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*भगवान परशुराम जन्मोत्सव विशेष....*महर्षि भृगु के पुत्र ऋचिक का विवाह राजा गाधि की पुत्री सत्यवती से हुआ था। विवाह के बा...
23/04/2023

*भगवान परशुराम जन्मोत्सव विशेष....*
महर्षि भृगु के पुत्र ऋचिक का विवाह राजा गाधि की पुत्री सत्यवती से हुआ था। विवाह के बाद सत्यवती ने अपने ससुर महर्षि भृगु से अपने व अपनी माता के लिए पुत्र की याचना की। तब महर्षि भृगु ने सत्यवती को दो फल दिए और कहा कि ऋतु स्नान के बाद तुम गूलर के वृक्ष का तथा तुम्हारी माता पीपल के वृक्ष का आलिंगन करने के बाद ये फल खा लेना। किंतु सत्यवती व उनकी मां ने भूलवश इस काम में गलती कर दी। यह बात महर्षि भृगु को पता चल गई। तब उन्होंने सत्यवती से कहा कि तूने गलत वृक्ष का आलिंगन किया है। इसलिए तेरा पुत्र ब्राह्मण होने पर भी क्षत्रिय गुणों वाला रहेगा और तेरी माता का पुत्र क्षत्रिय होने पर भी ब्राह्मणों की तरह आचरण करेगा।तब सत्यवती ने महर्षि भृगु से प्रार्थना की कि मेरा पुत्रक्षत्रिय गुणों वाला न हो भले ही मेरा पौत्र(पुत्र का पुत्र) ऐसा हो। महर्षि भृगु ने कहा कि ऐसा ही होगा। कुछ समय बाद जमदग्रि मुनि ने सत्यवती के गर्भ से जन्म लिया। इनका आचरण ऋषियों के समान ही था। इनका विवाह रेणुका से हुआ। मुनि जमदग्रि के चार पुत्र हुए। उनमें से परशुराम चौथे थे। इस प्रकार एक भूल के कारण भगवान परशुराम का स्वभाव क्षत्रियों के समान था

राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका और भृगुवंशीय जमदग्नि के पुत्र विष्णु के अवतार परशुराम शिव के परम भक्त थे इन्हें शिव से विशेष परशु(कुल्हाड़ी)प्राप्त हुआ था। इनका नाम तो राम था किन्तु शंकर द्वारा प्रदत अमोघ परशु को सदैव धारण किए रहने के कारण ये परशुराम कहलाते थे। विष्णु के दस अवतारों में से छठा अवतार, जो वामन एवं रामचन्द्र के मध्य में हैं गिने जाते हैं जमदग्नि के पुत्र होने के कारण ये जामदग्न्य भी कहे जाते हैं। इनका जन्म अक्षय तृतीय (वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीय तिथि) को हुआ था। अतः इस दिन व्रत करने व उत्सव मनाने की प्रथा है। परम्परा के अनुसार इन्होंने क्षत्रियों का अनेक बार विनाश किया। क्षत्रियों के अहंकारपूर्ण दमन से विश्व को मुक्ति दिलाने के लिए इनका जन्म हुआ था।
उनकी माता जल का कलश भरने के लिए नदी पर गई। वहां गंधर्व चित्ररथ अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा कर रहा था। उसे देखने में रेणुका इतनी तन्मय हो गई कि जल लाने में विलंब हो गया तथा यज्ञ का समय व्यतीत हो गया। उसकी मानसिक स्थिति समझकर जमदग्नि ने क्रोध के आवेश में बारी-बारी से अपने चारों बेटों को मां की हत्या करने का आदेश दिया। किन्तु परशुराम के अतिरिक्त कोई भी ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हुआ। पिता के कहने से परशुराम ने माता का शीश काट डाला। पिता के प्रसन्न होने पर उन्होने परशुराम को वर मांगने को कहा तो उन्होंने चार वरदान मांगे। 1. माता पुनर्जीवित हो जाएं, 2. उन्हें मरने की स्मृति न रहे, 3. भाई चेतना युक्त हो जाएं और 4. मां परमायु हो। जमदग्नि ने उन्हें चारों वरदान दे दिए।
दुर्वासा की भांति ये भी अपने क्रोधी स्वभाव के लिए विख्यात हैं । एक बार कार्तवीर्य ने परशुराम की अनुपस्थिति में आश्रम उजाड़ डाला था जिससे परशुराम ने क्रोधित हो उसकी सहस्त्र भुजाओं को काट डाला। कार्तवीर्य के सम्बन्धियों ने प्रतिशोध की भावना से परशुराम के पिता जमदग्नि का वध कर दिया। इस पर परशुराम ने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय-विहीन कर दिया। अंत में पितरों की आकाशवाणी सुनकर उन्होंने क्षत्रियों से युद्ध करना छोड़कर तपस्या की ओर ध्यान लगाया।

