09/01/2020
आज तक संसार में अनेकानेक विशिष्ट व्यक्तियों की जीवन कहानियाँ लिखी गई हैं हैं। परंतु इस ब्लॉग में एक ऐसे अनोखे मानव का जीवन वृत्तांत दिया गया है जिसके जीवन में एक अनुपम और अदभुत परिवर्तन आया और जिसने अपने जीवन को संपूर्ण रीती से प्रभु को अर्पण करके प्रभु से सर्वस्व पा लिया। इसमें एक ऐसी निराली आत्मा के जीवन का उल्लेख है जिस आत्मा ने संसार में एक ऐसा कार्य किया जो अन्य कोई भी मानव नहीं कर सका। यह जीवन-कहानी क्या है, यह नर से श्री नारायण अथवा मनुष्य से फरिश्ता बनने का एक मनोहर वृत्तान्त है जिसे हमने वर्तमान जीवन में अपनी अपनी में अपनी अपनी आंखों से देखा है । इस जीवन कहानी के साथ संसार के इतिहास के बहुत ही महत्वपूर्ण वृत्तांत जुड़े हुए हैं और इसके एक भाग के साथ स्वयं दुखहर्ता, सुख करता परमपिता परमात्मा के भी दिव्य चरित्र जुड़े हुए हैं। इसमें वर्णित वृत्तांतो ने संसार को एक नया दिशा निर्देश दिया है और अनेकानेक नर-नारियों के जीवन को महान बनाया है। अतः स्वाभाविक है कि इस जीवन कहानी को पढ़ने से मनुष्य के जीवन को एक नया मोड़ मिलता है और सच्ची शांति तथा अपार आनंद की अनुभूति की चाबी उसके हाथ लग जाती है।
बात लगभग आज से से 80 वर्ष पहले की है। तब वर्तमान पाकिस्तान(अविभाजित भारत) के सिंध में हिंदू समाज की धार्मिक दशा बहुत ही बिगड़ चुकी थी। कई शताब्दियों से मुसलमानी, क्रिस्तानी(इसाईवादि), तथा पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव पड़ने के कारण हिंदू लोगों का खान-पान तमो प्रधान अथवा भ्रष्ट हो चुका था। शराब और माँसाहार का आम रिवाज था। लोग भक्ति करते करते थे, परंतु वे जितना पूजा पाठ करते थे उतना ही उनमें धन के लिए लोभ, व्यापार में छल कपट, व्यव्हार में क्रोध, घर में मोह तथा मन में वासना भरी हुई थी। निरर्थक तथा खर्चीली रस्में और धोते रिवाज समाज को घुन की तरह खाए जा रहे थे। पुजारी, पंडित, उपदेशक लोगों से धन बटोरते थे, परंतु वे उनके घर ग्रहस्थ को पवित्र सदाचार युक्त एवं शांति संपन्न बनाने वाला वास्तविक ज्ञान नहीं देते थे, क्योंकि वह केवल कर्मकाण्डी और शास्त्र पाठी ही बन गए थे। यद्यपि लोगों के पास धन था फिर भी उनका घरेलू जीवन मनोविकारों और अशांति के कारण तथा सात्विकता के अभाव के कारण नरक समान बन गया था। माताओं की दशा विशेष तौर पर चिंताजनक थी, उनका स्थान केवल घर और बाल-बच्चों को संभालने वाली दासी जैसा था तथा वे अपने पति की वासना तृप्ति ही के लिए थीं। चाहे पति शराबी कबाबी हो और विषय वासना में ही डूबा रहता हूं परंतु स्त्री के के लिए वह परमेश्वर और गुरु मारने के योग्य समझा जाता। व्यापारी वर्ग के लोगों के यहाँ कन्याएँ प्रायः अशिक्षिता-सी रहती थीं और माताएँ प्रायः बड़े-बड़े घुँघटों में मुँह छिपाकर शादी आदि रस्मों में सम्मिलित होती थी, या तो वह वह प्रायः घर की चार दीवारी में विचित्र वेशभूषा में ही रहती थी। उन्हें पुरुषों के 'बाएं पैर की एड़ी' माना जाता था। उन्हें धर्म प्रचार का प्रायः कोई अधिकार नहीं था ना ही उन्हें सन्यासियों की तरह ब्रह्मचर्य व्रत पालन करने का कोई हक था। घोर कलयुग की इस बेला में सभी आत्माए अपने विकारी संस्कारों अथवा कर्मों की बेड़ियों में बंधी हुई थीं। सभी लोग अज्ञान निंद्रा निंद्रा में मूर्छित से हुए पडे थे और कहीं भी प्रकाश की एक किरण भी दिखाई नहीं देती थी। ब्रह्मा की रात्रि का वह अत्यंत अंधकारमय पल था।
