ध्यान योग और साधना

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25/02/2026

साधक और सफलता :१३
प्रकृति में यह ऊर्जा परिष्करण का कार्य सतत् चलता रहता है और सभी पदार्थ एक अभीष्ट लक्ष्य की ओर अनवरत बढ़ रहे हैं मानो वे किसी को प्राप्त होना चाहते हों । इन सभी में यदि जैसे स्थूल ऊर्जा अथवा सूक्ष्म ऊर्जा जैसा कि पिछले पृष्ठ पर इसकी चर्चा की जा चुकी है कि बीज अपने मुक्ति के क्रम में तब तक बीज बनेगा जब तक कि उसका दूसरे उससे ऊपर के जीव द्वारा उसको पूर्ण ग्रहण न कर लिया जाए में अभीष्ट और सबसे उन्नत ऊर्जा किसे माना जाएगा । क्या वह ऊर्जा जो अपनी मुक्ति के क्रम में जन्म पर जन्म ले रही है या वह ऊर्जा जो इन सभी के केंद्र में हो कर इस जन्म मरण अथवा किसी भी बंधन से मुक्त है? निःसंदेह कहा जा सकता है कि सबसे परिष्कृत और शुद्ध ऊर्जा जो इन सभी में होते हुए भी सभी से मुक्त है ,सभी के केंद्र में है , सभी के लक्ष्य का अभीष्ट रूप है और सभी मूल रूप से वही केंद्र रूप हैं , वह कभी नहीं बदलता , कभी जन्म नहीं लेता और कभी कहीं आता - जाता भी नहीं है । वह स्वयं केंद्र है सभी जीवन का ,सूक्ष्म का भी और अनंत का भी और इन के बीच स्थित मध्य का भी । वह अत्यंत शुभ है ,आनंदमय है और जिसे हम भाव विभोर हो कर परमात्मा अथवा ईष्ट कहते हैं । सभी ऊर्जाओं में सबसे श्रेयस्कर ऊर्जा का रूप जिससे सभी निकलते हैं और फिर उसी में समाहित हो जाना चाहते हैं । वह हम सभी के अंतस में बैठा हमारे ही आने की प्रतिक्षा कर रहा है । ध्यान का और ध्यानियों का , योग का और योगियों का ,मनन का और मुनियों का , साधना का और साधक का और किसी भी विज्ञान का परम लक्ष्य मात्र वही है ।
असंख्य ऊर्जा केंद्र उस एक अभीष्ट केंद्र की ओर बहुत ही मौन परन्तु अत्यंत शक्ति के साथ बढ़ते चले आ रहे हैं । आप नास्तिक हैं या आस्तिक , सत्व गुण हैं या तम से युक्त अथवा जीव में कोई भी जीव ,मनुष्य में कोई भी मनुष्य , आपको कोई भी उस ओर बढ़ने से रोक नहीं सकता ।
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अस्तु।

