12/11/2025
गत 2 नवंबर,2025 को हरियाणा लेखक मंच द्वारा फारूखा खालसा सीनियर सेकंडरी स्कूल अम्बाला छावनी में एक साहित्यिक सेमिनार का आयोजन-'आज की हिंदी कहानी’और ‘आज की हिंदी गज़ल' पर दो सत्रों में संपन्न हुआ । मंच के कार्यकारी अध्यक्ष डा. अशोक भाटिया ने स्वागत वक्तव्य में कहा कि उत्सवधर्मिता की बढ़ती प्रवृत्ति गंभीर साहित्य के लिए गंभीर खतरे की तरह है।साहित्य में इस बढ़ती प्रवृत्ति के प्रति लेखकों को सतर्क रहना चाहिए। मुख्य वक्ता हिन्दी के प्रख्यात आलोचक डाॅ वैभव सिंह ने आधुनिक हिंदी कहानी पर चर्चा करते हुए कहा कि आज का दौर कुछ ऐसा है जिसमे पुरानी परंपराएं आक्रामक रूप से लौट रही हैं, दूसरी तरफ आधुनिकता अनेक अंतर्विरोधों से घिरी हुई है । दरअसल परंपरा और आधुनिकता के पाखंड के इस समय में सत्य को पहचान पाना बहुत जटिल हो गया है। सत्य को प्राप्त करना तो आवश्यक है, लेकिन सत्य को प्राप्त करने की प्रक्रिया की भी रक्षा करनी पड़ती है। यानी संवाद, बहस, असहमति की संस्कृति को बचाना व विकसित करना होता है जिसके बगैर सत्य भी प्राप्त नहीं हो सकता है।सत्य प्राप्ति तो संभव है । साहित्य, संस्कृति, पत्रकारिता आदि पर सत्ता का व्यापक दबाव है। इतना दबाव लेखक समुदाय ने कभी महसूस नहीं किया । इस दौर में चुनावी लोकतंत्र तो है लेकिन वास्तविक लोकतंत्र गायब होता जा रहा है । इसलिए लेखक के लिए स्वतंत्र रूप से सोचना और उसी प्रकार से लिखना चुनौतीपूर्ण हो गया है। लेकिन फिर भी हिंदी साहित्य में लेखक लगातार ऐसी कहानियाँ लिख रहे हैं जिनमें इस समय का यथार्थ अभिव्यक्त हो रहा है । आज भी कहानीकार कहानी के विभिन्न पड़ावों की यात्रा को आत्मसात करते हुए कहानी के कथ्य और प्रारूप को लगातार विकसित और समृद्ध कर रहा है । उन्होंने भीष्म साहनी,बदीउज्जमा,यशपाल और राही मासूम रजा की कहानियों की चर्चा भारत-पाक दंगों के संदर्भ में करते हुए कहा कि अब साम्प्रदायिकता बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक हो गई है। इस संदर्भ में उन्होंने भालचंद्र जोशी की कहानी 'रिहाई' मोहम्मद आरिफ की 'तार', अनिल यादव की 'दंगा भेज्यो मौला' और नीलाक्षी सिंह की 'परिंदे के इंतजार-सा कुछ' की चर्चा की।...
हिंदी कहानी और हिंदी गज़ल दोनों के सामने नई चुनौतियां
गत 2 नवंबर,2025 को हरियाणा लेखक मंच द्वारा फारूखा खालसा सीनियर सेकंडरी स्कूल अम्बाला छावनी में एक साहित्यिक सेमिनार .....
12/11/2025
'एकालाप' को पढ़ते हुए मुझे सबसे पहले ग़ालिब के शे'र याद आए--मौत का एक दिन मुअय्यन हैनींद क्यों रात भर नहीं आती---हो चुकी ग़ालिब बलाएँ सब तमामएक मर्ग -ए- नागहानी और है हिन्दी में मौत पर बहुत कम लिखा गया है।इक्का दुक्का किसी कवि ने भले एक दो कविताएँ लिखी हों, जम के किसी ने नहीं लिखा। इस संदर्भ में मुझे उपेन्द्रनाथ अश्क द्वारा रचित मौत पर लिखी 11 कविताओं की याद आती है जो उनके काव्य संग्रह ' पीली चोंच वाली चिडिया के नाम ' में संकलित हैं। सवाल हो सकता है कि मौत पर कविताएँ कम क्यों हैं?इसका जवाब अमित मनोज देते हुए लिखते हैं--" कभी न मरने की सोचकर ही हम तमाम तरह की चालाकियाँ- बईमानियाँ जीवन भर करते रहते हैं और कमाल की बात देखिए, ऐसा करते हुए हमें ज़रा भी न शर्म आती, न अफ़सोस होता।" मौत को भूले रहने में ही भला है।सो कवि लोग भी कई बार यह सोच कर कि इसमें कहने को क्या है,इस पर सोचने को तैयार नहीं हैं।हम जीवन की बात करे, मौत पर क्यों करें?बस इस पर कोई कुछ कहने को तैयार नहीं।कुछ तो इसे दार्शनिक विचार कह कर परे कर देते हैं।...
