10/12/2023
12 January 2024
Students' federation of India
10/12/2023
12 January 2024
28/01/2022
भिवानी (हरियाणा) के युवाओं ने बिहार और उत्तर प्रदेश में बेरोजगार युवाओं पर की गई लाठीचार्ज के विरोध में, सभी सरकारी विभागों में जल्द भर्तियां करने की मांग को लेकर किया गया प्रदर्शन ।
20/01/2022
कुरुक्षेत्र में आज लघु सचिवालय पर विरोध प्रर्दशन किया गया। छात्र-छात्राओं ने कहा कि रैली ऑफलाइन कक्षा ऑनलाइन को हम सहन नहीं करेंगे विद्यार्थियों का कहना है कि जब भाजपा सरकार के मंत्री एमएलए ऑफलाइन रैलीयाँ कर सकते हैं। तो कक्षाएं ऑफलाइन क्यों नहीं कर सकते। विद्यार्थियों का कहना है कि प्रदेश के सभी स्कूल, महाविद्यालय व विश्वविद्यालयों को पूर्ण रुप से जल्द से जल्द खोला जाए। अगर सरकार ने जल्दी शैक्षणिक संस्थानों को नहीं खोलेगी तो राज्य के सभी छात्र एकजुटता के साथ गाँव गाँव स्तर पर प्रदेश भर को जाम करेंगे ।
23/03/2021
शहीद भगतसिंह के गाँव खटकड़ कंला से चली हुई किसान मजदूर पैदल यात्रा पाँचवें दिन आज सिंघू बॉर्डर पहुँचे । इस पैदल यात्रा में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया (SFI) के कार्यकर्ताओं ने बढ़ चढ़कर भाग लिया। शहीद भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव के शहादत दिवस पर संकल्प जनसभा को एस०एफ०आई के राज्य अध्यक्ष विनोद गिल ने सम्बोधित किया।
21/03/2021
स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया ( SFI) पानीपत की इकाई ने शहीद भगतसिंह के गाँव खटकड़ कंला से चली हुई पदैल यात्रा पानीपत के गाँव पट्टी कलियाना पर पहुँचने पर फूलों व गुब्बारे देकर स्वागत किया। इस मौके एस०एफ०आई पानीपत की जिला संयोजक आशु संध्या, अमित, गगनदीप, आशीष, अनिल, संदीप, विकास आदि साथी शामिल रहे।
27/02/2021
Remembering Chandrashekhar Azad (23 July 1906 - 27 February 1931) on his death anniversary.
#महान_क्रांतिकारी_चन्द्रशेखर_आज़ाद*
शहीद चन्द्रशेखर 'आजाद'
(23 जुलाई 1906 - 27 फ़रवरी 1931)
वे ऐतिहासिक दृष्टि से भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के स्वतंत्रता सेनानी थे। वे शहीद राम प्रसाद बिस्मिल व शहीद भगत सिंह सरीखे क्रान्तिकारियों के अनन्यतम साथियों में से थे।
उपनाम : *'आजाद'*
जन्म स्थल : *भाबरा गाँव (चन्द्रशेखर आज़ाद नगर) (वर्तमान अलीराजपुर जिला)*
मृत्यु स्थल: *चन्द्रशेखर आजाद पार्क, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश*
आन्दोलन: *भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम*
प्रमुख संगठन: *हिदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन-के प्रमुख नेता (1928)*
सन् 1922 में गाँधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन को अचानक बन्द कर देने के कारण उनकी विचारधारा में बदलाव आया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बन गये। इस संस्था के माध्यम से राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में पहले 9 अगस्त 1924 को काकोरी काण्ड किया और फरार हो गये। इसके पश्चात् सन् 1927 में 'बिस्मिल' के साथ 4 प्रमुख साथियों के बलिदान के बाद उन्होंने उत्तर भारत की सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन किया तथा भगत सिंह के साथ लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला सॉण्डर्स की हत्या करके लिया एवं दिल्ली पहुँच कर असेम्बली बम काण्ड को अंजाम दिया।
*जन्म तथा प्रारम्भिक जीवन :