17/01/2026

साधक और सफलता :१४
पिछले पृष्ठ पर हमने ऊर्जा विभाजन और जीवन चक्र से मुक्ति के कारण और अभीष्ट उपाय के बारे में विचार किया ,अब हमारा प्रश्न इस बिंदु पर ठहरता है कि हम माता हैं ? पिता हैं या खाद्य के ऊर्जा का रूपांतरण है ? हम इन तीनों में कोई भी नहीं हैं ,कारण कि ऊर्जा का गठन हुआ ,रूपांतरण हुआ और ऊर्जा ने एक नया स्वरूप धारण किया ,यह निश्चित ही वह ऊर्जा है जो समय के साथ रूपांतरित होती है परन्तु हमारे भीतर कुछ ऐसा है जो इन तीनों ऊर्जा के गठन का कारण बनता है और इनके गठित रहते हुए इन्हें त्याग देता है जिसे हम मृत्यु कहते हैं । जब तक यह ऊर्जा विद्यमान रहती है ,इनका गठन बना रहता है और जीवन से पूर्ण माना जाता है,और जैसे यह ऊर्जा इन्हें त्यागती है इनको निर्जीव मान लिया जाता है । एक प्रमाण में और हम देखते हैं कि जब ऊर्जा का उचित गठन होता है तो यह ऊर्जा ठीक उसके बाद प्रमाणित होती है जिसे जन्म कहा जाता है अर्थात ऊर्जा के केंद्र में यही ऊर्जा है जो इससे सर्वथा अलग होती है और यह तीनों ऊर्जा उसके अधीन होती है । इस प्रकार यह ऊर्जा सभी ऊर्जा के केंद्र में है और जैसे ही यह मिश्रित परिधि अथवा पिंड छोड़ कर आगे बढ़ता है ,जीवन रूपी भौतिक ऊर्जा भी विघटित हो जाती है और अगले चक्र में प्रवेश कर जाती है । इस केंद्रीय ऊर्जा को आत्मा अथवा ईश्वर (अंश) की संज्ञा दी जाती है और यह सभी ऊर्जा का स्रोत और आधार होते हुए भी किसी का आधार नहीं लेता और यह सभी में परिलक्षित होता है परन्तु इसमें कोई परिलक्षित नहीं होता है । तीनों ऊर्जा जन्म लेती है और मरती भी है परन्तु यह न जन्म लेता है और न ही मरता है ।यह केंद्रीय ऊर्जा सदैव विद्यमान है और जहां प्रकट होता है ,जीवन वहीं विद्यमान होता है ।इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि यह ऊर्जा मात्र यात्रा करती है और पड़ाव ग्रहण करती है और हम सभी इन तीनों ऊर्जाओं में से कोई भी नहीं हैं । हम शुद्ध ,सात्विक और अविनाशी ऊर्जा हैं जो स्थूल और सूक्ष्म से परे हैं हम बिंदु के स्तर पर भी विद्यमान हैं और ब्रह्माण्ड के स्तर पर भी ,क्यों कि जो सभी में भाग लेता है और जिसमें कोई भाग नहीं लेता ,जो सभी से मुक्त है , उस पर उपरोक्त यही तथ्य परिभाषित किया जाता है ।
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ध्यान योग और साधना परिवार के बीस हजार सम्मानित साधकों को बहुत - बहुत साधुवाद ।
मैं अपने सभी सम्मानित साधकों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता हूं और उनके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूं ।
अस्तु।

06/01/2026

साधक और सफलता :१३
इस प्रकार हम देखते हैं कि ऊर्जा विभाजन के क्रम में हम अपने चक्र से तब तक मुक्त नहीं होते जब तक कि हमें कोई और चक्र का प्राणि पूर्ण रूप से ग्रहण न कर ले । इस प्रकार जन्म लिए जीव की सार्थक उपयोगिता यही है कि उसे उससे श्रेष्ठ चक्र का प्राणि ग्रहण करे और उसे उसके उस जन्म - जन्मांतर के चक्र से मुक्त करे । इन चक्रों का जब हम विहंगम और गहन दर्शन और अनुभूति करते हैं तो यह एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया से गुजराती हुई प्रतीत होती है जैसे - ग्रहण करने के पश्चात भी कुछ अंश निकृष्ट और अपशिष्ट हो जाता है ,जिसे ऊर्जा के रूप में अन्य निकृष्ट प्राणि ग्रहण कर लेते हैं जैसे किसी फल को किसी प्राणि ने बीज सहित ग्रहण किया और पूरी तरह पाचन के अभाव में वह फिर अपशिष्ट के रूप में बाहर आ जाता है जिसे कोई भूमिगत जीव ग्रहण करता है ,फिर वह ऊर्जा या तो उस जीव का भाग हो जाएगा या फिर बीज रूप में फिर पेड़ और फल बनेगा । इस विचार से यह सिद्ध होता है कि मुक्त होने के लिए ऊर्जा सदैव ऊपर की ओर प्रवाहित होनी चाहिए और इसके साथ परम शक्ति की कृपा भी इस भाव से होनी चाहिए कि जब तक हमें कोई पूर्ण रूप से हमसे श्रेष्ठ ग्रहण नहीं कर लेता ,हमारी मुक्ति संभव नहीं । शायद इसी भाव से प्रेरित हो कर हम सभी साधक प्रार्थनीय भाव से अपने ईष्ट से समर्पण दिखाते हैं और सदैव यह प्रार्थना करते हैं कि हमारे ईष्ट हमें ग्रहण करें और अपने श्रीचरणों में स्थान दें । चूंकि निकृष्टता हमें और ज्यादा अपने चक्रों में बांधेगी और उत्कृष्टता हमें भय , तृष्णा और अज्ञानता से मुक्त करते हुए जन्म - मरण के बंधन से भी मुक्त करेगी और हम सभी यह मानते हैं कि एक साधक से उत्कृष्ट मात्र ईष्ट देव ही हो सकते हैं ,इसलिए हम उनसे उनके प्रति अपने पूर्ण समर्पण की शक्ति की प्रार्थना करते हैं । और जब ऐसा होता है तो हम सहज ही इन चक्रों से मुक्त हो पाते हैं । ठीक है अब हम अपने मूल बिंदु पर आते हैं कि ऊर्जा के इन तीन स्वरूपों में से हमारा स्वरूप क्या है ?
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अस्तु।

