16/08/2026
भारत और पाकिस्तान का बंटवारा एक दिन में लिया गया फैसला न था। ये उस सियासी शतरंज का आखिरी दांव था, जो पिछले कई साल से चल रही थी। इसकी बिसात पर पिटने वाली थी बेबस आम जनता। जो बदहवासों की तरह इधर उधर भाग रही थी। बंटवारे का खलनायक मोहम्मद अली जिन्ना को बताया जाता है। इससे ऐतराज भी शायद ही किसी को होगा।
लेकिन, कहानी का दूसरा पहलू भी था। कांग्रेस लंबे समय तक अखंड भारत की बात करती रही, लेकिन आखिर में बंटवारा स्वीकार कर लिया। बीच में महात्मा गांधी थे, जो हमेशा कहते थे कि बंटवारा उनकी लाश पर होगा। सरदार पटेल भी थे और नेहरू भी... हर कोई बंटवारे के सवाल को अलग-अलग नजर से देख रहे थे।
जिन्ना हमेशा से बंटवारे के हक में नहीं थे। कम से कम शुरुआत में तो बिल्कुल नहीं। वो खुद को कांग्रेस का सच्चा सिपाही बताते। 1916 के लखनऊ पैक्ट में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौता कराने में उनकी अहम भूमिका थी। सरोजिनी नायडू ने उन्हें कभी 'हिंदू-मुस्लिम एकता का राजदूत' तक कहा।
लेकिन वक्त के साथ जिन्ना को लगने लगा कि आजाद भारत में मुसलमान कमजोर पड़ जाएंगे, क्योंकि उनकी तादाद हिंदुओं के मुकाबले कम रहेगी। कांग्रेस खुद को पूरे भारत की प्रतिनिधि पार्टी मानती थी। जिन्ना इस दावे को स्वीकार नहीं करते थे। उनके लिए मुस्लिम लीग को मुसलमानों का अलग राजनीतिक प्रतिनिधि मानना जरूरी था।
1937 के चुनावों के बाद यह दूरी और बढ़ गई। कांग्रेस कई प्रांतों में सरकार बनाने में सफल रही। मुस्लिम लीग को वैसी सफलता नहीं मिली, जैसी जिन्ना चाहते थे। यहां से जिन्ना की सोच और पक्की हो गई कि संयुक्त भारत में मुसलमान कमजोर ही रहेंगे, क्योंकि उनकी वोटिंग पावर कम रहेगी। यहीं से उन्होंने मुस्लिम लीग को एक बड़े मुस्लिम राजनीतिक मंच में बदलने की मुहिम तेज कर दी।
फिर 1940 आया। 23 मार्च को लाहौर में मुस्लिम लीग का अधिवेशन हुआ। यहां वह प्रस्ताव पास हुआ जिसे बाद में पाकिस्तान प्रस्ताव कहा गया। इसमें मुस्लिम बहुल इलाकों के लिए अलग राजनीतिक व्यवस्था की मांग रखी गई। पाकिस्तान शब्द प्रस्ताव में नहीं था, लेकिन दिशा साफ हो चुकी थी।
कुछ इतिहासकार मानते हैं कि शुरुआत में जिन्ना देश का बंटवारा नहीं चाहते थे, करीब 1940 तक। वो अलग मुल्क की मांग को बस मोलभाव के हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहते थे। उनका इरादा आजादी के बाद एक कमजोर केंद्रीय सत्ता वाला देश था। इसमें मुस्लिमों के लिए वो अलग व्यवस्था और ज्यादा ताकत के हिमायती थे। शायद कुछ आरक्षण जैसी व्यवस्था।
जिन्ना की इस सोच की झलक 1946 के कैबिनेट मिशन प्लान से भी मिलती है। उन्होंने ऐसे ढांचे को स्वीकार किया था जिसमें भारत ढीला-ढाला संघ (Union) रहता। केंद्र सरकार के पास सिर्फ रक्षा, विदेश नीति और संचार होते। बाकी लगभग सारे अधिकार प्रांतों और उनके ग्रुप के पास रहते।
