11/08/2019
#मांस_खाना_हराम
"मुस्लिम धर्म के नबियों ने कभी भी मांस नहीं खाया, ना कोई जीव हत्या की।"
"कबीर, दिनको रोजा रहत हैं, रात हनत हैं गाय।
यह खून वह वंदगी, कहुं क्यों खुशी खुदाय।।"
परमात्मा कबीर जी कहते है कि मुस्लिम दिन में तो रोजा रखते है और रात में गाय का मांस खाते है। यह तो एक जीव हत्या है यह अल्लाह की बन्दगी अर्थात इबादत नही है तो फिर अल्लाह इससे खुश कैसे होगा??
हजरत मुहम्मद जी जिस साधना को करते थे वही साधना अन्य मुसलमान समाज भी कर रहा हैं।
वर्तमान में सभी मुसलमान श्रद्धालु माँस भी खा रहे हैं परंतु नबी मुहम्मद जी ने कभी माँस नही खाया तथा न ही उनके सीधे 1लाख 80हजार अनुयायियों ने माँस खाया। वे केवल रोजा, बंग तथा नमाज किया करते थे। गाय आदि को बिस्मिल नहीं करते थे।
"नबी मुहम्मद नमस्कार है, राम रसूल कहाया।
एक लाख अस्सी कूं सौगंध, जिन नही करद चलाया।।
अर्श कुर्स पर अल्लह तख्त हैं, खालिक बिन नही खाली।
वे पैगम्बर पाक पुरुष थे, साहिब के अब्दाली।।
मोहम्मद जी ने मरी गाय को जीवित करके जीव के प्रति अपना प्रेम दिखाया था क्योंकि अगर वो मांसाहारी होते तो वह मृत गाय का गोश्त भी खा सकते थे। परंतु उन पाक नबियों ने कभी मांस को छुआ तक नहीं।
"मारी गऊ शब्द के तीरम, ऐसे थे मोहम्मद पीरम।
शब्दे फिर जिवाई, हंसा राख्या माँस नही भाख्या, ऐसे पीर मुहम्मद भाई।।"
नबी मुहम्मद जी ने एक गाय को शब्द से मार कर सभी के सामने जीवित किया उन्होंने गाय का मांस नहीं खाया।
अब मुसलमान समाज वास्तविकता से परिचित नहीं है जिस दिन गाय जीवित की थी उस दिन की याद बनाए रखने के लिए को गाय मार देते हो। आप जीवित नहीं कर सकते तो मारने के भी अधिकारी भी नहीं हो। मुस्लिम धर्मगुरु काजी मुल्ला मांस को प्रसाद रूप में जानकर खाते तथा खिलाते है। आप स्वयं भी पाप के भागी बन रहे हो तथा अनुयायियों को भी गुमराह कर रहे हो। आप दोजख के पात्र बन रहे हो क्योंकि मांस खाने का अल्लाह तआला, कुरान और पवित्र नबियों में से किसी का भी आदेश नहीं है। और जो अल्लाह क्या देश की नाफरमानी करेगा वह दोजख/नरक का पात्र बनेगा।
किसी जीव विशेष की हत्या कर एक दूसरे को काफिर कहने वालो याद रखो प्रत्येक जीव में एक आत्मा है और वह आत्मा परमात्मा का ही अंश है।
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