12/06/2026
कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी मार्केट की वो दुकान… जहाँ सिर्फ किताबें नहीं, भरोसा भी मिलता था!
अगर आप कभी Kurukshetra University के छात्र रहे हैं, तो संभव है कि आपकी छात्र-जीवन की कहानी में Prism Books & Stationery का भी एक छोटा सा किरदार जरूर रहा हो। कुछ जगहें सिर्फ दुकान नहीं होतीं, वे समय की गवाह बन जाती हैं। कई पुराने विद्यार्थियों को याद होगा कि 1960 और 70 के दशक में यूनिवर्सिटी मार्केट में किताबों की दुकानें गिनी-चुनी थीं। उस दौर में किसी विदेशी लेखक की रेफरेंस बुक मिलना किसी खजाने की तलाश जैसा था। अगर किताब उपलब्ध नहीं होती, तो ऑर्डर देकर मंगवाई जाती थी और छात्र बेसब्री से उसका इंतजार करते थे।
आज जब एक क्लिक पर PDF मिल जाती है, तब शायद नई पीढ़ी उस खुशी को महसूस भी न कर पाए जो नई किताब हाथ में आने पर होती थी। Prism Books की सबसे बड़ी पहचान सिर्फ किताबें नहीं रहीं, बल्कि वह भरोसा रहा है जिसके बारे में कई छात्र आज भी कहते हैं, “जेब में पैसे न भी हों, तो भी किताब मिल जाती थी।” ऐसा भरोसा आज के दौर में कितनी जगह देखने को मिलता है?
Competitive Exams की तैयारी हो, University Course की किताब हो, NIT या KU के किसी विभाग का रेफरेंस मैटेरियल हो, अक्सर जवाब एक ही होता था, “Prism पर मिल जाएगी।” और अगर नहीं मिली, तो जवाब होता था, “दो दिन बाद आकर ले जाना।”
यूनिवर्सिटी के हजारों छात्रों ने यहाँ से अपनी पहली नोटबुक खरीदी होगी, पहला प्रैक्टिकल रिकॉर्ड, पहली प्रतियोगी परीक्षा की किताब और शायद अपने सपनों की शुरुआत भी। मजेदार बात यह भी है कि यहाँ लगभग हर किताब मिल जाती है, लेकिन एक चीज़ कभी नहीं मिलती… मोलभाव (Bargaining) का मौका!
कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी बदल गई, मार्केट बदल गई, पीढ़ियाँ बदल गईं, लेकिन कुछ जगहें आज भी यादों को संभाले खड़ी हैं। Prism Books उन्हीं जगहों में से एक है।
अगर आपने भी कभी Prism Books से किताब खरीदी है, उधार ली है, ऑर्डर करवायी है, या सिर्फ AC से बचने के लिए अंदर खड़े हुए हैं… 😄 तो कमेंट में लिखिए— “Prism Memories ❤️” और बताइए, आपकी सबसे यादगार कहानी क्या है?