सहजता की बानगी ‘एकालाप’ कविता संग्रह – डॉ.राजेन्द्र टोकी
‘एकालाप’ को पढ़ते हुए मुझे सबसे पहले ग़ालिब के शे’र याद आए–मौत का एक दिन मुअय्यन हैनींद क्यों रात भर नहीं आती—हो चुक.....
22/06/2025
हिन्दी समाचार पत्र दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित दो लघुकथाएँ - 'कप में उफान' और निक्की ट्रैप हो गई'
निक्कू ट्रैप हो गई : अशोक भाटिया
छोटी चार साल की है। स्कूल जाती है। सबसे घुल मिल जाती है।
तीनों बच्चे निक्कू ट्रैप हो गई का खेल खेल रहे थे। दो लड़कर अपने घर चले गए तो छोटी ने मां को बताया कि निक्कू ट्रैप हो गई है। मां बोली 'कोई बात नहीं, मिल जाएगी। मां ने ध्यान बंटाना चाहा कि छोटी ने पूछा मम्मी, अगर मैं ट्रैप हो गई तो ?'
मां ऐसा भयावह दृश्य सोचकर कांप उठी। फिर उसे समझाया कि स्कूल से आते वक्त पहले देखी कि पर कर कोई मेम्बर आपको लेने आया है तो ही चैन से नीचे उतरी। नहीं तो घर पर फोन करने को बोलना, वो बुला लेंगे। कोई न आया तो वापस स्कूल ले जाएंगे और रूम में बिठा देगे। परेशान मां कोटी के चेहरे पर तनाव को साफ देख रही थी। उसे फिर से समझाकर रोज की तरह घंटे भर के लिए खुला दिया। लेकिन थोड़ी देर में ही छोटी झटके से उठी और कहा, 'मम्मी, मुझे तो स्कूल का भी रास्ता नहीं पता। सुनकर मां के होश फाख्ता हो गए। ओह! यह अभी वहीं अटकी है। पहली बार वह छोटी के चेहरे पर इतनी परेशानी देख रही थी। क्या कहे और क्या करे, यह कुछ समझ नहीं पा रही थे। जब से उनकी गली से दो बच्चे चोरी हुए है. उसका चैन और नींद उड़ चुकी है। अपनी बच्ची को कैसे बचाए रखें इन राक्षसों से? यह तो स्कूल से आकर भी अपनी बालकनी में खड़ी हो जाती है। कितना खतरा है-इसे इसके दादा-दादी भी नहीं जानते। बाहर लोहे का 'जाल लगवाने को कहा तो मना कर दिया। कहा, कुछ नहीं होता। कैसे नहीं होता। गली में दो वाकये तो हो चुके।
मां को डर के मारे कुछ नहीं सुन रहा। बच्ची की पहचान कैसे बनी रहे, अगर कुछ ऐसा-वैसा हो नहीं नहीं... उसने जोर से सिर झटक दिया। उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। तभी छोटी स्कूल से लौटी तो जान में जान आई। जब तक ये घर न पहुंच जाए, किसे बताऊं कि एक-एक पल कितनी परेशानी में बीतता है। मां ने छोटी को उठाकर छाती से चिपका लिया। नन्ही जान... उसके सपने... और ये सब गली से उठाए गए दोनों बच्चे आज तक नहीं मिले... वह बच्ची के कपड़े बदलने लगी। अचानक उसे ध्यान आया.... गले का आइडेंटिटी कार्ड तो बाहर की चीज है। पहचान कैसे होगी कुछ हो गया तो हां, यह पेटी... उफ़ बह बदहवास-सी स्टेशनरी की दुकान पर पहुंची, 'कोई ऐसा मार्कर है, जिससे कपड़े पर लिखा मिटता नहीं?'
07/06/2025
लघुकथा के प्रमुख हस्ताक्षर Ashok Bhatia Ashok bhatia Sahitya का लघुकथा संग्रह 'जंगल में आदमी'।
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