Hadoti Classes, Kota Jn.

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18/12/2025

क्या आपने कभी पढ़ा है कि हल्दीघाटी के बाद अगले १० साल में मेवाड़ में क्या हुआ..इतिहास से जो पन्ने हटा दिए गए हैं उन्हें वापस संकलित करना ही होगा क्यूंकि वही हिन्दू रेजिस्टेंस और शौर्य के प्रतीक हैं. इतिहास में तो ये भी नहीं पढ़ाया गया है की हल्दीघाटी युद्ध में जब महाराणा प्रताप ने कुंवर मानसिंह के हाथी पर जब प्रहार किया तो शाही फ़ौज पांच छह कोस दूर तक भाग गई थी और अकबर के आने की अफवाह से पुनः युद्ध में सम्मिलित हुई है. ये वाकया अबुल फज़ल की पुस्तक अकबरनामा में दर्ज है.

क्या हल्दी घाटी अलग से एक युद्ध था..या एक बड़े युद्ध की छोटी सी घटनाओं में से बस एक शुरूआती घटना..महाराणा प्रताप को इतिहासकारों ने हल्दीघाटी तक ही सिमित करके मेवाड़ के इतिहास के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है. वास्तविकता में हल्दीघाटी का युद्ध , महाराणा प्रताप और मुगलो के बीच हुए कई युद्धों की शुरुआत भर था. मुग़ल न तो प्रताप को पकड़ सके और न ही मेवाड़ पर अधिपत्य जमा सके. हल्दीघाटी के बाद क्या हुआ वो हम बताते हैं.

हल्दी घाटी के युद्ध के बाद महाराणा के पास सिर्फ 7000 सैनिक ही बचे थे..और कुछ ही समय में मुगलों का कुम्भलगढ़, गोगुंदा , उदयपुर और आसपास के ठिकानों पर अधिकार हो गया था. उस स्थिति में महाराणा ने “गुरिल्ला युद्ध” की योजना बनायीं और मुगलों को कभी भी मेवाड़ में सेटल नहीं होने दिया. महराणा के शौर्य से विचलित अकबर ने उनको दबाने के लिए 1576 में हुए हल्दीघाटी के बाद भी हर साल 1577 से 1582 के बीच एक एक लाख के सैन्यबल भेजे जो कि महाराणा को झुकाने में नाकामयाब रहे.

हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात् महाराणा प्रताप के खजांची भामाशाह और उनके भाई ताराचंद मालवा से दंड के पच्चीस लाख रुपये और दो हज़ार अशर्फिया लेकर हाज़िर हुए. इस घटना के बाद महाराणा प्रताप ने भामाशाह का बहुत सम्मान किया और दिवेर पर हमले की योजना बनाई। भामाशाह ने जितना धन महाराणा को राज्य की सेवा के लिए दिया उस से 25 हज़ार सैनिकों को 12 साल तक रसद दी जा सकती थी. बस फिर क्या था..महाराणा ने फिर से अपनी सेना संगठित करनी शुरू की और कुछ ही समय में 40000 लडाकों की एक शक्तिशाली सेना तैयार हो गयी.

उसके बाद शुरू हुआ हल्दीघाटी युद्ध का दूसरा भाग जिसको इतिहास से एक षड्यंत्र के तहत या तो हटा दिया गया है या एकदम दरकिनार कर दिया गया है. इसे बैटल ऑफ़ दिवेर कहा गया गया है.

बात सन १५८२ की है, विजयदशमी का दिन था और महराणा ने अपनी नयी संगठित सेना के साथ मेवाड़ को वापस स्वतंत्र कराने का प्रण लिया. उसके बाद सेना को दो हिस्सों में विभाजित करके युद्ध का बिगुल फूंक दिया..एक टुकड़ी की कमान स्वंय महाराणा के हाथ थी दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे. कर्नल टॉड ने भी अपनी किताब में हल्दीघाटी को Thermopylae of Mewar और दिवेर के युद्ध को राजस्थान का मैराथन बताया है. ये वही घटनाक्रम हैं जिनके इर्द गिर्द आप फिल्म 300 देख चुके हैं. कर्नल टॉड ने भी महाराणा और उनकी सेना के शौर्य, तेज और देश के प्रति उनके अभिमान को स्पार्टन्स के तुल्य ही बताया है जो युद्ध भूमि में अपने से 4 गुना बड़ी सेना से यूँ ही टकरा जाते थे.

दिवेर का युद्ध बड़ा भीषण था, महाराणा प्रताप की सेना ने महाराजकुमार अमर सिंह के नेतृत्व में दिवेर थाने पर हमला किया , हज़ारो की संख्या में मुग़ल, राजपूती तलवारो बरछो भालो और कटारो से बींध दिए गए। युद्ध में महाराजकुमार अमरसिंह ने सुलतान खान मुग़ल को बरछा मारा जो सुल्तान खान और उसके घोड़े को काटता हुआ निकल गया.उसी युद्ध में एक अन्य राजपूत की तलवार एक हाथी पर लगी और उसका पैर काट कर निकल गई। महाराणा प्रताप ने बहलेखान मुगल के सर पर वार किया और तलवार से उसे घोड़े समेत काट दिया। शौर्य की ये बानगी इतिहास में कहीं देखने को नहीं मिलती है. उसके बाद यह कहावत बनी की मेवाड़ में सवार को एक ही वार में घोड़े समेत काट दिया जाता है.ये घटनाये मुगलो को भयभीत करने के लिए बहुत थी। बचे खुचे ३६००० मुग़ल सैनिकों ने महाराणा के सामने आत्म समर्पण किया. दिवेर के युद्ध ने मुगलो का मनोबल इस तरह तोड़ दिया की जिसके परिणाम स्वरुप मुगलों को मेवाड़ में बनायीं अपनी सारी 36 थानों, ठिकानों को छोड़ के भागना पड़ा, यहाँ तक की जब मुगल कुम्भलगढ़ का किला तक रातो रात खाली कर भाग गए.

दिवेर के युद्ध के बाद प्रताप ने गोगुन्दा , कुम्भलगढ़ , बस्सी, चावंड , जावर , मदारिया , मोही , माण्डलगढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण ठिकानो पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद भी महाराणा और उनकी सेना ने अपना अभियान जारी रखते हुए सिर्फ चित्तौड़ कोछोड़ के मेवाड़ के सारे ठिकाने/दुर्ग वापस स्वतंत्र करा लिए.

