13/06/2020
जाति भेद, रंग भेद का, क्यों फर्क बतलाया है ?
इन लोगों में कमी एकता की, इसलिए कहर ढाया है।।
रोटियों में काम करते - करते, गुजर गई पीढ़ियां।
तुमको संतुष्ट करने देते, दारू और बीड़ियां।।
रोते को पुचकार कर, चुप करना एक कला है।
पांव धोकर खुश करना, बहुत बुरी बला है।।
गर आप भी इन कलाओं को, अपना लिए होते।
सदियां नहीं गुजरती, अपमान व तिरस्कार सहते।।
ऐसे प्रजातंत्र से लाभ क्या, बदबू गई नहीं राजतंत्रों की।
प्रकृति पर छोड़ दो व्यवस्था, दुर्दशा नहीं होगी परतंत्रों की।।
सदियां गुज़र गई, इतिहास बदलाव चाहता है।
श्वेत समाज दूध से, अश्वेत वर्ग खून से नहाता है।।
पशु - पक्षी और वन्य जीव, अपनी जाति का समर्थन करते हैं।
यहां मानव जाति एक होते हुए, आपस में फर्क करते है।।
उठो। जागो। साथियों। कसलो कमर, सर पर बांध लो कफ़न।
कहां तक इन गद्दारों की, नाइंसाफी करते रहोगे सहन।।
निरीह गरीबो, धाराएं मत बदलने दो, संविधान में।
अपने मतलब के लिए बेटा बन जाना, लिखा है कौन विधान में ?
ईमानदारी से काम करें, बेईमान कहलाते हैं।
बेईमान एश करें, ईमानदार कहलाते हैं।।
तुम्हारे रगों में खून नहीं पानी है।
तुम्हारी कमाई तुमको ही देते, कहते हम दानी हैं।।
क्यों डरते हो इनसे, क्या तुम्हारी औलाद मारी जाएगी।
उनकी औलाद क्या फौलादी है, जो नहीं मारी जाएगी।।
-Nandlal kotiya