मूर्तियां क्या होती हैं ?
मूर्तियां इंसान के द्वारा बनाई गई वह कोडिंग होती है लैंग्वेज होती है जिसे हमें पढ़ना आना चाहिए वास्तव में हम मूर्तियां को पढ़ते नहीं है उनकी कोडिंग को समझते नहीं है हम उनको पूजने लग जाते हैं इसी का नाम अज्ञानता है भटकाव है
मूर्तियों को पूजना नहीं है हमें उसे समझना है हमें उसे पढ़ना है
उसकी कोडिंग को समझना है वास्तव में वह मूर्ति आपको क्या कहना चाहती है उनकी मुद्राओं को ध्यान से देखिए वह आपसे बहुत कुछ कहना चाहती है उन्हें पूजे मत उन्हें समझीए
मूर्तियां प्राचीन लैंग्वेज है
इसलिए लैंग्वेज की पूजा मत करो उसे पढ़ना सीखो
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जीव के भटकने कारण अज्ञानता है
ज्ञान से परम-आत्मा का जानना होगा
प्रेम से परम-आत्मा का पाना होगा
ध्यान मे परम-आत्मा को देखना होगा
संसार बुद्धि से तेजस्वी होता है
बुद्धि ज्ञान से तेजस्वी होती है
और ज्ञान गुरु से तेजस्वी होता है
प्रश्न÷कौन सा ग्रंथ सबसे उत्तम है ?
उतर÷ पूर्ण सत्-गुरु से देह रूपी ग्रंथ और नाम रूपी ग्रंथ जानना पढ़ना सबसे उत्तम है
प्रसन÷सबसे उत्तम तीर्थ कौन सा है ?
उतर÷ सच्चे सत्-गुरु से मिला नाम ही उत्तम तीर्थ है
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परमात्मा को मानने और जानने में क्या अंतर है ?
दोनों के बीच वही अंतर है जैसे अंधेरे में दो दीया हैं एक जला हुआ दीया है और एक भुजा हुआ दीया है बुझा हुआ दीया मानना है और जला हुआ दीया जानना है
1️⃣ मानना अज्ञानता में होता है मानना मन का काम है जानना ज्ञान में होता है जानना बुद्धि का काम है
2️⃣ मानना मन से होने के कारण भटकाव है जानना प्रैक्टिकल होने के कारण ठहर जाना है
3️⃣ मानने वाला प्रसन्न करता है जानने वाला चुप हो जाता है मानने वालो की बुद्धि पर अज्ञानता का पर्दा होता है जानने वाला की बुद्धि स्वतंत्र होती है
4️⃣ मानना भय का कारण है जानना निर्भय होने का कारण है
5️⃣ मानने में परमात्मा दूसरे भाव में होता है
जानने में आप परमात्मा मे और परमात्मा आप मे होता है
6️⃣ मानने वाला आश में जीता है जानने वाला प्रैक्टिकल में जीता है
7️⃣ मानने वाले की मंजिल रहती है जानने वाले की मंजिल खत्म हो जाती है
8️⃣ मानने में मै बचा रहता है जानने में स्वयं बचता है और जहाँ स्वयं वहां परमात्मा है
9️⃣ मानना मैल है
जानना साबुन है मानना मन का मैल है जानना बुद्धि साबुन है
🔟 जब इंसान जान जाता है फिर कुछ भी मानने लायक नहीं रहता जब कुछ भी मानने लायक नहीं रहता फिर आप मे और परमात्मा में कोई अंतर नहीं रहता
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वास्तव में उलझने का कारण वर्णनात्मक शब्द है हम शब्दों को रोज पढ़ते हैं लिखते भी हैं परंतु हम उसे समझते नहीं है जो शब्द हम लिखते हैं उन में ही अर्थ छिपा होता है हम शब्दों को ध्यान से नहीं पढ़ते हम उनका संधि विच्छेद करना नहीं जानते और हम उसे नहीं समझ नहीं पाते कई बार एक ही शब्द के कई पर्यायवाची शब्द होते हैं जैसी जल नीर पानी इन तीनों शब्द का अर्थ एक ही है परंतु हम इन्हें अलग-अलग पढ़ते हैं अलग-अलग पढ़ने और बोलने की वजह से झगड़ा हो गया
कोई कहता है पानी बड़ा है कोई कहता है नीर बड़ा है कोई कहता है जल बड़ा है परंतु वास्तव में तीनों एक ही थे लड़ाई न समझी की थी इसी तरीके से आत्मा स्वयं खुद निज एक ही है परंतु न समझे की वजह से झगड़े होते हैं शब्द हमारे जीवन में बहुत मायने रखते हैं क्योंकि हम वर्णनात्मक शब्द बोलते हैं शब्दों को ही पढ़ते हैं और शब्दों को ही समझते हैं संसार में जितने भी ग्रंथ लिखे गए उन सब में वर्णनात्मक शब्द ही है संसार में जितने लोग अपनी बात को दूसरों के सामने रखते हैं वह वर्णनात्मक शब्द ही है जो हम सुनते हैं वह वर्णनात्मक शब्द ही है शब्दों को समझना सीखिए शब्दों का संधि विच्छेद करना सीखिए किसी शब्द को ध्यान से पढ़िए
वर्णनात्मक शब्द जाल है
पढ़ना सोच समझ
समझ गया तो पार
उलझ गया तो मार
फिर कैसे पाएगा उसको
जिसमें तेरा सार !!
