श्रीमद्भगवद्गीता संवाद

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श्रीमद्भगवद्गीता संवाद बासुदेव केवलम्

🌼🌼🌼🌼🌼श्रीमद्भगवद्गीता🌼🌼🌼🌼🌼🌺🌺🌺🌺🌺साधक संजीवनी🌺🌺🌺🌺🌺🌷🌷🌷श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी🌷🌷🌷अध्याय : १ | श्लोक : १७-१८काश्यश्च ...
18/12/2022

🌼🌼🌼🌼🌼श्रीमद्भगवद्गीता🌼🌼🌼🌼🌼
🌺🌺🌺🌺🌺साधक संजीवनी🌺🌺🌺🌺🌺
🌷🌷🌷श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी🌷🌷🌷

अध्याय : १ | श्लोक : १७-१८

काश्यश्च परमेष्वास: शिखण्डी च महारथ:।

धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजित:॥ १७॥

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वश: पृथिवीपते।

सौभद्रश्च महाबाहु: शङ्खान्दध्मु: पृथक् पृथक्॥ १८॥

हे राजन्! श्रेष्ठ धनुषवाले काशिराज और महारथी शिखण्डी तथा धृष्टद्युम्न एवं राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद और द्रौपदीके पाँचों पुत्र तथा लम्बी-लम्बी भुजाओंवाले सुभद्रापुत्र अभिमन्यु(—इन सभीने) सब ओरसे अलग-अलग (अपने-अपने) शंख बजाये।

पृथिवीपते = हे राजन्!
परमेष्वास: = श्रेष्ठ धनुषवाले
काश्य: = काशिराज
च = और
महारथ: = महारथी
शिखण्डी = शिखण्डी
च = तथा
धृष्टद्युम्न: = धृष्टद्युम्न
च = एवं
विराट: = राजा विराट
च = और
अपराजित: = अजेय
सात्यकि: = सात्यकि,
द्रुपद: = राजा द्रुपद
च = और
द्रौपदेया: = द्रौपदीके पाँचों पुत्र
च = तथा
महाबाहु: = लम्बी-लम्बी भुजाओंवाले
सौभद्र: = सुभद्रापुत्र अभिमन्यु(—इन सभीने)
सर्वश: = सब ओरसे
पृथक्, पृथक् = अलग-अलग (अपने-अपने)
शङ्खान् = शंख
दध्मु: = बजाये।
'काश्यश्च परमेष्वास:.....शङ्खान् दध्मु: पृथक् पृथक्’—महारथी शिखण्डी बहुत शूरवीर था। यह पहले जन्ममें स्त्री (काशिराजकी कन्या अम्बा) था और इस जन्ममें भी राजा द्रुपदको पुत्रीरूपसे प्राप्त हुआ था। आगे चलकर यही शिखण्डी स्थूणाकर्ण नामक यक्षसे पुरुषत्व प्राप्त करके पुरुष बना। भीष्मजी इन सब बातोंको जानते थे और शिखण्डीको स्त्री ही समझते थे। इस कारण वे इसपर बाण नहीं चलाते थे। अर्जुनने युद्धके समय इसीको आगे करके भीष्मजीपर बाण चलाये और उनको रथसे नीचे गिरा दिया।

अर्जुनका पुत्र अभिमन्यु बहुत शूरवीर था। युद्धके समय इसने द्रोण-निर्मित चक्रव्यूहमें घुसकर अपने पराक्रमसे बहुत-से वीरोंका संहार किया। अन्तमें कौरव-सेनाके छ: महारथियोंने इसको अन्यायपूर्वक घेरकर इसपर शस्त्र-अस्त्र चलाये। दु:शासनपुत्रके द्वारा सिरपर गदाका प्रहार होनेसे इसकी मृत्यु हो गयी।

संजयने शंखवादनके वर्णनमें कौरव-सेनाके शूरवीरोंमेंसे केवल भीष्मजीका ही नाम लिया और पाण्डव-सेनाके शूरवीरोंमेंसे भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन, भीम आदि अठारह वीरोंके नाम लिये। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि संजयके मनमें अधर्मके पक्ष-(कौरवसेना-) का आदर नहीं है। इसलिये वे अधर्मके पक्षका अधिक वर्णन करना उचित नहीं समझते। परन्तु उनके मनमें धर्मके पक्ष-(पाण्डवसेना-) का आदर होनेसे और भगवान् श्रीकृष्ण तथा पाण्डवोंके प्रति आदरभाव होनेसे वे उनके पक्षका ही अधिक वर्णन करना उचित समझते हैं और उनके पक्षका वर्णन करनेमें ही उनको आनन्द आ रहा है।

🌼🌼🌼🌼🌼श्रीमद्भगवद्गीता🌼🌼🌼🌼🌼🌺🌺🌺🌺🌺साधक संजीवनी🌺🌺🌺🌺🌺🌷🌷🌷श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी🌷🌷🌷अध्याय : 1 | श्लोक : 16अनन्तविजयं र...
15/12/2022

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🌺🌺🌺🌺🌺साधक संजीवनी🌺🌺🌺🌺🌺
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अध्याय : 1 | श्लोक : 16
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:।

नकुल: सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥ १६॥

कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरने अनन्तविजय नामक (शंख बजाया तथा) नकुल और सहदेवने सुघोष और मणिपुष्पक नामक (शंख बजाये)।

कुन्तीपुत्र: = कुन्तीपुत्र
राजा = राजा
युधिष्ठिर: = युधिष्ठिरने
अनन्तविजयम् = अनन्तविजय नामक (शंख बजाया तथा)
नकुल: = नकुल
च = और
सहदेव: = सहदेवने
सुघोषमणिपुष्पकौ = सुघोष और मणिपुष्पक नामक (शंख बजाये)।
'अनन्तविजयं राजा..............सुघोषमणि-पुष्पकौ’—अर्जुन, भीम और युधिष्ठिर—ये तीनों कुन्तीके पुत्र हैं तथा नकुल और सहदेव—ये दोनों माद्रीके पुत्र हैं, यह विभाग दिखानेके लिये ही यहाँ युधिष्ठिरके लिये 'कुन्तीपुत्र’ विशेषण दिया गया है।

युधिष्ठिरको 'राजा’ कहनेका तात्पर्य है कि युधिष्ठिरजी वनवासके पहले अपने आधे राज्य-(इन्द्रप्रस्थ-)के राजा थे, और नियमके अनुसार बारह वर्ष वनवास और एक वर्ष अज्ञातवासके बाद वे राजा होने चाहिये थे। 'राजा’ विशेषण देकर संजय यह भी संकेत करना चाहते हैं कि आगे चलकर धर्मराज युधिष्ठिर ही सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डलके राजा होंगे।