अधिकांश मेवाड़ को पुनः कब्जाने के बाद महाराणा प्रताप ने आदेश निकाला की अगर कोई एक बिस्वा जमीन भी खेती करके मुसलमानो को हासिल (टैक्स) देगा , उसका सर काट दिया जायेगा। इसके बाद मेवाड़ और आस पास के बचे खुचे शाही ठिकानो पर रसद पूरी सुरक्षा के साथ अजमेर से मगाई जाती थी.

दिवेर का युद्ध न केवल महाराणा प्रताप बल्कि मुगलो के इतिहास में भी बहुत निर्णायक रहा। मुट्ठी भर राजपूतो ने पुरे भारतीय उपमहाद्वीप पर राज करने वाले मुगलो के ह्रदय में भय भर दिया। दिवेर के युद्ध ने मेवाड़ में अकबर की विजय के सिलसिले पर न सिर्फ विराम लगा दिया बल्कि मुगलो में ऐसे भय का संचार कर दिया की अकबर के समय में मेवाड़ पर बड़े आक्रमण लगभग बंद हो गए.

इस घटना से क्रोधित अकबर ने हर साल लाखों सैनिकों के सैन्य बल अलग अलग सेनापतियों के नेतृत्व में मेवाड़ भेजने जारी रखे लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली. अकबर खुद 6 महीने मेवाड़ पर चढ़ाई करने के मकसद से मेवाड़ के आस पास डेरा डाले रहा लेकिन ये महराणा द्वारा बहलोल खान को उसके घोड़े समेत आधा चीर देने के ही डर था कि वो सीधे तौर पे कभी मेवाड़ पे चढ़ाई करने नहीं आया.

ये इतिहास के वो पन्ने हैं जिनको दरबारी इतिहासकारों ने जानबूझ कर पाठ्यक्रम से गायब कर दिया है. जिन्हें अब वापस करने का प्रयास किया जाना चाहिए .

05/12/2025

1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने और ठीक छः दिन बाद दो वैज्ञानिक अब्दुल कलाम और चिदंबरम को अपने ऑफिस बुलाया। वाजपेयी ने धीमी आवाज मे पूछा क्या आप दोनों परमाणु परिक्षण के लिये तैयार है? दोनों ने हामी भरी तो वाजपेयी ने कहा कि बुद्ध पूर्णिमा की पूजन इस बार आप दोनों ही करेंगे।

परमाणु परिक्षण के लिये राजस्थान का पोखरण चुना गया, मटेरियल पूरा मुंबई मे रखा था। रात के दो बजे मुंबई मे सामान लोड करके एयरपोर्ट लाया गया, रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नाडीज पूरी रात नहीं सोये।

यदि एक भी कन्टेनर फट जाता तो पूरा मुंबई शहर शमशान बन जाता, ये सामग्री मुंबई से जैसलमेर के रास्ते पोखरण साइट पहुंची। अमेरिकी सेटेलाइट से बचने के लिये टीम मुश्किल से चंद मिनट ही काम कर पाती थी।

हमारे वैज्ञानिको ने अपार कष्ट सहकर काम किया, अपार इसलिए कि उन्हें तपते रेगिस्तान मे सेना की भारी वर्दी पहननी पड़ी जिसके वे आदि नहीं थे।

दिल्ली मुंबई मे रहे वैज्ञानिको को राजस्थान की गर्मी असहनीय थी, लेकिन बावजूद इसके काम शीघ्रता से किया गया। दूसरा डर यह भी था कि वाजपेयी की गठबंधन की सरकार बड़ी मुश्किल से चल रही थी।

ऐसे मे यदि सरकार गिर जाती तो ये परिक्षण फिर सालो पीछे हो जाता। आखिर 11 मई का दिन आया, उस दिन वाजपेयी, आडवाणी, जसवंत सिंह और जॉर्ज फर्नाडीज प्रधानमंत्री आवास पर एकदम शांत बैठे थे।

दिल्ली के गरम माहौल से दूर पोखरण मे आखिर परमाणु परिक्षण हुआ, धरती डोल गयी, दो फुटबाल मैदान के बराबर का गड्ढा हो गया। कलाम और चिदंबरम को चक़्कर आने लगे दोनों ने एक दूसरे को संभाला और बाहर आये।

वैज्ञानिको ने जैसे ही चिदंबरम और कलाम को देखा तो भारत माता की जय का नारा लगाना शुरू कर दिया, कलाम और चिदंबरम हर नारे पर जय बोल रहे थे। दिल्ली खबर आयी तो चारो नेता रो पड़े मगर किसी ने किसी को बधाई नहीं दी।

इसके बाद वाजपेयी का वो 15 आवर्स 45 मिनट वाला भाषण इतिहास लिख गया, 13 मई को फिर दो धमाके किये गए और वाजपेयी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा "अब भारत परमाणु शक्ति बन चुका है"

लेकिन इसके तुरंत बाद अमेरिका के प्रतिबंधों की बारिश शुरू हो गयी, जापान ने भारत के सारे बॉन्ड फ्रीज कर दिये, कनाडा ने तो अपने डिप्लोमेट तक बुलाने का फैसला कर लिया। संयुक्त राष्ट्र तक मुद्दा गया।

ब्रिटेन, फ़्रांस और रूस ने इस पर किसी भी प्रकार की बात करने से मना कर दिया, हालांकि ब्रिटेन राष्ट्रीय स्तर पर भारत के खिलाफ था मगर संयुक्त राष्ट्र मे उसने चुप्पी साधकर भारत का साथ दिया।
देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले ऐसे महान लोगों को शत शत नमन




27/07/2025

साल था 1528, जगह थी चंदेरी, मध्य भारत का एक पहाड़ी क़िला — घने जंगलों, ऊँची चट्टानों और बहादुरों की कहानियों से घिरा हुआ।

ये सिर्फ एक क़िला नहीं था, ये उस समय की राजपूताना शान का एक प्रतीक था।
यहाँ राज कर रहे थे मेदनी राय — एक राजपूत योद्धा, जो किसी रियासत के राजा से ज़्यादा, एक सेनानी दिल के मालिक थे। और ये क़िला अब एक बहुत बड़ी सियासी लड़ाई का हिस्सा बनने वाला था।

