31/07/2025
भारत का योगदान और विज्ञान
Teaching is a gift that I cherish, I like involving all you wonderfull poeple in my journey as a tea
31/07/2025
भारत का योगदान और विज्ञान
31/07/2025
देश को विकास की नहीं बल्कि Ai की जरूरत है।
12/03/2020
#सीख
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राधिका और नवीन को आज तलाक के कागज मिल गए थे। दोनो साथ ही कोर्ट से बाहर निकले। दोनो के परिजन साथ थे और उनके चेहरे पर विजय और सुकून के निशान साफ झलक रहे थे। चार साल की लंबी लड़ाई के बाद आज फैसला हो गया था।
दस साल हो गए थे शादी को मग़र साथ मे छः साल ही रह पाए थे।
चार साल तो तलाक की कार्यवाही में लग गए।
राधिका के हाथ मे दहेज के समान की लिस्ट थी जो अभी नवीन के घर से लेना था और नवीन के हाथ मे गहनों की लिस्ट थी जो राधिका से लेने थे।
साथ मे कोर्ट का यह आदेश भी था कि नवीन दस लाख रुपये की राशि एकमुश्त राधिका को चुकाएगा।
राधिका और नवीन दोनो एक ही टेम्पो में बैठकर नवीन के घर पहुंचे। दहेज में दिए समान की निशानदेही राधिका को करनी थी।
इसलिए चार वर्ष बाद ससुराल जा रही थी। आखरी बार बस उसके बाद कभी नही आना था उधर।
सभी परिजन अपने अपने घर जा चुके थे। बस तीन प्राणी बचे थे।नवीन, राधिका और राधिका की माता जी।
नवीन घर मे अकेला ही रहता था। मां-बाप और भाई आज भी गांव में ही रहते हैं।
राधिका और नवीन का इकलौता बेटा जो अभी सात वर्ष का है कोर्ट के फैसले के अनुसार बालिग होने तक वह राधिका के पास ही रहेगा। नवीन महीने में एक बार उससे मिल सकता है।
घर मे परिवेश करते ही पुरानी यादें ताज़ी हो गई। कितनी मेहनत से सजाया था इसको राधिका ने। एक एक चीज में उसकी जान बसी थी। सब कुछ उसकी आँखों के सामने बना था।एक एक ईंट से धीरे धीरे बनते घरोंदे को पूरा होते देखा था उसने।
सपनो का घर था उसका। कितनी शिद्दत से नवीन ने उसके सपने को पूरा किया था।
नवीन थकाहारा सा सोफे पर पसर गया। बोला "ले लो जो कुछ भी चाहिए मैं तुझे नही रोकूंगा"
राधिका ने अब गौर से नवीन को देखा। चार साल में कितना बदल गया है। बालों में सफेदी झांकने लगी है। शरीर पहले से आधा रह गया है। चार साल में चेहरे की रौनक गायब हो गई।
वह स्टोर रूम की तरफ बढ़ी जहाँ उसके दहेज का अधिकतर समान पड़ा था। सामान ओल्ड फैशन का था इसलिए कबाड़ की तरह स्टोर रूम में डाल दिया था। मिला भी कितना था उसको दहेज। प्रेम विवाह था दोनो का। घर वाले तो मजबूरी में साथ हुए थे।
प्रेम विवाह था तभी तो नजर लग गई किसी की। क्योंकि प्रेमी जोड़ी को हर कोई टूटता हुआ देखना चाहता है।
बस एक बार पीकर बहक गया था नवीन। हाथ उठा बैठा था उसपर। बस वो गुस्से में मायके चली गई थी।
फिर चला था लगाने सिखाने का दौर । इधर नवीन के भाई भाभी और उधर राधिका की माँ। नोबत कोर्ट तक जा पहुंची और तलाक हो गया।
न राधिका लोटी और न नवीन लाने गया।
राधिका की माँ बोली" कहाँ है तेरा सामान? इधर तो नही दिखता। बेच दिया होगा इस शराबी ने ?"
