Lord Sri Kalki School of Enlightenment

Lord Sri Kalki School of Enlightenment The first school on Enlightenment in the entire world. Enlightenment is now made easy.

Guru Sri Hitendra has been into the spiritual path and has helped many to the path of spiritual enlightenment and have motivated thousands to follow the path of Sanatan Dharma - The Eternal Religion. He is an Enlightened Master and have a vivid knowledge of the entire process of Enlightenment, Yoga, Astrology, Palmistry, Occult Sciences, Transformation, Gita, Upanishad, Vedas, Vastu, Sacred Texts,

Information Science etc. He believes simplicity and truthfulness can alone make one to qualify for the knowledge of the Enlightenment.

29/01/2025
29/01/2025

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गुरु कौन? एक दंडी संन्यासी का प्रश्न गुरु के संदर्भ में।
05/09/2024

गुरु कौन? एक दंडी संन्यासी का प्रश्न गुरु के संदर्भ में।

कानपुर के एक दंडी स्वामी का उत्तम प्रश्न गुरु के संदर्भ में कि आखिर गुरु कौन है ...

20/07/2024

।।गुरु पूर्णिमा,गुरू,शिष्यपरम्परा विमर्श।।
प्रिय ! वैदिक सनातन धर्मप्रेमी स्नेहीस्वजन !

यह लेख सभी के लिए पठनीय है।
जो आत्म कल्याण चाहते हों वे अवश्य एक बार पढ़ें।
साथ ही दूसरों को पढ़ने के लिए प्रेरित भी करें।
यह लेख एक बहुत बड़ा सत्य का प्रकाशक तथा मिथ्यात्व का विखण्डक है ।
इस वर्ष गुरू पूर्णिमा के पावनतम शुभ अवसर पर यह लेख मानव‌ समाज‌ को बहुमान के रूप में आप का पौराणिक आप को समर्पित कर रहा है ।
मित्रों !
अब आप सब सावधानी पूर्वक यह लेख पढ़ना प्रारम्भ करें-
मंत्र दीक्षा के गूढ़ रहस्य को गहराई पूर्वक समझने के लिए निम्नलिखित पांच विषयों पर विचार किया जाना आवश्यक प्रतीत होता है ।
(१) गुरू पूर्णिमा का महत्व क्या है ?
(२) गुरू शिष्य परम्परा कब से प्रारम्भ हुई है?
(३) गुरू तत्व क्या है ?
(४) शिष्य किसे कहते हैं ?
(५) गुरू दीक्षा का अधिकार,महत्व तथा आधार क्या है । कौन गुरू बनने का अधिकारी है।कैसे गुरू का त्याग करना चाहिए।
पुनः दीक्षा लिया जा सकता है या नहीं।

भाइयों‌ एवं बहनों ! ‌‌ यह लेख निष्पक्ष तथा सप्रमाण होगा।

(१) गुरू पूर्णिमा का महत्व --- धार्मिक इतिहासों तथा पुराणों के अनुसार गुरू पूर्णिमा के बहुविध महत्वों का वर्णन मिलता है।
मैं उन सभी में जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण है उसका उल्लेख कर रहा हूं।
तत:सप्तदशे जात: सत्यवत्यां पराशरात्।
चक्रे वेदतरो:शाखा दृष्ट्वा पुंसोSल्पमेधस:।। भा०१-३-१९

मनुष्य मात्र को अल्प मेधा सम्पन्न देख कर भगवान श्री हरि का सत्रहवां अवतार श्रीकृष्ण द्वैपायन वेद व्यासजी के रूप में धरा पर आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा तिथि को ही हुआ। इन्होंनें वेद का विभाजन कर चारवेद, अष्टादश पुराण, ब्रह्म सूत्र , महाभारत आदि सम्पूर्ण ज्ञान राशि से विश्व को प्रकाशित कर जगद्गुरू के पद को अलंकृत कर दिया। इन प्रथम जगद्गुरू के अवतार लेने के कारण इस आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा के रूप में प्रतिष्ठित किया जाना‌ सर्वथा उचित ही है। इस पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा, ज्ञान पूर्णिमा, वैद पूर्णिमा आदि-आदि के रूप में भी सम्मान प्राप्त है। इसीलिए इस पूर्णिमा का सर्वातिशायी महत्व है कि यह आषाढ शुक्ल पूर्णिमा विश्वको विश्व गुरू देकर जगत को कृतार्थ कर दी है ।