चन्द्रशेखर आजाद का जन्म भाबरा गाँव (अब चन्द्रशेखर आजादनगर) (वर्तमान अलीराजपुर जिला) में 23 जुलाई सन् 1906 को हुआ था। उनके पूर्वज बदरका (वर्तमान उन्नाव जिला) बैसवारा से थे। आजाद के पिता पण्डित सीताराम तिवारी संवत् 1856 में अकाल के समय अपने पैतृक निवास बदरका को छोड़कर पहले कुछ दिनों [मध्य प्रदेश] अलीराजपुर रियासत में नौकरी करते रहे फिर जाकर भाबरा [गाँव] में बस गये। यहीं बालक चन्द्रशेखर का बचपन बीता। उनकी माँ का नाम जगरानी देवी था। आजाद का प्रारम्भिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित भाबरा गाँव में बीता अतएव बचपन में आजाद ने भील बालकों के साथ खूब धनुष बाण चलाये। इस प्रकार उन्होंने निशानेबाजी बचपन में ही सीख ली थी। बालक चन्द्रशेखर आज़ाद का मन अब देश को आज़ाद कराने के अहिंसात्मक उपायों से हटकर सशस्त्र क्रान्ति की ओर मुड़ गया। उस समय बनारस क्रान्तिकारियों का गढ़ था। वह मन्मथनाथ गुप्त और प्रणवेश चटर्जी के सम्पर्क में आये और क्रान्तिकारी दल के सदस्य बन गये। क्रान्तिकारियों का वह दल "हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ" के नाम से जाना जाता था।
*पहली घटना :
1919 में हुए अमृतसर के जलियांवाला बाग नरसंहार ने देश के नवयुवकों को उद्वेलित कर दिया। चन्द्रशेखर उस समय पढाई कर रहे थे। जब गांधीजी ने सन् 1920 में असहयोग आन्दोलन का फरमान जारी किया तो वह आग ज्वालामुखी बनकर फट पड़ी और तमाम अन्य छात्रों की भाँति चन्द्रशेखर भी सडकों पर उतर आये। अपने विद्यालय के छात्रों के जत्थे के साथ इस आन्दोलन में भाग लेने पर वे पहली बार गिरफ़्तार हुए और उन्हें 15 बेतों की सज़ा मिली। इस घटना का उल्लेख पं० जवाहरलाल नेहरू ने कायदा तोड़ने वाले एक छोटे से लड़के की कहानी के रूप में किया है-
ऐसे ही कायदे (कानून) तोड़ने के लिये एक छोटे से लड़के को, जिसकी उम्र 14 या 15 साल की थी और जो अपने को आज़ाद कहता था, बेंत की सजा दी गयी। वह नंगा किया गया और बेंत की टिकटी से बाँध दिया गया। जैसे-जैसे बेंत उस पर पड़ते थे और उसकी चमड़ी उधेड़ डालते थे, वह 'भारत माता की जय!' चिल्लाता था। हर बेंत के साथ वह लड़का तब तक यही नारा लगाता रहा, जब तक वह बेहोश न हो गया। बाद में वही लड़का उत्तर भारत के क्रान्तिकारी कार्यों के दल का एक बड़ा नेता बना।
*झांसी में क्रांतिकारी गतिविधियां :
चंद्रशेखर आजाद ने एक निर्धारित समय के लिए झांसी को अपना गढ़ बना लिया। झांसी से पंद्रह किलोमीटर दूर ओरछा के जंगलों में वह अपने साथियों के साथ निशानेबाजी किया करते थे। अचूक निशानेबाज होने के कारण चंद्रशेखर आजाद दूसरे क्रांतिकारियों को प्रशिक्षण देने के साथ-साथ पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के छ्द्म नाम से बच्चों के अध्यापन का कार्य भी करते थे। वह धिमारपुर गांव में अपने इसी छद्म नाम से स्थानीय लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गए थे। झांसी में रहते हुए चंद्रशेखर आजाद ने गाड़ी चलानी भी सीख ली थी।
*क्रान्तिकारी संगठन :
असहयोग आन्दोलन के दौरान जब फरवरी 1922 में (चौरी-चौरा) की घटना के पश्चात् बिना किसी से पूछे (गाँधीजी) ने आन्दोलन वापस ले लिया तो देश के तमाम नवयुवकों की तरह आज़ाद का भी कांग्रेस से मोह भंग हो गया और पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल योगेशचन्द्र चटर्जी ने 1924 में उत्तर भारत के क्रान्तिकारियों को लेकर एक दल हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ (एच० आर० ए०) का गठन किया। चन्द्रशेखर आज़ाद भी इस दल में शामिल हो गये। इस संगठन ने जब गाँव के अमीर घरों में डकैतियाँ डालीं, ताकि दल के लिए धन जुटाने की व्यवस्था हो सके तो यह तय किया गया कि किसी भी औरत के ऊपर हाथ नहीं उठाया जाएगा। एक गाँव में राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में डाली गई डकैती में जब एक औरत ने आज़ाद का पिस्तौल छीन लिया तो अपने बलशाली शरीर के बावजूद आज़ाद ने अपने उसूलों के कारण उस पर हाथ नहीं उठाया। इस डकैती में क्रान्तिकारी दल के आठ सदस्यों पर, जिसमें आज़ाद और बिस्मिल भी शामिल थे, पूरे गाँव ने हमला कर दिया। बिस्मिल ने मकान के अन्दर घुसकर उस औरत के कसकर चाँटा मारा, पिस्तौल वापस छीनी और आजाद को डाँटते हुए खींचकर बाहर लाये। इसके बाद दल ने केवल सरकारी प्रतिष्ठानों को ही लूटने का फैसला किया। 