20/10/2017
$$$ रसलीन $$$
®®® संकलनकर्ता- रविन्द्र पुनियां ®®®
जन्म- 1689 ई.
निधन -1750 ई.
मुलनाम- सैयद गुलाम नबी
उपनाम- रसलीन
जन्म स्थान- बिलग्राम, हरदोई, उत्तर प्रदेश
काल- रीतिकाल (रीतिबद्ध कवि)
#रचनाएं:-
अंग दर्पण (1737 ई)
रस प्रबोध (1742 ई)
#विशेष:-
- इनकी रचनाए हिन्दी में गुलामनबी, नबी और रसलीन नामों से मिलती हैं। कवि ने गुलामनबी व नबी नामों से कवित्त और सवैये रचे। रसलीन नाम से मुख्यत: दोहा छंद में रचनाएँ मिलती हैं।
- ये अच्छे संगीतज्ञ, सुयोग्य सैनिक, तीरंदाज व घुड़सवार थे|
-ये रामचेतौनी के युद्ध में मारे गए थे|
- ग़ुलाम नबी ने अपने पिता का नाम 'बाकर' लिखा है।
-इन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'अंग दर्पण' 1737 ई. में लिखी जिसमें अंगों का, उपमा उत्प्रेक्षा से युक्त चमत्कारपूर्ण वर्णन है। सूक्तियों के चमत्कार के लिए यह ग्रंथ काव्य रसिकों में विख्यात चला आया है। यह प्रसिद्ध दोहा जिसे जनसाधारण बिहारी का समझा करते हैं, 'अंग दर्पण' का ही है -
"अमिय हलाहल मदभरे सेत स्याम रतनार।
जियत मरत झुकि झुकि परत जेहि चितवत इक बार ||"
- 'अंगदर्पण' के अतिरिक्त रसलीन ने 1742 ई. में 'रस प्रबोध' नामक रस निरूपण का ग्रंथ दोहों में बनाया। इसमें 1155 दोहे हैं और रस, भाव, नायिका भेद, षट्ऋतु, बारहमासा आदि अनेक प्रसंग आए हैं। रसविषय का अपने ढंग का यह छोटा सा अच्छा ग्रंथ है। रसलीन ने स्वयं कहा है कि इस छोटे से ग्रंथ को पढ़ लेने पर रस का विषय जानने के लिए और ग्रंथ पढ़ने की आवश्यकता न रहेगी। किंतु यह ग्रंथ अंग दर्पण के समान प्रसिद्ध न हुआ।
®®® संकलनकर्ता- रविन्द्र पुनियां ®®®
#प्रसिद्ध_पंक्ति:-
-"धारति न चौकी नगजरी यातें उर में लाय।
छाँह परे पर पुरुष की जनि तिय धरम नसाय
चख चलि स्रवन मिल्यो चहत कच बढ़ि छुवन छवानि।"
- "अम्बुज पद भूपर धरत, नूपुर नहिं बाजन्त।
साधुन के मन भौंर ह्वै, बाँचत रच्छाजंत।।"
-"पायन पायल के परत, झन कायल धुनि कान।
मायल कर घायल करत, कुरछायल ज्यों तान।।"
-"ओट करे नहिं जात हैं, केहूँ इनके चोट।
बिधि याही बिधि तें धर्यौ, इनके नाम अनोट।।"
-"नवला अमला कमल सी, चपला सी चलचारु।
चन्द्रकला सी सीतकर, कमलासी सुकुमारु।।"
-"मुख छवि निरखि चकोर, अरु तन पानिप लखि मीन।
पद पंकज देखत भँवर, होत नयन रसलीन।।"
-"लाल पीत सित स्याम पट, जो पहिरत दिन रात।
ललित गात छवि छाय के, नैनन में चुभि जात।।"
-"अंग अंग को रूप सब, यामें परत लखाय।
नाम अंग दर्पन धर्यो, याही गुन तें ल्याय।।"
-"सोरह सै चौरानबे, सम्बत् में अभिराम।
इह सिख नख पूरन कियो, लै श्री प्रभु को नाम।।"
नोट: - संकलन में कोई त्रुटि हो तो जरूर बताएं|
®®® संकलनकर्ता- रविन्द्र पुनियां ®®®