26/09/2025
आज का बिहार और मुसलमानों की राजनीतिक ताक़त — एक शोधपरक समीक्षा
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प्रस्तावना
बिहार की राजनीति में मुसलमान आबादी के लिहाज़ से हमेशा निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। राज्य में लगभग 17 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, जो 50 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों और कई संसदीय सीटों पर परिणाम को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। यही कारण है कि हर बड़ी राजनीतिक पार्टी मुसलमानों का वोट हासिल करने के लिए संघर्ष करती है। लेकिन सवाल यह है कि आज़ादी के बाद से अब तक क्या किसी पार्टी ने मुसलमानों को वह हक़ दिया, जिसके वे हक़दार थे? हक़ीक़त यही है कि सबने वोट तो लिया, लेकिन हक़ देने के मामले में सिर्फ़ वादे ही किए गए।
आरजेडी और मुसलमानों की राजनीति
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने दशकों तक मुसलमानों को अपना मज़बूत वोट बैंक बनाया। लालू प्रसाद यादव के दौर में यह कहा जाता था कि "मुसलमान और यादव" आरजेडी की जीत की गारंटी हैं। मुसलमानों ने भर-भर कर वोट दिया, लेकिन बदले में उन्हें राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्तर पर वह हिस्सेदारी नहीं मिली, जिसके वे हक़दार थे। प्रतिनिधित्व मिला भी तो सीमित स्तर पर, और विकास के असली दरवाज़े आज भी उनके लिए बंद हैं।
सेक्युलर गठबंधन और मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन
महागठबंधन (आरजेडी, कांग्रेस और अन्य सेक्युलर दल) हमेशा खुद को मुसलमानों का संरक्षक बताते रहे हैं, लेकिन अगर उनके रिकॉर्ड पर नज़र डालें तो वे केवल "हमदर्दी की राजनीति" करते दिखते हैं। दूसरी ओर, मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने सीमांचल में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है और वहाँ के पिछड़े मुसलमानों की बात की है, लेकिन वोटों के बँटवारे का ख़तरा भी सच्चाई है। यही बँटवारा मुसलमानों की असली ताक़त को कमज़ोर करता है।
जेडीयू और मुसलमानों का रवैया
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने समय-समय पर मुसलमानों के लिए कुछ सकारात्मक कदम उठाए, जैसे अल्पसंख्यक कल्याण बोर्ड और शैक्षिक योजनाएँ। लेकिन बीजेपी के साथ गठबंधन ने उनकी इस छवि को नुक़सान पहुँचाया। नतीजा यह है कि मुसलमान जेडीयू को लेकर हमेशा शक और संशय में रहते हैं।
सीमांचल और शेरशाहाबादी तबक़ा — एक नज़रअंदाज़ किया हुआ इलाक़ा
बिहार का सीमांचल क्षेत्र (किशनगंज, अररिया, पूर्णिया, कटिहार आदि) मुसलमानों की बहुसंख्यक आबादी वाला इलाक़ा है, जहाँ ख़ास तौर पर शेरशाहाबादी तबक़ा बड़ी तादाद में रहता है। यह तबक़ा ग़रीबी, बेरोज़गारी, शिक्षा की कमी और बुनियादी सुविधाओं से महरूम है। लेकिन हक़ीक़त यह है कि सभी राजनीतिक दलों ने इस क्षेत्र को हमेशा नज़रअंदाज़ किया। यहाँ के लोगों को सिर्फ़ वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया गया, उनके मसलों पर कभी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया। यह एक ऐसा "लम्हा-ए-फ़िकरिया" है जिस पर न केवल वहाँ के लोग बल्कि पूरे बिहार के मुसलमानों को सोचना होगा।
निष्कर्ष और सुझाव
विश्लेषण यह बताता है कि अब तक किसी भी पार्टी ने मुसलमानों को वह हिस्सेदारी और न्याय नहीं दिया, जिसके वे हक़दार हैं। आरजेडी ने सबसे अधिक वोट तो लिए मगर समान प्रतिनिधित्व नहीं दिया। सेक्युलर गठबंधन ने वादे किए मगर पूरे नहीं किए। जेडीयू ने कभी नज़दीकी तो कभी दूरी का रवैया अपनाया। और मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन की आमद से नई आवाज़ तो पैदा हुई, लेकिन इससे वोटों के बँटवारे का ख़तरा भी बढ़ गया।
इसलिए मुसलमानों के लिए ज़रूरी है कि वे एकजुट और जागरूक राजनीतिक रणनीति अपनाएँ। वोट देने से पहले केवल नारों या भावनाओं पर नहीं, बल्कि व्यावहारिक प्रदर्शन और भविष्य की नीतियों को देखकर फ़ैसला करें। सीमांचल जैसे इलाक़े और शेरशाहाबादी जैसे तबक़े की महरूमी दूर करना किसी भी राजनीतिक दल की प्राथमिकता होनी चाहिए। वरना यह महरूमियाँ और नज़रअंदाज़ किए जाने का सिलसिला हमेशा जारी रहेगा।