12/09/2025
Addy Sachan
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12/09/2025
11/09/2025
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11/09/2025
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Ethyl alcohol ka kamal
श्रीमद्भगवद्गीता
Chapter -1
Verse - 2
Sanjaya said:
Then Duryodhana the prince, seeing the army of the Pandavas drawn up in battle array, approached his master and spoke these words:
संजय उवाच
धृतराष्ट्रकृत प्रश्न के उत्तर में द्रोणाचार्य के पास दुर्योधन के गमन-का वर्णन ।
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥
पदच्छेदः
दृष्ट्वा, तु, पाण्डवानीकम्, व्यूढम् दुर्योधनः, तदा,
आचार्यम्, उपसंगम्य, राजा, वचनम्, अब्रवीत् ॥२॥
इसपर संजय बोला-
शब्दार्थ अन्वयः
तदा = उस समय
राजा = राजा
दुर्योधनः = दुर्योधनने
ब्यूढम् = व्यूहरचनायुक्त
पाण्डवा = पाण्डवों की
नीकम् = सेना को
दृष्ट्वा = देखकर
तु = और
आचार्यम् = द्रोणाचार्य के
उपसंगम्य = पास जाकर (यह )
वचनम् = वचन
अब्रवीत् = कहा
श्रीमद्भगवद्गीता
Chapter - 1
Verse - 1
Dhritarashtra said:
Assembled on the field of Dharma, O Sanjaya, on the field of the Kurus, eager to fight, what did my people and the Pandavas do?
'धृतराष्ट्र उवाच ।
युद्धके विषय में धृतराष्ट्रका प्रश्न ।
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥१॥
पदच्छेदः
धर्मक्षेत्रे, कुरुक्षेत्रे,समवेताः,युयुत्सवः,
मामकाः,पाण्डवाः,च, एव,किम्,अकुर्वत संजय ॥१॥
शब्दार्थ अन्वयः
धृतराष्ट्र बोला-
संजय = हे संजय|
धर्मक्षेत्रे = धर्मभूमि
कुरुक्षेत्रे = कुरुक्षेत्रमें |
समवेताः = इकट्ठे हुए
युयुत्सवः = युद्धकी इच्छावाले |
मामकाः = मेरे
च = और
एव*
पाण्डवाः = पाण्डुके पुत्रोंने
किम् = क्या
अकुर्वत = किया
001. Balz – Schiemann Reaction (स्कीमान अभिक्रिया – HBF4 / से क्रिया ) :-
यह अभिक्रिया फ्लोरो यौगिकों के निर्माण हेतु प्रयोग की जाती है| इस क्रिया में डाइएजो लवण की फ्लोरोबोरिक अम्ल से क्रिया द्वारा अविलेय फ्लोरोबोरेट प्राप्त किये जाते हैं जो हल्का गर्म करने पर फ्लोरो यौगिक बनाते हैं|
C6H5Cl + C6H5 -> C6H5F + N2 + BF3
अलसस्य कुतः विद्या,
अविद्यस्य कुतः धनम्।
अधनस्य कुतः मित्रम्अ,
मित्रस्य कुतः सुखम् ॥
हिन्दी भावार्थ:
आलसी इन्सान को विद्या कहाँ।
विद्याविहीन/अनपढ़/मूर्ख को धन कहाँ।
धनविहीन/निर्धन को मित्र कहाँ।
और मित्रविहीन/अमित्र को सुख कहाँ।
येषां न विद्या न तपो न दानं,
ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः ।
ते मर्त्यलोके भुविभारभूता,
मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥ [चाणक्य नीति / 10 / 7]
हिन्दी भावार्थ:
जिन लोगों के पास न तो विद्या है, न तप, न दान, न शील, न गुण और न धर्म।
वे लोग इस पृथ्वी पर भार हैं और मनुष्य के रूप में मृग/जानवर की तरह से घूमते रहते हैं।
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः ।
सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु ।
मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत् ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
हिन्दी भावार्थ:
सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी का जीवन मंगलमय बनें और कोई भी दुःख का भागी न बने।
हे भगवन हमें ऐसा वर दो!
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