Er. Jag veer singh

Er. Jag veer singh This page made for only intertenment and motivational, learning purpose..

जीवन को खाता अकेलापनसोचिए, रविार की शाम आप एक भरे पूरे परिवार वाले फ्लैट में हैं। एक तरफ क्रिकेट चल रहा है, कहीं कूकर की...
27/07/2026

जीवन को खाता अकेलापन

सोचिए, रविार की शाम आप एक भरे पूरे परिवार वाले फ्लैट में हैं। एक तरफ क्रिकेट चल रहा है, कहीं कूकर की सीटी बज रही है, तो कहीं फोन पर किसी की बात हो रही है। सभी अपने में उत्‍साहित दिख रहे हैं, और व्‍यस्‍त हैं। वहीं घर की महिला किचन काउंटर पर अकेली खड़ी सोच रही है कि उसे घरवालों ने कितने समय पहले सच में ध्‍यान से देखा था।

मजेदार बात यह है कि उसे छोड़ा नहीं गया है, न ही जानबूझकर नजरअंदाज किया गया है। फिर भी उसके भीतर-भीतर कुछ चल रहा है; एक शांत दर्द। आज के शब्‍दों में इसका नाम अकेलापन है। हमारा अकेलापन किसी सुनसान द्वीप जैसा नहीं है। यह एक भरी-पूरी जिंदगी के अंदर का अकेलापन है। हम इतिहास की सबसे ज्‍यादा कनेक्‍टेड पीढ़ी हैं। और कई मायनों में, सबसे अकेली पीढ़ी में से हैं।

इंसानी जीवन पर अब तक के सबसे लंबे अध्‍ययन में हावर्ड विश्वविद्यालय ने यह जानने की कोशिश की है कि हमें क्‍या चीज़ आगे बढ़ाती है। पता लगा कि वह न धन है, न यश और न ही नियंत्रित कोलेस्‍ट्रॉल। वह है, रिश्‍तों की गर्माहट। शोधकर्ता तो यह भी कह रहे हैं कि अकेलापन शरीर पर कुछ-कुछ धूम्रपान की तरह का प्रभाव डालता है। जो लोग समागम के बाहर रहते हैं, वे न सिर्फ दुखी रहते हैं, बल्कि जल्‍दी बूढ़े भी हो जाते हैं।

शहरी भारत के सर्वे में पाया गया है कि अकेलेपन का दर्द सबसे तेजी से युवाओं, और सबसे ज्‍यादा डिजिटली जानकार लोगों में बढ़ रहा है। हमने कॉन्टेक्ट को मेल-मिलाप समझ लिया है। सौ लाइक्‍स प्‍यार नहीं होते हैं। हम आत्‍मनिभर होने के लिए नहीं, बल्कि समाज में एक-दूसरे पर निर्भर रहकर जीने के लिए बने हैं। हमें इसे भूलना नहीं चाहिए।

(‘द हिन्‍दू’ में प्रकाशित शिवकुमार सुंदरम के लेख पर आ‍धारित-27/06/2026)

25/07/2026

देश में युवाओं और छात्रों के आंदोलनों का इतिहास रहा है
आरती जेरथ, ( राजनीतिक टिप्पणीकार )

छात्र आंदोलनों के रूप में सरकार बड़ी चुनौती का सामना कर रही है। युवाओं के प्रदर्शन दिल्ली ही नहीं, देशभर के शहरों में फैल गए हैं। अतीत में झांककर देखें तो छात्र आंदोलन अकसर खतरे की घंटी साबित होते हैं। 1973 में गुजरात के मोरबी कॉलेज के छात्रों द्वारा मेस में शुल्क वृद्धि के विरोध में शुरू किया गया आंदोलन देखते ही देखते देशव्यापी जनांदोलन में बदल गया था। इसने दो मुख्यमंत्रियों की कुर्सी छीन ली, आपातकाल की घोषणा का मार्ग प्रशस्त किया और अंततः केंद्र की राजनीति में ऐसा भूचाल लाया कि 1977 में इंदिरा गांधी को हार का सामना करना पड़ा।

यकीनन, इतिहास के दो क्षण कभी एक जैसे नहीं होते और यह अनुमान लगाना अभी बहुत जल्दबाजी होगी कि मौजूदा विरोध-प्रदर्शन किस दिशा में जाएंगे। लेकिन इतना जरूर है कि सरकार को इस सम्भावना पर गम्भीरता से विचार करना होगा कि यदि आज सड़कों पर दिखाई दे रहे युवाओं के आक्रोश का शीघ्र और प्रभावी सुधारात्मक कदमों के साथ समाधान नहीं किया गया, तो इसके क्या परिणाम हो सकते हैं।

