग के मामले की शीघ्र जानकारी और उपचार ‘रोग उन्मूलन की कुंजी’ है, क्योंकि समुदाय में जल्दी कुष्ठ रोगियों का पता लगाने से समुदाय में संक्रमण के स्रोतों में कमी आएगी और रोग का संचारण भी रूकेगा। आशा रोग के मामलों का पता लगाने में मदद कर रही है तथा सामुदायिक स्तर पर संपूर्ण उपचार भी सुनिश्चित कर रही है; इसके लिए उसे प्रोत्साहन भुगतान दिया जा रहा है।
स्पर्श कुष्ठ जागरूकता अभियान, वर्ष 2018:
स्पर्श कुष्ठ जागरूकता अभियान का आयोजन कुष्ठ रोग के बारे में जागरुकता उत्पन्न करने के लिए 30 जनवरी से 13 फरवरी तक पखवाड़े के दौरान वार्षिक अभियान के रूप में किया गया था।
स्पर्श कुष्ठ उन्मूलन अभियान (एसएलईसी): स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के केंद्रीय कुष्ठ विभाग ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती पर, ‘स्पर्श कुष्ठ उन्मूलन अभियान (एसएलईसी)’ वार्षिक अभियान की शुरूआत की है। इस अभियान का उद्देश्य 2 अक्टूबर वर्ष 2019 तक समाज में छिपे अनुपचारित नए कुष्ठ मामलों का, ग्रेड दो विकलांगता

30/01/2020

सत्य और अहिंसा के प्रेरणा-स्त्रोत परम-पूज्य राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी की पुण्यतिथि पर शत्-शत् नमन💐💐💐💐💐

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Laxmi Nagar
110092

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