24/10/2025
जब आइसलैंड की महिला श्रमिकों ने अपनी एक दिन की हड़ताल से नारी-पुरुष असमानता को चुनौती दी
महिला संघर्षों का इतिहास
आज ही के दिन 24 अक्टूबर 1975 को आइसलैंड में 90% महिलाओं ने पुरुषों के साथ समानता के लिए आम हड़ताल की थी। उस समय देश में महिलाएं, पुरुषों की तुलना में औसतन 40% कम कमाती थीं।
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में महिलाओं के कम वेतन और अवैतनिक श्रम की जरूरत को दिखाने के लिए रेड स्टॉकिंग्स नामक एक रेडिकल नारीवादी समूह ने सबसे पहले कम वेतन के खिलाफ हड़ताल का विचार प्रस्तावित किया। महिला संगठनों की एक समिति ने तब महिलाओं के लिए "दिन की छुट्टी" का आह्वान करने का फैसला किया जिसे तब प्रमुख मजदूर ट्रेड यूनियनों ने समर्थन दिया था।
एक महिला, अन्नादिस रुडोल्फ्सडॉटिर ने बाद में गार्जियन अखबार को बताते हुए कहा "24 तारीख से पहले के दिनों में ऐसा लगता था कि हर जगह महिलाएं एक साथ इकट्ठा हो रही थीं, कॉफी पी रही थीं, धूम्रपान कर रही थीं, लेकिन बहुत गंभीर मुद्दों पर निरंतर चर्चा कर रही थी। मेरी दादी एक मछली कारखाने में बहुत कठिन परिश्रम करती थी। उनके कारखाने में उस दिन छुट्टी नहीं होने वाली थी। लेकिन महिला आंदोलन द्वारा उठाए गए प्रश्न उसके दिमाग में घूम रहे थे। युवा पुरुष उससे अधिक वेतन क्यों ले रहे थे जबकि वो उनसे कम शारीरिक श्रम नहीं करती थी?"
"दिन की छुट्टी" बेहद सफल रही: आइसलैंड की अधिकांश मजदूरी करने वाली महिलाएं घर पर रहीं, घरों में काम करने वाली घरेलू कामगारों ने इस दिन खाना पकाने, सफाई करने और बच्चों की देखभाल करने से इनकार कर दिया। समाचार पत्र नहीं छपे, टेलीफोन कॉल नहीं जुड़े और कई स्कूल बंद रहे। उड़ानें रद्द कर दी गईं, मछली कारखाने बंद कर दिए गए और कई अन्य व्यवसाय बाधित हो गए।
25,000 महिलाओं ने तब राजधानी रेकजाविक में रैली की जिससे यातायात ठप हो गया।
हड़ताल के एक साल बाद आइसलैंड की सरकार ने लैंगिक भेदभाव को अवैध ठहराते हुए लैंगिक समानता अधिनियम पारित किया और एक लैंगिक समानता परिषद का गठन किया। आज आइसलैंड में दुनिया में सबसे कम लैंगिक असमानता है हालांकि महिलाएं अभी भी पुरुषों की मजदूरी का केवल 80% ही कमाती हैं इसलिए भेदभाव और इसके खिलाफ संघर्ष जारी है।
साभार : कुछ संशोधनों के साथ Working Class History (हिंदी में अनुवाद हमारा)