Wishing you all a very happy and vibrant Holi. May this festival of colours fill your life with bright hues of happiness, laughter and love. Enjoy to the fullest, smear colours and stay safe!
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02/03/2018
सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं
02/10/2017
लालबहादुर शास्त्री जी के जन्मदिन पर राष्ट्र का शत-शत नमन
एक अत्यंत गरीब परिवार में जन्मा बालक भी अपने परिश्रम व सद्गुणों द्वारा विश्व इतिहास में कैसे अमर हो सकता है, इसका ज्वलंत उदाहरण थे भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री। पंडित नेहरू के शब्दों में, 'अत्यंत ईमानदार, दृढ़ संकल्प, शुद्ध आचरण और महान परिश्रमी, ऊँचे आदर्शों में पूरी आस्था रखने वाले निरंतर सजग व्यक्तित्व का ही नाम है- लाल बहादुर शास्त्री। भारत की जनता के सच्चे प्रतिनिधि शास्त्रीजी के संपूर्ण जीवनकाल का यदि सर्वेक्षण किया जाए तो निश्चय ही वे मानवता की कसौटी पर खरे कंचन सिद्ध होंगे।
उत्तरप्रदेश के मुगलसराय में एक अत्यंत गरीब परिवार में शास्त्रीजी का जन्म हुआ। उनके पिता श्री शारदाप्रसाद अध्यापक थे। शास्त्रीजी जब डेढ़ वर्ष के थे, उनके पिता का देहावसान हो गया। ननिहाल में उनका लालन-पालन हुआ। उनकी आरंभिक शिक्षा वाराणसी में हुई।
17 वर्ष की अल्पायु में ही गाँधीजी की स्कूलों और कॉलेजों का बहिष्कार करने की अपील पर वे पढ़ाई छोड़कर असहयोग आंदोलन से संलग्न हो गए। परिणामस्वरूप वे जेल भेज दिए गए। जेल से रिहा होने के पश्चात् उन्होंने काशी विद्यापीठ में पढ़ाई आरंभ की। विद्यापीठ में उनके आचार्य स्व.डॉ. भगवानदास, आचार्य नरेंद्रदेव, बाबू संपूर्णानंदजी और श्री प्रकाशजी थे। उन्होंने प्रथम श्रेणी में परीक्षा उत्तीर्ण कर 'शास्त्री' की उपाधि प्राप्त की।
शास्त्रीजी का समस्त जीवन देश की सेवा में ही बीता। देश के स्वतंत्रता संग्राम और नवभारत के निर्माण में शास्त्रीजी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान वे सात बार जेल गए। अपने जीवन में कुल मिलाकर 9 वर्ष उन्हें कारावास की यातनाएँ सहनी पड़ीं।
सन् 1926 में शास्त्रीजी ने लोक सेवा समाज की आजीवन सदस्यता ग्रहण की और इलाहाबाद को अपना कार्य-क्षेत्र चुना। बाद में वे इलाहाबाद नगर पालिका, तदोपरांत इम्प्रुवमेंट ट्रस्ट के भी सदस्य रहे।
सन् 1947 में शास्त्रीजी उत्तरप्रदेश के गृह और परिवहन मंत्री बने। इसी पद पर कार्य करते समय शास्त्रीजी की प्रतिभा पहचान कर 1952 के पहले आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी के चुनाव आंदोलन को संगठित करने का भार नेहरूजी ने उन्हें सौंपा। चुनाव में कांग्रेस भारी बहुमतोंसे विजयी हुई जिसका बहुत कुछ श्रेय शास्त्रीजी की संगठन कुशलता को दिया गया।
1952 में ही शास्त्रीजी राज्यसभा के लिए चुने गए। उन्हें परिवहन और रेलमंत्री का कार्यभार सौंपा गया। 4 वर्ष पश्चात् 1956 में अडियालूर रेल दुर्घटना के लिए, जिसमें कोई डेढ़ सौ से अधिक लोग मारे गए थे, अपने को नैतिक रूप से उत्तरदायी ठहरा कर उन्होंने रेलमंत्री का पद त्याग दिया। शास्त्रीजी के इस निर्णय का देशभर में स्वागत किया गया।