एक साधारण परंतु विशेष व्यक्तित्व
ऐसे उपरोक्त बताए गए वातावरण में हैदराबाद सिंध में एक निराले व्यक्ति थे, जिन्हें लोग स्नेह से 'दादा' कहते थे। उनका पूरा नाम 'दादा लेखराज' था। यूं तो दादा बहुत साधारण थे परंतु फिर भी उनमें बहुत विशेषताएं थी। यदि कहीं सौ व्यक्तियों के बीच में वह जा रहे हो तो भी वह सभी से न्यारे और प्यारे प्रतीत होते और झट पहचाने जा सकते थे, क्योंकि उनकी आकृति-प्रकृति उनके कद-काठी और व्यक्तित्व में अवर्णनीय मनमोहकता थी और उनके व्यवहार में विशेष मधुरता और विनम्रता थी। उनके संबंध में स्नेह तथा सहृदयता थी और उनके स्वभाव में एक में एक चुंबकीय आकर्षण था था। उनके नयन-बैन, उनका मुख-मण्डल, उनका विशाल एवं उन्नत मस्तक, उनके बाल, उनकी चाल, उनका रहन-सहन, उनका शिष्टाचार और उनकी भक्ति भावना सभी चित्त को चुराने वाली थे। इसलिए लोगों से उनकी अच्छी मित्रता थी और वह सिन्ध के लोगों के स्नेही थे। यद्यपि एक मध्यम वर्ग के घराने में उनका जन्म हुआ था तथापि उन्होंने अपनी व्यवहार-कुशलता, व्यापार चातुर्य, ईमानदारी तथा परिश्रम से गिने चुने धनी-मानी लोगों में स्थान पा लिया था। ऐसा व्यक्ति संसार में कोई विरला ही होता है जिससे अपने कुटुंब-परिवार के लोगों,अडौसी-पड़ोसी, मित्र तथा व्यापार के कारण संपर्क में आने वाले लोग, सभी संतुष्ट हों। करोड़ों मनुष्यों में से कोई एक मनुष्य ऐसा होता है जो लोगों को भी प्रिय हो जिसके अपने मन में भी लोगों के लिए प्यार के लिए प्यार हो। ऐसे व्यक्ति थे 'दादा लेखराज' क्योकि, वे दूसरों से मिलते जुलते, उनके लिए सुख की साज-सामग्री रचते तथा उनसे मित्रता निभाने में बहुत कुशल थे, उदारचित्त थे और वचन के बहुत पक्के थे। उनकी कायिक रचना, उनका स्वास्थ्य, उनकी वेशभूषा, उनकी वाणी में भरे मिठास का हम कैसे वर्णन करें? वे सभी इस बात की ओर संकेत करते थे की पूर्व जन्मों में उनके कोई विशेष ही संस्कार रहे होंगे और कुदरत ने उनके इस शरीर रुपी रथ(काया) को बनाने में विशेषता और अलौकिकता का प्रयोग किया होगा। जिन लोगों ने एक बार उन्हें देख लिया अथवा जो उनके संपर्क में आए, मैं ऐसा अनुभव करते थे कि दादा उनके भी संबंधी हैं, अथवा वे मन ही मन में सोचते की बहुत अच्छा होता होता कि हम भी दादा के निकट के सम्बन्धी होते।
लौकिक जीवन का प्रारंभ
दादा लेखराज का जन्म सन 1876 में सिंध के कृपलानी कुल में एक वल्लभाचारी भक्त के यहां हुआ था। उनके पिता एक स्कूल में प्रधान अध्यापक थे परंतु दादा अपनी चमत्कारी बुद्धि और अथक पुरुषार्थ द्वारा गेहूं के एक छोटे व्यापारी से उठ कर एक प्रसिद्ध जौहरी बन गए थे। उन्हें हीरे-जवाहरातों की अचूक परख थी। अपने इस व्यापार के कारण राजाओं-महाराजाओं, धनाढ्य व्यक्तियों तथा तत्कालीन वायसराय आदि से भी उनका मेल मिला था और नेपाल के राज्यकुल तथा उदयपुर के महाराजा का तो उन्हें विशेष आतिथ्य और सम्मान प्राप्त था और वे उनके राज दरबार में भी आमंत्रित होते थे। इस विषय में ब्रम्हाकुमारी बृजइंद्रा जी, जो की लौकिक नाते से दादा की पुत्रवधू (बहु) थीं और जिनका लौकिक नाम राधिका था और जो प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय विश्वविद्यालय प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की महाराष्ट्र ज़ोन की इंचार्ज थीं, लिखती हैं:-