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जो इंसान स्वयं को खुद को छोड़कर दूसरों को समझने में लगा है वास्तव में वह बहुत बड़ा मूर्ख है जो खुद को तो जानता नहीं बस दुसरो को मानने में लगा है क्योंकि मनाना मन का काम है जानना बुद्धि का काम है बुद्धि हमेशा मन से बड़ी होती है बुद्धि से आत्मा बड़ी होती है आत्म मतलब स्वयं खुद आप को कहते हैं
आप क्या हो बस यही जानने का विषय है
जब आप स्वयं को जान जाते हो फिर कुछ भी जानने लायक नहीं है फिर वृक्ष बीज में है और बीज वृक्ष में आत्मज्ञान कीजिए स्वयं का ज्ञान कीजिए खुद का ज्ञान कीजिए यही आपके जीवन का अंतिम देय है इंसानी जीवन का अंतिम लक्ष्य है
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अगर दुनिया में कोई रहस्य है
तो वह इंसान खुद है
इंसान हर चीज के बारे में जानना चाहता है परंतु अपने बारे में नहीं जानना चाहता दुनिया की सबसे अद्भुत रचना इंसान का खुद का शरीर है क्योंकि जितनी भी रचना बाहर दिखती है वह बाहर नही है वह सब आपका प्रतिबिंब है क्योंकि दृश्य दृष्टि और दृष्टा तीनों पुट आप खुद हो क्योंकि इंसान दृश्य और दृष्टि पर विश्वास करता है परंतु दृष्टा यानी कि खुद को भूल जाता है दृष्टा से दृष्टि बनती है दृष्टि से दृश्य बनता है दृश्य से सृष्टि बनती है बस ऐसे ही रचना बनती है यह जो फैलाव बाहर दिखता है वास्तव यह बाहर नहीं है यह हमारी दृष्टि यानी आंखों के पीछे है दृश्य को देखकर मानना यह मन का काम है दृश्य को देखकर उसे जानना यह बुद्धि का काम है बुद्धि हमेशा मन से बड़ी होती है मन चीजों का संकल्प और विकल्प करता रहता है बुद्धि निश्चय करती है बुद्धि से बड़ी आत्मा होती है आत्मा का मतलब होता है आत्म यानी स्वयं खुद निज यानी कि आप क्योंकि देखने वाले आप हो समझने वाले आप हो खोज करने वाले आप हो महसूस करने वाले आप हो निर्णय करने वाले आप हो मानने वाले आप हो परंतु आप क्या हो बस यही जानने का विषय है खुद से खुद को जानना दुनिया में बहुत ही अद्भुत है जो स्वयं से स्वयं को जान लेता है फिर कुछ भी जानने लायक नहीं रहता उसे बोध हो जाता है कि वास्तव में सत् क्या है सत्य को जानना ही इंसान का असली पुरुषार्थ है ज्ञान और ध्यान दो सीढ़ी है जिन पर चढ़कर आप अपने देय तक पहुंच सकते हो यानी कि स्वयं खुद निज यानी अपने आत्म को जान सकते हो
आप ही यह सारी सृष्टि हो
सारी सृष्टि आप ही हो
बीज कभी वृक्ष को नहीं ढूंढ सकता क्योंकि बीज का विस्तार ही वृक्ष होता है क्योंकि बीज वृक्ष में छिपा है और वृक्ष बीच में छिपा है वास्तव में गांठ जहां पर लगती है वहीं से खुलती है यह गांठ आप पर लगी है परंतु गांठ अपने आप को कभी नहीं खोल सकती उसे खोलने के लिए किसी दूसरे की जरूरत होती है जैसे बुझा हुआ दिवा अपने आप को नहीं जला सकता उसे जलाने के लिए जले हुए दिवे की जरूरत होती है उसे गुरु ऑपलाइन कोच मास्टर कहते हैं इसलिए अगर आप अपने आप को जानना चाहते हैं तो आप एक आत्म-ज्ञानी गुरु की खोज कीजिए इंसान के भटकने का सबसे बड़ा कारण अज्ञानता है
खुद से खुद को पाल बंदे
क्या खोजे हैं और
गुरु संतों की वाणी
देती है पुरजोर
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विश्वास किसे कहते हैं ?
पहले विश्वास का संधि विच्छेद करते हैं वि+स्वांस विश्वास
वि का मतलब विषय होता है स्वांस का मतलब प्राण होता है विश्वास हम उसे नहीं कहते जो हम दूसरों पर भरोसा करते हैं वह भरोसा होता है विश्वास और भरोसे में अंतर होता है विश्वास का मतलब होता है स्वांस को प्राणों को विषयों से हटाना क्योंकि विषयो में हमारा स्वांस रुक जाता है विषय पांच होते हैं शब्द स्पर्श रूप रस और गंद जब हम बोलते हैं हमारा स्वांस रुकता है जब हम खाते हैं हमारा स्वांस रुकता है जब हम रूप को देखते हैं तब हमारा स्वांस रुकता है जब हम स्पर्श करते हैं जब हम स्पर्श करते हैं हमारा स्वांस रुकता है जब हम दुर्गंध को महसूस करते हैं तब हमारा सांस रूकता है
स्वांस का रुकना ही
नाम'' का रुकना है
Agamjyot SEWA Sansthan
05/03/2026
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