15/12/2025

साधक और सफलता :१२
जब हम ऐसा विचार करते हैं कि हमारा मूल स्वरूप क्या है? आम का, माता का या फिर पिता का ? आध्यात्मिकता यहीं से प्रारंभ होती है और हम इस विचार के साथ आगे बढ़ते हैं कि हमारा मूल स्वरूप क्या है , हम आए कहां से और हमें जाना कहां तक है । सारे प्रश्न इस आधार से जुड़ते चले जाते हैं और हमारी जीवन के रहस्यों के प्रति जिज्ञासा भी बढ़ती चली जाती है । फिर स्वानुभूति , अंतर ज्ञान और वाह्य ज्ञान के सारे रास्ते हम अपने लिए खोल लेते हैं जिससे जीवन के इस रहस्य को सुलझाया और समझा जा सके ,परन्तु बहुधा ऐसे साधक हैं जो यह खोज मात्र अतिरिक्त समय के साधन के रूप में देखते हैं और अन्यान्य गतिविधियों में अपना समय बेकार करते हैं । अब हम अपने मूल बिंदु पर आते हैं , जब हमारे मन में यह विचार आता है कि हम इन तीन अंशों में से मूल रूप से किस अंश से हैं तो हम पाते हैं कि यदि अपवाद छोड़ दिया जाए तो हमारा शरीर इन सभी तीन अंशों का मिश्रण है जो आधारभूत पांच तत्वों के मेल से बने हैं । भौतिक स्तर पर देखा जाए तो आम की जो मूल ऊर्जा है वह उसके बीज में निहित है जो भूमि पा कर पेड़ फिर ढेर सारे आम और फिर कई सारे बीज बनता है अर्थात उसका मूल बीज से प्रारंभ हो कर पुनः बीज पर ही खत्म होता है अथवा प्रारंभ होता है । उस बीज का यह चक्र तबतक चलता रहता है जबतक कि उसे कोई दूसरा जीव अथवा जानवर पूर्ण रूप से ग्रहण न कर ले । इस चक्र को यदि हम चार से पांच बार भी जोड़ कर देखें तो एक बीज पूरा आम के वन का रूप ले चुका होगा अर्थात अपने जीवन चक्र से बंधा आम अपने ऊर्जा विभाजन के क्रम में एक पूरे वन को जन्म दे देता है परन्तु अपने बंधन से वह मुक्त तब तक नहीं हो पाता जब तक उसके बीज को कोई दूसरा प्राणि ग्रहण न कर ले । फिर वह उस प्राणि के अंदर पेड़ का रूप नहीं ले पाता और ऊर्जा विभाजन के रूप में वह ग्रहण किए गए प्राणि की ऊर्जा में चला जाता है । अर्थात उसके अंदर जो वन बनाने की शक्ति थी वह उस जानवर को प्राप्त हुई और उसका कुछ अंश उसकी आने वाली पीढ़ियों के रूप में विभाजित हुई । यह विभाजन भी तब तक होगा जबतक कि उसे किसी दूसरे प्राणि ने ग्रहण न कर लिया हो ।
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अस्तु ।