"चुप रहो माँ"
राधिका को न जाने क्यों नवीन को उसके मुँह पर शराबी कहना अच्छा नही लगा।
फिर स्टोर रूम में पड़े सामान को एक एक कर लिस्ट में मिलाया गया।
बाकी कमरों से भी लिस्ट का सामान उठा लिया गया।
राधिका ने सिर्फ अपना सामान लिया नवीन के समान को छुवा भी नही। फिर राधिका ने नवीन को गहनों से भरा बैग पकड़ा दिया।
नवीन ने बैग वापस राधिका को दे दिया " रखलो, मुझे नही चाहिए काम आएगें तेरे मुसीबत में ।"
गहनों की किम्मत 15 लाख से कम नही थी।
"क्यूँ, कोर्ट में तो तुम्हरा वकील कितनी दफा गहने-गहने चिल्ला रहा था"
"कोर्ट की बात कोर्ट में खत्म हो गई, राधिका। वहाँ तो मुझे भी दुनिया का सबसे बुरा जानवर और शराबी साबित किया गया है।"
सुनकर राधिका की माँ ने नाक भों चढ़ाई।
"नही चाहिए।
वो दस लाख भी नही चाहिए"
"क्यूँ?" कहकर नवीन सोफे से खड़ा हो गया।
"बस यूँ ही" राधिका ने मुँह फेर लिया।
"इतनी बड़ी जिंदगी पड़ी है कैसे काटोगी? ले जाओ,,, काम आएगें।"
इतना कह कर नवीन ने भी मुंह फेर लिया और दूसरे कमरे में चला गया। शायद आंखों में कुछ उमड़ा होगा जिसे छुपाना भी जरूरी था।
राधिका की माता जी गाड़ी वाले को फोन करने में व्यस्त थी।
राधिका को मौका मिल गया। वो नवीन के पीछे उस कमरे में चली गई।
वो रो रहा था। अजीब सा मुँह बना कर। जैसे भीतर के सैलाब को दबाने दबाने की जद्दोजहद कर रहा हो। राधिका ने उसे कभी रोते हुए नही देखा था। आज पहली बार देखा न जाने क्यों दिल को कुछ सुकून सा मिला।
मग़र ज्यादा भावुक नही हुई।
सधे अंदाज में बोली "इतनी फिक्र थी तो क्यों दिया तलाक?"
"मैंने नही तलाक तुमने दिया"
"दस्तखत तो तुमने भी किए"
"माफी नही माँग सकते थे?"
"मौका कब दिया तुम्हारे घर वालों ने। जब भी फोन किया काट दिया।"
"घर भी आ सकते थे"?
"हिम्मत नही थी?"
राधिका की माँ आ गई। वो उसका हाथ पकड़ कर बाहर ले गई। "अब क्यों मुँह लग रही है इसके? अब तो रिश्ता भी खत्म हो गया"
मां-बेटी बाहर बरामदे में सोफे पर बैठकर गाड़ी का इंतजार करने लगी।
राधिका के भीतर भी कुछ टूट रहा था। दिल बैठा जा रहा था। वो सुन्न सी पड़ती जा रही थी। जिस सोफे पर बैठी थी उसे गौर से देखने लगी। कैसे कैसे बचत कर के उसने और नवीन ने वो सोफा खरीदा था। पूरे शहर में घूमी तब यह पसन्द आया था।"
फिर उसकी नजर सामने तुलसी के सूखे पौधे पर गई। कितनी शिद्दत से देखभाल किया करती थी। उसके साथ तुलसी भी घर छोड़ गई।
घबराहट और बढ़ी तो वह फिर से उठ कर भीतर चली गई। माँ ने पीछे से पुकारा मग़र उसने अनसुना कर दिया। नवीन बेड पर उल्टे मुंह पड़ा था। एक बार तो उसे दया आई उस पर। मग़र वह जानती थी कि अब तो सब कुछ खत्म हो चुका है इसलिए उसे भावुक नही होना है।
उसने सरसरी नजर से कमरे को देखा। अस्त व्यस्त हो गया है पूरा कमरा। कहीं कंही तो मकड़ी के जाले झूल रहे हैं।
कितनी नफरत थी उसे मकड़ी के जालों से?