रामावतार में श्री रामचन्द्र द्वारा शिव का धनुष तोड़ने पर ये क्रुद्ध होकर आए थे। इन्हेांने परीक्षा के लिए उनका धनुष श्री रामचन्द्र जी को दिया था। जब श्री रामचन्द्र जी ने धनुष चढ़ा दिया तो परशुराम समझ गए कि रामचन्द्र विष्णु के अवतार हैं। इसलिए उनकी वन्दना करके वे तपस्या करने चले गए। परशुराम ने अपने जीवनकाल में अनेक यज्ञ किए। यज्ञ करने के लिए उन्होंने बत्तीस हाथ ऊँची सोने की वेदी बनवाई थी। महर्षि कश्यप ने दक्षिण में पृथ्वी सहित उस वेदी को ले लिया तथा फिर परशुराम से पृथ्वी छोड़कर चले जाने के लिए कहा। परशुराम ने समुद्र से पीछे हटकर गिरिश्रेष्ठ महेन्द्र पर निवास किया।
रामजी का पराक्रम सुनकर वे अयोध्या गए और राजा दशरथ ने उनके स्वागतार्थ रामचन्द्र को भेजा। उन्हें देखते ही परशुराम ने उनके पराक्रम की परीक्षा लेनी चाही। अतः उन्हें क्षत्रिय संहारक दिव्य धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए कहा। राम के ऐसा कर लेने पर उन्हें धनुष पर एक दिव्य बाण चढ़ाकर दिखाने के लिए कहा। राम ने वह बाण चढ़ाकर परशुराम के तेज पर छोड़ दिया। बाण उनके तेज को छीनकर पुनः राम के पास लौट आया। रामजी ने परशुराम को दिव्य दृष्टि दी। जिससे उन्होंने राम के यथार्थ स्वरूप के दर्शन किए। परशुराम एक वर्ष तक लज्ज्ति, तेजहीन तथा अभिमानशून्य होकर तपस्या में लगे रहे। तद्न्तर पितरों से प्रेरणा पाकर उन्होंने वधूसर नामक नदी के तीर्थ पर स्नान करके अपना तेज पुनः प्राप्त किया।
परशुराम कुंड नामक तीर्थस्नान में पांच कुंड बने हुए हैं। परशुराम ने समस्त क्षत्रियों का संहार करके उन कुंडों की स्थापना की थी तथा अपने पितरों से वर प्राप्त किया था कि क्षत्रिय संहार के पाप से मुक्त हो जाएंगे।