बाबर, जिसने 1526 में पानीपत में इब्राहीम लोदी को हराकर दिल्ली की सत्ता अपने नाम की, अब पूरे उत्तर भारत में अपनी हुकूमत जमाने निकला था।

लेकिन रास्ता आसान नहीं था।

1527 में राणा सांगा को खानवा की लड़ाई में हराने के बाद भी, बाबर जानता था कि राजपूताना की आत्मा अभी ज़िंदा है।
उस आत्मा का नाम था — चंदेरी।
और बाबर जानता था — जब तक चंदेरी उसके क़ब्ज़े में नहीं आता, हिंदुस्तान उसके हाथ में पूरी तरह नहीं होगा।

बाबर ने चंदेरी को तीनों दिशाओं से घेर लिया।
चारों ओर से तोपें, घोड़े, अफगानी घुड़सवार और तुर्की सैनिक।

उसने मेदनी राय को एक प्रस्ताव भेजा —

"या तो तुम दोस्ती स्वीकार करो, या फिर जंग।"

मेदनी राय ने आत्मसमर्पण से इंकार किया।

जनवरी 1528 की एक सुबह।
चंदेरी की चट्टानों पर कोहरे की चादर थी, पर क़िले के अंदर तलवारों की खनक और फ़ौजी नारों की गूंज थी।

बाबर की सेना ने क़िले की बाहरी दीवारें तोड़ दीं।
तोपों से पत्थरों को उड़ाया गया, सीढ़ियों से सैनिक चढ़े और घातक लड़ाई शुरू हुई।

राजपूतों ने भी हार नहीं मानी।
हर गली, हर मोड़, हर दरवाज़े पर लड़ाई हुई।

जब मेदनी राय ने देखा कि अब क़िला नहीं बचने वाला —
तो उन्होंने वो किया, जो राजपूत इतिहास की सबसे दिल दहला देने वाली परंपरा है — जौहर।

महिलाओं ने आग का अलाव जलाया।
राजपूत पत्नियाँ, माताएँ, बेटियाँ — अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए आग में कूद पड़ीं।

और फिर, मेदनी राय और उनके साथी — आखिरी सांस तक लड़े और मारे गए।

बाबर ने युद्ध तो जीत लिया, लेकिन बाबरनामा में उसने खुद लिखा:

"हमने क़िला तो ले लिया, लेकिन जो दृश्य वहाँ देखा — उसे बयान करना मुश्किल है।"

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27/07/2025

इतिहास में छुपाया गया एक सच ....
45 साल के महात्मा गाँधी 1915 में भारत आते हैं, 2 दशक से भी ज्यादा दक्षिण अफ्रीका में बिता कर। इससे 4 साल पहले 28 वर्ष का एक युवक अंडमान में एक कालकोठरी में बन्द होता है। अंग्रेज उससे दिन भर कोल्हू में बैल की जगह हाँकते हुए तेल पेरवाते हैं, रस्सी बटवाते हैं और छिलके कूटवाते हैं। वो तमाम कैदियों को शिक्षित कर रहा होता है, उनमें राष्ट्रभक्ति की भावनाएँ प्रगाढ़ कर रहा होता है और साथ ही दीवालों कर कील, काँटों और नाखून से साहित्य की रचना कर रहा होता है। उसका नाम था- विनायक दामोदर सावरकर।

उन्हें कई बार आत्महत्या के ख्याल आते। उस खिड़की की ओर एकटक देखते रहते थे, जहाँ से अन्य कैदियों ने पहले आत्महत्या की थी। पीड़ा असह्य हो रही थी। यातनाओं की सीमा पार हो रही थी। अंधेरा उन कोठरियों में ही नहीं, दिलोदिमाग पर भी छाया हुआ था। दिन भर बैल की जगह कोल्हू घुमाते रहो, रात को करवट बदलते रहो। 11 साल ऐसे ही बीते। कैदी उनकी इतनी इज्जत करते थे कि मना करने पर भी उनके बर्तन, कपड़े वगैरह धो देते थे, उनके काम में मदद करते थे। सावरकर से अँग्रेज बाकी कैदियों को दूर रखने की कोशिश करते थे। अंत में बुद्धि को विजय हुई तो उन्होंने अन्य कैदियों को भी आत्महत्या से विमुख किया।
लेकिन नहीं, महा गँवारों का कहना है कि सावरकर ने मर्सी पेटिशन लिखा, सॉरी कहा, माफ़ी माँगी।
अरे मूर्खों, काकोरी कांड में फँसे क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल ने भी माफ़ी माँगी थी, तो? उन्हें भी 'डरपोक' करार दोगे? बताओ। उन्होंने भी माफ़ी माँगी थी अंग्रेजों से। क्या अब इस कसौटी पर क्रांतिकारियों को तौला जाएगा? शेर जब बड़ी छलाँग लगाता है तो कुछ कदम पीछे लेता ही है। उस समय उनके मन में क्या था, आगे की क्या रणनीति थी- ये आज कुछ लोग अपने घरों में बैठे-बैठे जान जाते हैं।
कौन ऐसा स्वतंत्रता सेनानी है जिसे 11 साल कालापानी की सज़ा मिली हो। नेहरू? गाँधी? .....कौन?
नानासाहब पेशवा, महारानी लक्ष्मीबाई और वीर कुँवर सिंह जैसे कितने ही वीर इतिहास में दबे हुए थे। 1857 को सिपाही विद्रोह बताया गया था। तब इसके पर्दाफाश के लिए 20-22 साल का एक युवक लंदन की एक लाइब्रेरी का किसी तरह एक्सेस लेकर और दिन-रात लग कर अँग्रेजों के एक के बाद एक दस्तावेज पढ़ कर सच्चाई की तह तक जा रहा था, जो भारतवासियों से छिपाया गया था। उसने साबित कर दिया कि वो सैनिक विद्रोह नहीं, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था। उसके सभी अमर बलिदानियों की गाथा उसने जन-जन तक पहुँचाई। भगत सिंह सरीखे क्रांतिकारियों ने मिल कर उसे पढ़ा, अनुवाद किया।
दुनिया में कौन सी ऐसी किताब है जिसे प्रकाशन से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया गया था? अँग्रेज कितने डरे हुए थे उससे कि हर वो इंतजाम किया गया, जिससे वो पुस्तक भारत न पहुँचे। जब किसी तरह पहुँची तो क्रांति की ज्वाला में घी की आहुति पड़ गई। कलम और दिमाग, दोनों से अँग्रेजों से लड़ने वाले सावरकर थे। दलितों के उत्थान के लिए काम करने वाले सावरकर थे। 11 साल कालकोठरी में बंद रहने वाले सावरकर थे। हिंदुत्व को पुनर्जीवित कर के राष्ट्रवाद की अलख जगाने वाले सावरकर थे। साहित्य की विधा में पारंगत योद्धा सावरकर थे।
आज़ादी के बाद क्या मिला उन्हें? अपमान नेहरू व मौलाना अबुल कलाम जैसों ने तो मलाई चाटी सत्ता की, सावरकर को गाँधी हत्या केस में फँसा दिया। गिरफ़्तार किया। पेंशन तक नहीं दिया। प्रताड़ित किया। 60 के दशक में उन्हें फिर गिरफ्तार किया, प्रतिबंध लगा दिया। उन्हें सार्वजनिक सभाओं में जाने से मना कर दिया गया। ये सब उसी भारत में हुआ, जिसकी स्वतंत्रता के लिए उन्होंने अपना जीवन खपा दिया। आज़ादी के मतवाले से उसकी आज़ादी उसी देश में छीन ली गई, जिसे उसने आज़ाद करवाने में योगदान दिया था। शास्त्री जी PM बने तो उन्होंने पेंशन का जुगाड़ किया।
वो कालापानी में कैदियों को समझाते थे कि धीरज रखो, एक दिन आएगा जब ये जगह तीर्थस्थल बन जाएगी। आज भले ही हमारा पूरे विश्व में मजाक बन रहा हो, एक समय ऐसा होगा जब लोग कहेंगे कि देखो, इन्हीं कालकोठरियों में हिंदुस्तानी कैदी बन्द थे। सावरकर कहते थे कि तब उन्हीं कैदियों की यहाँ प्रतिमाएँ होंगी। आज आप अंडमान जाते हैं तो सीधा 'वीर सावरकर इंटरनेशनल एयरपोर्ट' पर उतरते हैं। सेल्युलर जेल में उनकी प्रतिमा लगी है। उस कमरे में प्रधानमंत्री भी जाकर ध्यान धरते हैं, जिसमें वीर सावरकर को रखा गया था।