दिसम्बर 1973 में लौटते हैं। मोरबी कॉलेज में छात्रों के उग्र प्रदर्शन के बाद 40 छात्रों को निलम्बित कर दिया गया था और कॉलेज को अनिश्चितकाल के लिए बंद करना पड़ा था। कुछ ही दिनों में अहमदाबाद के इंजीनियरिंग कॉलेज में भी विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए और जनवरी 1974 तक गुजरात विश्वविद्यालय के छात्र भी आंदोलन पर उतर आए। राज्यभर के छात्र संगठनों ने तीन दिन की हड़ताल का आह्वान किया। धीरे-धीरे आंदोलन में मध्य-वर्ग भी शामिल हो गया, जो चिमनभाई पटेल के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में महंगाई और भ्रष्टाचार से पहले ही परेशान था। जल्द ही विभिन्न स्थानीय आंदोलन एकजुट होकर नवनिर्माण समिति के बैनर तले आ गए। समिति ने आंदोलन का दायरा बढ़ाते हुए व्यवस्था में व्यापक बदलाव की मांग उठाई। आखिर में मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा। गुजरात विधानसभा भंग कर दी गई और नए चुनाव कराए गए।

कांग्रेस (ओ) के वरिष्ठ नेता मोरारजी देसाई जैसे विपक्षी नेताओं ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया था। संघ की छात्र इकाई एबीवीपी की भी इसमें भागीदारी थी। वास्तव में, इस आंदोलन ने राज्य में जनसंघ (भाजपा का पूर्ववर्ती स्वरूप) के उभार का पथ प्रशस्त किया था। पहले वह गैर-कांग्रेसी गठबंधनों का हिस्सा बना और अंततः 1995 में भाजपा ने वहां अपने दम पर सरकार बनाई, जिसके बाद से वह आज तक सत्ता से बाहर नहीं हुई है।

1974 में ही जेपी गुजरात आए थे। वहां के आंदोलन से प्रेरित होकर वे बिहार लौटे और कांग्रेस सरकार के खिलाफ इसी तरह का आंदोलन खड़ा किया। इसमें लालू यादव और नीतीश कुमार जैसे युवा छात्र नेता भी शामिल हुए, जिन्होंने आगे चलकर कई दशकों तक राज्य की राजनीति पर प्रभुत्व कायम रखा। अंतत: मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर की सरकार भी सत्ता से बाहर हो गई। लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह था कि यह आंदोलन बिहार और गुजरात की सीमाओं से निकलकर सरकार के खिलाफ व्यापक विरोध का रूप ले बैठा। जेपी ने सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान किया।

जब कॉकरोच जनता पार्टी ने जंतर-मंतर पर अपना विरोध प्रदर्शन शुरू किया और बाद में लद्दाख के कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी उससे जुड़ गए, तब ऐसा लग रहा था कि यह आंदोलन धीरे-धीरे बिना किसी खास प्रभाव के समाप्त हो जाएगा। बहुत कम लोगों ने अनुमान लगाया था कि संसद के मानसून सत्र के पहले दिन आयोजित ‘संसद चलो’ मार्च में दिल्ली की सड़कों पर इतनी बड़ी संख्या में लोग उतरेंगे। लेकिन तब से इन विरोध प्रदर्शनों में केवल छात्र ही नहीं, बल्कि कई अन्य वर्गों के लोग भी शामिल हो चुके हैं। इनमें ऐसे पैरेंट्स भी हैं, जिन्हें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता है; ऐसे स्कूली छात्र हैं जो उच्च शिक्षा के अपने सपनों को लेकर चिंतित हैं; ऐसे वरिष्ठ नागरिक हैं जो युवाओं का उत्साहवर्धन करना चाहते हैं; ऑटो-रिक्शा चालक, बेरोजगार युवा और विभिन्न आयु वर्गों तथा सामाजिक तबकों के अनेक लोग भी इसमें शामिल हैं।

ये विरोध प्रदर्शन अभी शुरुआती दौर में ही हैं। इन्हें अभी एक स्पष्ट और संगठित आंदोलन का स्वरूप लेना बाकी है। इस आंदोलन को अभी अपना ‘जेपी’ भी नहीं मिला है। यही स्थिति सरकार को अवसर देती है कि इतिहास के खुद को दोहराने से पहले वह इन विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित कर सके। अतीत से अगर कोई सबक लिया जा सकता है तो वो यही है कि सड़कों पर उतरे लोगों के आक्रोश की अनदेखी करना राजनीतिक समझदारी नहीं है।

बिना फुटपाथ की सड़केंसंपादकीयसुप्रीम कोर्ट का यह कहना सराहनीय और स्वागतयोग्य है कि फुटपाथ पर पैदल चलने वालों का पहला अधि...
23/06/2026