6 जून 1946 को मुस्लिम लीग ने इस योजना को स्वीकार कर लिया था। जिन्ना को लगता था कि ये व्यवस्था मुस्लिम-बहुल प्रांतों को इतनी स्वायत्तता दे देगी कि भविष्य में वे लगभग पाकिस्तान जैसी स्थिति हासिल कर लेंगे। उन्होंने एक निजी पत्र में लिखा भी था कि पहले ग्रुप बन जाने दें, उसके बाद आगे का रास्ता खुल जाएगा।
लेकिन, शायद कांग्रेस और उसके नेताओं ने जिन्ना की चालाकी को भांप लिया। 10 जुलाई 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि संविधान सभा किसी योजना से बंधी नहीं होगी और उसमें बदलाव कर सकती है। जिन्ना ने इसे कैबिनेट मिशन प्लान की मूल भावना के खिलाफ माना।
इसके बाद मुस्लिम लीग ने योजना से समर्थन वापस ले लिया। उसने 16 अगस्त 1946 को 'डायरेक्ट एक्शन' का ऐलान किया। जिन्ना ने साफ कहा, 'अब हम या तो हमारे पास बंटा हुआ भारत होगा, या फिर बर्बाद भारत।' जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन का मकसद अलग मुल्क के लिए दबाव बनाना था। यहीं से देश में दंगे भड़क गए। सबसे बुरी तरह झुलसा बंगाल।
बंगाल में हिंदू और मुस्लिमों के बीच भीषण हिंसा हुई। कलकत्ता में चार दिनों तक हत्या, आगजनी और लूटपाट चलती रही। इसमें कितने लोग मारे गए, इसका कोई सटीक अनुमान नहीं है। मगर, ज्यादातर इतिहासकारों का अनुमान है कि लगभग 4,000 लोग मारे गए। 10,000 से 15,000 लोग घायल हुए। करीब एक लाख लोग बेघर हुए।
कलकत्ता के दंगों के बाद हिंसा की सिलसिला शुरू हो गया। अक्टूबर 1946 में पूर्वी पाकिस्तान यानी आज बांग्लादेश में नोआखाली में हिंदुओं पर बड़े पैमाने पर हमले हुए। गावों को जलाया गया। महिलाओं पर जुल्म हुए। जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया। महात्मा गांधी खुद नोआखाली पहुंचे। वो गांव-गांव घूमकर माहौल सुधारने की कोशिश कर रहे थे।
इसके जवाब में बिहार में मुसलमानों को निशाना बनाया गया। यहां भी गांव जलाए गए। हजारों मुसलमान मारे गए। फिर पंजाब में भी सांप्रदायिक हिंसा की आग भड़क गई। यहां हिंदू-सिख-मुस्लिम तीनों समुदाय के लोग निशाना बने। शायद ही कोई बड़ा इलाका बचा होगा, जहां हिंदू-मुस्लिमों के बीच हिंसा न हुई होगी।
अब भारत का विभाजन कोई विकल्प नहीं रहा, वो एकदम से अनिवार्य बन गया।
फरवरी 1947 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने लुई माउंटबेटन को भारत का आखिरी वायसराय नियुक्त किया। उनका स्पष्ट मिशन था... भारत में ब्रिटिश हुकूमत खत्म करना और सत्ता का हस्तांतरण कराना। वैसे माउंटबेटन को भारत भेजने का फैसला सिर्फ प्रशासनिक नहीं था। वे किंग जॉर्ज VI के रिश्तेदार थे। करिश्माई शख्सियत के लिए जाने जाते थे। एटली सरकार को भरोसा था कि वे गांधी, नेहरू, जिन्ना और पटेल जैसे नेताओं से व्यक्तिगत स्तर पर बेहतर तालमेल बैठा सकेंगे।