🌼🌼🌼🌼🌼श्रीमद्भगवद्गीता🌼🌼🌼🌼🌼🌺🌺🌺🌺🌺साधक संजीवनी🌺🌺🌺🌺🌺🌷🌷🌷श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी🌷🌷🌷अध्याय : १ | श्लोक : १५सम्बन्ध :अब ...
12/12/2022

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🌺🌺🌺🌺🌺साधक संजीवनी🌺🌺🌺🌺🌺
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अध्याय : १ | श्लोक : १५

सम्बन्ध :
अब संजय आगेके चार श्लोकोंमें पूर्वश्लोकका खुलासा करते हुए दूसरोंके शंखवादनका वर्णन करते हैं।

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जय:।

पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदर:॥ १५॥

अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्णने पांचजन्य नामक (तथा) धनंजय अर्जुनने देवदत्त नामक (शंख बजाया और) भयानक कर्म करनेवाले वृकोदर भीमने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया।

हृषीकेश: = अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्णने
पाञ्चजन्यम् = पांचजन्य नामक (तथा)
धनञ्जय: = धनंजय अर्जुनने
देवदत्तम् = देवदत्त नामक (शंख बजाया और)
भीमकर्मा = भयानक कर्म करनेवाले
वृकोदर: = वृकोदर भीमने
पौण्ड्रम् = पौण्ड्र नामक
महाशङ्खम् = महाशंख
दध्मौ = बजाया।
'पाञ्चजन्यं हृषीकेश:’—सबके अन्तर्यामी अर्थात् सबके भीतरकी बात जाननेवाले साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवोंके पक्षमें खड़े होकर 'पांचजन्य’ नामक शंख बजाया। भगवान्ने पंचजन नामक शंखरूपधारी दैत्यको मारकर उसको शंखरूपसे ग्रहण किया था, इसलिये इस शंखका नाम 'पांचजन्य’ हो गया।

'देवदत्तं धनञ्जय:’—राजसूय यज्ञके समय अर्जुनने बहुत-से राजाओंको जीतकर बहुत धन इकट्ठा किया था। इस कारण अर्जुनका नाम 'धनंजय’ पड़ गया। निवातकवचादि दैत्योंके साथ युद्ध करते समय इन्द्रने अर्जुनको 'देवदत्त’ नामक शंख दिया था। इस शंखकी ध्वनि बड़े जोरसे होती थी, जिससे शत्रुओंकी सेना घबरा जाती थी। इस शंखको अर्जुनने बजाया।

'पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदर:’— हिडिम्बासुर, बकासुर, जटासुर आदि असुरों तथा कीचक, जरासन्ध आदि बलवान् वीरोंको मारनेके कारण भीमसेनका नाम 'भीमकर्मा’ पड़ गया। उनके पेटमें जठराग्निके सिवाय 'वृक’ नामकी एक विशेष अग्नि थी, जिससे बहुत अधिक भोजन पचता था। इस कारण उनका नाम 'वृकोदर’ पड़ गया। ऐसे भीमकर्मा वृकोदर भीमसेनने बहुत बड़े आकारवाला 'पौण्ड्र’ नामक शंख बजाया।

🌼🌼🌼🌼🌼श्रीमद्भगवद्गीता🌼🌼🌼🌼🌼🌺🌺🌺🌺🌺साधक संजीवनी🌺🌺🌺🌺🌺🌷🌷🌷श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी🌷🌷🌷अध्याय : १ | श्लोक : १४सम्बन्ध :इस ...
11/12/2022

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अध्याय : १ | श्लोक : १४

सम्बन्ध :
इस अध्यायके आरम्भमें ही धृतराष्ट्रने संजयसे पूछा था कि युद्धक्षेत्रमें मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने क्या किया? अत: संजयने दूसरे श्लोकसे तेरहवें श्लोकतक 'धृतराष्ट्रके पुत्रोंने क्या किया’—इसका उत्तर दिया। अब आगेके श्लोकसे संजय 'पाण्डुके पुत्रोंने क्या किया’—इसका उत्तर देते हैं।

तत: श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।

माधव: पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतु:॥ १४॥

उसके बाद सफेद घोड़ोंसे युक्त महान् रथपर बैठे हुए लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुनने भी दिव्य शंखोंको बड़े जोरसे बजाया।

तत: = उसके बाद
श्वेतै: = सफेद
हयै: = घोड़ोंसे
युक्ते = युक्त
महति = महान्
स्यन्दने = रथपर
स्थितौ = बैठे हुए
माधव: = लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण
च = और
पाण्डव: = पाण्डुपुत्र अर्जुनने
एव = भी
दिव्यौ = दिव्य
शङ्खौ = शंखोंको
प्रदध्मतु: = बड़े जोरसे बजाया।
'तत: श्वेतैहर्यैर्युक्ते’—चित्ररथ गन्धर्वने अर्जुनको सौ दिव्य घोड़े दिये थे। इन घोड़ोंमें यह विशेषता थी कि इनमेंसे युद्धमें कितने ही घोड़े क्यों न मारे जायँ, पर ये संख्यामें सौ-के-सौ ही बने रहते थे, कम नहीं होते थे। ये पृथ्वी, स्वर्ग आदि सभी स्थानोंमें जा सकते थे। इन्हीं सौ घोड़ोंमेंसे सुन्दर और सुशिक्षित चार सफेद घोड़े अर्जुनके रथमें जुते हुए थे।

'महति स्यन्दने स्थितौ’—यज्ञोंमें आहुतिरूपसे दिये गये घीको खाते-खाते अग्निको अजीर्ण हो गया था। इसीलिये अग्निदेव खाण्डववनकी विलक्षण-विलक्षण जड़ी- बूटियाँ खाकर (जलाकर) अपना अजीर्ण दूर करना चाहते थे। परन्तु देवताओंके द्वारा खाण्डववनकी रक्षा की जानेके कारण अग्निदेव अपने कार्यमें सफल नहीं हो पाते थे। वे जब-जब खाण्डववनको जलाते, तब-तब इन्द्र वर्षा करके उसको (अग्निको) बुझा देते। अन्तमें अर्जुनकी सहायतासे अग्निने उस पूरे वनको जलाकर अपना अजीर्ण दूर किया और प्रसन्न होकर अर्जुनको यह बहुत बड़ा रथ दिया। नौ बैलगाडिय़ोंमें जितने अस्त्र-शस्त्र आ सकते हैं, उतने अस्त्र-शस्त्र इस रथमें पड़े रहते थे। यह सोनेसे मढ़ा हुआ और तेजोमय था। इसके पहिये बड़े ही दृढ़ एवं विशाल थे। इसकी ध्वजा बिजलीके समान चमकती थी। यह ध्वजा एक योजन (चार कोस) तक फहराया करती थी। इतनी लम्बी होनेपर भी इसमें न तो बोझ था, न यह कहीं रुकती थी और न कहीं वृक्ष आदिमें अटकती ही थी। इस ध्वजापर हनुमान्जी विराजमान थे।