(२) गुरू शिष्य परम्परा का आरम्भ -- अनादि काल से यह परम्परा चली आ रही है।जैसे हमारा सनातन‌ धर्म आदि,अन्त,हीन है वैसे ही गुरू शिष्य परम्परा भी आदि अन्त रहित है ।। शांकर मत में ---
नारायण समारम्भां शंकराचार्य मध्यमाम्
अस्मदाचार्य पर्यन्तां वन्दे गुरू परम्पराम्।।
के अनुसार श्री नारायण से यह परम्परा प्रारम्भ हो रही है ।
श्रीवैष्णव मत में --
लक्ष्मीनाथ समारम्भां नाथ यामुन मध्ममाम्।
अस्मदाचार्य पर्यन्तां वन्दे गुरू परम्पराम्।। श्री रामानुज संप्रदाय में यह परम्परा श्री विष्णु से प्रारम्भ हुई है।
वैरागी वैष्णव मतानुसार --
सीता नाथ समारम्भां रामानन्दार्य मध्यमाम्।
अस्मदाचार्य पर्यन्तां वन्दे गुरू परम्पराम्।।
स्वामी श्रीरामानन्दाचार्य मतानुयायी जनों ने सीता पति राम से गुरू शिष्य परम्परा को बताया है ।इस प्रकार यह गुरू शिष्य की परम्परा सनातन अनादि परम्परा स्वत: प्रमाणम् है।

(३) गुरू तत्व हि सृष्टि का‌ श्रेष्ठतम तत्व है । साक्षात् भगवान नारायण ही गुरू के रूप पर में प्रतिष्ठित हैं । यही कारण है कि अद्वैत मत के आचार्यों ने नारायण तत्व को , श्रीवैष्णव विशिष्टा द्वैत, लक्ष्मी नाथ को , वैरागी विशिष्टा द्वैत,सीतानाथ को तथा अन्य सभी सम्प्रदायों के आचार्यों ने नारायण को ही आदि गुरू के रूप में स्वीकार कर यह सिद्ध कर‌ दिया है कि भगवान नारायण ही परम गुरू तत्व हैं।‌ अतः कृष्णन वन्दे जगद्गुरूम् --का ब्रह्माण्ड व्यापी उद्घोष के साथ ही पुराणों ने ----
गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णु:गुरूर्देवो महेश्वर:।
गुरू: साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम:।। श्रीमद्देवी भागवतम्
का चरम ज्ञान प्रदान कर गुरू की महिमा को सर्वाधिकतम प्रतिष्ठित किया है । जो तमस से प्रकाश,मृत्यु से अमरता , असत्य से सत्य तथा विनाश से विकास की तरफ ले जाय वही गुरू है। तमसो मा ज्योतिर्गमय,मृत्योर्मा अमृतं गमय , अनृतं मा‌ सद्गमय।। उपनिषदि।।
अन्धकार परिपूर्ण संसार रूपी भयंकर गुफा से निकाल कर देदीप्यमान वैकुण्ठादि अभय पद प्रदान कर दे वह है महानतम गुरू तत्व ।
गु शब्दस्त्वन्धकार: रू शब्दस्तन्निरोधक:।
अन्धकार निरोधित्वात् गुरूरित्यभिधीयते ।। श्री गुरू गीता ।
अतः गुरू तत्व अखिल लोक में नित्य महानतम तत्व के पद पर अभिषिक्त है ।
यदि समस्त देवी-देवता रूष्ट हो जायें और गुरूजी प्रसन्न हो तो गुरू रक्षा करने में समर्थ होता है।
राखइ गुरू जो कोप विधाता।। राम चरित मानस ।
अत एव गुरू ही ब्रह्म तत्व, शिव तत्व, विष्णु तत्व तथा परब्रह्म तत्व है।
नान्यद् परतर: कोSपि तत्वोSस्ति जगतीतले।
गुरू तत्व के अतिरिक्त दूसरा कोई तत्व संसार में नहीं है ।

