1 st अप्रैल 2023 से नव प्रवेश शुरू हो जाएंगे ।*हिन्दी व अँग्रेजी व Pure English if both parents know it a little, inform near your area and tell about our school. What is the *Raj Maharshi* thanks to all of you .
*Raj Maharshi*
Raj Mahershi Vashistha
Raj Mahershi Vashistha Secondary School provides his achivements and old memories
10 th में 20 no हटा दो व 8थ को पहले जैसा बोर्ड बना दो सच कहता हूं मंजर बदल जायेगा ।क्योकि हमारा व हमारी मेहनत का कोई मुकाबला नही कर पाएगा ।मुफ्तखोरी व मुफ्त में पास ने जमाने मे हमारी जरूरत को कमजोर किया है ।
16/03/2023
जो आज आये वो इस प्रकार बने
14/03/2023
*कांकङ का पानी*
कांकङ एक राजस्थानी शब्द है जिसका हिन्दी शब्दार्थ है *स्थानीय या क्षेत्रीय वन्यभूमि एवं चारागाह।* हमारे देश के प्रत्येक गाँव की अपनी नीजि कांकङ होती है जो पूरे गाँव की *सार्वजनिक सम्पति* मानी जाती है। कांकङ के समस्त संसाधनों का सामुहिक स्वामित्व माना जाता है और इसके *संरक्षण व संवर्धन की सामुहिक जवाबदेही* होती है। कांकङ स्थानीय मवेशी का *सार्वजनिक चारागाह और ईंधन आपूर्ति* का प्रमुख स्रोत होता है। कांकङ *पर्यावरणीय परिवेश* को सहेजने, संवारने और संतुलित रखने का पुख्ता प्रबन्धन है। कांकङ के पानी से तात्पर्य उस क्षेत्र विशेष में बरसने वाले *बरसाती पानी* से है। कांकङ के पानी को संकलित व सहजने का प्रबन्धन जितना पुख्ता होता है वह गाँव उतना ही *हराभरा, सरब्ज व समृद्ध* होता है। कांकङ का व्यर्थ बहता पानी, उपजाऊ मिट्टी बहाकर ले जाता है एवं *कांकङ को विरान व गाँव को क॔गाल बना देता है।*
कांकङ केवल वन्यभूमि या चारागाह मात्र ही नहीं है बल्कि *पर्यावरणीय परिवेश व पारिस्थितिकतंत्र का सुदृढ तानाबाना है।* कांकङ का पानी एवं कांकङ की मिट्टी, *मान मर्यादा का प्रतीक* भी माना गया है। कांकङ के पानी व मिट्टी की मर्यादा बचाने केलिये महाघमासान होते रहे हैं और *सुभट-शूरमा प्राण न्योछावर* करते रहे हैं। कांकङ क्षेत्रीय *सीमारेखा* भी है। कांकङ का पानी *क्षेत्रीय संसाधनों व स्वावलंबन का प्रतीक* भी माना जाता है। संसाधनों में *जल, जमीन, जंगल व जन्तु* सभी सम्मिलित होते हैं। मनुष्य स्वंय *सर्वाधिक सबल, समर्थ व मूल्यवान* संसाधन है। कांकङ के पानी याने, संसाधन संरक्षण आज की सर्वाधिक *विकट व ज्वलन्त समस्या है।*
क्षेत्रीय शासकों की *अदूरदर्शीता एवं अकर्मण्यता* के कारण कांकङ व कांकङ का पानी सूखता जा रहा है या *प्रदुषित एवं विशेला* होता जा रहा है। संकेन्द्रित शहरीकरण की आत्मघाती नीति के तहत आज के *गाँव विरान कब्रिस्तान बनते जा रहे हैं तो नगर, आबादी के बोझ* तले दबते जा रहे हैं। कांकङ का पवित्र पानी, *शहरी मलमूत्र* का हिस्सा बन, प्रदुषित होता जा रहा है और अपनी उपयोगिता खो रहा है। यहाँ कांकङ के पानी से तात्पर्य, *मनुष्य सहित जैविक एवं अजैविक* समस्त ग्रामीण संसाधनों से है। यदि कांकङ के पानी को सहेजा जाय अर्थात गाँवों के *स्वाभिमान व स्वावलंबन को संरक्षित* कर दिया जाय तो सहज ही सभी गांव, *आदर्श गाँव* और सभी शहर, *स्मार्ट शहर* बन जायेंगे। सहज ही भारत *आत्मनिर्भर* हो जायेगा। गरीबी व भूखमरी स्व॔य *अपनी मौत* मर जायेगी। सबका साथ, सबका विकास व सबका सहयोग *सहज सुलभ* हो जायेगा। ग्रामीण कांकङ के पानी को *प्रदुषित* होने से बचा लिया जाय तो शेष सबकुछ, *सहज ही शुभ और सुखद हो जायेगा। एक प्रयास करके देखो।*
लेखन साभार
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