1 जनवरी 1925 को दल ने समूचे हिन्दुस्तान में अपना बहुचर्चित पर्चा द रिवोल्यूशनरी (क्रान्तिकारी) बाँटा जिसमें दल की नीतियों का खुलासा किया गया था। इस पैम्फलेट में सशस्त्र क्रान्ति की चर्चा की गयी थी। इश्तहार के लेखक के रूप में "विजयसिंह" का छद्म नाम दिया गया था। शचींद्रनाथ सान्याल इस पर्चे को बंगाल में पोस्ट करने जा रहे थे तभी पुलिस ने उन्हें बाँकुरा में गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। "एच० आर० ए०" के गठन के अवसर से ही इन तीनों प्रमुख नेताओं - बिस्मिल, सान्याल और चटर्जी में इस संगठन के उद्देश्यों को लेकर मतभेद था।
इस संघ की नीतियों के अनुसार 9 अगस्त 1925 को काकोरी काण्ड को अंजाम दिया गया। जब शाहजहाँपुर में इस योजना के बारे में चर्चा करने के लिये मीटिंग बुलायी गयी तो दल के एक मात्र सदस्य अशफाक उल्ला खाँ ने इसका विरोध किया था। उनका तर्क था कि इससे प्रशासन उनके दल को जड़ से उखाड़ने पर तुल जायेगा और ऐसा ही हुआ भी। अंग्रेज़ चन्द्रशेखर आज़ाद को तो पकड़ नहीं सके पर अन्य सर्वोच्च कार्यकर्ताओँ - पण्डित राम प्रसाद 'बिस्मिल', अशफाक उल्ला खाँ एवं ठाकुररोशन सिंह को 19 दिसम्बर 1927 तथा उससे 2 दिन पूर्व राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को 17 दिसम्बर 1927 को फाँसी पर लटकाकर मार दिया गया। सभी प्रमुख कार्यकर्ताओं के पकडे जाने से इस मुकदमे के दौरान दल पाय: निष्क्रिय ही रहा। एकाध बार बिस्मिल तथा योगेश चटर्जी आदि क्रान्तिकारियों को छुड़ाने की योजना भी बनी जिसमें आज़ाद के अलावा भगत सिंह भी शामिल थे लेकिन किसी कारणवश यह योजना पूरी न हो सकी।
4 क्रान्तिकारियों को फाँसी और 16 को कड़ी कैद की सजा के बाद चन्द्रशेखर आज़ाद ने उत्तर भारत के सभी कान्तिकारियों को एकत्र कर 8 सितम्बर 1928 को दिल्ली के फीरोजशाह कोटला मैदान में एक गुप्त सभा का आयोजन किया। इसी सभा में भगत सिंह को दल का प्रचार-प्रमुख बनाया गया। इसी सभा में यह भी तय किया गया कि सभी क्रान्तिकारी दलों को अपने-अपने उद्देश्य इस नयी पार्टी में विलय कर लेने चाहिये। पर्याप्त विचार-विमर्श के पश्चात् एकमत से समाजवाद को दल के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल घोषित करते हुए "हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेशन" का नाम बदलकर "हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन" रखा गया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने सेना-प्रमुख (कमाण्डर-इन-चीफ) का दायित्व सम्हाला। इस दल के गठन के पश्चात् एक नया लक्ष्य निर्धारित किया गया - "हमारी लड़ाई आखरी फैसला होने तक जारी रहेगी और वह फैसला है जीत या मौत।"
*लाला लाजपतराय का बदला :
17 दिसम्बर, 1928 को चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और राजगुरु ने संध्या के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ़्तर को जा घेरा। ज्यों ही जे. पी. सांडर्स अपने अंगरक्षक के साथ मोटर साइकिल पर बैठकर निकला, पहली गोली राजगुरु ने दाग़ दी, जो साडंर्स के मस्तक पर लगी और वह मोटर साइकिल से नीचे गिर पड़ा। भगतसिंह ने आगे बढ़कर चार–छह गोलियाँ और दागकर उसे बिल्कुल ठंडा कर दिया। जब सांडर्स के अंगरक्षक ने पीछा किया तो चन्द्रशेखर आज़ाद ने अपनी गोली से उसे भी समाप्त कर दिया। लाहौर नगर में जगह–जगह परचे चिपका दिए गए कि लाला लाजपतराय की मृत्यु का बदला ले लिया गया। समस्त भारत में क्रान्तिकारियों के इस क़दम को सराहा गया।