(४) शिष्य किसे कहना चाहिए ? यह बह्वर्थक है । यहां प्रसंगानुसार विचारणीय है ।
कार्पण्य दोषोपहतस्वभाव: पृच्छामि त्वां धर्म‌सम्मूढचेता:।
यच्छ्रेय:स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेSहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।। श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय ०२श्लोक ०७ ।।

जो समस्त अज्ञानों को‌ समाप्त कर सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर श्रेय तथा प्रेय वस्तु को तत्वत:जानने की ईच्छा रखते हुए किसी योग्य गुरू के श्री चरणों का समाश्रयण कर आत्म कल्याण का परम पिपासु हो वही शिष्य है। वह कभी भी शिष्य नहीं हो सकता जिसका गुरू के यहां जाने का उद्देश्य धर्म न होकर धन हो ,पद हो, पैसा हो , प्रतिष्ठा हो । श्रेय पदार्थ न हो कर प्रेय पदार्थ हो ।
अत एव‌ ईश्वर कामी जब अनुशासन में रह कर शिक्षण, प्रशिक्षण की परिपुष्ट कामना से किसी श्रेष्ठ गुरू की शरणागति प्राप्त कर लें वही शिष्य होता है ।

(५) गुरू दीक्षा ( मंत्र दीक्षा) देने का अधिकार किसको है --

यह सम्प्रति सर्वाधिक विचारणीय है ।गुरू के मूख्यत: दो प्रकार हैं
(क)। शिक्षा गुरू(ख) दीक्षा गुरू।। यहां दीक्षा गुरू ही विवेच्य विषय है। दीक्षा गुरू बनने का अधिकार किसको है इस विषय पर
(१)ब्राह्मणोSस्यमुखमासीद्।शुक्ल यजुर्वेद --३१--११
(२) ब्राह्मणो मामकी तनु:। वामन पुराण --९५--०८
(३)वर्णानां ब्राह्मण: प्रभु: ।मनु स्मृ० --१०--०३
(४)वर्णानां ब्राह्मणो गुरू:।।पद्म पुराण स्वर्ग खण्ड -५२--५१
(५)ब्रह्म वैवर्त पुराण गौ०मा०--१०--४७, ‌
(६)ब्रह्म पुराण -८०+४७
(७)चाणक्य नीति -५-१
(८) महाभागवत श्रेष्ठ: ब्राह्मणो वै गुरूर्नृणाम्।
सर्वेषामेवलोकानामसौ पूज्यो यथा हरि:।।हरिभक्ति विलास।
(१०) ब्राह्मणा:सर्व वर्णानां गुरूरेव द्विजोत्तम: ।।पदम पुराण ब्रह्म खण्ड-१४+२१
(११) गुरू र्हि सर्व वर्णानां ज्येष्ठ: श्रेष्ठश्च वै द्विज:।। महाभारत शान्ति पर्व -७२--११
वेद, पुराण,स्मृति, महाभारत तथा तन्त्रादि सभी ग्रन्थों ने दीक्षा गुरू बनकर मन्त्र दीक्षा देने में केवल ब्राह्मण को ही अधिकृत माना है । उपरोक्त सभी प्रमाणों से यह सिद्ध हुआ कि मात्र ब्राह्मण को ही मंत्र दीक्षा देने का अधिकार है अन्य वर्णों को नहीं । यहां यह विचार करना आवश्यक है ।
प्रश्न ----क्या ? किसी भी ब्राह्मण को दीक्षा देने का अधिकार है ।
उत्तर--- नहीं ।। यथान्धेन नीयमाना यथान्धा:।।
जैसे जन्मान्ध व्यक्ति अन्धों का मार्गदर्शक नहीं बन सकता और यदी बना‌ तो स्वयं सहित सभी का सर्वनाश करेगा ही करेगा । ठीक उसी तरह मूर्ख और पतित ब्राह्मण भी गुरू दीक्षा नहीं दे सकता । तो कैसा ब्राह्मण गुरू दीक्षा देने का अधिकारी है ---
-
(१)उद्धर्तुं चैव संहर्तुं समर्थो ब्राह्मणोत्तम:।
तपस्वी सत्यवादी च गृहस्थो गुरू रूच्यते।। शैवाचार प्रदीपिका -२-१५ अग ०संहिता ।।
(२)कलत्र पुत्रवान् विप्रो दयालु सर्व सम्मत:।
दैवे पित्रेSरि मित्रे च गृहस्थो देशिक:भवेत्।। यामले