जानापाव पहाड़ी का संक्षिप्त परिचय एवं धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
इस स्थल को जानापाव कहने के बारे में जनश्रुति है। परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि ने परशुराम को अपनी माँ का सिर काटने का आदेश दिया था। उन्होंने यह कार्य करके पिता को कहा कि अब मुझे माँ जीवित चाहिए। तब ऋषि ने अपने कमण्डल से जल छींटा तो माँ में वापस जान आ गई थी। इसलिए इसका नाम जानापाव यानी जान वापस आना पड़ा। इन्दौर जिले की महू तहसील से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर विन्ध्याचल पर्वत की श्रृंखला में धार्मिक एवं पौराणिक महत्व का स्थान जानापाव स्थित है। जानापाव में भगवान परशुराम जी के पिता महर्षि जमदग्नि ने जनकेश्वर शिवलिंग की स्थापना कर अत्यन्त कठोर तपस्या की थी। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिवजी ने महर्षि जमदग्नि को वरदान स्वरूप समस्त कामनाओं की पूर्ति करने वाली कामधेनू गाय प्रदान की थी।वर्षों पूर्व जानापाव पहाड़ी ज्वालामुखी का उद्गम स्थल था। ज्वालामुखी के लावे से ही मालवा क्षेत्रा में काली मिट्टी का फैलाव हुआ था। वर्तमान में यह बिन्दुजल कुण्ड के रूप में विद्यमान है। नदियों का उद्गम स्थलः जानापाव पहाड़ी की मुख्य विशेषता यह है कि यहाँ से सात नदियों का उद्गम हुआ है। इनमें से तीन नदियाँ चोरल, गम्भीर एवं चम्बल मुख्य हैं। शेष चार सहायक नदियाँ नखेरी, अजनार, कारम और जामली हैं।
प्रति वर्ष अक्षय तृतीया को जानापाव में भगवान परशुराम जी का जन्मोत्सव बडे़ पैमाने पर मनाया जाता है। साथ ही एक मेले का भी आयोजन किया जाता है। प्रति वर्ष नवरात्रि एवं भूतड़ी अमावस्या को भी मेले का आयोजन किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि भूतड़ी अमावस्या को जानापाव के कुण्ड में स्नान करने से भूतप्रेत बाधा एवं समस्त शारीरिक रोगों का नाश होता है। अतः इस मेले में देश, प्रदेश के समस्त श्रद्धालु बड़ी संख्या में भाग लेते हैं।
परशुराम और सहस्रबाहु की कथा
राम चरितमानस में आया है कि ‘सहसबाहु सम सो रिपु मोरा’ का कई बार उल्लेख आया है। महिष्मती नगर के राजा सहस्त्रार्जुन क्षत्रिय समाज के हैहय वंश के राजा कार्तवीर्य और रानी कौशिक के पुत्र थे। सहस्त्रार्जुन का वास्तविक नाम अर्जुन था। उन्होने दत्तत्राई को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की।दत्तत्राई उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उसे वरदान मांगने को कहा तो उसने दत्तत्राई से एक हजार हाथों का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद उसका नाम अर्जुन से सहस्त्रार्जुन पड़ा। इसे सहस्त्राबाहू और राजा कार्तवीर्य पुत्र होने के कारण कार्तेयवीर भी कहा जाता है।
कहा जाता है महिष्मती सम्राट सहस्त्रार्जुन अपने घमंड में चूर होकर धर्म की सभी सीमाओं को लांघ चुका था। उसके अत्याचार व अनाचार से जनता त्रस्त हो चुकी थी। वेद-पुराण और धार्मिक ग्रंथों को मिथ्या बताकर ब्राह्मण का अपमान करना, ऋषियों के आश्रम को नष्ट करना, उनका अकारण वध करना, निरीह प्रजा पर निरंतर अत्याचार करना, यहाँ तक की उसने अपने मनोरंजन के लिए मद में चूर होकर अबला स्त्रियों के सतीत्व को भी नष्ट करना शुरू कर दिया था।
एक बार सहस्त्रार्जुन अपनी पूरी सेना के साथ झाड-जंगलों से पार करता हुआ जमदग्नि ऋषि के आश्रम में विश्राम करने के लिए पहुंचा। महर्षि जमदग्रि ने सहस्त्रार्जुन को आश्रम का मेहमान समझकर स्वागत सत्कार में कोई कसर नहीं छोड़ी। कहते हैं ऋषि जमदग्रि के पास देवराज इन्द्र से प्राप्त दिव्य गुणों वाली कामधेनु नामक अदभुत गाय थी। महर्षि ने उस गाय के मदद से कुछ ही पलों में देखते ही देखते पूरी सेना के भोजन का प्रबंध कर दिया। कामधेनु के ऐसे विलक्षण गुणों को देखकर सहस्त्रार्जुन को ऋषि के आगे अपना राजसी सुख कम लगने लगा। उसके मन में ऐसी अद्भुत गाय को पाने की लालसा जागी। उसने ऋषि जमदग्नि से कामधेनु को मांगा। किंतु ऋषि जमदग्नि ने कामधेनु को आश्रम के प्रबंधन और जीवन के भरण-पोषण का एकमात्र जरिया बताकर कामधेनु को देने से इंकार कर दिया। इस पर सहस्त्रार्जुन ने क्रोधित होकर ऋषि जमदग्नि के आश्रम को उजाड़ दिया और कामधेनु को ले जाने लगा। तभी कामधेनु सहस्त्रार्जुन के हाथों से छूट कर स्वर्ग की ओर चली गई।
जब परशुराम अपने आश्रम पहुंचे तब उनकी माता रेणुका ने उन्हें सारी बातें विस्तारपूर्वक बताई। परशुराम माता-पिता के अपमान और आश्रम को तहस नहस देखकर आवेशित हो गए। पराक्रमी परशुराम ने उसी वक्त दुराचारी सहस्त्रार्जुन और उसकी सेना का नाश करने का संकल्प लिया। परशुराम अपने परशु अस्त्र को साथ लेकर सहस्त्रार्जुन के नगर महिष्मतिपुरी पहुंचे। जहां सहस्त्रार्जुन और परशुराम का युद्ध हुआ। किंतु परशुराम के प्रचण्ड बल के आगे सहस्त्रार्जुन बौना साबित हुआ। भगवान परशुराम ने दुष्ट सहस्त्रार्जुन की हजारों भुजाएं और धड़ परशु से काटकर कर उसका वध कर दिया। सहस्त्रार्जुन के वध के बाद पिता के आदेश से इस वध का प्रायश्चित करने के लिए परशुराम तीर्थ यात्रा पर चले गए। तब मौका पाकर सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने अपने सहयोगी क्षत्रियों की मदद से तपस्यारत महर्षि जमदग्रि का उनके ही आश्रम में सिर काटकर उनका वध कर दिया। सहस्त्रार्जुन पुत्रों ने आश्रम के सभी ऋषियों का वध करते हुए, आश्रम को जला डाला। माता रेणुका ने सहायतावश पुत्र परशुराम को विलाप स्वर में पुकारा। जब परशुराम माता की पुकार सुनकर आश्रम पहुंचे तो माता को विलाप करते देखा और माता के समीप ही पिता का कटा सिर और उनके शरीर पर 21 घाव देखे। यह देखकर परशुराम बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने शपथ ली कि वह हैहय वंश का ही सर्वनाश नहीं कर देंगे बल्कि उसके सहयोगी समस्त क्षत्रिय वंशों का 21 बार संहार कर भूमि को क्षत्रिय विहिन कर देंगे। पुराणों में उल्लेख है कि भगवान परशुराम ने अपने इस संकल्प को पूरा भी किया। पुराणों में उल्लेख है कि भगवान परशुराम ने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन करके उनके रक्त से समन्तपंचक क्षेत्र के पाँच सरोवर को भर कर अपने संकल्प को पूरा किया। कहा जाता है की महर्षि ऋचीक ने स्वयं प्रकट होकर भगवान परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोक दिया था तब जाकर किसी तरह क्षत्रियों का विनाश भूलोक पर रुका। तत्पश्चात भगवान परशुराम ने अपने पितरों के श्राद्ध क्रिया की एवं उनके आज्ञानुसार अश्वमेध और विश्वजीत यज्ञ किया।
अपने शिष्य भीष्म को नहीं कर सके पराजित
महाभारत के अनुसार महाराज शांतनु के पुत्र भीष्म ने भगवान परशुराम से ही अस्त्र-शस्त्र की विद्या प्राप्त की थी। एक बार भीष्म काशी में हो रहे स्वयंवर से काशीराज की पुत्रियों अंबा, अंबिका और बालिका को अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य के लिए उठा लाए थे। तब अंबा ने भीष्म को बताया कि वह मन ही मन किसी और का अपना पति मान चुकी है तब भीष्म ने उसे ससम्मान छोड़ दिया, लेकिन हरण कर लिए जाने पर उसने अंबा को अस्वीकार कर दिया.. तब अंबा भीष्म के गुरु परशुराम के पास पहुंची और उन्हें अपनी व्यथा सुनाई। अंबा की बात सुनकर भगवान परशुराम ने भीष्म को उससे विवाह करने के लिए कहा, लेकिन ब्रह्मचारी होने के कारण भीष्म ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। तब परशुराम और भीष्म में भीषण युद्ध हुआ और अंत में अपने पितरों की बात मानकर भगवान परशुराम ने अपने अस्त्र रख दिए। इस प्रकार इस युद्ध में न किसी की हार हुई न किसी की जीत।
बाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम से परशुराम भगवान से कोई विवाद नही हुआ था गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस में वर्णन है कि भगवान श्रीराम ने सीता स्वयंवर में शिव धनुष उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह टूट गया। धनुष टूटने की आवाज सुनकर भगवान परशुराम भी वहां आ गए। अपने आराध्य शिव का धनुष टूटा हुआ देखकर वे बहुत क्रोधित हुए और वहां उनका श्रीराम व लक्ष्मण से विवाद भी हुआ। जबकि वाल्मीकि रामायण के अनुसार सीता से विवाह के बाद जब श्रीराम पुन: अयोध्या लौट रहे थे। तब परशुराम वहां आए और उन्होंने श्रीराम से अपने धनुष पर बाण चढ़ाने के लिए कहा। श्रीराम ने बाण धनुष पर चढ़ा कर छोड़ दिया। यह देखकर परशुराम को भगवान श्रीराम के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो गया और वे वहां से चले गए।

जय श्री परशुराम

*🌹आज का चिन्तन्🌹*         *यह जरुरी नहीं कि जीवन में हमेशा प्रिय क्षण ही आएं दूसरे लोगों का अनुकूल व्यवहार ही हमें प्राप...
05/06/2022