*केन्द्रीय असेंबली में बम :
चन्द्रशेखर आज़ाद के ही सफल नेतृत्व में भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल, 1929 को दिल्ली की केन्द्रीय असेंबली में बम विस्फोट किया। यह विस्फोट किसी को भी नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से नहीं किया गया था। विस्फोट अंग्रेज़ सरकार द्वारा बनाए गए काले क़ानूनों के विरोध में किया गया था। इस काण्ड के फलस्वरूप भी क्रान्तिकारी बहुत जनप्रिय हो गए। केन्द्रीय असेंबली में बम विस्फोट करने के पश्चात भगति सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने स्वयं को गिरफ्तार करा लिया। वे न्यायालय को अपना प्रचार–मंच बनाना चाहते थे।
*चरम सक्रियता :
आज़ाद के प्रशंसकों में पण्डित मोतीलाल नेहरू, पुरुषोत्तमदास टंडन का नाम शुमार था। जवाहरलाल नेहरू से आज़ाद की भेंट आनन्द भवन में हुई थी उसका ज़िक्र नेहरू ने अपनी आत्मकथा में 'फासीवादी मनोवृत्ति' के रूप में किया है। इसकी कठोर आलोचना मन्मथनाथ गुप्त ने अपने लेखन में की है। कुछ लोगों का ऐसा भी कहना है कि नेहरू ने आज़ाद को दल के सदस्यों को समाजवाद के प्रशिक्षण हेतु रूस भेजने के लिये एक हजार रुपये दिये थे जिनमें से 488 रूपये आज़ाद की शहादत के वक़्त उनके वस्त्रों में मिले थे। सम्भवतः सुरेन्द्रनाथ पाण्डेय तथा यशपाल का रूस जाना तय हुआ था पर 1928-31 के बीच शहादत का ऐसा सिलसिला चला कि दल लगभग बिखर सा गया। जबकि यह बात सच नहीं है। चन्द्रशेखर आज़ाद की इच्छा के विरुद्ध जब भगत सिंह एसेम्बली में बम फेंकने गये तो आज़ाद पर दल की पूरी जिम्मेवारी आ गयी। साण्डर्स वध में भी उन्होंने भगत सिंह का साथ दिया और बाद में उन्हें छुड़ाने की पूरी कोशिश भी की। आज़ाद की सलाह के खिलाफ जाकर यशपाल ने 23 दिसम्बर 1929 को दिल्ली के नज़दीक वायसराय की गाड़ी पर बम फेंका तो इससे आज़ाद क्षुब्ध थे क्योंकि इसमें वायसराय तो बच गया था पर कुछ और कर्मचारी मारे गए थे। आज़ाद को 28 मई 1930 को भगवती चरण वोहरा की बम-परीक्षण में हुई शहादत से भी गहरा आघात लगा था। इसके कारण भगत सिंह को जेल से छुड़ाने की योजना भी खटाई में पड़ गयी थी। भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु की फाँसी रुकवाने के लिए आज़ाद ने दुर्गा भाभी को गांधीजी के पास भेजा जहाँ से उन्हें कोरा जवाब दे दिया गया था। आज़ाद ने अपने बलबूते पर झाँसी और कानपुर में अपने अड्डे बना लिये थे। झाँसी में मास्टर रुद्र नारायण, सदाशिव मलकापुरकर, भगवानदास माहौर तथा विश्वनाथ वैशम्पायन थे जबकि कानपुर में पण्डित शालिग्राम शुक्ल सक्रिय थे। शालिग्राम शुक्ल को 1 दिसम्बर 1930 को पुलिस ने आज़ाद से एक पार्क में मिलने जाते वक्त शहीद कर दिया था।
*बलिदान :
एच०एस०आर०ए० द्वारा किये गये साण्डर्स-वध और दिल्ली एसेम्बली बम काण्ड में फाँसी की सजा पाये तीन अभियुक्तों - भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव ने अपील करने से साफ मना कर ही दिया था। अन्य सजायाफ्ता अभियुक्तों में से सिर्फ 3 ने ही प्रिवी कौन्सिल में अपील की। 11 फ़रवरी 1931 को लन्दन की प्रिवी कौन्सिल में अपील की सुनवाई हुई। इन अभियुक्तों की ओर से एडवोकेट प्रिन्ट ने बहस की अनुमति माँगी थी किन्तु उन्हें अनुमति नहीं मिली और बहस सुने बिना ही अपील खारिज कर दी गयी। चन्द्रशेखर आज़ाद ने मृत्यु दण्ड पाये तीनों प्रमुख क्रान्तिकारियों की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया। वे उत्तर प्रदेश की हरदोई जेल में जाकर गणेशशंकर विद्यार्थी से मिले। विद्यार्थी से परामर्श कर वे इलाहाबाद गये और 20 फरवरी को जवाहरलाल नेहरू से उनके निवास आनन्द भवन में भेंट की। आजाद ने पण्डित नेहरू से यह आग्रह किया कि वे गांधी जी पर लॉर्ड इरविन से इन तीनों की फाँसी को उम्र- कैद में बदलवाने के लिये जोर डालें! अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेव राज से मन्त्रणा कर ही रहे थे तभी सी०आई०डी० का एस०एस०पी० नॉट बाबर जीप से वहाँ आ पहुँचा। उसके पीछे-पीछे भारी संख्या में कर्नलगंज थाने से पुलिस भी आ गयी। दोनों ओर से हुई भयंकर गोलीबारी में आजाद को वीरगति प्राप्त हुई। यह दुखद घटना 27 फ़रवरी 1931 के दिन घटित हुई और हमेशा के लिये इतिहास में दर्ज हो गयी।
पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिये चन्द्रशेखर आज़ाद का अन्तिम संस्कार कर दिया था। जैसे ही आजाद की बलिदान की खबर जनता को लगी सारा इलाहाबाद अलफ्रेड पार्क में उमड पडा। जिस वृक्ष के नीचे आजाद शहीद हुए थे लोग उस वृक्ष की पूजा करने लगे। वृक्ष के तने के इर्द-गिर्द झण्डियाँ बाँध दी गयीं। लोग उस स्थान की माटी को कपडों में शीशियों में भरकर ले जाने लगे। समूचे शहर में आजाद के बलिदान की खबर से जबरदस्त तनाव हो गया। शाम होते-होते सरकारी प्रतिष्ठानों पर हमले होने लगे। लोग सडकों पर आ गये।
आज़ाद के बलिदान की खबर जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू को मिली तो उन्होंने तमाम काँग्रेसी नेताओं व अन्य देशभक्तों को इसकी सूचना दी।। बाद में शाम के वक्त लोगों का हुजूम पुरुषोत्तम दास टंडन के नेतृत्व में इलाहाबाद के रसूलाबाद शमशान घाट पर कमला नेहरू को साथ लेकर पहुँचा। अगले दिन आजाद की अस्थियाँ चुनकर युवकों का एक जुलूस निकाला गया। इस जुलूस में इतनी ज्यादा भीड थी कि इलाहाबाद की मुख्य सडकों पर जाम लग गया। ऐसा लग रहा था जैसे इलाहाबाद की जनता के रूप में सारा हिन्दुस्तान अपने इस सपूत को अंतिम विदाई देने उमड पड़ा हो। जुलूस के बाद सभा हुई। सभा को शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी प्रतिभा सान्याल ने सम्बोधित करते हुए कहा कि जैसे बंगाल में खुदीराम बोस की बलिदान के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया वैसे ही आज़ाद को भी सम्मान मिलेगा। सभा को कमला नेहरू तथा पुरुषोत्तम दास टंडन ने भी सम्बोधित किया। इससे कुछ ही दिन पूर्व 6 फ़रवरी 1931 को पण्डित मोतीलाल नेहरू के देहान्त के बाद आज़ाद भेस बदलकर उनकी शवयात्रा में शामिल हुए थे।
*व्यक्तिगत जीवन :
भारत सरकार ने 1977 में महान बलिदानी की स्मृति में डाक टिकट जारी किया। आजाद प्रखर देशभक्त थे। काकोरी काण्ड में फरार होने के बाद से ही उन्होंने छिपने के लिए साधु का वेश बनाना बखूबी सीख लिया था और इसका उपयोग उन्होंने कई बार किया। एक बार वे दल के लिये धन जुटाने हेतु गाज़ीपुर के एक मरणासन्न साधु के पास चेला बनकर भी रहे ताकि उसके मरने के बाद मठ की सम्पत्ति उनके हाथ लग जाये। परन्तु वहाँ जाकर जब उन्हें पता चला कि साधु उनके पहुँचने के पश्चात् मरणासन्न नहीं रहा अपितु और अधिक हट्टा-कट्टा होने लगा तो वे वापस आ गये। प्राय: सभी क्रान्तिकारी उन दिनों रूस की क्रान्तिकारी कहानियों से अत्यधिक प्रभावित थे आजाद भी थे लेकिन वे खुद पढ़ने के बजाय दूसरों से सुनने में ज्यादा आनन्दित होते थे। एक बार दल के गठन के लिये बम्बई गये तो वहाँ उन्होंने कई फिल्में भी देखीं। उस समय मूक फिल्मों का ही प्रचलन था अत: वे फिल्मो के प्रति विशेष आकर्षित नहीं हुए।
चन्द्रशेखर आज़ाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी। उनके बलिदान के बाद उनके द्वारा प्रारम्भ किया गया आन्दोलन और तेज हो गया, उनसे प्रेरणा लेकर हजारों युवक स्वतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े। आजाद की शहादत के सोलह वर्षों बाद 15 अगस्त सन् 1947 को हिन्दुस्तान की आजादी का उनका सपना पूरा तो हुआ किन्तु वे उसे जीते जी देख न सके। सभी उन्हें पण्डित जी ही कहकर सम्बोधित किया करते थे.
