24/02/2026
“ज्ञान का अपमान ज्ञान की कमी से नहीं, बल्कि अज्ञान की अधिकता से होता है।”
यह वाक्य केवल एक सूक्ति नहीं, बल्कि समाज के गहन मनोविज्ञान का दर्पण है। जब हम समाज में ज्ञान के प्रति उपेक्षा, उपहास या अवमानना देखते हैं, तो उसका मूल कारण यह नहीं होता कि ज्ञान दुर्लभ है, बल्कि यह होता है कि अज्ञान इतना प्रबल हो चुका होता है कि वह ज्ञान के प्रकाश को स्वीकार करने से इंकार कर देता है।
ज्ञान स्वभाव से विनम्र होता है। वह शोर नहीं करता, वह केवल प्रकाश देता है। परंतु अज्ञान का स्वभाव विपरीत है ,वह शोर करता है, स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास करता है, और सत्य को चुनौती देने का दुस्साहस करता है। यही कारण है कि जब किसी समाज में अज्ञान की अधिकता होती है, तो वहाँ ज्ञान का सम्मान नहीं, बल्कि उसका अपमान होता है।
यह स्थिति केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि एक सामाजिक प्रवृत्ति बन जाती है। जब समाज में लोग बिना समझे, बिना अध्ययन किए, केवल सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करने लगते हैं, तब वे ज्ञान के वास्तविक स्रोतों को नकारने लगते हैं। वे उस व्यक्ति का उपहास करते हैं जो सत्य की बात करता है, क्योंकि सत्य उनके भ्रमों को तोड़ता है। अज्ञान को सबसे अधिक भय ज्ञान से ही होता है, क्योंकि ज्ञान का एक दीपक भी अज्ञान के विशाल अंधकार को समाप्त करने की क्षमता रखता है।
इतिहास इसका साक्षी है कि जब-जब ज्ञान का अपमान हुआ, तब-तब समाज पतन की ओर बढ़ा। और जब-जब ज्ञान का सम्मान हुआ, तब-तब सभ्यता ने उत्कर्ष प्राप्त किया। ज्ञान केवल सूचना नहीं है; वह चेतना का विस्तार है, वह विवेक की उत्पत्ति है, और वह मनुष्य को पशुता से मनुष्यता की ओर ले जाने वाला सेतु है।
इसी सत्य को शास्त्रों में अत्यंत मार्मिक रूप से कहा गया है:-
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
जो मनुष्य अज्ञानरूपी घोर अंधकार से अंधा हो चुका है, उसके नेत्रों को ज्ञानरूपी अंजन (काजल) की शलाका से खोलने वाले गुरु को नमस्कार है।
इसका तात्पर्य यह है कि अज्ञान मनुष्य को सत्य देखने से वंचित कर देता है। वह सत्य के सामने होते हुए भी उसे देख नहीं पाता, जब ज्ञान का प्रकाश मिलता है, तब ही उसकी चेतना जागृत होती है और वह वास्तविकता को पहचान पाता है।
इसलिए जहाँ अज्ञान की अधिकता होती है, वहाँ ज्ञान का अपमान होता है, क्योंकि अंधकार प्रकाश को स्वीकार नहीं कर पाता।
परंतु अज्ञान का सबसे बड़ा संकट यह है कि वह स्वयं को अज्ञान नहीं मानता। अज्ञानी व्यक्ति को अपने अज्ञान का बोध नहीं होता, और यही उसकी सबसे बड़ी सीमा है। वह अपने सीमित अनुभव को ही अंतिम सत्य मान लेता है और व्यापक सत्य को अस्वीकार कर देता है। इस स्थिति में ज्ञान का अपमान अनिवार्य हो जाता है, क्योंकि अज्ञान अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए ज्ञान को अस्वीकार करता है।
समाज का वास्तविक उत्थान तभी संभव है जब ज्ञान को केवल अर्जित ही नहीं, बल्कि सम्मानित भी किया जाए। ज्ञान का सम्मान केवल विद्वानों का सम्मान नहीं है, बल्कि सत्य, विवेक और चेतना का सम्मान है। जब समाज ज्ञान का सम्मान करता है, तब वह स्वयं को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है।
अतः यह आवश्यक है कि हम ज्ञान को केवल सूचना के रूप में न देखें, बल्कि उसे जीवन का मार्गदर्शक मानें। हमें अपने भीतर यह विनम्रता विकसित करनी होगी कि हम यह स्वीकार करें कि हम सब सीखने की प्रक्रिया में हैं। क्योंकि जहाँ विनम्रता होती है, वहीं ज्ञान प्रवेश करता है, और जहाँ अहंकार होता है, वहाँ अज्ञान अपना साम्राज्य स्थापित कर लेता है।
अंततः, ज्ञान का अपमान वास्तव में ज्ञान की पराजय नहीं, बल्कि अज्ञान की अंतिम छटपटाहट है। ज्ञान सूर्य के समान है, उसे अपमानित करने से उसका प्रकाश कम नहीं होता, बल्कि अपमान करने वाला स्वयं अंधकार में रह जाता है।
और समाज का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह प्रकाश को अपनाता है, या अंधकार को अपना स्वामी बना लेता है।
ऐसे ज्ञानमय चिंतन और सत्य के प्रति समर्पण का यह भाव हमारे पूज्य आध्यात्मिक गुरु, उत्तराम्नाय ज्योतिष्पिताधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी के चरणों में समर्पित है, जिनकी कृपा से ज्ञान केवल शब्द नहीं रहता, बल्कि आत्मा का जागरण बन जाता है। उनके उपदेश यह स्मरण कराते हैं कि ज्ञान का सम्मान करना ही आत्मा का सम्मान करना है, और अज्ञान से ऊपर उठना ही मनुष्य जीवन की वास्तविक साधना है।
चरणों में बारम्बार प्रणाम 🙏
#आत्म_बोध✍️
1008.Guru
Jagadguru Shankaracharya Swaamishreeh Avimukteshwaraanandah Saraswatee 1008
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