*🌹आज का चिन्तन्🌹*
*यह जरुरी नहीं कि जीवन में हमेशा प्रिय क्षण ही आएं दूसरे लोगों का अनुकूल व्यवहार ही हमें प्राप्त हो। अपमान, शोक, वियोग, हानि, असफलता आदि तमाम स्थितियां आती रहती हैं और जाती भी रहती हैं।*
*जरा सी बात पर परेशान हो जाना, निराश हो जाना, रोना, उत्तेजित हो जाना, क्रोधांध स्थिति में आकर ना कहने योग्य बात को कह जाना और ना करने योग्य कार्य को कर जाना, यह सब मनुष्य की आंतरिक कमजोरी, दुर्बलता, जड़ता के लक्षण हैं।*
*कठिन से कठिन विकट स्थिति में विवेक पूर्वक और धैर्यपूर्वक निर्णय लेना चाहिए । उत्तेजना और क्रोध में कहा गया शब्द और किया गया कर्म स्थिति को और बिगाड़ देता है। इसलिए मौन और मुस्कुराहट को अपना आभूषण बनायें।*
*भगवान् के मंगलमय विधानसे जो अनुकूल (सुखदायी) या प्रतिकूल (दुःखदायी) परिस्थिति आती है, वह हमारे हित के लिए ही होती है...!!!*
*और याद रहे--"धन, दौलत हो या स्नेह, प्रेम"...,"मोह" खतम हो जाने के बाद, खोने का डर हमेशा के लिए खतम हो जाता है !!*

🌳🦚आज की कहानी🦚🌳💐💐असली शांति💐💐                   एक राजा था जिसे चित्रकला से बहुत प्रेम था। एक बार उसने घोषणा की कि जो को...
07/03/2022

🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐असली शांति💐💐



एक राजा था जिसे चित्रकला से बहुत प्रेम था। एक बार उसने घोषणा की कि जो कोई भी चित्रकार उसे एक ऐसा चित्र बना कर देगा जो शान्ति को दर्शाता हो तो वह उसे मुँह माँगा पुरस्कार देगा।

निर्णय वाले दिन एक से बढ़ कर एक चित्रकार पुरस्कार जीतने की लालसा से अपने-अपने चित्र लेकर राजा के महल पहुँचे। राजा ने एक-एक करके सभी चित्रों को देखा और उनमें से दो चित्रों को अलग रखवा दिया। अब इन्ही दोनों में से एक को पुरस्कार के लिए चुना जाना था।

पहला चित्र एक अति सुन्दर शान्त झील का था। उस झील का पानी इतना स्वच्छ था कि उसके अन्दर की सतह तक दिखाई दे रही थी। और उसके आस-पास विद्यमान हिमखंडों की छवि उस पर ऐसे उभर रही थी मानो कोई दर्पण रखा हो। ऊपर की ओर नीला आसमान था जिसमें रुई के गोलों के सामान सफ़ेद बादल तैर रहे थे। जो कोई भी इस चित्र को देखता उसको यही लगता कि शान्ति को दर्शाने के लिए इससे अच्छा कोई चित्र हो ही नहीं सकता। वास्तव में यही शान्ति का एक मात्र प्रतीक है।

दूसरे चित्र में भी पहाड़ थे, परन्तु वे बिलकुल सूखे, बेजान, वीरान थे और इन पहाड़ों के ऊपर घने गरजते बादल थे जिनमें बिजलियाँ चमक रहीं थीं… घनघोर वर्षा होने से नदी उफान पर थी… तेज हवाओं से पेड़ हिल रहे थे… और पहाड़ी के एक ओर स्थित झरने ने रौद्र रूप धारण कर रखा था। जो कोई भी इस चित्र को देखता यही सोचता कि भला इसका ‘शान्ति’ से क्या लेना देना… इसमें तो बस अशांति ही अशांति है।

सभी आश्वस्त थे कि पहले चित्र बनाने वाले चित्रकार को ही पुरस्कार मिलेगा। तभी राजा अपने सिंहासन से उठे और घोषणा की कि दूसरा चित्र बनाने वाले चित्रकार को वह मुँह माँगा पुरस्कार देंगे। हर कोई आश्चर्य में था!

पहले चित्रकार से रहा नहीं गया, वह बोला, “लेकिन महाराज उस चित्र में ऐसा क्या है जो आपने उसे पुरस्कार देने का फैसला लिया… जबकि हर कोई यही कह रहा है कि मेरा चित्र ही शान्ति को दर्शाने के लिए सर्वश्रेष्ठ है?”

“आओ मेरे साथ!”, राजा ने पहले चित्रकार को अपने साथ चलने के लिए कहा। दूसरे चित्र के समक्ष पहुँच कर राजा बोले, “झरने के बायीं ओर हवा से एक ओर झुके इस वृक्ष को देखो। उसकी डाली पर बने उस घोंसले को देखो… देखो कैसे एक चिड़िया इतनी कोमलता से, इतने शान्त भाव व प्रेमपूर्वक अपने बच्चों को भोजन करा रही है…”

फिर राजा ने वहाँ उपस्थित सभी लोगों को समझाया, “शान्त होने का अर्थ यह नहीं है कि आप ऐसी स्थिति में हों जहाँ कोई शोर नहीं हो…कोई समस्या नहीं हो… जहाँ कड़ी मेहनत नहीं हो… जहाँ आपकी परीक्षा नहीं हो… शान्त होने का सही अर्थ है कि आप हर तरह की अव्यवस्था, अशांति, अराजकता के बीच हों और फिर भी आप शान्त रहें, अपने काम पर केंद्रित रहें… अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहें।”

अब सभी समझ चुके थे कि दूसरे चित्र को राजा ने क्यों चुना है।

शिक्षा:-
मित्रों, हर कोई अपने जीवन में शान्ति चाहता है। परन्तु प्राय: हम ‘शान्ति’ को कोई बाहरी वस्तु समझ लेते हैं, और उसे दूरस्थ स्थलों में ढूँढते हैं, जबकि शान्ति पूरी तरह से हमारे मन की भीतरी चेतना है, और सत्य यही है कि सभी दुःख-दर्दों, कष्टों और कठिनाइयों के बीच भी शान्त रहना ही वास्तव में शान्ति है..!!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🙏🙏🙏🙏