नमन वीर सावरकर जी

26/07/2025

"ऊँठाला युद्ध का रोचक वर्णन"

17वीं सदी की शुरुआत में मुगल सिपहसलार कायम खां मेवाड़ के ऊँठाळे दुर्ग में तैनात था। इस युद्ध को मेवाड़ के इतिहास में विशेष स्थान प्राप्त है। इसका सबसे अहम कारण था चुण्डावतों व शक्तावतों में हरावल में रहने की होड़।

मेवाड़ की हरावल अर्थात सेना की अग्रिम पंक्ति में रहकर लड़ने का अधिकार चुण्डावतों को प्राप्त था। जब महाराणा अमरसिंह ने ऊँठाळे दुर्ग पर आक्रमण करने की बात दरबार में की, तब वहां मौजूद महाराज शक्तिसिंह के पुत्र बल्लू शक्तावत ने महाराणा से अर्ज किया कि

"हुकम, मेवाड़ की हरावल में रहने का अधिकार केवल चुंडावतों को ही क्यों है, क्या हम शक्तावत किसी मामले में पीछे हैं ?"

तभी दरबार में मौजूद रावत कृष्णदास चुंडावत के पुत्र रावत जैतसिंह चुंडावत ने कहा कि "मेवाड़ की हरावल में रहकर लड़ने का अधिकार चुंडावतों के पास पीढ़ियों से है।"

महाराणा अमरसिंह के सामने दुविधा खड़ी हो गई, क्योंकि वे दोनों को ही नाराज नहीं कर सकते थे। सोच विचारकर महाराणा अमरसिंह ने इस समस्या का एक हल निकाला।

महाराणा अमरसिंह ने कहा कि "आप दोनों शक्तावतों और चुंडावतों की एक-एक सैनिक टुकड़ी का नेतृत्व करो और अलग-अलग रास्तों से ऊँठाळे दुर्ग में जाने का प्रयास करो। दोनों में से जो भी ऊँठाळे दुर्ग में सबसे पहले प्रवेश करेगा, वही हरावल में रहने का अधिकारी होगा"

महाराणा अमरसिंह ने खुद इस महायुद्ध का नेतृत्व किया। महाराणा के नेतृत्व में 10,000 मेवाड़ी वीरों ने ऊँठाळे गांव में प्रवेश किया, जहां मुगलों से लड़ाई हुई।

इस लड़ाई में सैंकड़ों मुगल मारे गए। मुगल सेना ने भागकर ऊँठाळे दुर्ग में प्रवेश किया। मेवाड़ी सेना ने ऊँठाळे दुर्ग को घेर लिया।

दुर्ग में प्रवेश करने के लिए बल्लू शक्तावत दुर्ग के द्वार के सामने आए और अपने हाथी को आदेश दिया कि द्वार को टक्कर मारे पर लोहे की कीलें होने से हाथी ने द्वार को टक्कर नहीं मारी।

बल्लू जी द्वार की कीलों को पकड़ कर खड़े हो गए और महावत से कहा कि हाथी को मेरे शरीर पर हूल दे। हाथी ने बल्लू जी के टक्कर मारी, जिससे बल्लू जी नुकीली कीलों से टकराकर वीरगति को प्राप्त हुए। द्वार टूट गया और द्वार के साथ-साथ बल्लू जी भी किले के भीतर गिर पड़े। बल्लू जी के इस बलिदान के बावजूद वे हरावल का अधिकार नहीं ले सके।

रावत जैतसिंह चुण्डावत सीढियों के सहारे ऊपर चढ रहे थे। ऊपर पहुंचते ही मुगलों की बन्दूक से निकली एक गोली रावत जैतसिंह की छाती में लगी, जिससे वे सीढ़ी से गिरने लगे, तभी उन्होंने अपने साथियों से कहा कि मेरा सिर काटकर दुर्ग के अन्दर फेंक दो। साथियों ने ठीक वैसा ही किया।

शक्तावतों ने जैसे ही गढ़ का द्वार तोड़ा तो देखा कि जैतसिंह जी का सिर पहले ही किले में पड़ा है। इस तरह किले में पहले प्रवेश करने के कारण हरावल का नेतृत्व चुण्डावतों के अधिकार में ही रहा।