'स्थितौ’ कहनेका तात्पर्य है कि उस सुन्दर और तेजोमय रथपर साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण और उनके प्यारे भक्त अर्जुनके विराजमान होनेसे उस रथकी शोभा और तेज बहुत ज्यादा बढ़ गया था।

'माधव: पाण्डवश्चैव’—'मा’ नाम लक्ष्मीका है और 'धव’ नाम पतिका है। अत: 'माधव’ नाम लक्ष्मीपतिका है। यहाँ 'पाण्डव’ नाम अर्जुनका है; क्योंकि अर्जुन

सभी पाण्डवोंमें मुख्य हैं—'पाण्डवानां धनञ्जय:’ (गीता १०। ३७)।

अर्जुन 'नर’के और श्रीकृष्ण 'नारायण’के अवतार थे। महाभारतके प्रत्येक पर्वके आरम्भमें नर (अर्जुन) और नारायण (भगवान् श्रीकृष्ण)-को नमस्कार किया गया है— 'नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।’ इस दृष्टिसे पाण्डव-सेनामें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन ये दोनों मुख्य थे। संजयने भी गीताके अन्तमें कहा है कि 'जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण और गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन रहेंगे, वहींपर श्री, विजय, विभूति और अटल नीति रहेगी’ (१८। ७८)।

'दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतु:’—भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके हाथोंमें जो शंख थे, वे तेजोमय और अलौकिक थे। उन शंखोंको उन्होंने बड़े जोरसे बजाया।

यहाँ शंका हो सकती है कि कौरवपक्षमें मुख्य सेनापति पितामह भीष्म हैं, इसलिये उनका सबसे पहले शंख बजाना ठीक ही है; परन्तु पाण्डव-सेनामें मुख्य सेनापति धृष्टद्युम्नके रहते हुए ही सारथि बने हुए भगवान् श्रीकृष्णने सबसे पहले शंख क्यों बजाया? इसका समाधान है कि भगवान् सारथि बनें चाहे महारथी बनें, उनकी मुख्यता कभी मिट ही नहीं सकती। वे जिस किसी भी पदपर रहें, सदा सबसे बड़े ही बने रहते हैं। कारण कि वे अच्युत हैं, कभी च्युत होते ही नहीं। पाण्डव-सेनामें भगवान् श्रीकृष्ण ही मुख्य थे और वे ही सबका संचालन करते थे। जब वे बाल्यावस्थामें थे, उस समय भी नन्द, उपनन्द आदि उनकी बात मानते थे। तभी तो उन्होंने बालक श्रीकृष्णके कहनेसे परम्परासे चली आयी इन्द्र-पूजाको छोड़कर गोवर्धनकी पूजा करनी शुरू कर दी। तात्पर्य है कि भगवान् जिस किसी अवस्थामें, जिस किसी स्थानपर और जहाँ कहीं भी रहते हैं, वहाँ वे मुख्य ही रहते हैं। इसीलिये भगवान्ने पाण्डव-सेनामें सबसे पहले शंख बजाया।

जो स्वयं छोटा होता है, वही ऊँचे स्थानपर नियुक्त होनेसे बड़ा माना जाता है। अत: जो ऊँचे स्थानके कारण अपनेको बड़ा मानता है, वह स्वयं वास्तवमें छोटा ही होता है। परंतु जो स्वयं बड़ा होता है, वह जहाँ भी रहता है, उसके कारण वह स्थान भी बड़ा माना जाता है। जैसे भगवान् यहाँ सारथि बने हैं, तो उनके कारण वह सारथिका स्थान (पद) भी ऊँचा हो गया।

🌼🌼🌼🌼🌼श्रीमद्भगवद्गीता🌼🌼🌼🌼🌼🌺🌺🌺🌺🌺साधक संजीवनी🌺🌺🌺🌺🌺🌷🌷🌷श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी🌷🌷🌷अध्याय : १ | श्लोक : १३सम्बन्ध :पित...
10/12/2022

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🌺🌺🌺🌺🌺साधक संजीवनी🌺🌺🌺🌺🌺
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अध्याय : १ | श्लोक : १३

सम्बन्ध :
पितामह भीष्मके द्वारा शंख बजानेका परिणाम क्या हुआ, इसको संजय आगेके श्लोकमें कहते हैं।

तत: शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखा:।

सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्॥ १३॥

उसके बाद शंख और भेरी (नगाड़े) तथा ढोल, मृदंग और नरसिंघे बाजे एक साथ ही बज उठे। (उनका) वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ।
तत: = उसके बाद
शङ्खा: = शंख
च = और
भेर्य: = भेरी (नगाड़े)
च = तथा
पणवानकगोमुखा: = ढोल, मृदंग और नरसिंघे बाजे
सहसा = एक साथ
एव = ही
अभ्यहन्यन्त = बज उठे। (उनका)
स: = वह
शब्द: = शब्द
तुमुल: = बड़ा भयंकर
अभवत् = हुआ।
'तत: शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानक- गोमुखा:’—यद्यपि भीष्मजीने युद्धारम्भकी घोषणा करनेके लिये शंख नहीं बजाया था, प्रत्युत दुर्योधनको प्रसन्न करनेके लिये ही शंख बजाया था, तथापि कौरव-सेनाने भीष्मजीके शंखवादनको युद्धकी घोषणा ही समझा। अत: भीष्मजीके शंख बजानेपर कौरव-सेनाके शंख आदि सब बाजे एक साथ बज उठे।

'शंख’ समुद्रसे उत्पन्न होते हैं। ये ठाकुरजीकी सेवा-पूजामें रखे जाते हैं और आरती उतारने आदिके काममें आते हैं। मांगलिक कार्योंमें तथा युद्धके आरम्भमें ये मुखसे फूँक देकर बजाये जाते हैं। 'भेरी’ नाम नगाड़ोंका है (जो बड़े नगाड़े होते हैं, उनको नौबत कहते हैं)। ये नगाड़े लोहेके बने हुए और भैंसेके चमड़ेसे मढ़े हुए होते हैं, तथा लकड़ीके डंडेसे बजाये जाते हैं। ये मन्दिरोंमें एवं राजाओंके किलोंमें रखे जाते हैं। उत्सव और मांगलिक कार्योंमें ये विशेषतासे बजाये जाते हैं। राजाओंके यहाँ ये रोज बजाये जाते हैं। 'पणव’ नाम ढोलका है। ये लोहेके अथवा लकड़ीके बने हुए और बकरेके चमड़ेसे मढ़े हुए होते हैं तथा हाथसे या लकड़ीके डंडेसे बजाये जाते हैं। ये आकारमें ढोलकीकी तरह होनेपर भी ढोलकीसे बड़े होते हैं। कार्यके आरम्भमें पणवोंको बजाना गणेशजीके पूजनके समान मांगलिक माना जाता है। 'आनक’ नाम मृदंगका है। इनको पखावज भी कहते हैं। आकारमें ये लकड़ीकी बनायी हुई ढोलकीके समान होते हैं। ये मिट्टीके बने हुए और चमड़ेसे मढ़े हुए होते हैं तथा हाथसे बजाये जाते हैं। 'गोमुख’ नाम नरसिंघेका है। ये आकारमें साँपकी तरह टेढ़े होते हैं और इनका मुख गायकी तरह होता है। ये मुखकी फूँकसे बजाये जाते हैं।