02/01/2022

1. प्रतिदिन 10 से 30 मिनट टहलने की आदत बनायें. टहलते समय चेहरे पर मुस्कराहट रखें.
꧁ ||जय श्रीकृष्ण ||꧂

2. प्रतिदिन कम से कम 10 मिनट चुप रहकर बैठें.
꧁ ||जय श्रीकृष्ण||꧂

3. पिछले साल की तुलना में इस साल ज्यादा पुस्तकें पढ़ें.
꧁ ||जय श्रीकृष्ण||꧂

4. 70 साल की उम्र से अधिक आयु के बुजुर्गों और 6 साल से कम आयु के बच्चों के साथ भी कुछ समय व्यतीत करें.
꧁ ||जय श्रीकृष्ण ||꧂

5. प्रतिदिन खूब पानी पियें.
꧁ ||जय श्रीकृष्ण||꧂

6. प्रतिदिन कम से कम तीन लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश करें.
꧁ ||जय श्रीकृष्ण||꧂

7. गपशप पर अपनी कीमती ऊर्जा बर्बाद न करें.
꧁ ||जय श्रीकृष्ण||꧂

8. अतीत के मुद्दों को भूल जायें, अतीत की गलतियों को अपने जीवनसाथी को याद न दिलायें.
꧁ ||जय श्रीकृष्ण||꧂

9. एहसास कीजिये कि जीवन एक स्कूल है और आप यहां सीखने के लिये आये हैं. जो समस्याएं आप यहाँ देखते हैं, वे पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं.
꧁ ||जय श्रीकृष्ण ||꧂

10. एक राजा की तरह नाश्ता, एक राजकुमार की तरह दोपहर का भोजन और एक भिखारी की तरह रात का खाना खायें.
꧁ ||जय श्रीकृष्ण ||꧂

11. दूसरों से नफरत करने में अपना समय व ऊर्जा बर्बाद न करें. नफरत के लिए ये जीवन बहुत छोटा है.
꧁ ||जय श्रीकृष्ण ||꧂

12. आपको हर बहस में जीतने की जरूरत नहीं है, असहमति पर भी अपनी सहमति दें.
꧁ ||जय श्रीकृष्ण ||꧂

13. अपने जीवन की तुलना दूसरों से न करें.
꧁ ||जय श्रीकृष्ण ||꧂


14. गलती के लिये गलती करने वाले को माफ करना सीखें.
꧁ ||जय श्रीकृष्ण||꧂

15. ये सोचना आपका काम नहीं कि दूसरे लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं.
꧁ ||जय श्रीकृष्ण||꧂

16. समय ! सब घाव भर देता है.
꧁ ||जय श्रीकृष्ण||꧂

17. ईर्ष्या करना समय की बर्बादी है. जरूरत का सब कुछ आपके पास है.
꧁ ||जय श्रीकृष्ण ||꧂

18. प्रतिदिन दूसरों का कुछ भला करें.
꧁ ||जय श्रीकृष्ण||꧂

19. जब आप सुबह जगें तो अपने माता-पिता को धन्यवाद दें, क्योंकि माता-पिता की कुशल परवरिश के कारण आप इस दुनियां में हैं.
꧁ ||जय श्रीकृष्ण||꧂

20. हर उस व्यक्ति को ये संदेश शेयर करें जिसकी आप परवाह करते हैं ꧁ ||जय श्रीकृष्ण||꧂

10/12/2021

"चित्त का स्तर"
〰️🌼🌼🌼〰️
प्रत्येक साधक की कुछ दिन ध्यान साधना करने के बाद यह जानने की इच्छा होती हैं की मेरी कुछ ‘आध्यात्मिक प्रगति’ हुई या नही क्या मैं साधना के नाम पर "भुस में लठ" तो नहीं मार रहा, इस बात से प्रेरित हो कर आप को इस पोस्ट के माध्यम से अवगत करने की कोशिश कर रहा हूँ! ‘आध्यात्मिक प्रगति’ को नापने का मापदंड है , आपका अपना चित्त ! आपका अपना चित्त कितना शुद्ध और पवित्र हुआ है , वही आपकी आध्यात्मिक स्थिति को दर्शाता हैं ! अब आपको भी अपनी आध्यात्मिक प्रगति जानने की इच्छा हैं, तो आप भी इन निम्नलिखित चित्त के स्तर से अपनी स्वयं की आध्यात्मिक स्थिति को जान सकते हैं | बस अपने ‘चित्त का प्रामाणिकता’ के साथ ही ‘अवलोकन’ करें यह अत्यंत आवश्यक हैं !

(1) दूषित चित्त👉 चित्त का सबसे निचला स्तर हैं , दूषित चित्त ! इस स्तर पर साधक सभी के दोष ही खोजते रहता हैं ! दूसरा , सदैव सबका बुरा कैसे किया जाए सदैव इसी का विचार करते रहता है ! दूसरों की प्रगति से सदैव ‘ईर्ष्या’ करते रहता हैं ! नित्य नए-नए उपाय खोजते रहता हैं की किस उपाय से हम दुसरे को नुकसान पहुँचा सकते हैं ! सदैव नकारात्मक बातों से , नकारात्मक घटनाओं से , नकारात्मक व्यक्तिओं से यह ‘चित्त’ सदैव भरा ही रहता हैं !

(2) भूतकाल में खोया चित्त👉 एक चित्त एसा होता हैं , वः सदैव भूतकाल में ही खोया हुआ होता हैं ! वह सदैव भूतकाल के व्यक्ति और भूतकाल की घटनाओं में ही लिप्त रहता हैं ! जो भूतकाल की घटनाओं में रहने का इतना आधी हो जाता हैं की उसे भूतकाल में रहने में आनंद का अनुभव होता हैं !

