18/12/2022
🌼🌼🌼🌼🌼श्रीमद्भगवद्गीता🌼🌼🌼🌼🌼
🌺🌺🌺🌺🌺साधक संजीवनी🌺🌺🌺🌺🌺
🌷🌷🌷श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी🌷🌷🌷
अध्याय : १ | श्लोक : १७-१८
काश्यश्च परमेष्वास: शिखण्डी च महारथ:।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजित:॥ १७॥
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वश: पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहु: शङ्खान्दध्मु: पृथक् पृथक्॥ १८॥
हे राजन्! श्रेष्ठ धनुषवाले काशिराज और महारथी शिखण्डी तथा धृष्टद्युम्न एवं राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद और द्रौपदीके पाँचों पुत्र तथा लम्बी-लम्बी भुजाओंवाले सुभद्रापुत्र अभिमन्यु(—इन सभीने) सब ओरसे अलग-अलग (अपने-अपने) शंख बजाये।
पृथिवीपते = हे राजन्!
परमेष्वास: = श्रेष्ठ धनुषवाले
काश्य: = काशिराज
च = और
महारथ: = महारथी
शिखण्डी = शिखण्डी
च = तथा
धृष्टद्युम्न: = धृष्टद्युम्न
च = एवं
विराट: = राजा विराट
च = और
अपराजित: = अजेय
सात्यकि: = सात्यकि,
द्रुपद: = राजा द्रुपद
च = और
द्रौपदेया: = द्रौपदीके पाँचों पुत्र
च = तथा
महाबाहु: = लम्बी-लम्बी भुजाओंवाले
सौभद्र: = सुभद्रापुत्र अभिमन्यु(—इन सभीने)
सर्वश: = सब ओरसे
पृथक्, पृथक् = अलग-अलग (अपने-अपने)
शङ्खान् = शंख
दध्मु: = बजाये।
'काश्यश्च परमेष्वास:.....शङ्खान् दध्मु: पृथक् पृथक्’—महारथी शिखण्डी बहुत शूरवीर था। यह पहले जन्ममें स्त्री (काशिराजकी कन्या अम्बा) था और इस जन्ममें भी राजा द्रुपदको पुत्रीरूपसे प्राप्त हुआ था। आगे चलकर यही शिखण्डी स्थूणाकर्ण नामक यक्षसे पुरुषत्व प्राप्त करके पुरुष बना। भीष्मजी इन सब बातोंको जानते थे और शिखण्डीको स्त्री ही समझते थे। इस कारण वे इसपर बाण नहीं चलाते थे। अर्जुनने युद्धके समय इसीको आगे करके भीष्मजीपर बाण चलाये और उनको रथसे नीचे गिरा दिया।
अर्जुनका पुत्र अभिमन्यु बहुत शूरवीर था। युद्धके समय इसने द्रोण-निर्मित चक्रव्यूहमें घुसकर अपने पराक्रमसे बहुत-से वीरोंका संहार किया। अन्तमें कौरव-सेनाके छ: महारथियोंने इसको अन्यायपूर्वक घेरकर इसपर शस्त्र-अस्त्र चलाये। दु:शासनपुत्रके द्वारा सिरपर गदाका प्रहार होनेसे इसकी मृत्यु हो गयी।
संजयने शंखवादनके वर्णनमें कौरव-सेनाके शूरवीरोंमेंसे केवल भीष्मजीका ही नाम लिया और पाण्डव-सेनाके शूरवीरोंमेंसे भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन, भीम आदि अठारह वीरोंके नाम लिये। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि संजयके मनमें अधर्मके पक्ष-(कौरवसेना-) का आदर नहीं है। इसलिये वे अधर्मके पक्षका अधिक वर्णन करना उचित नहीं समझते। परन्तु उनके मनमें धर्मके पक्ष-(पाण्डवसेना-) का आदर होनेसे और भगवान् श्रीकृष्ण तथा पाण्डवोंके प्रति आदरभाव होनेसे वे उनके पक्षका ही अधिक वर्णन करना उचित समझते हैं और उनके पक्षका वर्णन करनेमें ही उनको आनन्द आ रहा है।