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कश्यप ऋषिजिसका कोई गोत्र ज्ञात नहीं होता उसे कश्यप गोत्र का मान लेने की मान्यता है इस मृत्युलोक का एक नाम "संसार" पड़ने क...
30/04/2026

कश्यप ऋषि

जिसका कोई गोत्र ज्ञात नहीं होता उसे कश्यप गोत्र का मान लेने की मान्यता है

इस मृत्युलोक का एक नाम "संसार" पड़ने का रहस्य

कश्यप नाम के कई ऋषि हुए हैं, जिनमें से एक की गणना प्रजापतियों में होती है। इस ऋषि ने दक्ष की दिति, अदिति, दनु आदि नाम की सत्रह कन्याओं से विवाह किया था। अदिति के गर्भ से देवता उत्पन्न हुए। दिति ने दैत्यों को और दनु ने दानवों को जन्म दिया। कश्यप एक गोत्र का नाम भी है। यह गोत्र इतना व्यापक है कि जिसके गोत्र का पता नहीं चलता, उसका गोत्र कश्यप मान लिया जाता है क्योंकि सभी जीव-धारियों की उत्पत्ति कश्यप से ही मानी जाती है।

हमारा गोत्र काश्यप है जिसे कश्यप ऋषि के नाम पर ही नामकरण किया गया है। हमारे कुल के पूर्वज सर्वप्रथम “किशनगढ़-बास” में आकर बसे इसलिए “किशनगढ़ बास वाले” कहलाने लगे, जिनकी कुलदेवी का नाम अर्चट रखा गया। हमारे गोत्र के ऋषि कश्यप के बारे में कुछ जानकारी निम्न प्रकार है –

आदिकाल में लोकप्रिय ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना करने हेतु अपने शरीर से दस मानस पुत्रों को जन्म दिया। इनमें प्रजापति ब्रह्मा की गोद से नारद, अंगूठे से दक्ष, प्राण से वशिष्ठ, त्वचा से भृगु, हाथ से क्रतु, नाभि से प्रलय, कानों से पुलस्त्य, मुख से अंगिरा, नेत्रों से अत्रि, और मन से मारीच उत्पन्न हुए। इनमें से नारद जी जैसे कुछ ऋषियों ने वर्षों तक तपस्या करने के बाद सृष्टि रचना में कोई रूचि नहीं दिखाई। तब ब्रह्माजी ने अपने शरीर के एक भाग से स्वायम्भु मनु और दूसरे भाग से शतरूपा का स्त्री पुरुष का जोड़ा प्रकट किया तथा उन्हें मैथुन क्रिया से सृष्टि की रचना करने का आदेश दिया। ब्रह्मा पुत्र मारीच ऋषि का विवाह कर्दम ऋषि की पुत्री कला से हुआ जिससे उनके दो पुत्र कश्यप और पूर्णिमा उत्पन्न हुए। कश्यप ऋषि का जन्म कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को हुआ था। उनका विवाह दक्ष की कन्या अदिती से हुआ जिनके गर्भ से दो आसुरी प्रकृति के अत्यन्त बलशाली पुत्रों ने जन्म लिया जिनके नाम थे हिरण्याक्ष एवं हिरण्यकशिपु, जिनको भगवान ने स्वयं वाराह तथा नरसिंह अवतार लेकर संहार किया।

अपार दिव्यदृष्टि से पूर्ण महर्षि कश्यप ऋषि को ब्रह्मदेव के मानस पुत्र कहे जाते हैं। इस प्रकार महर्षि कश्यप ब्रह्मदेव के पोते हुए। महर्षि कश्यप अपनी आयु के अनुसार प्रजापति दक्ष की सत्रह (17) कन्याओं से विधि पूर्वक विवाह किया और सृष्टि की रचना रचने लगे। संसार में हर प्रकार के प्राणी और जातियां महर्षि कश्यप की इन्ही सत्रह (17) पत्नियों की संतानें मानी जाती हैं इसी कारण महर्षि कश्यप की पत्नियों को लोकमाता का दर्जा देकर लोकमाता कहा जाने लगा। मानव के १७ कन्याओं के पुत्र होने के कारण, १७ की संख्या के अपभ्रंश नाम को लेकर इस लोक को 'संसार' कहा गया !