(3) नकारात्मक चित्त👉 इस प्रकार का चित्त सदैव बुरी संभावनाओं से ही भरा रहता हैं ! सदैव कुछ-न-कुछ बुरा ही होगा यह वह चित्त चित्तवाला मनुष्य सोचते रहता हैं ! यह अति भूतकाल में रहने के कारण होता हैं क्योंकि अति भूतकाल में रहने से वर्त्तमान काल खराब हो जाता हैं !

(4) सामान्य चित्त👉 यह चित्त एक सामान्य प्रकृत्ति का होता हैं ! इस चित्त में अच्छे , बुरे , दोनों ही प्रकार के विचार आते हैं ! यह जब अच्छी संगत में होता हैं , तो इसे अच्छे विचार आते हैं और जब यह बुरी संगत में रहता हैं तब उसे बुरे विचार आते हैं ! यानी इस चित्त के अपने कोई विचार नहीं होते ! जैसी अन्य चित्त की संगत मिलती हैं , वैसे ही उसे विचार आते हैं ! वास्तव में वैचारिक प्रदुषण के कारण नकारात्मक विचारों के प्रभाव में ही यह ‘सामान्य चित्त’ आता हैं !

(5) निर्विचार चित्त👉 साधक जब कुछ ‘साल’ तक ध्यान साधना करता हैं , तब यह निर्विचार चित्त की स्थिति साधक को प्राप्त होती है ! यानी उसे अच्छे भी विचार नहीं आते और बुरे भी विचार नहीं आते ! उसे कोई भी विचार ही नहीं आते ! वर्त्तमान की किसी परिस्थितिवश अगर चित्त कहीं गया तो भी वह क्षणिकभर ही होता हैं ! जिस प्रकार से बरसात के दिनों में एक पानी का बबुला एक क्षण ही रहता हैं , बाद में फुट जाता हैं , वैसे ही इनका चित्त कहीं भी गया तो एक क्षण के लिए जाता हैं , बाद में फिर अपने स्थान पर आ जाता हैं ! यह आध्यात्मिक स्थिति की ‘प्रथम पादान’ हैं होती हैं क्योकि फिर कुछ साल तक अगर इसी स्थिति में रहता हैं तो चित्त का सशक्तिकरण होना प्रारंभ हो जाता हैं और साधक एक सशक्त चित्त का धनि हो जाता हैं !

(6) दुर्भावनारहित चित्त👉 चित्त के सशक्तिकरण के साथ-साथ चित्त में निर्मलता आ जाती हैं ! और बाद में चित्त इतना निर्मल और पवित्र हो जाता हैं कि चित्त में किसी के भी प्रति बुरा भाव ही नहीं आता हैं , चाहे सामनेवाला का व्यवहार उसके प्रति कैसा भी हो ! यह चित्त की एक अच्छी दशा होती हैं !

(7) सद्भावना भरा चित्त👉 ऐसा चित्त बहुत ही कम लोगों को प्राप्त होता हैं ! इनके चित्त में सदैव विश्व के सभी प्राणिमात्र के लिए सदैव सद्भावना ही भरी रहती हैं ! ऐसे चित्तवाले मनुष्य ‘संत प्रकृत्ति’ के होते हैं वे सदैव सभी के लिए अच्छा , भला ही सोचते हैं ! ये सदैव अपनी ही मस्ती में मस्त रहते हैं ! इनका चित्त कहीं भी जाता ही नहीं हैं ! ये साधना में लीन रहते हैं !

(8) शून्य चित्त👉 यह चित्त की सर्वोत्तम दशा हैं ! इस स्थिति में चित्त को एक शून्यता प्राप्त हो जाती हैं ! यह चित्त एक पाइप जैसा होता हैं , जिसमें साक्षात परमात्मा का ‘चैतन्य’ सदैव बहते ही रहता हैं ! परमात्मा की ‘करूणा की शक्ति’ सदैव ऐसे शून्य चित्त से बहते ही रहती हैं ! यह चित्त कल्याणकारी होता हैं !यह चित्त किसी भी कारण से किसी के भी ऊपर आ जाए तो भी उसका कल्याण हो जाता हैं ! इसीलिए ऐसे चित्त को कल्याणकारी चित्त कहते हैं ! ऐसे चित्त से कल्याणकारी शक्तियाँ सदैव बहते ही रहती हैं | यह चित्त जो भी संकल्प करता हैं , वह पूर्ण हो जाता हैं ! यह सदैव सबके मंगल के ही कामनाएँ करता हैं ! मंगलमय प्रकाश ऐसे चित्त से सदैव निरंतर निकलते ही रहता हैं !

अब आप अपना स्वयं का ‘अवलोकन’ करें और जानें की आपकी आध्यात्मिक स्थिति कैसी हैं ! आत्मा की पवित्रता का और चित्त हा बड़ा ही निकट का संबंध होता हैं ! अब तो यह समझ लो की ‘चित्तरूपी धन’ लेकर हम जन्मे हैं और जीवनभर हमारे आसपास सभी ‘चित्तचोर’ जो चित्त को दूषित करने वाले ही रहते हैं , उनके बीच रहकर भी हमें अपने चित्तरूपी धन को संभालना हैं ! अब कैसे , वह आप ही जाने !!!

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10/12/2021

जद्यपि जग दारुन दु:ख नाना।
सब तें कठिन जाति अवमाना॥
समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा।
बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा

मनुष्य अपने जीवन में अनेक प्रकार के दुखों से गुज़रता है। वह कई दुख अपनी मूर्खता से उठाता है जबकि कई ऐसे भी होते हैं जो उसे न चाहते हुए भी घेरे रहते हैं। तुलसीदास जी अपनी इस चौपाई में कहते हैं कि सभी दुखों में सबसे बड़ा दुख अपमान का दुख है।
यह चौपाई तब की है जब भगवान शिव के समझाने के बाद भी सती माता अपने पिता दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में बिना निमंत्रण ही सम्मिलित होने पहुंचती हैं और देखती हैं कि वहां दामाद शिव जी और पुत्री सती के आगमन की परीक्षा किसी को नहीं थी, यहां तक कि पुत्री सती को देखकर पिता दक्ष के हृदय में प्रेम तक नहीं उमड़ा। उन्होंने बेटी का स्वागत और सम्मान करना तो दूर बल्कि उसकी अवहेलना करनी प्रारंभ कर दी। सती अपने ही पिता द्वारा दिए गए इस अपमान को सह नहीं पाईं और अत्यंत विषाद में डूब गईं। उनका यह महान दुख एकमात्र उनकी मां ही समझ रहीं थीं। वे अपनी बेटी को विविध प्रकार से समझा रहीं थीं, उनके क्रोध को शांत करने का प्रयास कर रहीं थीं। अंततः सती माता स्वयं को अग्नि के हवाले समर्पित कर देती हैं।
'अपमान' किसी के लिए भी सु-फलदायी नहीं हो सकता। न ही सहने वाले के लिए और न अपमान करने वाले के लिए। अक्सर तो अपमान करने वाले व्यक्ति को इस बात का अंदाजा तक नहीं होता कि उसके द्वारा किया गया अपमान भविष्य में उसे स्वयं भी कष्ट दे सकता है।
मूर्खतावश आज किया जाने वाला अपमान कल बड़े पश्चाताप का कारण बन जाता है। किंतु विडंबना यह भी है कि आने वाले कल के विषय में आज कौन जागरूक रहना चाहता है? यदि जागरूकता रहता तो वह इतना मूर्ख हो ही नहीं सकता था कि किसी को ख़ुद से छोटा, कमतर, कमजोर या अकेला समझकर उसे अपमानित करे।
अपमान सहने वाला भी अपने आत्मसम्मान की चोट को बर्दाश्त नहीं कर पाता। इसके दो ही परिणाम होते हैं या तो वह स्वयं को ही दंडित करता है या फिर सभी के प्रति आक्रोश से भर उठता है। यदि वह अपने स्व को दमित करता है तब भी दो ही परिणाम होते हैं - या तो वह हमेशा हमेशा के लिए आत्म सम्मान रहित कुंठित और दब्बू प्रवृत्ति का हो जाता है या फिर खुद का जीवन समाप्त कर डालता है। कुल मिलाकर दोनों ही स्थितियों में वह अपना अस्तित्व ही मिटाता है। या तो जीता नहीं या जीते जी मुर्दा समान बन जाता है।
दूसरी स्थिति में यदि वह आक्रोश से भर उठे तब भी दो ही परिणाम देखने को मिलते हैं- या तो वह अपने अनियंत्रित आक्रोश में अपमान करने वाले व्यक्ति को हानि पहुंचा बैठता है या फिर अपमानजनित आक्रोश में खुद की क्षति कर डालता है। जैसा कि मां सती करती हैं। वे स्वयं को समाप्त करने हेतु अपना शरीर अग्नि के हवाले कर देती हैं।
इसलिए तुलसीदास जी सही कहते हैं। इस संसार में दारुण दुख हो सकते हैं किंतु अपमान से बड़ा कोई दुख नहीं होता अतः किसी को भी अपमानित नहीं करना चाहिए।
🙏जय श्री राम🙏

25/05/2021

इस जनरेशन का कड़वा सच

●बिजनेस सुरु करो 1 लाख में - नही बहोत रिस्क है
iPhone लेलो 1 लाख में - हां हां बिल्कुल
●कुछ नया सिख लो - काश मेरे पास टाइम होता
नई webseries आई है - अच्छा चल देख ते है

सही और समझदारी से चुने कि आप जिसे
प्राथमिकता देंगे वही आपका काल बनेगा
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Like&Share╰⍆☞ Guru ji
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03/07/2020

ये घर किसका है,इदन्न मम
(यह मेरा नहीं है?यह आलेख भी मेरा नहीं है।)
कल अपनी पुरानी सोसाइटी में गया था। वहां मैं जब भी जाता हूं, मेरी कोशिश होती है कि अधिक से अधिक लोगों से मुलाकात हो जाए।

कल अपनी पुरानी सोसाइटी में पहुंच कर गार्ड से बात कर रहा था कि और क्या हाल है आप लोगों का, तभी मोटर साइकिल पर एक आदमी आया और उसने झुक कर प्रणाम किया।

मैंने पहचानने की कोशिश की। बहुत पहचाना-पहचाना लग रहा था,पर नाम याद नहीं आ रहा था। उसने कहा,

भैया पहचाने नहीं? हम बाबू हैं, बाबू। उधर वाली आंटीजी के घर काम करते थे।

मैंने पहचान लिया। अरे ये तो बाबू है। सी ब्लॉक वाली आंटीजी का नौकर।

अरे बाबू, तुम तो बहुत स्मार्ट हो गए हो, आंटी कैसी हैं?

बाबू हंसा,आंटी तो गईं।

गईं? कहां गईं? उनका बेटा विदेश में था, वहीं चली गईं क्या? ठीक ही किया, उन्होंने। यहां अकेले रहने का क्या मतलब था?

अब बाबू थोड़ा गंभीर हुआ। उसने हंसना रोक कर कहा,

भैया, आंटीजी भगवान जी के पास चली गईं।

भगवान जी के पास? ओह! कब?

बाबू ने धीरे से कहा, दो महीने हो गए।

क्या हुआ था आंटी को?

कुछ नहीं। बुढ़ापा ही बीमारी थी। उनका बेटा भी बहुत दिनों से नहीं आया था। उसे याद करती थीं, पर अपना घर छोड़ कर वहां नहीं गईं। कहती थीं कि यहां से चली जाऊंगी तो कोई मकान पर कब्जा कर लेगा। बहुत मेहनत से ये मकान बनवाया है।

हां, वो तो पता ही है।लेकिन तुमने खूब सेवा की, अब तो वो चली गईं। अब तुम क्या करोगे?

बाबू फिर हँस दिया,
मैं क्या करुंगा भैया? पहले अकेला था, अब गांव से फैमिली को ले आया हूं। दोनों बच्चे और पत्नी अब यहीं रहते हैं।

यहीं मतलब उसी मकान में?