16/10/2020
प्रैस नोट इन्द्री ( करनाल ) 16/10/2020
सबको योग्यता अनुसार स्थाई रोजगार के लिये
रोजगार अधिकार पैदल यात्रा (27 अक्तूबर उचाना -1 नवंबर करनाल ) विनोद गिल
(इन्द्री) भारत कि जनवादी नौजवान सभा ( DYFI) स्टूडैंट्स फैडरेशन आॅफ इंडिया ( SFI) ने आज इन्द्री मे प्रैस वार्ता करते हुए रोजगार अधिकार पदयात्रा की जानकारी दी। प्रैस वार्ता को भारत की जनवादी नौजवान सभा ( DYFI) के राज्य सहसचिव संदीप , जिला के कैशियर ज्ञान सिंह स्टूडैंट्स फैडरेशन आॅफ इंडिया ( SFI) के राज्य अध्यक्ष विनोद गिल ने सयुंक्त तौर प्रैस वार्ता को सम्बोधित करते बताया की हरियाणा 33% बेरोजगारी के साथ देश में पहले स्थान पर है । इसका मतलब है कि हरियाणा का हर तीसरा व्यक्ति बेरोजगार है । हरियाणा के लगभग 1.3 करोड़ युवा 18-40 साल की उम्र के हैं और हमारे सामने बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या है । बेरोजगारी के चलते गरीबी, अपराध, नशा, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता, अशिक्षा, अस्वास्थ्य, जातिवाद, धार्मिक कट्टरता, अंधविश्वास, अवसरवाद, अनैतिकता आदि को बढ़ावा मिलता है । बेरोजगारी के कारण युवाओं की शादियां नही हो रही हैं। नशाखोरी बढ़ रही है व परिवार टूट रहे हैैं। युवाओं में आत्महत्या की दर बढ़ रही है। पढ़े- लिखे युवाओं को मनरेगा में काम करना पड़ रहा है। बेरोजगारी के कारण व्यक्ति आत्मसम्मान के साथ अपना जीवन व्यतीत नही कर सकता जो कि हमारा मौलिक अधिकार है ।
देश व प्रदेश में बेरोजगारी लगातार बढ़ती जा रही है। पहले नोटबंदी, फिर जीएसटी और अब सरकार द्वारा बिना प्लानिंग के लॉकडाउन ने आग में घी डालने का काम किया है। बेरोजगारी अपने आप बढ़ रही हो ऐसा नहीं है सरकारों की गलत नीतियों के कारण बेरोजगारी बढ़ रही है । चाहे पिछली कांग्रेस के नेतृत्ववाली सरकारें हों या वर्तमान में बीजेपी के नेतृत्ववाली हों, दोनों ने ही बेरोजगारी बढ़ानेवाली निजीकरण की दिवालिया नीतियों को लागू किया है। वर्तमान सत्ताधारी बीजेपी ने केंद्र के स्तर पर हर साल 2 करोड़ व प्रदेश में हर साल 2 लाख स्थाई रोजगार देने का वायदा किया था लेकिन किया बिल्कुल इसके विपरीत । लॉकडाउन के दौरान ही करोड़ो युवाओं का रोजगार छिन गया । ऐसा प्रतीत होता है जैसे बीजेपी सरकारों ने तो रोजगार खत्म करने का ठेका ले रखा है। हर सरकारी विभाग को बेचा जा रहा हैं। एक साल के लिए भर्तियों पर प्रतिबंध लगा दिया है। श्रम कानूनों को खत्म किया जा रहा है। कृषि को उजाड़ा जा रहा है। काम के घंटे बढ़ाए जा रहे हैं और कंपनियों में कर्मचारियों को निकालने की खुली छूट दी गई है । दोस्तों हरियाणा में ही लाखों स्वीकृत पद खाली पड़े हैं लेकिन सरकार भर्ती नहीं कर रही है। ऐसे समय में हरियाणा व देश के युवाओं के सामने अपने देश व भविष्य को बचाने के लिए आन्दोलन का ही रास्ता बच्चा हुआ। इसलिए बेरोजगार युवा मंच हरियाणा ने तय किया है कि हरियाणा के बेरोजगार युवा 27 अक्तूबर से 1 नवंबर तक उचाना से करनाल तक स्थाई रोजगार के सवाल पर पैदल मार्च करेंगे और 1 नवंबर को आक्रोश प्रदर्शन करते हुए मुख्यमंत्री आवास का घेराव करेंगें।
