Drishti Library and Digital Space
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01/03/2026
*आ बेटी तुझे मैं बेटे की शक्ल दे दूँ,*
*कहीं कोई जल्लाद तेरे इन्तज़ार में ना बैठा हो।*
कतर दूँ जुल्फें तेरी, पहना दूँ लिबास मर्दाना,
कि बाहर कोई दरिंदा शिकार में ना बैठा हो।
वो आँखें जो हवस की आग लेकर ताकती हैं,
भगवान करे कि वो तेरे रास्ते में ना बैठा हो।
तेरी हंसी भी अब ज़माने को चुभने लगी है,
कि कोई ज़हर लिए तीर-ओ-तलवार में ना बैठा हो।
बना दूँ पत्थर तुझे या फौलाद की इक मूरत,
कि कोई मोम का पुतला बाज़ार में ना बैठा हो।
ये कैसी रीत है, कैसा वक़्त आ गया 'साहब',
कि बाप ही सहमा हुआ दीवार में ना बैठा हो।
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