'सहसैवाभ्यहन्यन्त’—कौरव-सेनामें उत्साह बहुत था। इसलिये पितामह भीष्मका शंख बजते ही कौरव-सेनाके सब बाजे अनायास ही एक साथ बज उठे। उनके बजनेमें देरी नहीं हुई तथा उनको बजानेमें परिश्रम भी नहीं हुआ।

'स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ’—अलग-अलग विभागों- में, टुकडिय़ोंमें खड़ी हुई कौरव-सेनाके शंख आदि बाजोंका शब्द बड़ा भयंकर हुआ अर्थात् उनकी आवाज बड़ी जोरसे गूँजती रही।

🌼🌼🌼🌼🌼श्रीमद्भगवद्गीता🌼🌼🌼🌼🌼🌺🌺🌺🌺🌺साधक संजीवनी🌺🌺🌺🌺🌺🌷🌷🌷श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी🌷🌷🌷 अध्याय : १ | श्लोक : १२सम्बन्ध :द्...
09/12/2022

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अध्याय : १ | श्लोक : १२

सम्बन्ध :
द्रोणाचार्यके द्वारा कुछ भी न बोलनेके कारण दुर्योधनका मानसिक उत्साह भंग हुआ देखकर उसके प्रति भीष्मजीके किये हुए स्नेह-सौहार्दकी बात संजय आगेके श्लोकमें प्रकट करते हैं।

तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्ध: पितामह:।

सिंहनादं विनद्योच्चै: शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्॥ १२॥

उस (दुर्योधन)-के (हृदयमें) हर्ष उत्पन्न करते हुए कौरवोंमें वृद्ध प्रभावशाली पितामह भीष्मने सिंहके समान गरजकर जोरसे शंख बजाया।

तस्य = उस (दुर्योधन)-के
हर्षम् = (हृदयमें) हर्ष
सञ्जनयन् = उत्पन्न करते हुए
कुरुवृद्ध: = कौरवोंमें वृद्ध
प्रतापवान् = प्रभावशाली
पितामह: = पितामह भीष्मने
सिंहनादम् = सिंहके समान
विनद्य = गरजकर
उच्चै: = जोरसे
शङ्खम् = शंख
दध्मौ = बजाया।
'तस्य सञ्जनयन् हर्षम् ’—यद्यपि दुर्योधनके हृदयमें हर्ष होना शंखध्वनिका कार्य है और शंखध्वनि कारण है, इसलिये यहाँ शंखध्वनिका वर्णन पहले और हर्ष होनेका वर्णन पीछे होना चाहिये अर्थात् यहाँ 'शंख बजाते हुए दुर्योधनको हॢषत किया’—ऐसा कहा जाना चाहिये। परन्तु यहाँ ऐसा न कहकर यही कहा है कि 'दुर्योधनको हॢषत करते हुए भीष्मजीने शंख बजाया’। कारण कि ऐसा कहकर संजय यह भाव प्रकट कर रहे हैं कि पितामह भीष्मकी शंखवादन क्रियामात्रसे दुर्योधनके हृदयमें हर्ष उत्पन्न हो ही जायगा। भीष्मजीके इस प्रभावको द्योतन करनेके लिये ही संजय आगे 'प्रतापवान्’ विशेषण देते हैं।

'कुरुवृद्ध:’—यद्यपि कुरुवंशियोंमें आयुकी दृष्टिसे भीष्मजीसे भी अधिक वृद्ध बाह्लीक थे (जो कि भीष्मजीके पिता शान्तनुके छोटे भाई थे), तथापि कुरुवंशियोंमें जितने बड़े-बूढ़े थे, उन सबमें भीष्मजी धर्म और ईश्वरको विशेषतासे जाननेवाले थे। अत: ज्ञानवृद्ध होनेके कारण संजय भीष्मजीके लिये 'कुरुवृद्ध:’ विशेषण देते हैं।

'प्रतापवान्’—भीष्मजीके त्यागका बड़ा प्रभाव था। वे कनक-कामिनीके त्यागी थे अर्थात् उन्होंने राज्य भी स्वीकार नहीं किया और विवाह भी नहीं किया। भीष्मजी अस्त्र- शस्त्रको चलानेमें बड़े निपुण थे और शास्त्रके भी बड़े जानकार थे। उनके इन दोनों गुणोंका भी लोगोंपर बड़ा प्रभाव था।

जब अकेले भीष्म अपने भाई विचित्रवीर्यके लिये काशिराजकी कन्याओंको स्वयंवरसे हरकर ला रहे थे, तब वहाँ स्वयंवरके लिये इकट् ठे हुए सब क्षत्रिय उनपर टूट पड़े। परन्तु अकेले भीष्मजीने उन सबको हरा दिया। जिनसे भीष्म अस्त्र-शस्त्रकी विद्या पढ़े थे, उन गुरु परशुरामजीके सामने भी उन्होंने अपनी हार स्वीकार नहीं की। इस प्रकार शस्त्रके विषयमें उनका क्षत्रियोंपर बड़ा प्रभाव था।

जब भीष्म शर-शय्यापर सोये थे, तब भगवान् श्रीकृष्णने धर्मराजसे कहा कि 'आपको धर्मके विषयमें कोई शंका हो तो भीष्मजीसे पूछ लें; क्योंकि शास्त्रज्ञानका सूर्य अस्ताचलको जा रहा है अर्थात् भीष्मजी इस लोकसे जा रहे हैं।’ इस प्रकार शास्त्रके विषयमें उनका दूसरोंपर बड़ा प्रभाव था।