फिर उसकी नजर चारों और लगी उन फोटो पर गई जिनमे वो नवीन से लिपट कर मुस्करा रही थी।
कितने सुनहरे दिन थे वो।
इतने में माँ फिर आ गई। हाथ पकड़ कर फिर उसे बाहर ले गई।
बाहर गाड़ी आ गई थी। सामान गाड़ी में डाला जा रहा था। राधिका सुन सी बैठी थी। नवीन गाड़ी की आवाज सुनकर बाहर आ गया।
अचानक नवीन कान पकड़ कर घुटनो के बल बैठ गया।
बोला--" मत जाओ,,, माफ कर दो"
शायद यही वो शब्द थे जिन्हें सुनने के लिए चार साल से तड़प रही थी। सब्र के सारे बांध एक साथ टूट गए। राधिका ने कोर्ट के फैसले का कागज निकाला और फाड़ दिया ।
और मां कुछ कहती उससे पहले ही लिपट गई नवीन से। साथ मे दोनो बुरी तरह रोते जा रहे थे।
दूर खड़ी राधिका की माँ समझ गई कि
कोर्ट का आदेश दिलों के सामने कागज से ज्यादा कुछ नही।
काश उनको पहले मिलने दिया होता?
🙏🙏 अगर माफी मांगने से ही रिश्ते टूटने से बच जाए, तो माफ़ी मांग लेनी चाहिए 🙏🙏
08/01/2020
27/11/2019
#जरूर_पढ़ें दुःखद घटना
यह मुम्बई की करोड़पति स्त्री का शव है। एक करोड़पति NRI पुत्र की माँ की लाश है। लगभग 10 माह से 7 करोड़ के फ़्लैट में मरी पड़ी थी। अमेरिका में रहने वाले इंजीनियर ऋतुराज साहनी लंबे अरसे बाद अपने घर मुंबई लौटे, तो घर पर उनका सामना किसी जीवित परिजन की जगह अपनी मां के कंकाल से हुआ। बेटे को नहीं मालूम कि उसकी मां आशा साहनी की मौत कब और किन परिस्थितियों में हुई। आशा साहनी के बुढ़ापे की एकमात्र आशा 'उनके इकलौते बेटे' ने खुद स्वीकार किया कि उसकी मां से आखिरी बातचीत कोई सवा साल पहले बीते साल अप्रैल में हुई थी।
23 अप्रैल 2016 को मां ने ऋुतुराज से कहा था कि बेटा! अब अकेले नहीं रह पाती हूँ। या तो अपने पास अमेरिका बुला लो या फिर मुझे किसी ओल्डएज होम में भेज दो। बेटे ऋतुराज ने आशा साहनी को ढाढस दिया कि मां फिक्र न करे, वह जल्द ही इंडिया आएगा। डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका में किसी भारतीय का नौकरी करना और डालर कमाना आसान नहीं रहा। लिहाजा बेटे ने अपने हिसाब से तो जल्दी ही की होगी, वह सवा साल बाद मॉं से किया वायदा पूरा करने इंडिया आया, पर माँ के हिसाब से देर हो गई और इसी बीच न जाने कब आशा साहनी की मौत हो गई।
रविवार सुबह एयरपोर्ट से घर पहुंचने के बाद ऋतुराज साहनी ने काफी देर तक दरवाजे पर दस्तक दी। जब कोई जवाब नहीं आया तो उन्होंने दरवाजा खुलवाने के लिए एक चाबी बनाने वाले की मदद ली। भीतर घुसे तो उन्हें अपनी 63 साल की मां आशा साहनी का कंकाल मिला।
आशा साहनी 10वें फ्लोर पर बड़े से फ़्लैट में अकेले रहती थीं। उनके पति की मौत 2013 में हो चुकी थी। पुलिस के मुताबिक 10वीं मंजिल पर स्थित दोनों फ्लैट साहनी परिवार के ही हैं, इसलिए शायद पड़ोसियों को कोई बदबू नहीं आई। हालांकि पुलिस के मुताबिक यह भी हैरानी की बात है कि किसी मेड या फिर पड़ोसी ने उनके दिखाई न देने पर गौर क्यों नहीं किया।
