31/05/2026
वो शामें अब फिर कभी उसी तरह नहीं आएँगी,
हँसी की गूँजें इन गलियारों में कहीं रह जाएँगी।
ये फ़ासले अब चुपके-चुपके बढ़ते चले जाएँगे,
और दोस्त तस्वीरों में मुस्कुराते नज़र आएँगे।
वो फेस्ट की रातें याद आएँगी,
जहाँ नींद से ज्यादा दोस्ती जगमगाती थी।
अब रातें तो होंगी हर रोज़ मगर,
उनमें वो बात कहाँ रह जाएगी।
वो नाम जो रोज़ पुकारे जाते थे,
अब मोबाइल की स्क्रीन तक सिमट जाएँगे।
जो रिश्ते हर दिन जिए जाते थे,
अब बस यादों में महसूस किए जाएँगे।
ना जाने कितनी बातें अधूरी रह जाएँगी,
कुछ हँसी, कुछ शिकायतें भी साथ जाएँगी।
मगर ये कॉलेज के दिन दिल में यूँ बस जाएँगे,
कि उम्र भर चुपके से याद आएँगे।