शिशुमंदिर शाळा

शिशुमंदिर शाळा प्राथमिक शाळा

20/01/2023
|| सर्वांना विजयादशमीच्या हार्दिक शुभेच्छा ||   🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️
15/10/2021

|| सर्वांना विजयादशमीच्या हार्दिक शुभेच्छा ||
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21/08/2021

शिशु-मंदिर शाळेच्या माजी मुख्याध्यापिका सौ उमा डोंगरे बाई यांना वाढदिवसाच्या हार्दिक शुभेच्छा

-शुभेच्छुक आजी माजी विद्यार्थी

26/09/2020

12 समावर्तन संस्कार

परिणीत युवक, परिणीता युवती, नव्य-नव्य युवक, नव्या-नव्या युवती जो ब्रह्ममय, वेदमय उदात्त विचारों के आधुनिकतम सन्दर्भों के आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक विज्ञानों में निष्णांत हों उनके लिए यह संस्कार किया जाता है।
24 वर्ष के वसु ब्रह्मचारी अथवा 36 वर्ष के रुद्र ब्रह्मचारी या 48 वर्ष के आदित्य ब्रह्मचारी जब सांगोपांग वेदविद्या, उत्तम शिक्षा, और पदार्थ विज्ञान को पूर्ण रीति से प्राप्त होके विद्याध्ययन समाप्त करके घर लौटता था तब आचार्य उसे उपदेश देता था कि तू सत्य को कभी न छोड़ना, धर्म का आचरण सदैव करते रहना, स्वाध्याय में प्रमाद कभी न करना, इत्यादि।
आचार्य का आश्रम द्वितीय गर्भ है जिसमें विद्या-अर्थी का विद्या पठन होता है। समावर्तन संस्कार द्वारा विद्यार्थी संसार में सहजतः सरलतापूर्वक दूसरा जन्म लेता है। मानव का द्विज नाम इसी सन्दर्भ में है। ब्रह्मचारी विद्यार्थी भिक्षाटन-अतिथि व्यवस्था द्वारा समाज के परिवारों से परिचित रहता है। समावर्तन संस्कार करानेवाले स्नातक तीन प्रकार के होते हैं- 1) विद्या-स्नातक:- विद्या समाप्त कर बिना विवाह आजीविका कार्य। 2) व्रत-स्नातक:- विवाह करके भी विद्याध्ययन जारी रखनेवाला। 3) विद्याव्रत स्नातक:- विवाहबद्ध आजीविकामय जीवन जीनेवाला अर्थात् विद्या अध्ययन एवं ब्रह्मचर्य व्रत की भी समाप्ति।
ब्रह्मचर्य, विद्याव्रत-सिद्ध, सांगोपांग वेद विद्या, उत्तम षिक्षा, उपवेद (विद) ज्ञान या विद्या का सत्तार्थ, लाभार्थ, उपयोगार्थ, विचारार्थ उपयोग ज्ञान तथा वर्तमान विज्ञान को पूर्ण रूप से प्राप्त कर ले तब उस का पठन-समाप्ति पर घर में आना अर्थात् समाज में पुनर्जन्म या द्विज होना समावर्तन संस्कार कहलाता है। इसमें अभिप्राय प्राप्त ज्ञान के मान्य जनों तथा रिश्तेदारों के मध्य कल्याण कारक सम्प्रयोग हैं। गणमान्य माता-पिता, प्रतिष्ठित समाज पुरुषों के आगमन पष्चात् स्नातक को 1. आसन, 2. पाद्यम्- पग धोने हेतु जल, 3. अर्घ्यम्- मुख धोने हेतु जल, 4. आचमन हेतु जल, 5. मधुपर्क- दही-मलाई-शहद मिलाकर देना। यह स्वागत विधि है।
समावर्तनी के निम्न गुण हैं- 1) सागर के समान गम्भीर, 2) ब्रह्म-सिद्ध, 3) तप-सिद्ध, 4) महा-तप करता, 5) वेद पठन-सिद्ध, 6) शुभ गुण-कर्म-स्वभाव से प्रकाषमान, 7) नव्य-नव्य, परिवीत अर्थात् ज्ञान ओढ़ लिया है जिसने और 9) सुमनस। समावर्तन संस्कार में त्रिपाश भक्तिभाव से ब्रह्मचारी मेखलादि का त्याग कर अंग-अंग में ब्रह्म पवित्रता का भाव रखता है। वह सप्तेन्द्रियों के त्रि रूपों में ब्रह्म परितृप्त होता है तथा पंचेन्द्रियों में भी त्रि-सिद्ध होता है। त्रि-सप्त, त्रि-पंच सिद्ध वह द्वादशी होता है। ऐसा समावर्तनी युवक समावर्तनी युवती से विवाह कर अस्तित्व पहचानमय श्रेष्ठ जीवन का प्रारम्भ करता है। इनका द्वादशी रूप निम्न प्रकार से है।
क्र. अंग देव ऋषि ब्रह्म
1. ओऽम् नासिका गन्ध है ब्रह्म-लयम् गौतम पृथिवी ब्रह्म
2. ओऽम् रसना रस है ब्रह्म-लयम् इष्टतम आपो ब्रह्म
3. ओऽम् चक्षुः रूप है ब्रह्म-लयम् जमदग्नि अग्नि ब्रह्म
4. ओऽम् त्वक् स्पर्श है ब्रह्म-लयम् रोमश वरुण ब्रह्म
5. ओऽम् श्रोत्रम् शब्द है ब्रह्म-लयम् विश्वामित्र आकाश ब्रह्म
6. ओऽम् प्राणः प्राणन है ब्रह्म-लयम् विश्वामित्र खं ब्रह्म
7. ओऽम् वाक् वाकन् है ब्रह्म-लयम् वषिष्ठ ऋचा ब्रह्म
यह त्रि-सप्त अवस्था है।
8. ओऽम् मनः मनन है ब्रह्म-लयम् भरद्वाज वाजब्रह्म
9. ओऽम् बुद्धिः बोध है ब्रह्म-लयम् कण्व ध्येयतम
10. ओऽम् धीः ध्यान है ब्रह्म-लयम् प्रस्कण्व एकम्
11. ओऽम् स्वः स्व-आन है ब्रह्म-लयम् सच्चित स्वः
12. ओऽम् आत्मा आत्मन् है ब्रह्म-लयम् आत्म आत्मा
यह त्रि-पंच सिद्ध अवस्था है।
द्वादशी अस्तित्व द्वादश परितृप्त द्वादश तर्पणमय दिव्य होता है। ऐसे पति-पत्नी 1 + 1 = 1 होते हैं। और आगे संस्कार योजना का नव जीवन के लिए विधान करते हैं।