बेटे ने अंतिम बार अप्रैल 2016 में बात होने की जानकारी ऐसे दी, मानों वह अपनी मां से कितना रेगुलर टच में था। जैसा कि बेटे से बातचीत में आशा ने संकेत भी किया था कि वह इतनी अशक्त हो चुकी थीं कि उनका अकेले चल-फिर पाना और रहना मुश्किल हो गया था। करोड़ों डालर कमाने वाले बेटे की मां और 12 करोड़ के दो फ़्लैटों की मालकिन आशा साहनी को अंतिम यात्रा तो नसीब नहीं ही हुई, इससे भी बड़ी विडंबना यह हुई, जैसा कि प्रत्यक्षदर्शियों का अनुमान है कि संभवत: आशा की मौत भूख-प्यास के चलते हुई।
भारत के महाराष्ट्र प्रान्त की आर्थिक राजधानी मुंबई के अंधेरी इलाके लोखंडवाला की पाश लोकलिटी 'वेल्स कॉट सोसायटी' में इस अकेली बुजुर्ग महिला की मौत जिन हालात में हुई, उनसे यह साफ है कि कोलंबिया विश्वविद्यालय की रिपोर्ट में छुपी पश्चिमी सभ्यता की त्रासदी हम भारतीयों के दरवाजे पर दस्तक देती लग रही है। इस रिपोर्ट के मुताबिक मौत का इंतजार ही इस सदी की सबसे खौफनाक बीमारी और आधुनिक जीवन शैली की सबसे बड़ी त्रासदी है। अशक्त मां की करुण पुकार सुनकर भी अनसुना कर देने वाला जब अपना इकलौता बेटा ही हो, तब ऐसे समाज में रिश्ते-नातेदारों से क्या अपेक्षा की जाय?
आशा साहनी की मौत ने एक बार फिर चेताया है कि भारत के शहरों में भी सामाजिक ताना-बाना किस कदर बिखर गया है। अब समय नहीं बचा है, अब भारतवर्ष को चेत जाना चाहिए। भारत में भारतीय संस्कृति नहीं बची तो कुछ नहीं बचेगा।
23/07/2019
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लोग राखी का त्यौहार मनाते हैं मगर मेरी पत्नी जान्हवी तो राखी को जी गई. हैपेटाइटिस की बीमारी में उसके छोटे भाई का लिवर देर से बीमारी डायग्नोज होने के कारण पूरी तरह ख़राब हो गया था. बीते शनिवार जब जबलपुर हॉस्पीटल ने हाथ पूरी तरह खड़े कर दिए कि 90%उम्मीद ख़त्म, तो परिवार के बाकी लोगों ने रोना शुरू कर दिया लेकिन जान्हवी ने उस बचे हुए 10% के विकल्प पर फोकस किया.. ये 10% जटिल और बेहद कठिन था लेकिन असंभव नहीं... वो था, एयर एम्बुलेंस के ज़रिए कुछ घंटों में गुड़गांव के मेदांता ले जाना और उतनी ही स्पीड से लिवर ट्रांसप्लांट करना. उसने एयर एम्बुलेंस बुक करने को कहा और खुद लिवर डोनेट का निर्णय लिया.. कुछ घंटो में ही वो उसे लेकर मेदांता पहुँची और अपना लीवर देकर भाई को यमराज के पंजों से छुड़ा लाई. भोपाल से बाय रोड जबलपुर जाना, जबलपुर एयर एम्बुलेंस बुलाना और मेदांता पहुंच कर 24 घंटे के अंदर ट्रांसप्लांट भी करा लेना, वाकई बहुत जीवट का काम था... एम्बुलेंस में अटेंडेंट ज्यादा जा नहीं सकते थे और रूटीन की फ्लाइट भी मुझे नहीं मिली. मैं