अपने सद्गुणों व जनप्रिय होने के कारण 1957 के द्वितीय आम चुनाव में वे विजयी हुए और पुनः केंद्रीय मंत्रिमंडल में परिवहन व संचार मंत्री के रूप में सम्मिलित किए गए। सन् 1958 में वे वाणिज्य व उद्योगे मंत्री बनाए गए। पं. गोविंद वल्लभ पंत के निधन के पश्चात् सन् 1961 में वे गृहमंत्री बने, किंतु सन् 1963 में जब कामराज योजना के अंतर्गत पद छोड़कर संस्था का कार्य करने का प्रश्न उपस्थित हुआ तो उन्होंने सबसे आगे बढ़कर बेहिचक पद त्याग दिया।
पंडित जवाहरलाल नेहरू जब अस्वस्थ रहने लगे तो उन्हें शास्त्रीजी की बहुत आवश्यकता महसूस हुई। जनवरी 1964 में वे पुनः सरकार में अविभागीय मंत्री के रूप में सम्मिलित किए गए। तत्पश्चात् पंडित नेहरू के निधन के बाद, चीन के हाथों युद्ध में पराजय की ग्लानि के समय 9 जून 1964 को उन्हें प्रधानमंत्री का पद सौंपा गया। सन् 1965 के भारत-पाक युद्ध में उन्होंने विजयश्री का सेहरा पहना कर देश को ग्लानि और कलंक से मुक्त करा दिया।
शास्त्रीजी को प्रधानमंत्रित्व के 18 माह की अल्पावधि में अनेक समस्याओं व चुनौतियों का सामना करना पड़ा किंतु वे उनसे तनिक भी विचलित नहीं हुए और अपने शांत स्वभाव व अनुपम सूझ-बूझ से उनका समाधान ढूँढने में कामयाब होते रहे। स्व. पुरुषोत्तमदास टंडन ने शास्त्रीजीके बारे में ठीक ही कहा था कि उनमें कठिन समस्याओं का समाधान करने, किसी विवाद का हल खोजने तथा प्रतिरोधी दलों में समझौता कराने की अद्भुत प्रतिमा विद्यमान थी।
काश्मीर की हजरत बल मस्जिद से हजरत मोहम्मद के पवित्र बाल उठाए जाने के मसले को, जिससे सांप्रदायिक अशांति फैलने की आशंका उत्पन्न हो गई थी, शास्त्रीजी ने जिस ढंग से सुलझाया वह सदा अविस्मरणीय रहेगा। देश में खाद्यान्न संकट उत्पन्न होने पर अमेरिका के प्रतिमाह अन्नदान देने की पेशकश पर तो शास्त्रीजी तिलमिला उठे किंतु संयत वाणी में उन्होंने देश का आह्वान किया- 'पेट पर रस्सी बाँधो, साग-सब्जी ज्यादा खाओ, सप्ताह में एक शाम उपवास करो। हमें जीना है तो इज्जत से जिएँगे वरना भूखे मर जाएँगे। बेइज्जती की रोटी से इज्जत की मौत अच्छी रहेगी।'
लालबहादुर शास्त्री
गरीबी में जन्मे, पले और बढ़े शास्त्रीजी को बचपन में ही गरीबी की मार की भयंकरता का बोध हो गया था, फलतः उनकी स्वाभाविक सहानुभूति उन अभावग्रस्त लोगों के साथ रही जिन्हें जीवनयापन के लिए सतत संघर्ष करना पड़ता है। वे सदैव इस हेतु प्रयासरत रहे कि देश में कोई भूखा, नंगा और अशिक्षित न रहे तथा सबको विकास के समान साधन मिलें। शास्त्रीजी का विचार था कि देश की सुरक्षा, आत्मनिर्भरता तथा सुख-समृद्धि केवल सैनिकों व शस्त्रों पर ही आधारित नहीं बल्कि कृषक और श्रमिकों पर भी आधारित है। इसीलिए उन्होंने नारा दिया,
'जय जवान, जय किसान।'
छोटे कद के विराट हृदय वाले शास्त्रीजी अपने अंतिम समय तक शांति की स्थापना के लिए प्रयत्नशील रहे। सन् 1965 के भारत-पाक युद्ध विराम के बाद उन्होंने कहा था कि 'हमने पूरी ताकत से लड़ाई लड़ी, अब हमें शांति के लिए पूरी ताकत लगानी है।' शांति की स्थापना के लिए ही उन्होंने 10 जनवरी 1966 को ताशकंद में पाकिस्तानी राष्ट्रपति अय्यूब खाँ के साथ 'ताशकंद समझौते' पर हस्ताक्षर किए। भारत की जनता के लिए यह दुर्भाग्य ही रहा कि ताशकंद समझौते के बाद वह इस छोटे कद के महान पुरुष के नेतृत्व से हमेशा-हमेशा के लिए वंचित हो गई। 11 जनवरी सन् 1966 को इस महान पुरुष का ताशकंद में ही हृदयगति रुक जाने से निधन हो गया। मरणोपरांत सन् 1966 में उन्हें भारत के सर्वोच्च अलंकरण 'भारत रत्न' से विभूषित किया गया। राष्ट्र के विजयी प्रधानमंत्री होने के नाते उनकी समाधि का नाम भी 'विजय घाट' रखा गया।