'पितामह:’—इस पदका आशय यह मालूम देता है कि दुर्योधनके द्वारा चालाकीसे कही गयी बातोंका द्रोणाचार्यने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने यही समझा कि दुर्योधन चालाकीसे मेरेको ठगना चाहता है, इसलिये वे चुप ही रहे। परन्तु पितामह (दादा) होनेके नाते भीष्मजीको दुर्योधनकी चालाकीमें उसका बचपना दीखता है। अत: पितामह भीष्म द्रोणाचार्यके समान चुप न रहकर वात्सल्यभावके कारण दुर्योधनको हॢषत करते हुए शंख बजाते हैं।

'सिंहनादं विनद्योच्चै: शङ्खं दध्मौ’—जैसे सिंहके गर्जना करनेपर हाथी आदि बड़े-बड़े पशु भी भयभीत हो जाते हैं, ऐसे ही गर्जना करनेमात्रसे सभी भयभीत हो जायँ और दुर्योधन प्रसन्न हो जाय—इसी भावसे भीष्मजीने सिंहके समान गरजकर जोरसे शंख बजाया।

परिशिष्ट भाव—दुर्योधनके साथ द्रोणाचार्यका विद्याका सम्बन्ध था और भीष्मजीका जन्मका अर्थात् कौटुम्बिक सम्बन्ध था। जहाँ विद्याका सम्बन्ध होता है, वहाँ पक्षपात नहीं होता, पर जहाँ कौटुम्बिक सम्बन्ध होता है, वहाँ स्नेहवश पक्षपात हो जाता है। अत: दुर्योधनके द्वारा चालाकीसे कहे गये वचन सुनकर द्रोणाचार्य चुप रहे, जिससे दुर्योधनका मानसिक उत्साह भंग हो गया। परन्तु दुर्योधनको उदास देखकर कौटुम्बिक स्नेहके कारण भीष्मजी शंख बजाते हैं।

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08/12/2022

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अध्याय : १ | श्लोक : ११

सम्बन्ध :
अब दुर्योधन पितामह भीष्मको प्रसन्न करनेके लिये अपनी सेनाके सभी महारथियोंसे कहता है—

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिता:।

भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्त: सर्व एव हि॥ ११॥

दुर्योधन बाह्यदृष्टिसे अपनी सेनाके महारथियोंसे बोला— आप सब-के-सब लोग सभी मोर्चोंपर अपनी-अपनी जगह दृढ़तासे स्थित रहते हुए निश्चितरूपसे पितामह भीष्मकी ही चारों ओरसे रक्षा करें।

च = दुर्योधन बाह्यदृष्टिसे अपनी सेनाके महारथियोंसे बोला—
भवन्त: = आप
सर्वे, एव = सब-के-सब लोग
सर्वेषु = सभी
अयनेषु = मोर्चोंपर
यथाभागम् = अपनी-अपनी जगह
अवस्थिता: = दृढ़तासे स्थित रहते हुए
हि = निश्चितरूपसे
भीष्मम् = पितामह भीष्मकी
एव = ही
अभिरक्षन्तु = चारों ओरसे रक्षा करें।
'अयनेषु च सर्वेषु.....भवन्त: सर्व एव हि’—जिन-जिन मोर्चोंपर आपकी नियुक्ति कर दी गयी है, आप सभी योद्धालोग उन्हीं मोर्चोंपर दृढ़तासे स्थित रहते हुए सब तरफसे, सब प्रकारसे भीष्मजीकी रक्षा करें।

भीष्मजीकी सब ओरसे रक्षा करें—यह कहकर दुर्योधन भीष्मजीको भीतरसे अपने पक्षमें लाना चाहता है। ऐसा कहनेका दूसरा भाव यह है कि जब भीष्मजी युद्ध करें, तब किसी भी व्यूहद्वारसे शिखण्डी उनके सामने न आ जाय—इसका आपलोग खयाल रखें। अगर शिखण्डी उनके सामने आ जायगा, तो भीष्मजी उसपर शस्त्रास्त्र नहीं चलायेंगे। कारण कि शिखण्डी पहले जन्ममें भी स्त्री था और इस जन्ममें भी पहले स्त्री था, पीछे पुरुष बना है। इसलिये भीष्मजी इसको स्त्री ही समझते हैं और उन्होंने शिखण्डीसे युद्ध न करनेकी प्रतिज्ञा कर रखी है। यह शिखण्डी शंकरके वरदानसे भीष्मजीको मारनेके लिये ही पैदा हुआ है। अत: जब शिखण्डीसे भीष्मजीकी रक्षा हो जायगी, तो फिर वे सबको मार देंगे, जिससे निश्चित ही हमारी विजय होगी। इस बातको लेकर दुर्योधन सभी महारथियोंसे भीष्मजीकी रक्षा करनेके लिये कह रहा है।

🌼🌼🌼🌼🌼श्रीमद्भगवद्गीता🌼🌼🌼🌼🌼🌺🌺🌺🌺🌺साधक संजीवनी🌺🌺🌺🌺🌺🌷🌷🌷श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी 🌷🌷🌷अध्याय : १ | श्लोक : १०सम्बन्ध :दु...
07/12/2022

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🌺🌺🌺🌺🌺साधक संजीवनी🌺🌺🌺🌺🌺
🌷🌷🌷श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी 🌷🌷🌷

अध्याय : १ | श्लोक : १०

सम्बन्ध :
दुर्योधनकी बातें सुनकर जब द्रोणाचार्य कुछ भी नहीं बोले, तब अपनी चालाकी न चल सकनेसे दुर्योधनके मनमें क्या विचार आता है—इसको संजय आगेके श्लोकमें कहते हैं।

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्।

पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्॥ १०॥

हमारी वह सेना (पाण्डवोंपर विजय करनेमें) अपर्याप्त है, असमर्थ है; (क्योंकि) उसके संरक्षक (उभयपक्षपाती)भीष्म हैं। परन्तु इन पाण्डवोंकी यह सेना (हमपर विजय करनेमें) पर्याप्त है, समर्थ है; (क्योंकि)

अस्माकम् = हमारी
तत् = वह
बलम् = सेना (पाण्डवोंपर विजय करनेमें)
अपर्याप्तम् = अपर्याप्त है, असमर्थ है; (क्योंकि)
भीष्माभिरक्षितम्= उसके संरक्षक (उभयपक्षपाती)भीष्म हैं।
तु = परन्तु
एतेषाम् = इन पाण्डवोंकी
इदम् = यह
बलम् = सेना (हमपर विजय करनेमें)
पर्याप्तम् = पर्याप्त है, समर्थ है; (क्योंकि)
भीमाभिरक्षितम् = इसके संरक्षक (निजसेनापक्षपाती) भीमसेन हैं।

'अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभि- रक्षितम् ’—अधर्म—अन्यायके कारण दुर्योधनके मनमें भय होनेसे वह अपनी सेनाके विषयमें सोचता है कि हमारी सेना बड़ी होनेपर भी अर्थात् पाण्डवोंकी अपेक्षा चार अक्षौहिणी अधिक होनेपर भी पाण्डवोंपर विजय प्राप्त करनेमें है तो असमर्थ ही! कारण कि हमारी सेनामें मतभेद है। उसमें इतनी एकता (संगठन), निर्भयता, नि:संकोचता नहीं है, जितनी कि पाण्डवोंकी सेनामें है। हमारी सेनाके मुख्य संरक्षक पितामह भीष्म उभयपक्षपाती हैं अर्थात् उनके भीतर कौरव और पाण्डव—दोनों सेनाओंका पक्ष है। वे कृष्णके बड़े भक्त हैं। उनके हृदयमें युधिष्ठिरका बड़ा आदर है। अर्जुनपर भी उनका बड़ा स्नेह है। इसलिये वे हमारे पक्षमें रहते हुए भी भीतरसे पाण्डवोंका भला चाहते हैं। वे ही भीष्म हमारी सेनाके मुख्य सेनापति हैं। ऐसी दशामें हमारी सेना पाण्डवोंके मुकाबलेमें कैसे समर्थ हो सकती है? नहीं हो सकती।

'पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ’—परन्तु यह जो पाण्डवोंकी सेना है, यह हमारेपर विजय करनेमें समर्थ है। कारण कि इनकी सेनामें मतभेद नहीं है, प्रत्युत सभी एकमत होकर संगठित हैं। इनकी सेनाका संरक्षक बलवान् भीमसेन है, जो कि बचपनसे ही मेरेको हराता आया है। यह अकेला ही मेरेसहित सौ भाइयोंको मारनेकी प्रतिज्ञा कर चुका है अर्थात् यह हमारा नाश करनेपर तुला हुआ है! इसका शरीर वज्रके समान मजबूत है। इसको मैंने जहर पिलाया था, तो भी यह मरा नहीं। ऐसा यह भीमसेन पाण्डवोंकी सेनाका संरक्षक है, इसलिये यह सेना वास्तवमें समर्थ है, पूर्ण है।

यहाँ एक शंका हो सकती है कि दुर्योधनने अपनी सेनाके संरक्षकके लिये भीष्मजीका नाम लिया, जो कि सेनापतिके पदपर नियुक्त हैं। परन्तु पाण्डव-सेनाके संरक्षकके लिये भीमसेनका नाम लिया, जो कि सेनापति नहीं हैं। इसका समाधान यह है कि दुर्योधन इस समय सेनापतियोंकी बात नहीं सोच रहा है; किन्तु दोनों सेनाओंकी शक्तिके विषयमें सोच रहा है कि किस सेनाकी शक्ति अधिक है? दुर्योधनपर आरम्भसे ही भीमसेनकी शक्तिका, बलवत्ताका अधिक प्रभाव पड़ा हुआ है। अत: वह पाण्डव-सेनाके संरक्षकके लिये भीमसेनका ही नाम लेता है।

विशेष बात

अर्जुन कौरव-सेनाको देखकर किसीके पास न जाकर हाथमें धनुष उठाते हैं (गीता—पहले अध्यायका बीसवाँ श्लोक), पर दुर्योधन पाण्डवसेनाको देखकर द्रोणाचार्यके पास जाता है और उनसे पाण्डवोंकी व्यूहरचनायुक्त सेनाको देखनेके लिये कहता है। इससे सिद्ध होता है कि दुर्योधनके हृदयमें भय बैठा हुआ है। भीतरमें भय होनेपर भी वह चालाकीसे द्रोणाचार्यको प्रसन्न करना चाहता है, उनको पाण्डवोंके विरुद्ध उकसाना चाहता है। कारण कि दुर्योधनके हृदयमें अधर्म है, अन्याय है, पाप है। अन्यायी, पापी व्यक्ति कभी निर्भय और सुख-शान्तिसे नहीं रह सकता—

यह नियम है। परन्तु अर्जुनके भीतर धर्म है, न्याय है। इसलिये अर्जुनके भीतर अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके लिये चालाकी नहीं है, भय नहीं है; किन्तु उत्साह है, वीरता है। तभी तो वे वीरतामें आकर सेना-निरीक्षण करनेके लिये भगवान्को आज्ञा देते हैं कि 'हे अच्युत! दोनों सेनाओंके मध्यमें मेरे रथको खड़ा कर दीजिये’ (पहले अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। इसका तात्पर्य है कि जिसके भीतर नाशवान् धन-सम्पत्ति आदिका आश्रय है, आदर है और जिसके भीतर अधर्म है, अन्याय है, दुर्भाव है, उसके भीतर वास्तविक बल नहीं होता। वह भीतरसे खोखला होता है और वह कभी निर्भय नहीं होता। परन्तु जिसके भीतर अपने धर्मका पालन है और भगवान्का आश्रय है, वह कभी भयभीत नहीं होता। उसका बल सच्चा होता है। वह सदा निश्चिन्त और निर्भय रहता है। अत: अपना कल्याण चाहनेवाले साधकोंको अधर्म, अन्याय आदिका सर्वथा त्याग करके और एकमात्र भगवान्का आश्रय लेकर भगवत्प्रीत्यर्थ अपने धर्मका अनुष्ठान करना चाहिये। भौतिक सम्पत्तिको महत्त्व देकर और संयोगजन्य सुखके प्रलोभनमें फँसकर कभी अधर्मका आश्रय नहीं लेना चाहिये; क्योंकि इन दोनोंसे मनुष्यका कभी हित नहीं होता, प्रत्युत अहित ही होता है।

परिशिष्ट भाव—अर्जुनने अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित नारायणी सेनाको छोड़कर नि:शस्त्र भगवान् श्रीकृष्णको स्वीकार किया था और दुर्योधनने भगवान्को छोड़कर उनकी नारायणी सेनाको स्वीकार किया था। तात्पर्य है कि अर्जुनकी दृष्टि भगवान्पर थी और दुर्योधनकी दृष्टि वैभवपर थी। जिसकी दृष्टि भगवान्पर होती है, उसका हृदय बलवान् होता है; क्योंकि भगवान्का बल सच्चा है। परन्तु जिसकी दृष्टि सांसारिक वैभवपर होती है, उसका हृदय कमजोर होता है; क्योंकि संसारका बल कच्चा है।

🌼🌼🌼🌼🌼श्रीमद्भगवद्गीता🌼🌼🌼🌼🌼🌺🌺🌺🌺🌺साधक संजीवनी🌺🌺🌺🌺🌺🌷🌷🌷श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी 🌷🌷🌷अध्याय : १ | श्लोक : ९अन्ये च बहव:...
06/12/2022