महाराणा अमरसिंह ने अपने हाथों से कायम खां को मारा और मेवाड़ी वीरों ने ऊँठाळे दुर्ग पर ऐतिहासिक विजय प्राप्त की। इस युद्ध में कई मुगल मारे गए व महाराणा अमरसिंह ने बचे खुचे मुगलों को कैद किया।

मेवाड़ के राजपूतों का ये अतिउत्साह ही इस युद्ध में उन्हें विजय दिलवा सका, वरना उस समय मुगलों से किला जीतना असाधारण कार्य था।

1952 ई. में ऊँठाला का नाम सरदार वल्लभ भाई पटेल के नाम पर वल्लभनगर रख दिया गया।

पोस्ट लेखक :- तनवीर सिंह सारंगदेवोत (लक्ष्मणपुरा - मेवाड़)

Photos from Hadoti Classes, Kota Jn.'s post 25/07/2025

ऐसे अद्भुत 1500 से भी ज्यादा मंदिरों का निर्माण करवाने बाला शक्तिशाली हिंदू राजवंश
#होयसल इतिहास की किताबों से गायब क्यों?

यह कठोर पत्थरों पर शानदार नक्काशी आज
आधुनिक युग मे विना मशीनों के असंभव है जो
हजारों साल पहलें हमारे पूर्वज कर गए।

#श्रीचैन्नाकेशव सोमनाथपुरा कर्नाटक।

11/07/2025

ब्राह्मी लिपि भारत की प्राचीनतम ज्ञात लिपि है, और इसे भारतीय लेखन परंपरा की जननी भी कहा जाता है। यह लिपि अनेक भाषाओं और लिपियों की जननी भी है।
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कौन-कौन सी भाषाएं ब्राह्मी में लिखी गईं?

1. प्राकृत भाषाएं

अशोक के समय मुख्यतः मगधी प्राकृत में शिलालेख लिखे गए।
आगे चलकर अन्य प्राकृतें जैसे शौरसेनी, महाराष्ट्री आदि भी ब्राह्मी में लिखी गईं।

2. संस्कृत

प्रारंभिक काल में संस्कृत के लेखन में ब्राह्मी का प्रयोग बहुत कम था, लेकिन शुंग और गुप्त काल में संस्कृत का प्रयोग बढ़ा और उसे ब्राह्मी में ही लिखा गया।

3. तमिल भाषा (तमिल ब्राह्मी)

तमिल ब्राह्मी, ब्राह्मी लिपि का ही एक स्थानीय रूप है, जो दक्षिण भारत में तमिल भाषा को लिखने के लिए उपयोग किया गया।
पुरातत्विक प्रमाण जैसे केरल के पांडवन पैराई, अरणी, पुथुक्कोट्टई, आदि में मिले शिलालेख इस बात को सिद्ध करते हैं।

4. पाली

पाली भाषा में लिखे गए कई ग्रंथ ब्राह्मी लिपि में थे।

बाद में श्रीलंका में ब्राह्मी से सिंहली लिपि का विकास हुआ।
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ब्राह्मी से उत्पन्न लिपियाँ

ब्राह्मी लिपि ने भारत ही नहीं, पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में अन्य लिपियों को जन्म दिया:

ब्राह्मी की संतति लिपियाँ उपयोग क्षेत्र

गुप्त लिपि - गुप्तकालीन भारत
शारदा - कश्मीर
सिद्धम - पूर्वी भारत व चीन, जापान
नागरी → देवनागरी संस्कृत, हिंदी, मराठी आदि
बंगला - बंगाल, असम
कन्नड़ - कर्नाटक
तेलुगु - आंध्रप्रदेश
सिंहली - श्रीलंका
खमेर, बर्मी, थाई, जावानीस दक्षिण-पूर्व एशिया
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ब्राह्मी लिपि भारत की सबसे प्राचीन और मूल लेखन प्रणाली है, जिसका प्रभाव भारत और दक्षिण एशिया की लगभग सभी प्रमुख लिपियों पर पड़ा है।

इस लिपि का उपयोग प्राकृत, संस्कृत, तमिल, पाली आदि अनेक भाषाओं को लिखने में हुआ।

04/01/2025

हल्दीघाटी के भीषण युद्ध में मानसिंह नाम में कई लोगों को बहुत कन्फ्यूजन है।

#हल्दीघाटी में #मानसिंह जी #सोनगरा (महाराणा प्रताप के मामा), #देलवाड़ा के झाला मानसिंह जी, बड़ी सादड़ी के झाला मानसिंह जी व मानसिंह जी सिसोदिया (महाराणा प्रताप के भाई) ने मेवाड़ के पक्ष में रहते हुए वीरता दिखाई थी। विरोधी पक्ष में आमेर के राजा मानसिंह कछवाहा ने मुगल सेना का नेतृत्व किया था।

23/10/2024

रानी चेनम्मा के साहस एवं उनकी वीरता के कारण देश के विभिन्न हिस्सों खासकर कर्नाटक में उन्हें विशेष सम्मान हासिल है और उनका नाम आदर के साथ लिया जाता है।

कित्तूर का पतन शुरु होने का कारण शिवलिंग रुद्रसर्ज द्वारा चेन्नम्मा की सलाह न मानकर चाटुकारों से गहरी मित्रता करना था। 19वीं सदी की शुरुआत में देश के बहुत से शासक अंग्रेजों की बदनीयत को समझ नहीं पाए थे। लेकिन उस समय भी कित्तुरु की रानी, रानी चेन्नम्मा ने ब्रिटिश सेना के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी थी।

रानी चेन्नम्मा की कहानी लगभग झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की तरह है। इसलिए उनको 'कर्नाटक की लक्ष्मीबाई' भी कहा जाता है। वह पहली भारतीय शासक थीं जिन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह किया। भले ही अंग्रेजों की सेना के मुकाबले उनके सैनिकों की संख्या कम थी और उनको गिरफ्तार किया गया लेकिन ब्रिटिश शासन के खिलाफ बगावत का नेतृत्व करने के लिए उनको अब तक याद किया जाता है।