(३)गृहस्थानां गुरूर्गृही।--तन्त्र रत्नाकर

(४)गृहस्थ:सर्व वर्णेषु श्रेष्ठो गुरूरूदाहृत:। सिद्धान्त शेखर

(५)सर्व शास्त्रार्थ वेत्ता च गृहस्थो गुरू रूच्यते।। ज्ञानार्णवे कुलार्णवे च

उपरोक्त सभी ग्रन्थों का मत है कि गुरू दीक्षा देने का अधिकार उन्हीं ब्राह्मणों को है जो उत्तम ब्राह्मण हों ,तपस्वी हों ,सत्यवादी हों ,सर्व शास्त्र वेत्ता हों, वरदान तथा अभिशाप देने में समर्थ हों,पुत्रवान्,पत्नी वाला, दयालू,देवाराधक, पितर पूजक, मित्र -शत्रु में अभेद दृष्टिवाला,महाभागवत तथा परम सद्गृहस्थ धर्म का पालक‌ हों। गृहस्थाश्रम में रहने वाला ऐसे सद्गृहस्थ ब्राह्मण ही तीनों लोकों का गुरू बनने के योग्य हैं। क्योंकि ये‌‌ देवताओं के भी आराध्य तथा भगवान विष्णु के समान तीनों लोकों तथा चौदहों भुवनों में पूज्य हैं।ये ब्राह्मण तीनों वर्णों के मनुष्यों में श्रेष्ठ‌ होने के कारण सभी के गुरू हैं ,सभी वर्णों को दीक्षा देने‌ में‌ तथा सभी का उद्धार करने में समर्थ भी हैं‌।

प्रश्न -----+क्या गृहस्थाश्रम में रहने वाला सद्गृहस्थ को सन्यासी को अपना दीक्षा गुरू बनाना चाहिए ?

उत्तर‌----- जी नहीं । सन्यासी को यह अधिकार ही नहीं है कि वह किसी गृहस्थाश्रमी को दीक्षा दे सके । प्रमाण --

(१)यतेर्दीक्षा पितुर्दीक्षा या दीक्षा वनवासिन:।
विविक्ता श्रमिणे दीक्षा न सा कल्याणकारिणी।। गणेशविमर्षिणी

(२)पितुर्दीक्षा यतेर्दीक्षा दीक्षा च वनवासिन:।
अनाश्रमाणां या दीक्षा सा दीक्षा दु:ख दायिनी।। तारा कल्प तंत्र

(३)उदासीनो ह्युदासीनां यतीनां तु यतिर्भवेत्।
भिन्नाश्रमी गुरूस्त्याज्य: सर्व‌ साधारणश्च य:।।कल्प चिन्तामणि

उक्त सभी धर्म शास्त्रों का कथन है कि सन्यासी को गृहस्थों को दीक्षा देने का अधिकार ही नहीं है । सन्यासी केवल सन्यासी को ही दीक्षा दे सकता है । भिन्नाश्रमी को गुरू बनाना ही नहीं चाहिए।अत एव सन्यासी को सन्यासी, वानप्रस्थाश्रमी को वानप्रस्थाश्रमी ही दीक्षा देगा। ।किन्तु गृहस्थाश्रमी को ये दीक्षा नहीं दे सकते। यदि कोई गृहस्थ सन्यासी से दीक्षा ले लिया तो वह दीक्षा कल्याणदायिनी नहीं होगी अपितु दु:ख देने वाली होगी।
प्रश्न -------यदि कोई गृहस्थ, सन्यासी,यति या वानप्रस्थी इन‌ भिन्नाश्रमियों से दीक्षा ले लिया हो तो उसे क्या करना चाहिए?
उत्तर-- इस सम्बन्ध में तन्त्र राज में बताया गया है कि --