" उनके संपर्क में आने वाले राजाओं का उनमें इतना विश्वास था कि उन्होंने दादा को खुली छुट्टी दे रखी थी कि वह कभी भी राज महल में सीधे अंदर आ सकते थे, उन्हें सेकेट्री आदि को सूचना देने की या या पहले राजा की आज्ञा लेने की आवश्यकता नहीं थी | दूसरे व्यापारी अपना सामान सेक्रेटरी को ही आकर देते थे परंतु जहां तक तक दादा की बात थी, उन्हें राजमहलों में राज माता अंदर ही अपनी बहू बेटियों को हीरे जवाहरात दिखानी है देने के लिए निसंकोच बुला लेती और कहती -'लखीराम, इस बेटी को यह जेवर दिखाओ'। राजमहलों के वासी दादा की धर्म निष्ठा और उनके स्वभाव तथा व्यवहार से परिचित हो गए थे। कई बार राजा लोग उन्हें कहते-' लखीराम बाबू, भगवान से तो भूल हो गई कि - हमको तो राजा बनाया बनाया परंतु आपको नहीं बनाया, राजा पन के सभी संस्कार तो आप में हैं'। परंतु वास्तव में भगवान ने भूल नहीं की थी क्योंकि वह राजे तो एक ताज वाले राजा थे जबकी भगवान ने दादा को दो ताज (प्रभा-मण्डल तथा स्वर्ण-मुकुट) वाला देवी राजा बनने का पुरुषार्थ कराया।"
राजा लोगों उन्हें इतना सम्मान देते थे कि वह दादा को विशेष निमंत्रण भेजते थे और दादा को पधारने पर उनको विशेष स्थान मान देते तथा उनका आतिथ्य करते थे। एक बार हम लोग उदयपुर के महाराज के निमंत्रण पर उनके राजमहल में ठहरे हुए थे। राजा का दरबार लगने वाला था। दादा सामने गैलरी में बैठे हुए थे। राजा ने देखा कि दादा अकेले बैठे हैं उनकी युगल(पत्नी) और उनके परिवार के अन्य सदस्य साथ नहीं बैठे हैं ( दादा की युगल 'जशोदा' का यह विचार था कि पहले हम श्रीनाथ द्वारे में दर्शन करने जाएंगे, इसलिए वह गैलरी में नहीं आई थी, ना ही हम आए थे)।जब राजा को यह बात पता चली तो राजा ने दरबार शुरू नहीं होने दिया और वजीर को विशेष तौर पर दादा के परिवार को आमंत्रित करने के लिए भेजा। जब हम आए तब राजा ने स्वागत किया, बैंड बाजे बजे और तब दरबार चालू हुआ। तब राजा ने वजीर को प्रोग्राम दिया की इनको श्री नाथद्वारा ले जाने की व्यवस्था हो। रास्ते में हमें ड्राइवर ने बताया ने बताया कि राजा ने आप की खास मेहमान नवाजी की है, वरना इस प्रकार दरबार कभी नहीं रुका ।
औपचारिक रीति से दादा ने कोई खास शिक्षा प्राप्त नहीं की थी परंतु अभ्यास से उन्हें सिंधी भाषा का अच्छा ज्ञान था, हिंदी के धर्म ग्रंथों का सहज ही अध्ययन कर लेते थे वह गुरुमुखी में ग्रंथ साहिब अच्छी तरह समझ लेते थे और अंग्रेजी के समाचार पत्रों को पढ़ा करते थे। उन्हें पत्र लिखने में विशेष कुशलता प्राप्त थी और अच्छे साहित्य एवं कला की उन्हें पैनी पहचान थी थी पहचान थी पैनी पहचान थी थी पहचान थी। अपने व्यापारी जीवन में भी वे अपनी ही सूझ से जेवरों के नए-नए डिजाइन बनाते थे। वे इस कार्य में किसी की नकल नहीं करते थे।
दादा के जीवन में अनन्य भक्ति-भाव और संयम-नियम