चेन्नम्मा का जन्म 23 अक्टूबर, 1778 को ककाती में हुआ था। यह कर्नाटक के बेलगावी जिले में एक छोटा सा गांव है। उनकी शादी देसाई वंश के राजा मल्लासारजा से हुई जिसके बाद वह कित्तुरु की रानी बन गईं। कित्तुरु अभी कर्नाटक में है। उनको एक बेटा हुआ था जिनकी 1824 में मौत हो गई थी। अपने बेटे की मौत के बाद उन्होंने एक अन्य बच्चे शिवलिंगप्पा को गोद ले लिया और अपनी गद्दी का वारिस घोषित किया। लेकिन ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी 'हड़प नीति' के तहत उसको स्वीकार नहीं किया। हालांकि उस समय तक हड़प नीति लागू नहीं हुई थी फिर भी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1824 में कित्तुरु पर कब्जा कर लिया।

ब्रिटिश शासन ने शिवलिंगप्पा को निर्वासित करने का आदेश दिया। लेकिन चेन्नम्मा ने अंग्रेजों का आदेश नहीं माना। उन्होंने बॉम्बे प्रेसिडेंसी के लेफ्टिनेंट गवर्नर लॉर्ड एलफिंस्टन को एक पत्र भेजा। उन्होंने कित्तुरु के मामले में हड़प नीति नहीं लागू करने का आग्रह किया। लेकिन उनके आग्रह को अंग्रेजों ने ठुकरा दिया। इस तरह से ब्रिटिश और कित्तुरु के बीच लड़ाई शुरू हो गई। अंग्रेजों ने कित्तुरु के खजाने और आभूषणों के जखीरे को जब्त करने की कोशिश की जिसका मूल्य करीब 15 लाख रुपये था। लेकिन वे सफल नहीं हुए।

अंग्रेजों ने 20,000 सिहापियों और 400 बंदूकों के साथ कित्तुरु पर हमला कर दिया। अक्टूबर 1824 में उनके बीच पहली लड़ाई हुई। उस लड़ाई में ब्रिटिश सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा। कलेक्टर और अंग्रेजों का एजेंट सेंट जॉन ठाकरे कित्तुरु की सेना के हाथों मारा गया। चेन्नम्मा के सहयोगी अमातूर बेलप्पा ने उसे मार गिराया था और ब्रिटिश सेना को भारी नुकसान पहुंचाया था। दो ब्रिटिश अधिकारियों सर वॉल्टर एलियट और स्टीवेंसन को बंधक बना लिया गया। अंग्रेजों ने वादा किया कि अब युद्ध नहीं करेंगे तो रानी चेन्नम्मा ने ब्रिटिश अधिकारियों को रिहा कर दिया। लेकिन अंग्रेजों ने धोखा दिया और फिर से युद्ध छेड़ दिया। इस बार ब्रिटिश अफसर चैपलिन ने पहले से भी ज्यादा सिपाहियों के साथ हमला किया। सर थॉमस मुनरो का भतीजा और सोलापुर का सब कलेक्टर मुनरो मारा गया। रानी चेन्नम्मा अपने सहयोगियों संगोल्ली रयन्ना और गुरुसिदप्पा के साथ जोरदार तरीके से लड़ीं। लेकिन अंग्रेजों के मुकाबले कम सैनिक होने के कारण वह हार गईं। उनको बेलहोंगल के किले में कैद कर दिया गया। वहीं 21 फरवरी 1829 को उनकी मौत हो गई।

भले ही चेन्नम्मा आखिरी लड़ाई में हार गईं लेकिन उनकी वीरता को हमेशा याद किया जाएगा। उनकी पहली जीत और विरासत का जश्न अब भी मनाया जाता है। हर साल कित्तुरु में 22 से 24 अक्टूबर तक कित्तुरु उत्सव लगता है जिसमें उनकी जीत का जश्न मनाया जाता है। उनकी समाधि एक छोटे से पार्क में है जिसकी देखरेख सरकार के जिम्मे है।

बहादुर वीरांगना रानी चेनम्मा की जयंती पर कोटि-कोटि नमन्।

23/08/2024

. 🔰 सिन्धु घाटी की लिपि 🔰
▪️ #इतिहासकार अर्नाल्ड जे टायनबी ने कहा था कि - विश्व के इतिहास में अगर किसी देश के #इतिहास के साथ सर्वाधिक छेड़ छाड़ की गयी है, तो वह भारत का इतिहास ही है।
भारतीय इतिहास का प्रारम्भ तथाकथित रूप से #सिन्धु घाटी की सभ्यता से होता है, इसे हड़प्पा कालीन सभ्यता या सारस्वत सभ्यता भी कहा जाता है। बताया जाता है, कि वर्तमान सिन्धु नदी के तटों पर 3500 BC (ईसा पूर्व) में एक विशाल नगरीय सभ्यता विद्यमान थी। मोहनजोदारो, हड़प्पा, कालीबंगा, लोथल आदि इस सभ्यता के नगर थे।

पहले इस सभ्यता का विस्तार सिंध, पंजाब, राजस्थान और गुजरात आदि बताया जाता था, किन्तु अब इसका विस्तार समूचा भारत, तमिलनाडु से वैशाली बिहार तक, आज का पूरा पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान तथा (पारस) ईरान का हिस्सा तक पाया जाता है। अब इसका समय 7000 BC से भी प्राचीन पाया गया है।

इस प्राचीन सभ्यता की सीलों, टेबलेट्स और बर्तनों पर जो लिखावट पाई जाती है उसे सिन्धु घाटी की लिपि कहा जाता है। इतिहासकारों का दावा है, कि यह लिपि अभी तक अज्ञात है, और पढ़ी नहीं जा सकी। जबकि सिन्धु घाटी की लिपि से समकक्ष और तथाकथित प्राचीन सभी लिपियां जैसे इजिप्ट, चीनी, फोनेशियाई, आर्मेनिक, सुमेरियाई, मेसोपोटामियाई आदि सब पढ़ ली गयी हैं।

#आजकल कम्प्यूटरों की सहायता से अक्षरों की आवृत्ति का विश्लेषण कर मार्कोव विधि से प्राचीन भाषा को पढना सरल हो गया है।

सिन्धु घाटी की लिपि को जानबूझ कर नहीं पढ़ा गया और न ही इसको पढने के सार्थक प्रयास किये गए।
भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद (Indian Council of Historical Research) जिस पर पहले अंग्रेजो और फिर कम्युनिस्टों का कब्ज़ा रहा, ने सिन्धु घाटी की लिपि को पढने की कोई भी विशेष #योजना नहीं चलायी।

आखिर ऐसा क्या था सिन्धु घाटी की लिपि में? #अंग्रेज और #कम्युनिस्ट इतिहासकार क्यों नहीं चाहते थे, कि सिन्धु घाटी की लिपि को पढ़ा जाए?