बेटे के साथ ट्रेन से जब दिल्ली पहुंचा तो ये ओटी में जा चुकी थी. लगभग 14 घंटे के जटिल ऑपरेशन की परमिशन भी डॉक्टर ने मुझसे फोन पर ली और ये बताया भी कुछ भी हो सकता है.. डोनर, रिसीवर दोनों की जान को ख़तरा हो सकता है लेकिन मैं जानता था कि पवित्र उद्देश्य में ईश्वर सदैव सहायक होते हैं, लिहाज़ा मैं चिंतित तो था लेकिन भयभीत नहीं था... तुम वाकई क़माल हो बेटू, शुद्ध अंत:करण वाली निस्वार्थ और चरम तक ईमानदार... रिश्तों और अपने पेशे दोनों के प्रति... मुझे याद पड़ता है कि बेहद समृद्ध आर्थिक पृष्ठभूमि में पली बढ़ी लेकिन मेरे साथ कितने अर्थाभाव को मुस्कुराहट के साथ झेल गई. कभी मेरे ईमान को भी डगमगाने नहीं दिया. यूं तो मैं भी सीधी रीढ़ की हड्डी वाला व्यक्ति हूं लेकिन तुमने भी मुझे लगातार प्रेरित किया कि अभाव झेले जा सकते हैं लेकिन कभी किसी से गैर वाज़िब मदद के लिए न हाथ फैलाना और न ही ऐसी किसी पेशकश को क़बूल करना. सरकार से मांगने पर संभवतः एयर एम्बुलेंस मिल सकती थी या कोई आर्थिक सहायता हो सकती थी लेकिन उसने ऐसे किसी प्रस्ताव पर सोचना तो दूर बल्कि लोगों को सूचना तक देने से मना किया.. ये ठीक है कि मुझे बेहतर संस्कार परिवार से मिले लेकिन उसे लगातार तराशा तुमने.. तुम्हारी बहादुरी, समर्पण और जीवट को सलाम है... चरम तक प्यार तो मैं यूं भी तुम्हें करता था लेकिन अब तुम्हारा स्थान मेरे मन में आदर के सर्वोच्च दर्जे पर रहेगा.. ऐसे दौर में जब कुछ लोग सगे भाई को एक पैकेट दूध देने में नाक भौं सिकोड़ते हों, ऐसे में अपने शरीर का अंग काटकर देेना, तुम्हारी तरह कोई विरला ही कर सकता है.. ईश्वर के प्रसाद के तौर पर तुम मेरे जीवन में आई हो... दीर्घायु रहो, ऐसे ही समर्पण के साथ अपने हर टास्क को पूरा करने का हौसला तुम्हें प्रभु से मिलता रहे... जल्दी पूरी तरह से स्वस्थ्य होकर आओ घर...मेरे ध्यान की दुनिया की समंदर सी शहज़ादी....
04/07/2019
देश को सशक्त विपक्ष देना भी Narendra Modi की ज़िम्मेदारी है। कांग्रेस ने बूढ़ा अध्यक्ष नही बनाया बल्कि उसकी सोच बूढ़ी हो गयी है।
27/06/2019
गिद्ध vs मीडिया.....
12/06/2019
India has made a big difference in its stand and voted in support of a proposal of Israel in the United Nations.This proposal was against an NGO of Palestine.Countries that vote in favor of the proposal include Brazil, Canada, Colombia, France, Germany, India, Ireland, Japan, Korea, Ukraine, Britain, and America. The Council decided to return the NGO's request because in the beginning of this year when the matter was being considered, the NGO failed to present important information.
Hananya Naftali
INDIA 🇮🇳🤝 🇮🇱Israel