पौराणिक उल्लेख................

प्राचीन वैदिक ॠषियों में प्रमुख ॠषि, जिनका उल्लेख एक बार ऋग्वेद में हुआ है। अन्य संहिताओं में भी यह नाम बहुप्रयुक्त है। इन्हें सर्वदा धार्मिक एवं रह्स्यात्मक चरित्र वाला बतलाया गया है एवं अति प्राचीन कहा गया है।

ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार उन्होंने 'विश्वकर्मभौवन' नामक राजा का अभिषेक कराया था। ऐतरेय ब्राह्मणों ने कश्यपों का सम्बन्ध जनमेजय से बताया गया है।

शतपथ ब्राह्मण में प्रजापति को कश्यप कहा गया है..............

"स यत्कुर्मो नाम। प्रजापतिः प्रजा असृजत।
यदसृजत् अकरोत् तद् यदकरोत् तस्मात् कूर्मः कश्यपो वै कूर्म्स्तस्मादाहुः सर्वाः प्रजाः कश्यपः।"

महाभारत एवं पुराणों में असुरों की उत्पत्ति एवं वंशावली के वर्णन में कहा गया है कि ब्रह्मा के छः मानस पुत्रों में से एक 'मरीचि' थे जिन्होंने अपनी इच्छा से कश्यप नामक प्रजापति पुत्र उत्पन्न किया।

कश्यप ने दक्ष प्रजापति की 17 पुत्रियों से विवाह किया। दक्ष की इन पुत्रियों से जो सन्तान उत्पन्न हुई उसका विवरण निम्नांकित है -

अदिति से आदित्य (देवता)

दिति से दैत्य

दनु से दानव

काष्ठा से अश्व आदि

अनिष्ठा से गन्धर्व

सुरसा से राक्षस

इला से वृक्ष

मुनि से अप्सरागण
क्रोधवशा से सर्प
सुरभि से गौ और महिष

सरमा से श्वापद (हिंस्त्र पशु)

ताम्रा से श्येन-गृध्र आदि

तिमि से यादोगण (जलजन्तु)

विनता से गरुड़ और अरुण

कद्रु से नाग

पतंगी से पतंग

यामिनी से शलभ

भागवत पुराण, मार्कण्डेय पुराण के अनुसार कश्यप की तेरह भांर्याएँ थीं। उनके नाम हैं-

दिति, अदिति, दनु, विनता, खसा, कद्रु, मुनि, क्रोधा, रिष्टा, इरा, ताम्रा, इला, और प्रधा। इन्हीं से सब सृष्टि हुई।

कश्यप एक गोत्र का भी नाम है। यह बहुत व्यापक गोत्र है। जिसका गोत्र नहीं मिलता उसके लिए कश्यप गोत्र की कल्पना कर ली जाती है, क्योंकि एक परम्परा के अनुसार सभी जीवधारियों की उत्पत्ति कश्यप से हुई।
एक बार समस्त पृथ्वी पर विजय प्राप्त कर परशुराम ने वह कश्यप मुनि को दान कर दी। कश्यप मुनि ने कहा-'अब तुम मेरे देश में मत रहो।' अत: गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए परशुराम ने रात को पृथ्वी पर न रहने का संकल्प किया। वे प्रति रात्रि में मन के समान तीव्र गमनशक्ति से महेंद्र पर्वत पर जाने लगे।

महर्षि कश्यप ने वेदों का अध्ययन किया तथा ऋग्वेद की ऋचाएँ भी लिखीं। जमदग्नि-नन्दन परशुरामजी ने सारी पृथ्वी पर आततायी क्षत्रिय राजाओं का विनाश कर अश्वमेध यज्ञ किया था जिसके पुरोहित महर्षि कश्यप थे। यज्ञ की समाप्ति पर परशुरामजी ने अधीन सारी पृथ्वी कश्यप ऋषि को दान में दी थी तथा अपने लिए भारत के पश्चिमी तट पर समुद्र से नई भूमि लेकर रहे। इस प्रकार कश्यप ऋषि को पृथ्वी का स्वामी व सृष्टि-कर्ता के रूप में पूजा जाता है।

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