(१)यतेर्दीक्षां गृहीत्वा तु कदाचिदपि मोहित:।
प्रायश्चितं धेनुरेकां त्रिरात्रब्रतमेव च।
प्रायश्चितं तत: कृत्वा पुनर्दीक्षां समाचरेत्।। तन्त्र राजे

किसी कारण मोह बस यदि कोई गृहस्थाश्रमी किसी यति, सन्यासी से दीक्षा ले लिया हो तो उसको तीन रात उपवास करके एक गाय का दान करना चाहिए। पुनः किसी योग्य गृहस्थ ब्राह्मण को अपना गुरू स्वीकार कर नियमानुसार फिर दीक्षा लेनी चाहिए।
त्रिपुरा रहस्य में‌ भगवान ने स्वयं‌ ही कहा है कि हे महेश्वरी ---

(२)भिक्षुभ्यश्च वनस्थेभ्यो वर्णिभ्यश्च महेश्वरि।
गृहस्थो भोग मोक्षार्थी मन्त्र दीक्षां न चाचरेत्।।

यदी गृहस्थ यह चाहता हो कि मेरा लोक‌और पर लोक दोनों कल्याणकारी हो तो उसे सन्यासी,वानप्रस्थी,तथा अन्य वर्ण वालों से दीक्षा नहीं लेनी चाहिए।।
उपरोक्त्त समस्त धर्म शास्त्रों तथा धर्म शास्त्रज्ञों के कथन का सार यही है कि मानव यदि --
(३)इह लोके सुखों भुक्त्वा चान्ते सत्य पुरं ययौ।

अपना‌ लोक‌ -परलोक दोनों सवांरना चाहता हो तो उसे अपनी पत्नी सहित जाती,कर्म से सम्पन्न शास्त्रज्ञ, सदाचार युक्त पत्नी,पुत्र से भरा पूरा परिवार वाला सद्गृहस्थ विद्वान्ब्राह्मण ब्रह्मर्षि को गुरू बनाकर मंत्र दीक्षा विधिवत ग्रहण करना चाहिए। भूल कर भी दूसरे आश्रम वालेवानप्रस्थीयति,‌सन्यासी, त्रिवर्णी आदि को दीक्षा गुरू नहीं बनाना चाहिए। यदि ऐसी ग़लती से घटना दुर्घटना घट गई हो तो प्रायश्चित करके पुनः गृहस्थ ब्राह्मण से दीक्षा लेना‌ चाहिए। यही सनातन गुरू दीक्षा संस्कार धर्म है ।
शं भवतु ते 👏

संन्यासदा आरंभ हुआ।Season 2, Episode 1संन्यासदा - जागृतिप्रस्तुति - गुरु श्री हितेंद्र सन्यास क्या है? सन्यास क्यों है? ...
19/07/2024

संन्यासदा आरंभ हुआ।
Season 2, Episode 1

संन्यासदा - जागृति
प्रस्तुति - गुरु श्री हितेंद्र

सन्यास क्या है? सन्यास क्यों है? और संन्यास की आवश्यकता किस लिए है? क्या ज्ञान को प्राप्त होने के पश्चात सन्यास अपने आप ही सिद्ध हो जाता है? क्या ज्ञान को प्राप्त न होने पर सन्यास लेना आपको अधोगति प्राप्त कराता है? सन्यास का कौन अधिकारी है? समस्त कर्मों का त्याग करना ही क्या संयास है या कर्म के फल को त्याग करना ही संन्यास है? सन्यास ही अंतिम 16वा संस्कार है। क्या संन्यास रूपी संस्कार को पालन करने से जन्म मृत्यु से बचा जा सकता है?
ऐसे और भी प्रश्नो का उत्तर संन्यासदा के अंतर्गत जाने। सनातन धर्म को जाने।