बिना फुटपाथ की सड़कें
संपादकीय

सुप्रीम कोर्ट का यह कहना सराहनीय और स्वागतयोग्य है कि फुटपाथ पर पैदल चलने वालों का पहला अधिकार है। उसने इस अधिकार को मौलिक अधिकार बताते हुए यह भी स्पष्ट किया कि सड़कों पर वाहनों की आवाजाही से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है कि पैदल यात्री फुटपाथ पर बिना किसी बाधा के चल सकें। यह अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सरकारों को यह भी याद दिलाया कि यह एक ऐसा अधिकार है, जिसे लागू किया जा सकता है। आखिर फुटपाथ होते ही इसलिए हैं कि लोग उन पर चल सकें, लेकिन अन्य देशों और विशेष रूप से विकसित एवं साथ ही कई विकासशील देशों की तुलना में हमारे यहां फुटपाथ बड़े पैमाने पर अतिक्रमण का शिकार हैं। कहीं-कहीं तो वे अतिक्रमण के चलते गायब ही हो गए हैं। अपने देश में फुटपाथों पर पैदल चलना इसलिए दूभर है, क्योंकि वे सही तरह सीमांकित नहीं हैं और यदि कहीं हैं भी तो कोई उसकी परवाह नहीं करता। कहीं रेहड़ी-पटरी वालों ने उन पर कब्जा कर लिया है तो कहीं दुकानदारों ने। यदि कहीं वे अतिक्रमण से मुक्त हैं तो भी उनमें वाहन खड़े नजर आते हैं या फिर दुकानों के साइनबोर्ड दिखते हैं।

वास्तव में अपने यहां फुटपाथों पर पैदल चलने की सुविधा के अलावा वह सब होता है, जो नहीं होना चाहिए। इसका ही नतीजा है कि आम तौर पर लोग सड़क किनारे चलने के लिए विवश होते हैं और दुर्घटनाओं की चपेट में आते हैं। इन दुर्घटनाओं में प्रतिवर्ष हजारों लोगों की मौत होती है। सुप्रीम कोर्ट का उक्त फैसला एक मोटर दुर्घटना मुआवजे के मामले से जुड़ा है, जिसमें एक पांच वर्षीय बच्चे की मौत इसलिए हो गई थी, क्योंकि वह जिस सड़क से जा रहा था, उस पर कोई फुटपाथ नहीं था। इससे बड़ी विडंबना और कोई नहीं हो सकती कि सुप्रीम कोर्ट को शासन-प्रशासन को छोटी-छोटी बातें याद दिलाने के साथ इसके लिए निर्देश भी देने पड़ते हैं कि उसे अपने बुनियादी काम करने चाहिए। कायदे से तो सुप्रीम कोर्ट को यह कहने कि आवश्यकता ही नहीं पड़नी चाहिए थी कि फुटपाथ लोगों के चलने के लिए हैं और इसमें कोई बाधा नहीं आनी चाहिए, लेकिन उसे यह काम भी करना पड़ा। इसके प्रति तो उन्हें बिना किसी के कहे सचेत रहना चाहिए था, जिन पर फुटपाथों के रखरखाव और यह देखने की जिम्मेदारी है कि उन पर किसी तरह का अतिक्रमण न होने पाए। समस्या यह है कि ऐसे लोग अपनी जिम्मेदारी के प्रति तनिक भी सजग नहीं-चाहे वे नगर निकायों के अधिकारी-कर्मचारी हों या फिर यातायात पुलिस। इसके साथ ही हमारे नेतागण भी कभी इसकी चिंता नहीं करते कि उनके इलाकों में फुटपाथों पर चलना कठिन है। शायद इसलिए कि उन्हें फुटपाथ पर चलने की आवश्यकता नहीं पड़ती। फुटपाथों पर अतिक्रमण सबको दिखता है, लेकिन चेतता कोई नहीं।

29/04/2026

लक्ष्य....

29/04/2026

बदलाव और चुनौतियों....
#ज्ञान

वामपंथ.. #ज्ञान  #इतिहास  #समाज  #राजनीति
26/04/2026

वामपंथ..
#ज्ञान #इतिहास #समाज #राजनीति

15/04/2026

💻 UPI ने भारत में डिजिटल पेमेंट को पूरी तरह बदल दिया है।📊 आज 45 करोड़ से ज्यादा लोग हर महीने अरबों ट्रांजैक्शन कर रहे हैं।
⚡ तेज और आसान भुगतान ने जीवन को सरल बना दिया है।
⚠️ लेकिन इसके साथ धोखाधड़ी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।
📈 2021 से 2025 तक साइबर फ्रॉड में कई गुना वृद्धि हुई है।
🏦 RBI ने सुरक्षा बढ़ाने के लिए नए नियम प्रस्तावित किए हैं।
⏳ बड़े ट्रांजैक्शन पर 1 घंटे की देरी सुरक्षा दे सकती है।🔐 AI और नई तकनीक से फ्रॉड को रोका जा सकता है।
🧠 जागरूकता ही सबसे बड़ी सुरक्षा है — सोच-समझकर भुगतान करें।
✨ “स्मार्ट बनो, सुरक्षित रहो — डिजिटल इंडिया की यही पहचान है।

30/03/2026

कोई काम करने...

29/03/2026

How to earn....

28/03/2026

जब काम में...

Address

Kosi Kalan
281403

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Er. Jag veer singh posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The School

Send a message to Er. Jag veer singh:

Shortcuts

Share