अंग्रेज और कम्युनिस्ट इतिहासकारों की नज़रों में सिन्धु घाटी की लिपि को पढने में निम्नलिखित खतरे थे -

1. सिन्धु घाटी की लिपि को पढने के बाद उसकी प्राचीनता और अधिक पुरानी सिद्ध हो जायेगी। इजिप्ट, चीनी, रोमन, ग्रीक, आर्मेनिक, सुमेरियाई, मेसोपोटामियाई से भी पुरानी. जिससे पता चलेगा, कि यह विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता है। भारत का महत्व बढेगा जो अंग्रेज और कम्युनिस्ट इतिहासकारों को बर्दाश्त नहीं होगा।
2. सिन्धु घाटी की लिपि को पढने से अगर वह वैदिक #सभ्यता साबित हो गयी तो अंग्रेजो और कम्युनिस्टों द्वारा फैलाये गए आर्य- द्रविड़ युद्ध वाले प्रोपगंडा के ध्वस्त हो जाने का डर है।
3. अंग्रेज और कम्युनिस्ट इतिहासकारों द्वारा दुष्प्रचारित ‘आर्य बाहर से आई हुई आक्रमणकारी जाति है और इसने यहाँ के मूल निवासियों अर्थात सिन्धु घाटी के लोगों को मार डाला व भगा दिया और उनकी महान सभ्यता नष्ट कर दी। वे लोग ही जंगलों में छुप गए, दक्षिण भारतीय (द्रविड़) बन गए, शूद्र व आदिवासी बन गए’, आदि आदि गलत साबित हो जायेगा।
कुछ फर्जी #इतिहासकार सिन्धु घाटी की लिपि को सुमेरियन भाषा से जोड़ कर पढने का प्रयास करते रहे तो कुछ इजिप्शियन भाषा से, कुछ चीनी भाषा से, कुछ इनको मुंडा आदिवासियों की भाषा, और तो और, कुछ इनको ईस्टर द्वीप के आदिवासियों की भाषा से जोड़ कर पढने का प्रयास करते रहे। ये सारे #प्रयास असफल साबित हुए।

सिन्धु घाटी की लिपि को पढने में निम्लिखित समस्याए बताई जाती है -
सभी लिपियों में अक्षर कम होते है, जैसे अंग्रेजी में 26, देवनागरी में 52 आदि, मगर सिन्धु घाटी की लिपि में लगभग 400 अक्षर चिन्ह हैं। सिन्धु घाटी की लिपि को पढने में यह कठिनाई आती है, कि इसका काल 7000 BC से 1500 BC तक का है, जिसमे लिपि में अनेक परिवर्तन हुए साथ ही लिपि में स्टाइलिश वेरिएशन बहुत पाया जाता है। लेखक ने लोथल और कालीबंगा में सिन्धु घाटी व #हड़प्पा कालीन अनेक पुरातात्विक साक्षों का अवलोकन किया।
भारत की प्राचीनतम लिपियों में से एक लिपि है जिसे ब्राह्मी लिपि कहा जाता है। इस लिपि से ही भारत की अन्य भाषाओँ की लिपियां बनी। यह लिपि वैदिक काल से गुप्त काल तक उत्तर पश्चिमी भारत में उपयोग की जाती थी। संस्कृत, पाली, प्राकृत के अनेक ग्रन्थ ब्राह्मी लिपि में प्राप्त होते है।
सम्राट अशोक ने अपने धम्म का प्रचार प्रसार करने के लिए ब्राह्मी लिपि को अपनाया। सम्राट #अशोक के #स्तम्भ और #शिलालेख ब्राह्मी लिपि में संस्कृत आदि भाषाओं में लिखे गए और भारत में लगाये गए।
सिन्धु घाटी की लिपि और ब्राह्मी लिपि में अनेक आश्चर्यजनक समानताएं है। साथ ही ब्राह्मी और तमिल लिपि का भी पारस्परिक सम्बन्ध है। इस आधार पर सिन्धु घाटी की लिपि को पढने का सार्थक प्रयास सुभाष काक और इरावाथम महादेवन ने किया।
सिन्धु घाटी की लिपि के लगभग 400 अक्षर के बारे में यह माना जाता है, कि इनमे कुछ वर्णमाला (स्वर व्यंजन मात्रा संख्या), कुछ यौगिक अक्षर और शेष चित्रलिपि हैं। अर्थात यह भाषा अक्षर और चित्रलिपि का संकलन समूह है। विश्व में कोई भी भाषा इतनी सशक्त और समृद्ध नहीं जितनी सिन्धु घाटी की भाषा।
बाएं लिखी जाती है, उसी प्रकार ब्राह्मी लिपि भी दाएं से बाएं लिखी जाती है। सिन्धु घाटी की लिपि के लगभग 3000 टेक्स्ट प्राप्त हैं।
इनमे वैसे तो 400 अक्षर चिन्ह हैं, लेकिन 39 अक्षरों का प्रयोग 80 प्रतिशत बार हुआ है। और ब्राह्मी लिपि में 45 अक्षर है। अब हम इन 39 अक्षरों को ब्राह्मी लिपि के 45 अक्षरों के साथ समानता के आधार पर मैपिंग कर सकते हैं और उनकी ध्वनि पता लगा सकते हैं।

ब्राह्मी लिपि के आधार पर सिन्धु घाटी की लिपि पढने पर सभी संस्कृत के शब्द आते है जैसे - श्री, अगस्त्य, मृग, हस्ती, वरुण, क्षमा, कामदेव, महादेव, कामधेनु, मूषिका, पग, पंच मशक, पितृ, अग्नि, सिन्धु, पुरम, गृह, यज्ञ, इंद्र, मित्र आदि।
निष्कर्ष यह है कि -
1. सिन्धु घाटी की लिपि ब्राह्मी लिपि की पूर्वज लिपि है।
2. सिन्धु घाटी की लिपि को ब्राह्मी के #आधार पर पढ़ा जा सकता है।
3. उस काल में संस्कृत भाषा थी जिसे सिन्धु घाटी की लिपि में लिखा गया था।
4. सिन्धु घाटी के लोग #वैदिक धर्म और #संस्कृति मानते थे।
5. वैदिक धर्म अत्यंत प्राचीन है।
हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीन व मूल सभ्यता है, हिन्दुओं का मूल निवास सप्त सैन्धव प्रदेश (सिन्धु सरस्वती क्षेत्र) था जिसका विस्तार ईरान से सम्पूर्ण भारत देश था।वैदिक धर्म को मानने वाले कहीं बाहर से नहीं आये थे और न ही वे आक्रमणकारी थे। आर्य - द्रविड़ जैसी कोई भी दो पृथक जातियाँ नहीं थीं जिनमे परस्पर #युद्ध हुआ हो।((( ॐ )))
जय श्रीराम ।। जय हिंदुराष्ट्र