मुख्य मांगे:-
1. कोरोना महामारी की आड़ में स्थाई भर्तियों पर लगाई गई रोक हटाई जाए।
2. खाली पड़े पदों पर तत्काल भर्ती की जाए,अटकी हुई सभी भर्तियों को पूरा किया जाए व ठेका प्रथा बन्द की जाए।
3. शिक्षा, रोडवेज, स्वास्थ्य ,बिजली ,रेलवे आदि सरकारी विभागों का निजीकरण करना बन्द किया जाए ।
4. लॉकडाउन की भरपाई हेतु तमाम भर्तियों के लिए आवेदन की उम्र सीमा व सर्टिफिकेट की वैधता 1 वर्ष बढ़ाई जाए।
5. नौकरियों के लिये सभी तरह के आवेदन निःशुल्क किए जाए ।
6. भर्तियों के लिए कर्मचारी चयन आयोग (SSC ) की तर्ज़ पर हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग (HSSC) का भी पाठ्यक्रम तैयार किया जाए और संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की तरह नियमित भर्तियाँ की जाए।
7. सक्षम योजना पर लगायी गयी 3 वर्ष कार्य उपलब्धता या 35 वर्ष उम्र की सीमा हटाओ और न्यूनतम वेतन कम से कम 20,000 रुपये किया जाए।
8. हरियाणा अध्यापक पात्रता परीक्षा (HTET) और केंद्रीय अध्यापक पात्रता परीक्षा (CTET) की वैधता अवधी आजीवन की जाए।
9. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग के खाली पदों (बैकलॉग )को पूरा करने के लिए विशेष भर्ति अभियान चलाया जाए।
10. मनरेगा की तरह शहरों के लिए भगतसिंह राष्ट्रीय शहरी रोज़गार गारण्टी कानून पारित किया जाए व रोज़गार न दे पाने की सूरत में प्रत्येक बेरोजगार को बिना शर्त न्यूनतम 10,000 रुपये मासिक बेरोजगारी भत्ता प्रदान किया जाए।
11. रोज़गार के अधिकार को मौलिक अधिकारों में शामिल किया जाए।
12. सभी कच्चे कर्मचारियों को पक्का किया जाए व विभागों में आउटसोर्सिंग के तहत सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पुनः नियुक्ति बन्द की जाए ।
13. मनरेगा के तहत परिवार के सभी वयस्क सदस्यों को 200 दिन का काम व 600 रुपये दिहाड़ी दी जाए ।
14.कृषि अध्यादेशों के जनविरोधी प्रावधान वापस लो और श्रम कानूनों में श्रमिक विरोधी बदलाव वापस लो।
15. स्वरोजगार के लिए बिना शर्त और बिना ब्याज ऋण उपलब्ध करवाया जाए ।
16. नयी शिक्षा नीति - 2020 को रद्द किया जाए व सभी के लिए समान एवं निःशुल्क शिक्षा का कानून बनाया जाए।
जारीकर्ता
विनोद गिल
SFI राज्य अध्यक्ष
12/08/2020
क्या आपको पता है कि आज के दिन (12 अगस्त) सन् 1936 अविभाजित भारत में संगठित छात्र आंदोलन का जन्म हुआ था ! ऑल इण्डिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISF) के गठन ने छात्र समुदाय में क्रांतिकारियों को एकजुट करने का काम किया था। AISF की खास बात यह थी कि उसने कई राजनैतिक विचारधारा से आने वाले छात्रों को ब्रिटिश राज व साम्राज्यवाद विरोधी नारे के तहत एकजुट किया। AISF के शुरुवाती दिनों में संगठन के भीतर चले तर्क - वितर्क से बनी समझदारी कि दो नींव थी।
पहला की छात्रों को अपने अधिकारों के लिए संगठित होने की जरूरत है और ऐसे शिक्षा व्यवस्था के लिए संघर्ष करने की जरूरत है ज्यो देश के बहुसंख्यक आबादी (पिछड़े और शोषित वर्ग) के लिए लाभदायक हो ।