10/12/2025

साधक और सफलता :११
पूर्वोक्त लेख के माध्यम से हमने एक दूसरे से अपने उत्पत्ति के मूल स्वरूप को समझा , अब हम उत्पत्ति के बाद के जीवन का संदर्भ ग्रहण करें तो हम पाएंगे कि उस पेड़ को पौधे से वृक्ष बनने, जानवर को बड़े होने के लिए उन्हीं सब घटकों की जैसे भोजन , जल ,सूर्य की किरण , हवा , मिट्टी और बारिश की आवश्यकता पड़ती है जिसकी आवश्यकता एक उत्तम कोटि के मनुष्य को भी पड़ती है । यदि कभी हम यह समझ भी लें कि जानवर निम्न कोटि का भोजन ग्रहण करता है तो इसके पीछे भी हमारा अलगाव वाला बाध्य विचार ही कारक है । हम सभी श्रेष्ठ वस्तुओं पर मात्र अपना अधिकार मान कर चलते हैं जबकि प्रकृति ऐसा कभी नहीं करती । यदि हम प्रकृति की समानता के सौवें हिस्से की भी सभी प्राणियों में समानता कर पाएं तो हम साधक की वास्तविक सफलता को मूल रूप से प्राप्त कर पा रहे हैं । ठीक है ,उपरोक्त विचार जीवन के प्रति थे ,अब हम जीवन प्राप्ति से पहले के मूल स्वरूप की चर्चा करेंगे कि हम जानवर ,पेड़ अथवा मनुष्य बनने के पहले उस आम में अथवा उस भोजन के अंश में किस रूप में विद्यमान थे जो शरीर रूपी भूमि प्राप्त कर कैसे अन्नग्राहक जैसे शरीर को प्राप्त कर जीवन को प्राप्त करता है । अब प्रश्न यह उठता है कि क्या हम पूर्ण रूप से उस आम में थे या ग्रहण करने वाले पिता में थे या जन्म देने वाली मां में थे,यह निश्चित ही एक रोचक प्रश्न है जिस पर प्रायः हमारे चित्त में विचार उठते रहते है । हम इन तीन प्राणियों में से मूल रूप से किसमें थे , हमारा स्वरूप किसके ज्यादा तुल्य है ? कौन हमारा मूल है । क्योंकि किसी एक के बिना हम संभव नहीं थे ।
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अस्तु।

01/12/2025

साधक और सफलता : १०
पूर्वोक्त लेख के क्रम में जब हम उन लकड़ियों को देखते हैं या फिर बाहर विचरण कर रहे किसी जानवर को जैसे घोड़े , कुत्ते अथवा कोई अन्य घरेलू या कोई जंगली जीव तो हमारी धारणा सर्व प्रथम उसे हमसे सर्वथा भिन्न मान लेती है ,जबकि उसका वास्तविक स्वरूप ऐसा नहीं है । हम जब आध्यात्मिक स्तर पर गहराई में उतरते हैं और बाध्य विचारों के परे जाते हैं तो हम देखते हैं कि उस लकड़ी अथवा उस जानवर का मूल स्वरूप और उत्पत्ति का बिंदु वहीं पर मिलता है जहां किसी महामानव का स्वरूप मिलता है । इसे हम इस प्रकार समझते हैं कि मान लीजिए - आप कोई आम खाते हैं जो एक वृक्ष से लिया गया है ।जिसका कुछ अंश आपकी पत्नी खाती है और बचा हुआ अंश फेक दिया जाता है जिसे वह जानवर ग्रहण करता है ।अब हम देखेंगे कि एक वृक्ष का एक ही फल तीन प्राणियों ने ग्रहण किया । उस आम को तीनों के शरीर ने भली भांति ग्रहण किया और ऊर्जा के रूप में पहले रक्त फिर मज्जा और वीर्य के रूप में परिवर्तित हुआ । अब परिणाम स्वरूप तीन प्राणियों के ग्रहण करने ,उसके परिवर्तित होने ,उनके संतति और उससे उत्पन्न बच्चे तक उस आम का ऊर्जा विभाजन होता रहा । आम एक था ,उसकी ऊर्जा भी एक है ,मात्र भौतिक अंश विभाजित हुआ और आम का एक अंश जानवर बना और एक मनुष्य ।उस आम का बीज भूमि पा कर पेड़ बना और लकड़ी के रूप में परिवर्तित हुआ ,हो सकता है कि जिस कक्ष में आप हैं उसकी खिड़की अथवा दरवाजा का कार्य कर रहा हो । आप तीन अलग - अलग प्राणियों का स्वरूप भौतिक रूप से अलग है परन्तु उसकी उत्पत्ति एक ही आम से हुई है इसलिए आप तीनों की उत्पत्ति और मूल स्वरूप वह आम है जो एक था ,यह भी हो सकता है कि उस आम को ग्रहण करते समय उसका कुछ अंश भूमि पर गिरा हो जिसे बहुत सारे कुछ अन्य जीवो जैसे चींटियों ने ग्रहण किया हो । ऐसे में उससे उत्पन्न चींटी भी हमारे ही अर्थात उस आम के ही मूल स्वरूप का भाग है ।
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शुभ दीपावली :   हमारे देश की विहंगम विभिन्नता और बहुतायत जातियों ,प्रथाओं और मान्यताओं के मध्य जो सेतु का कार्य है वह हम...
20/10/2025

