28/09/2025
भाग २ : छायाओं का समझौता
तिलस्मी नदी लौट आई थी और सहर नगर फिर से प्रकाश में नहा उठा। लोग खुशी मना रहे थे, लेकिन रैहाना के मन में बेचैनी थी। किताब के अंतिम पन्ने पर लिखा वाक्य उसकी आँखों के सामने घूमता रहा —
"यह तो शुरुआत है, असली परीक्षा अभी शेष है..."
एक रात दीपों के भवन से नीली आभा निकलने लगी। रैहाना अंदर पहुँची तो किताब अपने आप खुल गई। पन्नों पर नए शब्द उभरे:
"प्रकाश की रक्षा करने के लिए तुझे छायाओं के साथ समझौता करना होगा। यदि वे शांत न हुए, तो सहर नगर फिर अंधकार में डूब जाएगा।"
रैहाना चौंक उठी। छायाएँ वही भयानक प्राणियाँ थीं, जिन्होंने उसकी यात्रा में बार-बार हमला किया था। उनसे समझौता कैसे हो सकता था? मगर किताब का आदेश टाला नहीं जा सकता था।
अगली सुबह उसने अकमल से कहा,
“हमें उन छायाओं से मिलना होगा। वे हमारे शत्रु नहीं, बल्कि अधूरी कहानियों के रक्षक हैं। किताब यही इशारा कर रही है।”
दोनों पुनः यात्रा पर निकले। कई दिनों तक जंगलों और पहाड़ों को पार करते हुए वे उस घाटी में पहुँचे, जहाँ पहली बार छायाओं का सामना हुआ था। घाटी अब और भी घने अंधकार से ढकी हुई थी।
रैहाना ने आवाज़ दी —
“हे छायाओं! मैं तुमसे लड़ने नहीं, बल्कि समझौता करने आई हूँ। सामने आओ।”
धीरे-धीरे धुंध से दर्जनों परछाइयाँ निकलीं। उनकी लाल आँखें जल रही थीं। सबसे बड़ी छाया बोली,
“तुम प्रकाश की रक्षक हो। लेकिन याद रखो, बिना अंधकार के प्रकाश का अस्तित्व अधूरा है। हम संतुलन के रक्षक हैं। मनुष्य हमें नष्ट करना चाहता है, इसलिए हम उसका विरोध करते हैं।”
रैहाना ने साहस से उत्तर दिया,
“यदि संतुलन ही उद्देश्य है, तो हमें शत्रु क्यों बनना पड़ा? आओ, हम मिलकर नई राह निकालें।”
छाया बोली,
“तुम्हें अपनी सच्चाई सिद्ध करनी होगी। यदि तुम वास्तव में निस्वार्थ हो, तो हमारे परीक्षण में सफल होना पड़ेगा। तीन द्वार होंगे। हर द्वार पर तुम्हारे मन की कमजोरी सामने आएगी। यदि हार गई, तो यहीं सदा के लिए कैद हो जाओगी।”
रैहाना ने सहमति दी।
पहला द्वार खुला। वहाँ उसे अपने माता-पिता की छवियाँ दिखीं, जो उसे पुकार रहे थे:
“घर लौट आओ, यह सब छोड़ दो।”
रैहाना की आँखें भर आईं, पर उसने दृढ़ता से कहा,
“मेरा कर्तव्य पूरे गाँव के प्रति है। मैं लौट नहीं सकती।”
छवियाँ विलीन हो गईं।
दूसरे द्वार पर सोने-चाँदी के पहाड़ रखे थे। आवाज़ आई:
“सब धन तुम्हारा हो सकता है, बस किताब छोड़ दो।”
रैहाना मुस्कुराई,
“प्रकाश को धन से नहीं खरीदा जा सकता।”
धनराशि धूल में बदल गई।
तीसरे द्वार पर अकमल बंधा हुआ था। छाया बोली,
“यदि उसे मुक्त करना चाहो, तो स्वयं यहीं रहना होगा।”
क्षणभर के लिए रैहाना हिचकिचाई, फिर बोली,
“मैं तैयार हूँ। अकमल को जाने दो।”
तुरंत बंधन टूटे और अकमल मुक्त हो गया।
सारी छायाएँ एक साथ झुक गईं। प्रमुख छाया ने कहा,
“तुमने तीनों परीक्षाएँ पार कर लीं। अब हम प्रकाश के विरुद्ध नहीं जाएँगे। सहर नगर सुरक्षित रहेगा। लेकिन याद रखना — अगली बार जब अंधकार उठेगा, वह भीतर से आएगा, बाहर से नहीं।”
इतना कहकर छायाएँ धुंध में विलीन हो गईं।
रैहाना और अकमल लौटे तो दीपों का भवन चमक रहा था। किताब फिर खुल गई और उस पर नए शब्द उभरे:
"छायाएँ अब तुम्हारी सहयोगी हैं। परन्तु प्रकाश के भीतर छिपा अंधकार ही अगली चुनौती होगा। तैयार रहो।"
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