जी भैया। आंटी के जाने के बाद उनका बेटा आया था। एक हफ्ता रुक कर चले गए। मुझसे कह गए हैं कि घर देखते रहना। चार कमरे का इतना बड़ा फ्लैट है। मैं अकेला कैसे देखता?
भैया ने कहा कि तुम यहीं रह कर घर की देखभाल करते रहो। वो वहां से पैसे भी भेजने लगे हैं। और सबसे बड़ी बात ये है कि मेरे बच्चों को यहीं स्कूल में एडमिशन मिल गया है। अब आराम से हूं।

कुछ-कुछ काम बाहर भी कर लेता हूं। भैया सारा सामान भी छोड़ गए हैं। कह रहे थे कि ये सब दूर देश ले जाने में कोई फायदा नहीं।

मैं हैरान था। बाबू पहले साइकिल से चलता था। आंटी थीं तो उनकी देखभाल करता था। पर अब जब आंटी चली गईं तो वो चार कमरे के मकान में आराम से रह रहा है।

आंटी अपने बेटे के पास नहीं गईं कि कहीं कोई मकान पर कब्जा न कर ले। बेटा मकान नौकर को दे गया है, ये सोच कर कि वो रहेगा तो मकान बचा रहेगा।अब आंटी भी नहीं है और उनका बेटा भी यहां नहीं है,बस मकान बचा हुआ है।

मुझे पता है, मकान बहुत मेहनत और लागत से बनते हैं। पर ऐसी मेहनत किस काम की, जिसके आप सिर्फ पहरेदार बन कर रह जाएं?

मकान के लिए आंटी बेटे के पास नहीं गईं। मकान के लिए बेटा मां को पास नहीं बुला पाया। सच कहें तो हम सभी लोग मकान के पहरेदार ही हैं।

जिसने मकान बनाया वो अब दुनिया में ही नहीं है। जो हैं, उसके बारे में तो बाबू भी जानता है कि वो अब यहां कभी नहीं आएंगे।

मैंने बाबू से पूछा कि,तुमने भैया को बता दिया कि तुम्हारी फैमिली भी यहां आ गई है?

इसमें बताने वाली क्या बात है भैया? वो अब कौन यहां आने वाले हैं? और मैं अकेला यहां क्या करता? जब आएंगे तो देखेंगे।
पर जब मां थीं तब नहीं आए, उनके बाद अब क्या आएंगे? मकान की चिंता है, तो वो मैं कहीं लेकर जा नहीं रहा। मैं तो देखभाल ही कर रहा हूं।

बाबू हंसने लगा,उससे मैंने हाथ मिलाया। मैं समझ गया था कि बाबू अब नौकर नहीं रहा। वो मकान मालिक हो गया है।

हंसते-हंसते मैंने बाबू से कहा,

भाई, जिसने ये बात कही है कि मूर्ख आदमी मकान बनवाता है, बुद्धिमान आदमी उसमें रहता है,उसे ज़िंदगी का कितना गहरा तज़ुर्बा रहा होगा।

बाबू ने धीरे से कहा, “साहब, सब किस्मत की बात है।”

मैं वहां से चल पड़ा था ये सोचते हुए कि सचमुच सब किस्मत की ही बात है।

लौटते हुए मेरे कानों में बाबू के शब्द गूंज रहे थे-

“मैं मकान लेकर कहीं जाऊंगा थोड़े ही?मैं तो देखभाल ही कर रहा हूं।”

मैं भी सोच रहा था, मकान लेकर कौन जाता है? सब देखभाल ही तो करते हैं।
है न.....
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ये घर किसका है,इदन्न मम ( यह मेरा नहीं है?)
(यह आलेख भी मेरा नहीं है।किसी ने मुझे भेजा और मैंने आपको भेज दिया,अब बैठ कर आप सोचिये जिसमें आप रहते हैं वह घर किसका है?)

एक प्रयास आपके लिए ।
02/06/2019

एक प्रयास आपके लिए ।

26/05/2019

MENTOR AND MENTEE, MENTORING AND MENTORSHIP
-

1. The Greatest Act of Leadership Is Mentoring.

2. If what you learn, achieve, accumulate or accomplish dies with you then you are a generational failure.

3. Mentoring is the manifestation of the highest level of personal maturity, security and self confidence.

4. An insecure person will never Train People, they will oppress people.

5. Mature people create people greater than themselves.

6. Your assignment has a shelf life.

7. You will die one day; so train your replacement.

8. Your Greatest Gift to the world is your mentee.

9. True leaders do not seek followers, followers are attracted to true leaders.

10. The Greatest obligation of true leadership is to transfer your deposit to the next generation.

11. Leadership success is measured by the success of your successor.

12. No matter how great you may have been, if you didn't produce a successor, you are a failure.

13. You preserve what you built through mentorship.

14. Legacy is about preserving all that you've built by raising other people.

15. Success without a successor is failure.

16. Leadership that serves only it's generation is destined to failure.

17. If your vision dies with you, you have failed.

18. Legacy is about living beyond your grave.

19. Leadership Is not a Sprint but a relay.

20. The most important part of a relay is passing it on-not running.

21. The ultimate measure of true leadership is not to maintain followers but to produce leaders.

22. True leadership measures it's success by the diminishing dependency factor of its followers.

23. The ultimate measure of leadership is the ability to leave.

24. True leadership makes itself increasingly unnecessary.

25. You are a successful leader when your followers can lead others.

26. Your goal as a leader is to destroy the dependency of the people around you.

27. You are a great leader when your people don't need you.

28. Make people greater than you and you will live forever.

29. True leaders do not seek power.

30. True leaders seek to empower.

31. True leaders make themselves increasingly unnecessary.

32. Never confuse your position with your value.

33. The ultimate goal of true leadership is not to maintain followers but to produce leaders.

34. The first act of a true leader is identifying your replacement and you begin mentoring them.

35. You become great by producing people greater than yourself.

36. When you produce someone greater than yourself, don't get jealous. Take the credit.

37. When you train your replacement, you are freed to expand your work.

38. When you mentor people, your legacy will make your tombstone unnecessary.

Address

Mahaluwa Chouraha
Korwai
464224

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8889991988

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