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अध्याय : १ | श्लोक : ९

अन्ये च बहव: शूरा मदर्थे त्यक्तजीविता:।

नानाशस्त्रप्रहरणा: सर्वे युद्धविशारदा:॥ ९॥

इनके अतिरिक्त बहुत-से शूरवीर हैं, (जिन्होंने) मेरे लिये अपने जीनेकी इच्छाका भी त्याग कर दिया है, और जो अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंको चलाने-वाले हैं (तथा जो) सब-के-सब युद्धकलामें अत्यन्त चतुर हैं।


अन्ये = इनके अतिरिक्त
बहव: = बहुत-से
शूरा: = शूरवीर हैं, (जिन्होंने)
मदर्थे = मेरे लिये
त्यक्तजीविता: = अपने जीनेकी इच्छाका भी त्याग कर दिया है,
च = और
नानाशस्त्रप्रहरणा: = जो अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंको चलाने-वाले हैं (तथा जो)
सर्वे = सब-के-सब
युद्धविशारदा: = युद्धकलामें अत्यन्त चतुर हैं।

'अन्ये च बहव: शूरा मदर्थे त्यक्त- जीविता:’—मैंने अभीतक अपनी सेनाके जितने शूरवीरोंके नाम लिये हैं, उनके अतिरिक्त भी हमारी सेनामें बाह्लीक, शल्य, भगदत्त, जयद्रथ आदि बहुत-से शूरवीर महारथी हैं, जो मेरी भलाईके लिये, मेरी ओरसे लडऩेके लिये अपने जीनेकी इच्छाका त्याग करके यहाँ आये हैं। वे मेरी विजयके लिये मर भले ही जायँ, पर युद्धसे हटेंगे नहीं। उनकी मैं आपके सामने क्या कृतज्ञता प्रकट करूँ ?

'नानाशस्त्रप्रहरणा: सर्वे युद्धविशारदा:’—ये सभी लोग हाथमें रखकर प्रहार करनेवाले तलवार, गदा, त्रिशूल आदि नाना प्रकारके शस्त्रोंकी कलामें निपुण हैं; और हाथसे फेंककर प्रहार करनेवाले बाण, तोमर, शक्ति आदि अस्त्रोंकी कलामें भी निपुण हैं। युद्ध कैसे करना चाहिये; किस तरहसे, किस पैंतरेसे और किस युक्तिसे युद्ध करना चाहिये; सेनाको किस तरह खड़ी करनी चाहिये आदि युद्धकी कलाओंमें भी ये बड़े निपुण हैं, कुशल हैं।

🌼🌼🌼🌼🌼श्रीमद्भगवद्गीता🌼🌼🌼🌼🌼🌺🌺🌺🌺🌺साधक संजीवनी🌺🌺🌺🌺🌺🌷🌷🌷श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी 🌷🌷🌷अध्याय : १ | श्लोक : ८भवान्भीष्मश्...
05/12/2022

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अध्याय : १ | श्लोक : ८

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जय:।

अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥ ८॥

आप (द्रोणाचार्य) और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्तका पुत्र भूरिश्रवा।

भवान् = आप (द्रोणाचार्य)
च = और
भीष्म: = पितामह भीष्म
च = तथा
कर्ण: = कर्ण
च = और
समितिञ्जय: = संग्रामविजयी
कृप: = कृपाचार्य
च = तथा
तथा = वैसे
एव = ही
अश्वत्थामा = अश्वत्थामा,
विकर्ण: = विकर्ण
च = और
सौमदत्ति: = सोमदत्तका पुत्र भूरिश्रवा।

'भवान् भीष्मश्च’—आप और पितामह भीष्म—दोनों ही बहुत विशेष पुरुष हैं। आप दोनोंके समकक्ष संसारमें तीसरा कोई भी नहीं है। अगर आप दोनोंमेंसे कोई एक भी अपनी पूरी शक्ति लगाकर युद्ध करे, तो देवता, यक्ष, राक्षस, मनुष्य आदिमें ऐसा कोई भी नहीं है, जो कि आपके सामने टिक सके। आप दोनोंके पराक्रमकी बात जगत् में प्रसिद्ध ही है। पितामह भीष्म तो आबाल ब्रह्मचारी हैं, और इच्छामृत्यु हैं अर्थात् उनकी इच्छाके बिना उन्हें कोई मार ही नहीं सकता।

[महाभारत-युद्धमें द्रोणाचार्य धृष्टद्युम्नके द्वारा मारे गये और पितामह भीष्मने अपनी इच्छासे ही सूर्यके उत्तरायण होनेपर अपने प्राणोंका त्याग कर दिया।]

'कर्णश्च’—कर्ण तो बहुत ही शूरवीर है। मुझे तो ऐसा विश्वास है कि वह अकेला ही पाण्डव-सेनापर विजय प्राप्त कर सकता है। उसके सामने अर्जुन भी कुछ नहीं कर सकता। ऐसा वह कर्ण भी हमारे पक्षमें है।

[कर्ण महाभारत-युद्धमें अर्जुनके द्वारा मारे गये।]

'कृपश्च समितिञ्जय:’—कृपाचार्यकी तो बात ही क्या है! वे तो चिरंजीवी हैं, हमारे परम हितैषी हैं और सम्पूर्ण पाण्डव-सेनापर विजय प्राप्त कर सकते हैं।

यद्यपि यहाँ द्रोणाचार्य और भीष्मके बाद ही दुर्योधनको कृपाचार्यका नाम लेना चाहिये था; परन्तु दुर्योधनको कर्णपर जितना विश्वास था, उतना कृपाचार्यपर नहीं था। इसलिये कर्णका नाम तो भीतरसे बीचमें ही निकल पड़ा। द्रोणाचार्य और भीष्म कहीं कृपाचार्यका अपमान न समझ लें, इसलिये दुर्योधन कृपाचार्यको 'संग्रामविजयी’ विशेषण देकर उनको प्रसन्न करना चाहता है।

'अश्वत्थामा’—ये भी चिरंजीवी हैं और आपके ही पुत्र हैं। ये बड़े ही शूरवीर हैं। इन्होंने आपसे ही अस्त्र-शस्त्रकी विद्या सीखी है। अस्त्र-शस्त्रकी कलामें ये बड़े चतुर हैं।

'विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च’—आप यह न समझें कि केवल पाण्डव ही धर्मात्मा हैं, हमारे पक्षमें भी मेरा भाई विकर्ण बड़ा धर्मात्मा और शूरवीर है। ऐसे ही हमारे प्रपितामह शान्तनुके भाई बाह्लीकके पौत्र तथा सोमदत्तके पुत्र भूरिश्रवा भी बड़े धर्मात्मा हैं। इन्होंने बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले अनेक यज्ञ किये हैं। ये बड़े शूरवीर और महारथी हैं।