30/07/2024

*क्या आपने अमीर अली का नाम सुना है?* राजस्थान के इतिहास में यह वह व्यक्ति है जिसके धोखे के कारन महिलाएं जोहर नहीं कर पाई और उन्हें तलवारो से काटना पड़ा, तो चलिए आज जैसलमेर के राजा लूणकरण को याद करते है, जो मित्रता के नाम पर राजस्थान के सबसे बड़े धोखे का शिकार हुआ।

अमीर अली कंधार का नवाब था, तथा उसकी उसके भाई के साथ लड़ाई हो गयी और उसके भाई ने उसे हरा दिया, अपने भाई से हारने के बाद आमिर अली जैसलमेर के राजा लूणकरण के पास शरण लेता है, और चूँकि शरणागत की रक्षा करना भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है, महाराज लूणकरण अमीर अली को शरण दे देते है, व दोनों अपनी मित्रता को दर्शाने के लिए पगड़िया बदलते है। लूणकरण अमीर अली को जैसलमेर में जागीर देकर उसके रहने का प्रबंध करते है,

दिन बीतते है, राजा का अमीर अली पर विश्वास बढ़ता जाता है, और राजा अमीर अली पर बहुत ज्यादा विश्वास करने लगते है, अमीर अली ने एक बार राजा से कहता है की, उसकी बेगमें रनिवास की महिलाओ से मिलना चाहती है, पर वह नहीं चाहता की कोई और उसकी महिलाओं को देखे, इस पर राजा लूणकरण कहते है की कुछ दिनों में, राजमहल के अधिकांश व्यक्ति एक विवाह समारोह में सम्मिलित होने जायेगे, तब किले में कोई पुरुष नहीं होगा, उस दिन उनकी बेगमें, उनकी रानियों से मिल सकती है। इस पर अमीर अली हामी भर देता है, कुछ दिनों बाद वह दिन आता है जब महल के अधिकांश पुरुष, राजकुमार मालदेव भाटी के साथ विवाह समारोह में भागलेने चले जाते है,

राजा अमीर अली को संदेसा भिजवाते है, की उनकी बेगमें किले में आ सकती है, पर अमीर अली के मनसूबे कुछ और ही थे, वह जैसलमेर पर कब्ज़ा करना चाहता था और उसके लिए एक अच्छे मोके का इन्तजार कर रहा था, और उसे वह अवसर मिल गया, वह महिलाओं की पालकियों में अपने सैनिकों को बिठा देता है, और उनमे हथियार रखवा देता है, और प्रत्येक पालकी को उठाने वालो की जगह भी सैनिक लगा देता है। जब अमिर अली की पालकिया किले के प्रथम द्वार को पार कर रही होती है तो, वहा उपस्थित एक सैनिक को उन पर शक हो जाता है, और वह पालकियों की तलाशी लेने को कहता है, अमीर अली उन्हें समझाता है पर वह सैनिक नहीं मानते, जब अमीर अली को लग जाता की है यदि पालकियों की तलाशी हुई तो वे पकडे जायेंगे, और किले के बाकी दरवाजे बंद हो जाएंगे तो वह वही से अपने सिपाहियों को हमला कर देने का आदेश देता है, अचानक हुए इस हमले से सिपाही भी कुछ समझ नहीं पाते है, व जैसे तैसे किले के अंदर ख़बर पहुँचती है की अमीर अली ने विश्वास घात कर दिया है, और किले पर हमला हो चूका है, पर किले में उस वक्त बहुत कम ही पुरुष थे, इसीलिए हमेशा की तरह, जब सिपाही कम और हार निश्चित थी तो साका किया गया, पर एक समस्या राजा के सम्मुख आ खड़ी हुई, साके में सबसे पहले जौहर किया जाता है, जिसमे महिलाये अग्नि स्नान कर लेती है, जोहर पुरे विधि विधान द्वारा किया जाता है, व पर अब जौहर करने का समय नहीं बचा था, दुश्मन किसी भी वक्त किले में प्रवेश कर सकते थे, तब महिलाएं कहती है की उन्हें तलवारो से काट दिया जाए, इस पर महिलाओं को तलवार से काट दिया जाता है और इस युद्ध में महिलाएं अग्नि स्नान नहीं कर पाती इसलिए इस युद्ध में जौहर नहीं हो पाता, वरन इसमें धारा स्नान होता है, चूँकि महिलाये जोहर नहीं कर पायी थी, और सिर्फ पुरुषो ने केसरिया किया था इसलिए इस साके को जैसलमेर का अर्धसाका कहा जाता है।

अमीर अली किले पर कब्ज़ा कर लेता है, पर जब यह खबर राजकुमार मालदेव भाटी तक पहुँचती है तो मालदेव भाटी अपनी सेना लेकर आते है व अमीर अली को मारकर किले पर पुनः कब्ज़ा कर लेते है , यह घटना समस्त भारतवासी से छुपाने के कृत्य किए गये जिससे, मुस्लिम समुदाय को किसी भी कीमत पर धोखेबाज गद्दार कौम का टैग न लग पाए यह कौम बदनाम न होने पाए ,ऐसे कुत्सित प्रयास भारत भूमि पर सदैव कांग्रेस पोषित इतिहासकारों आज तक जारी है , जो कौम इतिहास से सबक नही सीखती वह सिर्फ मूर्ख ही नहीं कुल द्रोही है धर्मद्रोही समुदाय की कठपुतली है मात्र , इसके बाद भी अगर कोई हिंदू मुस्लिम एकता रोग से संक्रमित है या सेकुलर व कांग्रेस का सपोर्टर है तो उसे अपना डीएनए परीक्षण करवाना चाहिए। ।

साभार - इतिहास के झरोखों से

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