दूसरा की छात्रों का आंदोलन अपने अधिकार व मांग समाज के दूसरे वर्गो के आंदोलनों के साथ ना आकर हासिल नहीं कर सकता ।
SFI इस समझ को अपना सिद्धांत मानता है । दरअसल SFI का गठन आज़ादी के बाद AISF में चले एक लंबे संघर्ष का नतीजा था। उन दिनों AISF का एक धड़ा यह मानता की क्युकी देश को आज़ादी मिल चुकी थी, इसीलिए छात्रों को नेहरू सरकार के खिलाफ लामबंद होने की जरूरत नहीं है जबकि दूसरे धड़े का मानना था कि भले ही देश को राजनैतिक तौर से आज़ादी मिल गई है, परन्तु सही मायनों में देश के छात्रों व अन्य वर्गो की लड़ाई समाप्त नहीं हुई है। SFI का गठन AISF के दूसरे धड़े के लोगो ने 1970 में किया । आज देखा जाए तो वह लोग सही थे । देश के छात्र आज भी कई समस्याओं का शिकार है । उछशिक्षा प्रणाली में आज भी निम्संख्यक छात्र ही पहुंच पाते है और उनमें से भी ज़्यादातर को सम्मान जनक नौकरियां नहीं मिल पाती । शिक्षा जो मिलती भी है वह यह सिखाता है कि पूंजीवाद में एक आदर्श मज़दूर कैसे बने (आसान भाषा में समझा जाए तो व्यवस्था का आदर्श गुलाम कैसे बने) । उप्पर से RSS जैसी फासीवादी संगठन देश की शिक्षा को एक मिथक कि क्लास बनाने में तुली हुई है। इस परिपेक्ष में देखे तो AISF के दूसरे धड़े की बात सही साबित होती है । शायद यह ही कारण है की SFI आज देश का सबसे बड़ा प्रगतिशील छात्र संगठन है ।
आज की स्थितियां भले ही बदली हुई है, पर AISF के वह दो सिद्धांत उतने ही सच साबित होते है जितने वह अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई में थे ।
हमारी सभी छात्रों से अपील है की संगठित छात्र आंदोलन के इस इतिहास को याद करते हुए उन सिद्धांतो पर अमल करें ।
छात्र एकता ज़िंदाबाद ।
इंकलाब जिंदाबाद ।
विनोद गिल एस०एफ०आई राज्य अध्यक्ष
10/07/2020
मैडिकल स्टूडैंट्स संघर्ष समिति हरियाणा सम्बंधित स्टूडैंट्स फैडरेशन आॅफ इंडिया ( SFI) ने आज PGIMS के कुलपति के नाम ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन के माध्यम विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने मैडिकल स्टूडैंट्स की मुख्य मांगे रखी।
1. सभी मैडिकल कोर्सों के विद्यार्थियों को उनके पिछले शैक्षणिक कार्यशैली (एवरेज मार्क्स + असेसमेंट के मार्क्स+ प्लस 10% वेटेज के साथ प्रमोट किया जाए ।
2. जो विद्यार्थी इस कोरोना काल के समय में हास्पिटल में काम कर रहें है उन सब विद्यार्थियों को PPE किट व अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाए।
3. सभी मैडिकल कोर्सों की फीस माफ की जाए।
4. सभी मैडिकल स्टूडैंट्स का बीमा करने की व्यवस्था तुरन्त प्रभाव से की जाए ।
अगर विश्वविद्यालय प्रशासन विधार्थीयों की समस्याओं का कोई समाधान नहीं करता है। मैडिकल स्टूडैंट्स संघर्ष समिति ( SFI) प्रदेश भर में तमाम मैडिकल स्टूडैंट्स को लामबंद करते हुए तीखा आन्दोलन करने को मजबूर होगी, इस खामयाजा सरकार को भुगतना पड़ेगा।
01/07/2020
आप सब जरुर सुने।
30/06/2020
#जनकवि_बाबा_नागार्जुन