शास्त्रीजी को कभी किसी पद या सम्मान की लालसा नहीं रही। उनके राजनीतिक जीवन में अनेक ऐसे अवसर आए जब शास्त्रीजी ने इस बात का सबूत दिया। इसीलिए उनके बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि वे अपना त्यागपत्र सदैव अपनी जेब में रखते थे।
ऐसे निस्पृह व्यक्तित्व के धनी शास्त्रीजी भारत माता के सच्चे सपूत थे।का
18/07/2017
How to devlope your English
http://www.u-dictionary.com/wp/2017/07/17/how-to-develop-fluency-in-english/
How to Develop Fluency in English /Practicing Fluency/ 1.Speak in English. Developing fluency requires constant and consistent practice speaking aloud. It is best if you can speak with native English speakers, but if you cannot, sp…
14/01/2017
”तमसो मा ज्योतिर्गमय” अर्थात् अधंकार से मुझे प्रकाश की ओर ले जाओ- यह प्रार्थना भारतीय संस्कृति का मूल स्तम्भ है । प्रकाश में व्यक्ति को सब कुछ दिखाई देता है, अन्धकार में नहीं ।
प्रकाश से यहाँ तात्पर्य ज्ञान से है । ज्ञान से व्यक्ति का अंधकार नष्ट होता है । उसका वर्तमान और भावी जीने योग्य बनता है । ज्ञान से उसकी सुप्त इन्द्रियाँ जागृत होती हैं । उसकी कार्य क्षमता बढ़ती है जो उसके जीवन को प्रगति पथ पर ले जाती है ।
शिक्षा का क्षेत्र सीमित न होकर विस्तृत है । व्यक्ति जीवन से लेकर मृत्यु तक शिक्षा का पाठ पढ़ता है । प्राचीन काल में शिक्षा गुरुकुलों में होती थी । छात्र पूर्ण शिक्षा ग्रहण करके ही घर वापिस लौटता था । लेकिन आज जगह-जगह सरकारी और गैर-सरकारी विद्यालयों में शिक्षण कार्य होता है ।
वहां पर शिक्षक भिन्न-भिन्न विषयों की शिक्षा देते हैं । छात्र जब पढ़ने के लिए जाता है तब उसका मानसिक स्तर धीरे-धीरे ऊपर उठने लगता है। उसके मस्तिष्क में तरह-तरह के प्रश्न उठते हैं जैसे- तारे कैसे चमकते हैं ? आकाश में व्यक्ति कैसे पहुँच जाता है ? पृथ्वी गोल है या चपटी ? रेडियो में ध्वनि और टेलीविजन में तस्वीर कैसे आती है ?
इन सब प्रश्नों का उत्तर हमें शिक्षा के द्वारा मिलता है । जैसे-जैसे हम शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ते जाते हैं, वैसे-वैसे हमारा ज्ञान विस्तृत होता जाता है । ज्ञान का अर्थ केवल शब्द ज्ञान नहीं अपितु अर्थ ज्ञान है । यदि सम्पूर्ण पड़े हुए विषय का अर्थ न जाना जाए तो यह गधे की पीठ पर रखे हुए चंदन के भार की भांति परिश्रम कारक या निरर्थक होता है ।
अर्थात् जिस तरह चन्दन की लकड़ी को ढोने वाला गधा केवल उस के भार का ही ज्ञान रखता है किन्तु चन्दन की उपयोगिता को नहीं जान सकता । उसी प्रकार जो विद्वान अनेक शास्त्रों का अध्ययन बिना अर्थ समझे करें वह उन गधों की भांति ग्रन्थ-भार मात्र के वाहक हैं ।