03/07/2016

जितरोषरया महाधियः सपदि क्रोधजितो लघुर्जनः |
विजितेन जितस्य दुर्मतेर्मतिमद्भिः सह का विरोधिता ||

क्रोधाच्या आवेगांवर बुद्धीमंतानी विजय मिळवलेला असतो. क्षुद्र माणसे लगेच क्रोधाच्या आहारी जातात. अशा [क्रोध ताब्यात ठेवणाऱ्या] बुद्धिमान लोकांबरोबर [क्रोधाने ज्यांच्यावर विजयं मिळवलेला आहे अशा] पराभूत माणसांना वैर करणं काय जमणार? [मैत्री होणे तर शक्यच नाही.]

24/06/2016

उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीर्दैवं प्रधानमिति कापुरुषा वदन्ति |
दैवं विहाय कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिध्यति कॉऽत्र दोषः ||

सिंहाप्रमाणे असणाऱ्या कामसू माणसाकडे लक्ष्मी [आपणहून] येते. मात्र घाबरट लोक नशीब महत्वाचे आहे असे म्हणतात. नशिबाचा विचार न करता स्वतःच्या सामर्थ्याने प्रयत्न कर आणि प्रयत्न करूनही जर [ध्येय] गाठता आलं नाही तर त्यात [तुझा] काय दोष आहे?

19/06/2016

विकृतिं नैव गच्छन्ति सङ्गदोषेण साधवः |
आवेष्टितं महासर्पैश्चन्दनं न विषायते ||

सज्जन माणसे [वाईट लोकांच्या] संगतीने बिघडत नाहीत. चंदनाच्या वृक्षाला मोठमोठया सापांनी वेढले तरी तो विषारी बनत नाही.

17/06/2016

अर्थेन भेषजं लभ्यमारोग्यं न कदाचन |
अर्थेन ग्रन्थसंभारः ज्ञानं लभ्यं प्रयत्नतः ||

पैसे [देऊन] औषध मिळते, पण आरोग्य कधीही पैसे देऊन मिळत नाही. पैशांनी पुस्तकांची चळत [विकत] मिळते, पण ज्ञान [त्यामुळे ज्ञान मिळत नाही ते ] कष्टाने मिळवावे लागते.

15/06/2016

अनालस्यं ब्रह्मचर्यं शीलं गुरुजनादरः |
स्वावलम्बो दृढाभ्यासः षडेते छात्रसद्गुणाः ||

उद्योगीपणा, ब्रह्मचर्य, उत्तम चारित्र्य, शिक्षकांबद्दल आदर, स्वावलंबन, सतत अभ्यास करणे हे विद्यार्थ्याचे सहा गुण आहेत.

तारतारतरैरेतैरुत्तरोत्तरतो रुतैः |रतार्ता तित्तिरी रौति तीरे तीरे तरौ तरौ ||कामविव्हल झालेली टिटवी ह्या अशा अधिकाधिक वाढ...
13/06/2016

तारतारतरैरेतैरुत्तरोत्तरतो रुतैः |
रतार्ता तित्तिरी रौति तीरे तीरे तरौ तरौ ||

कामविव्हल झालेली टिटवी ह्या अशा अधिकाधिक वाढत जाणाऱ्या कर्कश आवाजात सगळ्या काठावर प्रत्येक झाडावर ओरडत आहे.

13/04/2015

।। सुविचार ।।

वेळ पण शिकवते आणि गुरु पण शिकवतात ,
दोघात फरक फक्त इतकाच आहे की, गुरु शिकवून परीक्षा घेतात आणि वेळ मात्र परीक्षा घेऊन शिकवते.......... !!

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