शुभ दीपावली :
हमारे देश की विहंगम विभिन्नता और बहुतायत जातियों ,प्रथाओं और मान्यताओं के मध्य जो सेतु का कार्य है वह हमारी समृद्ध सनातन संस्कृति अपने पर्व और त्यौहारों के माध्यम से करती है । इसमें कोई संदेह नहीं कि विश्व में जितनी भी महान संस्कृतियां हैं वे सभी पर्वों के माध्यम से ही लोकप्रिय और पुष्ट होती हैं । दीपावली भी हमारी महान सनातन संस्कृति का एक अभिन्न पर्व है और भगवान श्री राम हर भारतीय के अधिष्ठाता हैं । जय श्री राम ,जय सीता राम , जय दीपावली ,विजय दीपावली ।
सभी सम्मानित साधकों को दीपावली पर्व की बहुत - बहुत बधाई और मंगल कामनाएं ।

06/10/2025

साधक और सफलता :९
पूर्वोक्त लेख के भाग ८ में हमने यह चर्चा की थी कि वैराग्य ,साधना और साधक एक दूसरे से रिक्त हो कर अधूरे हैं और वैराग्य के अभाव में साधना मात्र एक लौकिक प्रपंच रह कर ठहर जाता है । ऐसे में सन्यासी के लिए जीवन का कोई अर्थ नहीं रह जाता और गृहस्थ के लिए अपनी जैविक उपार्जना को खतरे में डालने के समतुल्य होता है । ठीक है ,अब हम यह विचार करते हैं कि शीर्षक के अनुकूल वार्ता का इससे अभीष्ट सम्बन्ध कैसे प्रतीत होता है ,जैसे कि हमने सदैव दो पक्ष की वार्ता की है ,प्रथम सांसारिक और द्वितीय इसके समकक्ष आध्यात्मिक । हमारी वार्ता का मूल उद्देश्य साधक की वास्तविक सफलता से है और ऐसे में हमे बारम्बार सांसारिकता से आध्यात्मिकता की ओर मुड़ना होगा । हम आध्यात्मिकता की कोई वार्ता करेंगे तो भी उदाहरण स्वरूप सांसारिक घटनाओं और व्यवहारों का ही उल्लेख करेंगे ताकि हमारे सम्मानित साधक इन तत्वों को भली भांति समझ सकें । इसी क्रम में हम यह देखने का प्रयास करेंगे कि हमारी वास्तविक सफलता इस सांसारिकता से कैसे समान है और कैसे विपरीत है ? इसकी जड़े कैसे एक बिंदु पर मिलती हैं और कैसे यह हमारे जीवन को व्यापक रूप से प्रभावित करती हैं ।
जैसे आप मान लीजिए कि आप किसी कक्ष में हैं ,आप उसके दरवाजे अन्यथा खिड़की में लगी लकड़ियों को देखिए और विचार कीजिए कि इनका वास्तविक स्वरूप क्या था , वर्तमान अवस्था में पहुंचने से पूर्व इनका स्वरूप क्या था ,जैसे साधक कभी - कभी अपने स्वरूप के संबंध मे विचार करते हुए सोचता है कि उसका असल स्वरूप क्या है ?
शेष अगले लेख में ......................।
अस्तु ।

बहुत ही पारंपरिक रूप से रचित मां जगज्जननी के दर्शन ।
06/10/2025

बहुत ही पारंपरिक रूप से रचित मां जगज्जननी के दर्शन ।

02/10/2025

करुणामयी, जगज्जननी मां के अद्भुत दर्शन ।

29/09/2025

करुणामयी, जगज्जननी मां के अद्भुत दर्शन ।

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