विद्या सर्वश्रेष्ठ धन है । इसे चोर भी चुरा नहीं सकता । जो दूसरों को देने पर बढ़ता है । विदेश में विद्या ही अच्छा मित्र है । विद्या से विनय, विनय से योग्यता, योयता से धन और धर्म, धर्म से सब सुख प्राप्त होते हैं । ज्ञान से बुद्धि तीव्र होती है ।
जहां राजाओं ने लड़ाइयाँ तलवार की नोंक पर जीतीं और साम्राज्य स्थापित किए, वहीं चाणक्य ने अपनी बुद्धि से सम्पूर्ण नन्द वंश का नाश कर चन्द्रगुप्त को राजा बनाया । यहां जीत बुद्धि की हुई जिसे धार दी ज्ञान ने । विद्या और सुख एक साथ प्राप्त नहीं हो सकते ।
सुख चाहने वाले को विद्या और विद्या चाहने वाले को सुख त्याग देना चाहिए । विद्याहीन पशु-समान है । जिसे कोई पसन्द नहीं करता । इसलिए श्रेष्ठ विद्वान् से ही उत्तम विद्या प्राप्त करनी चाहिए, भले ही वह किसी भी जाति का क्यों न हो –
उत्तम विद्या लीजिए यद्यपि नीच पै होय। परयौ अपावन ठौर में कंचन तजत न कोय ।।
शिक्षा व्यक्ति को ज्ञान के प्रकाश से शुभाशुभ, भले बुरे की पहचान कराके आत्म विकास की प्रेरणा देती है । उत्रति का प्रथम सोपान शिक्षा है । उसके अभाव में हम लोकतंत्र और भारतीय संस्कृति की रक्षा नहीं कर सकते ।
11/01/2017
प्राइमरी या उच्च शिक्षा का मामला हो, हिंदी भाषी राज्यों में टीचरों की भारी कमी दिख रही है जिसे दूर किया जाना चाहिए-
01/01/2017
जैसे जैसे नया साल खिलता जाए, आशा है आपकी सारी इच्छाएं पूरी होती जाए।
आशा है यह नया साल आपके लिए ढेर सारी खुशियां और खूबसूरत समय लेकर आए। नए साल की बहुत सारी शुभकामनाएं!!
14/11/2016
बाल-दिवस है आज साथियो, आओ खेलें खेल ।
जगह-जगह पर मची हुई खुशियों की रेलमपेल ।
बरस-गांठ चाचा नेहरू की फिर आई है आज,
उन जैसे नेता पर सारे भारत को है नाज ।
वह दिल से भोले थे इतने, जितने हम नादान,
बूढ़े होने पर भी मन से वे थे सदा जवान ।
हम उनसे सीखे मुसकाना, सारे संकट झेल ।
हम सब मिलकर क्यों न रचाए ऐमा सुख संसार
भाई-भाई जहां सभी हों, रहे छलकता प्यार ।
नही घृणा हो किसी हृदय में, नहीं द्वेष का वास,
आँखों में आँसू न कहीं हों, हो अधरों पर हास ।
झगडे नही परस्पर कोई, हो आपस में मेल ।
पडे जरूरत अगर, पहन ले हम वीरों का वेश,
प्राणों से भी बढ़कर प्यारा हमको रहे स्वदेश ।
मातृभूमि की आजादी हित हो जाएं बलिदान,
मिट्टी मे मिलकर भी माँ की रक्खें ऊंची शान ।
दुश्मन के दिल को दहला दें, डाल नाक-नकेल ।
बाल दिवस है आज साथियो, आओ खेलें खेल ।
18/11/2015
समस्या जहाँ से सुरू होती है।
सुधार भी वहीं से होना चाहिए
06/10/2015
स्कूलों में शौचालय तो बन गए, दरवाज़े नहीं लगे लड़कियों को होती है मुश्किल, कहीं दरवाजे नहीं, तो कहीं ताला पड़ा गोंडा। कक्षा चार में पढऩे वाली सुष्मिता कुमारी (10 वर्ष) को स्कूल में जब भी शौच जाना होता है तो वो खेतों में जाती है। क्योंकि स्कूल के शौचालय में ताला ही लटका रहता है। ''मेरे स्कूल में दो शौचालय बने हैं, लेकिन…
06/10/2015
डिजिटल इंडिया में छात्राओं को शौचालय मिलेंगे ? लखनऊ। घर में शौचालय का न होना, आठवीं के बाद पढ़ाई को आगे जारी न रख पाना और घर से बाहर निकलने पर लड़कों की छींटाकशी, यूपी के ग्रामीण इलाके की करोड़ों लड़कियों की तीन सबसे बड़ी समस्याएं हैं। 'गाँव कनेक्शन' ने, युवा छात्रों के लिए शुरू किए गए 'स्वयं प्रोजेक्ट' के दौरान उत्तर प्रदेश…
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