सुने और फॉलो करें:-

https://open.spotify.com/episode/5sgUEWFiaCWKAcsvxOegP2?si=5eJ9o0KqRtiaZOa3GMk-yQ

Listen to this episode from प्रबुद्धता की ओर on Spotify. परम ज्ञान आरंभ। सप्तज्ञान भूमि का दूसरा चरण आरंभ। ज्ञान की पूर्ति होने के पश्चात ...

22/04/2024

The soul is ever constant and cannot be inline with the temporary such as body, mind, ego or intellect. Therefore, the soul is the Guru of course, but the intellect that lies close to the soul that matters. As the cause that makes the intellect shine is none other than the soul itself. Then is the intellect the Guru or the Guru is that soul?
When we speak about the body mind intellect all together aligned with the cause, then know such a body form is Guru. He is without a doubt the Ganesha, the Shakti, the Vishnu, the Shiva and the Surya.
Your soul is the Master but it doesn't apply to your intellect the knowledge. Just as the milk in the body of cow is everywhere but only can be extracted through mammary glands so is the body of Guru. You can extract knowledge from the body of Guru as he have established the Peeth in his own body.
- Guru Sri Hitendra

22/04/2024

When unauthorized people start to claim as authority the crisis begin. ISKON are running by unauthorized people. They have their own ideals. The unauthorized give deeksha. The unauthorized chants the mantras. The unauthorized gives teaching.
All violation as per the Sanatan Dharma. ISKON is just a business model and nothing else.

22/04/2024

दो प्रकार के मार्ग - एक प्रवृत्ति और दूसरा निवृत्ति। सन्यास निवृत्ति मार्ग है। यह संस्कार के द्वारा भी और कर्मों के फल का त्याग द्वारा भी इसको पालन करना ऐसा शास्त्रों में वर्णित है। ज्ञान कर्म सन्यास योग जो की चौथा अध्याय भागवत गीता का है, इसके अंतर्गत कर्म करते हुए भी कर्मों का फल को त्याग देना ही कर्म सन्यास है अर्थात कर्म को त्याग नहीं किया जा सकता है, कर्म प्रकृति द्वारा होता है और पुरुष यानी आत्मा उसका केवल मात्र दृष्टा है, लेकिन माया के कारण वह अपने को प्रकृति मानकर स्वयं को करता मान बैठता है। ज्ञान के उदय होने से भेद द्वारा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का ज्ञान होने पर परम ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। इसके लिए संस्कार अर्थात कर्म का बीज की आवश्यकता नहीं होती है। ज्ञान से संचित तथा क्रियामन कर्म का नाश हो जाता है लेकिन उपासना द्वारा प्रारब्ध को भी नष्ट किया जा सकता है। ध्यान से बढकर ज्ञान है, ज्ञान से बढ़कर कर्मों के फल का त्याग है, क्योंकि कर्मों के फल का त्याग से तुरंत शांति की प्राप्ति सुनिश्चित हो जाती है इसलिए निवृत्ति के अंतर्गत में कर्म के फल के त्याग की विधि सबसे श्रेष्ठ बताई गई है। कर्म के फल का त्याग कोई भी कर सकता है, उसको कोई विशेष वर्ण होने की आवश्यकता भी नहीं है।
- गुरु श्री हितेंद्र

Anna from Siberia and Alisia from Munich completed Pranayama,  Meditation and Philosophy lessons from me.
31/03/2024

Anna from Siberia and Alisia from Munich completed Pranayama, Meditation and Philosophy lessons from me.

29/03/2024

"The death of one's ego is the experience of immortality".

- Guru Sri Hitendra

My colleagues and my students
24/03/2024

My colleagues and my students

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116, Ramganga Sahkari Housing Society, Naramau, G. T. Road
Kanpur
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