दादा बाल्यकाल से ही श्री नारायण के अनन्य भक्त थे। श्री नारायण की स्मृति उन्हें इतनी प्रिय थी कि वह अपने पूजा पाठ के कक्ष के अतिरिक्त, श्री नारायण का चित्र अपने शयनागार में और अपने सिरहाने के नीचे भी रखते थे। उनकी तिजोरी और जेब में भी श्री नारायण का चित्र रखा रहता था ताकि दिनभर जिधर भी देखें जहां भी उनका हाथ पड़े वहां ही श्री नारायण उनके सामने आ जाएं। बाजार में श्री नारायण के जो छपे हुए चित्र प्रायः मिलते थे, उनमें श्री नारायण को लेटे हुए और श्री लक्ष्मी को उनके चरणों की दासी के तौर पर पांव दबाते हुए चित्रित किया हुआ होता है। दादा को यह चित्र पसंद नहीं थे क्योंकि वह इस चित्र को ऐसे समाज का प्रतीक मानते थे जिसमें स्त्री को गौण(कम), दासी-जैसा अथवा तिरस्कार युक्त स्थान दिया जाता हो। दादा स्त्री के स्थान को पुरुषों के स्थान से कम नहीं मानते थे। इसलिए वे चित्रकार से ऐसा चित्र बनवा लेते थे जिसमलक्ष्मी का दासी भाव अंकित ना हो।
दादा का भक्ति भाव इतना परिपक्व था की व्यापार या घर की कैसी भी परिस्थिति हो, वे एक दिन भी भक्ति और पाठ के नित्य नियम से नहीं चूकते थे। चाहे वे रेल यात्रा कर रहे हो तो भी वे श्रीमदभगवतगीता का पाठ अवश्य करते थे क्योंकि गीता में उनकी अनन्य श्रद्धा थी। दादा श्रद्धा भक्ति के बारे में ब्रह्माकुमारी ब्रजइन्द्रा जी लिखते हैं कि-
"जिन राजा महाराजाओं तथा धनाढ्य व्यक्तियों के साथ दादा का हीरे-जवाहरातों का व्यापार था,वे कई बार उनके यहॉ अतिथि बनकर आते और उनकी गाड़ी के पहुंचने का समय कई बार वही होता था जो दादा कि पूजा का समय होता था, परंतु फिर भी दादा भक्ति और पाठ को नहीं छोड़ते थे। दादा का खान-पान और रहन-सहन सात्विक और साधारण था। जब कभी भी मित्रों को भोजन या पार्टी देते तो उसमें सिगरेट, शराब आदि की गंध भी नहीं होती थी। दादा द्वारा दिए गए भोज में सम्मिलित होने वाले राजा तथा रईस लोग कई बार सिगरेट, शराब आदि को ना पाकर विनोदपूर्ण पाकर लहजे में कहते-"दादा, पार्टी फीकी रही। "परंतु दादा मुस्कुराते हुए उत्तर देते-" आपके लिए हम अपना धर्म थोड़े ही भ्रष्ट करेंगे । आप तो हमें कागज के नोट देते है परंतु हम तो उनके बदले में आपको हीरे देते हैं।" यह सुनकर वह लोग हंस पड़ते।
दादा को अमरनाथ, हरिद्वार, प्रयाग, वृंदावन, काशी आदि की यात्रा में विशेष रुचि थी और साधू सन्यासियों को अपने यहां पर आने में उन्हें बहुत खुशी होती थी। अपने लौकिक गुरु में उनकी बड़ी श्रद्धा थी और उनके स्वागत, सत्संग तथा आतिथ्य पर वह हजारों रूपया खर्च कर देते थे। गुरु की आज्ञा को कितना महत्व देते थे, इस विषय में ब्रह्माकुमारी बृज इन्द्रा जी की निम्नलिखित पंक्तियां पढ़ने योग्य है योग्य है:-
गुरु के प्रति अत्यन्त श्रद्धा
" उन दिनों दादा की अपने गुरु में भावना भी बहुत थी । एक बार गुरु अपनी बहुत बड़ी शिष्य मंडली ले कर उनके यहां आए, दादा ने बहुत ही आदर से गुरु जी का स्वागत किया। दादा में गुरु भक्ति भक्ति इतनी थी कि उन्होंने गुलाब जल की बोतलों कि कई पेटियाँ मंगवाई। प्रातः और सायं दोनों काल 'गुरु' के शौच-गृह में जाने से पहले वहां खूब गुलाब जल छिड़का जाता। दादा अपने ही हाथ से वहां एक बोतल गुलाब जल छिड़क आते और अगरबत्ती भी जगा आते।"