[युद्धमें विकर्ण भीमके द्वारा और भूरिश्रवा सात्यकिके द्वारा मारे गये।]

यहाँ इन शूरवीरोंके नाम लेनेमें दुर्योधनका यह भाव मालूम देता है कि हे आचार्य! हमारी सेनामें आप, भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य आदि जैसे महान् पराक्रमी शूरवीर हैं, ऐसे पाण्डवोंकी सेनामें देखनेमें नहीं आते। हमारी सेनामें कृपाचार्य और अश्वत्थामा—ये दो चिरंजीवी हैं, जबकि पाण्डवोंकी सेनामें ऐसा एक भी नहीं है। हमारी सेनामें धर्मात्माओंकी भी कमी नहीं है। इसलिये हमारे लिये डरनेकी कोई बात नहीं है।

श्रीमद्भगवद्गीतासाधक संजीवनीश्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजीअध्याय : १| श्लोक : ७सम्बन्ध :द्रोणाचार्यके मनमें पाण्डवोंके ...
04/12/2022

श्रीमद्भगवद्गीता
साधक संजीवनी
श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी

अध्याय : १| श्लोक : ७

सम्बन्ध :
द्रोणाचार्यके मनमें पाण्डवोंके प्रति द्वेष पैदा करने और युद्धके लिये जोश दिलानेके लिये दुर्योधनने पाण्डव-सेनाकी विशेषता बतायी। दुर्योधनके मनमें विचार आया कि द्रोणाचार्य पाण्डवोंके पक्षपाती हैं ही; अत: वे पाण्डव-सेनाकी महत्ता सुनकर मेरेको यह कह सकते हैं कि जब पाण्डवोंकी सेनामें इतनी विशेषता है, तो उनके साथ तू सन्धि क्यों नहीं कर लेता? ऐसा विचार आते ही दुर्योधन आगेके तीन श्लोकोंमें अपनी सेनाकी विशेषता बताता है।

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।

नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥ ७॥

हे द्विजोत्तम! हमारे पक्षमें भी जो मुख्य (हैं), उनपर (भी आप) ध्यान दीजिये। आपको याद दिलानेके लिये मेरी सेनाके (जो) नायक हैं, उनको (मैं) कहता हूँ।

द्विजोत्तम = हे द्विजोत्तम!
अस्माकम् = हमारे पक्षमें
तु = भी
ये = जो
विशिष्टा: = मुख्य (हैं),
तान् = उनपर (भी आप)
निबोध = ध्यान दीजिये।
ते = आपको
सञ्ज्ञार्थम् = याद दिलानेके लिये
मम = मेरी
सैन्यस्य = सेनाके (जो)
नायका: = नायक हैं,
तान् = उनको (मैं)
ब्रवीमि = कहता हूँ।

'अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम’—दुर्योधन द्रोणाचार्यसे कहता है कि हे द्विजश्रेष्ठ! जैसे पाण्डवोंकी सेनामें श्रेष्ठ महारथी हैं, ऐसे ही हमारी सेनामें भी उनसे कम विशेषतावाले महारथी नहीं हैं, प्रत्युत उनकी सेनाके महारथियोंकी अपेक्षा ज्यादा ही विशेषता रखनेवाले हैं। उनको भी आप समझ लीजिये।

तीसरे श्लोकमें 'पश्य’ और यहाँ 'निबोध’ क्रिया देनेका तात्पर्य है कि पाण्डवोंकी सेना तो सामने खड़ी है, इसलिये उसको देखनेके लिये दुर्योधन 'पश्य’ (देखिये) क्रियाका प्रयोग करता है। परन्तु अपनी सेना सामने नहीं है अर्थात् अपनी सेनाकी तरफ द्रोणाचार्यकी पीठ है, इसलिये उसको देखनेकी बात न कहकर उसपर ध्यान देनेके लिये दुर्योधन 'निबोध’ (ध्यान दीजिये) क्रियाका प्रयोग करता है।

'नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते’—मेरी सेनामें भी जो विशिष्ट-विशिष्ट सेनापति हैं, सेनानायक हैं, महारथी हैं, मैं उनके नाम केवल आपको याद दिलानेके लिये, आपकी दृष्टि उधर खींचनेके लिये ही कह रहा हूँ।

'सञ्ज्ञार्थम् ’ पदका तात्पर्य है कि हमारे बहुत-से सेनानायक हैं, उनके नाम मैं कहाँतक कहूँ; इसलिये मैं उनका केवल संकेतमात्र करता हूँ; क्योंकि आप तो सबको जानते ही हैं।

इस श्लोकमें दुर्योधनका ऐसा भाव प्रतीत होता है कि हमारा पक्ष किसी भी तरह कमजोर नहीं है। परन्तु राजनीतिके अनुसार शत्रुपक्ष चाहे कितना ही कमजोर हो और अपना पक्ष चाहे कितना ही सबल हो, ऐसी अवस्थामें भी शत्रुपक्षको कमजोर नहीं समझना चाहिये और अपनेमें उपेक्षा, उदासीनता आदिकी भावना किं चिन्मात्र भी नहीं आने देनी चाहिये। इसलिये सावधानीके लिये मैंने उनकी सेनाकी बात कही और अब अपनी सेनाकी बात कहता हूँ।

दूसरा भाव यह है कि पाण्डवोंकी सेनाको देखकर दुर्योधनपर बड़ा प्रभाव पड़ा और उसके मनमें कुछ भय भी हुआ। कारण कि संख्यामें कम होते हुए भी पाण्डव-सेनाके पक्षमें बहुत-से धर्मात्मा पुरुष थे और स्वयं भगवान् थे। जिस पक्षमें धर्म और भगवान् रहते हैं, उसका सबपर बड़ा प्रभाव पड़ता है। पापी-से-पापी, दुष्ट-से-दुष्ट व्यक्तिपर भी उसका प्रभाव पड़ता है। इतना ही नहीं, पशु-पक्षी, वृक्ष-लता आदिपर भी उसका प्रभाव पड़ता है। कारण कि धर्म और भगवान् नित्य हैं। कितनी ही ऊँची-से-ऊँची भौतिक शक्तियाँ क्यों न हों, हैं वे सभी अनित्य ही। इसलिये दुर्योधनपर पाण्डव-सेनाका बड़ा असर पड़ा। परन्तु उसके भीतर भौतिक बलका विश्वास मुख्य होनेसे वह द्रोणाचार्यको विश्वास दिलानेके लिये कहता है कि हमारे पक्षमें जितनी विशेषता है, उतनी पाण्डवोंकी सेनामें नहीं है। अत: हम उनपर सहज ही विजय कर सकते हैं।

03/12/2022

आप सभी को "गीता जयंती" की हार्दिक शुभकामनाएं 💐💐

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