माउंटबेटन ने 3 जून 1947 को विभाजन की योजना यानी माउंटबेटन प्लान की घोषणा की। हालांकि, महात्मा गांधी आखिर तक भारत को अखंड रखने के हक में थे। जब विभाजन लगभग तय लग रहा था, तो गांधी ने माउंटबेटन को एक चौंकाने वाला सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि जिन्ना को पूरे भारत की अंतरिम सरकार बनाने का मौका दे दीजिए, बस देश मत बांटिए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस इसका पूरा समर्थन करेगी।
हालांकि, कांग्रेस के बाकी नेता इससे सहमत नहीं थे। न नेहरू, न पटेल और न कोई और। इसलिए ये प्रस्ताव कभी जिन्ना तक औपचारिक रूप से नहीं पहुंचाया गया। नेहरू ने माउंटबेटन से निजी तौर पर कहा कि हम सिर काटकर सिरदर्द से छुटकारा पा लेंगे। यहां शायद सिर पाकिस्तान था, और सिरदर्द जिन्ना। पटेल भी पहले संयुक्त भारत के हक में थे। लेकिन, दंगों के बाद उन्होंने कहा कि देश को लगातार खून-खराबे में झोंकने से बेहतर है, 'कठिन फैसला' स्वीकार किया जाए।
जब विभाजन तय हो गया, तो जिन्ना चाहते थे कि उन्हें पूरा बंगाल और पंजाब मिले। सरदार पटेल ने कहा कि जिन्ना कट-पिटा पाकिस्तान नहीं चाहते, लेकिन लेना उन्हें कट-पिटा पाकिस्तान ही पड़ेगा। और हुआ भी यही। दोनों राज्यों के मुस्लिम बहुल हिस्से पाकिस्तान में गए, और हिंदू बहुल भारत में। कुछ अपवादों को छोड़कर। इसके बाद 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान अलग मुल्क बनकर आजाद हुआ। और 15 अगस्त को भारत को आजादी मिली।
फिर सबकुछ शांत नहीं था, क्योंकि ये बंटवारा अधूरी तैयारी के साथ जल्दबाजी में किया गया था। अमृतसर की एक गली में रातों-रात दरवाजों पर निशान बनने लगे थे। लाहौर में लोग यह समझ ही नहीं पा रहे थे कि कुछ दिनों बाद उनका शहर किस देश में होगा। कलकत्ता में सड़कों पर दंगे हो रहे थे। दिल्ली में सत्ता हस्तांतरण की तैयारियां चल रही थीं। और कराची में एक नया देश बनने की उलटी गिनती शुरू हो चुकी थी।
लेकिन, सबसे अजीब बात यह थी कि जिस सरहद के नाम पर लाखों लोग घर छोड़ने वाले या छोड़ रहे थे, उसकी आखिरी लकीर अभी खिंची भी नहीं थी। वो लकीर खिंचने वाली थी आजादी के दो दिन बाद यानी 17 अगस्त 1947 को। उसे खींचने वाले शख्स थे सर सिरिल जॉन रैडक्लिफ। उस शख्स ने कभी भारत देखा नहीं था। उसने नक्शे पर बंटवारे की लाइन ऐसे खींची, जब बच्चे अपनी रफ कॉपी पर खींचते हैं। किसी का घर भारत में, तो खेती पाकिस्तान में। किसी नलकूप पाकिस्तान में, तो जमीन भारत में।
और देश का विभाजन लाशों की ढेर पर हुआ। इतिहासकारों का मानना है कि इस बंटवारे के दौरान हिंसा में 10 से 15 लाख लोगों की मौत हुई। 1.4 से 1.8 करोड़ लोग विस्थापित हुए। यह इंसानी इतिहास के सबसे बड़े पलायनों में से एक था। और शायद सबसे भयावह और दर्दनाक भी।