उन्हें 'गुरु' के आराम का भी बहुत ध्यान रहता। कहीं आवारा कुत्तों की आवाज 'गुरु' कि आराम या एकांत में खलल ना डालें विशेषकर इस ख़याल से वह एक पहरेदार रखते। आम का मौसम न होने के कारण बाजार में चार रूपए का एक आम मिलता, तो भी वह गुरु के लिए आम ले आते।
वह गुरु की हर आज्ञा को हर हालत में सर्वोपरि मानते थे। एक बार की बात है कि दादा के पोते का नामकरण संस्कार होना था सायंकाल सब बड़े व्यक्तियों का भोज था अचानक ही 'गुरु' का तार आया कि तुरंत आओ। दादा ने जशोदा जी (दादा की लौकिक पत्नी) को कहा कि तुरंत कपड़े निकालो और ड्राइवर को बुलाओ क्योंकि मुझे जाना है। जसोदा जी बोली-" इस अवसर पर कैसे जा सकोगे सकोगे" दादा बोले-"सुनो, गुरु का बुलावा आया माता काल का बुलावा आया। काल आई तो क्या हम उसे यह कहकर रोक सकते हैं कि आज हमारे पोते का नामकरण है।" दादा इतना कहकर अंदर चले गए गए।अब हम क्या करते? उसी समय सभी मित्रों को फोन करके बताया कि-" दादा को किसी कारण से बाहर जाना पड़ गया है। दादा को 'गुरू' ने इसलिए बुलाया था कि दस हज़ार रुपये चाहिए थे, क्योंकि उसके किसी शिष्य को सट्टे में घाटा पड़ गया था।"
दानवीर दादा
दादा स्वभाव से ही दानी थे। उनके एक चाचा, जोकि,' मूलचंद आजवाला'( हाथी दांत के व्यापारी) के नाम से प्रसिद्ध थे, एक 'निष्काम दानी' के तौर पर विख्यात थे। उनके जीवन काल में ही दादा भी उनकी कोठी पर जाकर बैठते और पीड़ित लोगों को दान करते थे। इस परोपकार के कार्य में दादा अपने चाचा के अच्छे सहयोगी थे।
भक्ति की पराकाष्ठा
दादा में भक्ति के संस्कार इतने पक्के थे कि चाहे कैसा भी अवसर क्यों न हो, उनके कर्मों में भक्ति की झलक स्पष्ट दिखाई देती थी। उन्होंने जब अपनी लौकिक पुत्रियों तथा भतीजी का विवाह कराया तो उन्हें दहेज में हीरे सोना तथा लाखों का सामान देने के अतिरिक्त उन्हें श्रीमद् भगवदगीता तथा चांदी का एक सुंदर मंदिर भी विशेष सौगात के रूप में दिया ताकि वर और वधु के जीवन में भी भक्ति भावना बनी रहे। वह शादी के अवसर पर भी अपने लौकिक गुरु को आमंत्रित कर लिया करते थे और शादी को भी एक सत्संग के समान रूप दे देते थे, अर्थात उस अवसर पर भी वातावरण को धार्मिक बना देते थे तथा अन्य लोगों की तुलना में उसे निराले ढंग से संपन्न करते थे।
दादा की भक्ति- भावना का परिचय इस बात से भी मिलता है कि लखपति होते हुए भी, तथा लौकिक दृष्टि से एक प्रसिद्ध कृपलानी कुल के होते हुए भी उन्होंने अपनी एक पुत्री, जिससे वे प्यार से पुट्टु नाम से याद करते थे, का विवाह बोधराज नामक एक ऐसे व्यक्ति से किया जो कि स्कूल में मुख्याध्यापक थे, परंतु एक साधारण परिवार के थे। दादा की पुत्री सुशील थी, शोभनीय थी और सुखों में पली थी परंतु दादा ने उसका विवाह किसी धनाढ्य कुल के युवक से ना करके बोधराज से इस कारण किया क्योंकि बोधराज धर्म प्रिय थे। वह चिदाकाशी मठ में अपनी लग्न के लिए विशेष रूप से योगीराज नाम से भी प्रसिद्ध थे। अतः दादा ने अपने परिवार में भक्ति का वातावरण बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया था, हालांकि, उनके इस कार्य से उनके कुल में बहुत ही हलचल पैदा हुई ही और बहुत से लोगों में यह एक चर्चा का विषय बन गया कि दादा ने अपने ही उच्च कुल को छोड़ कर बाहर के एक एक 'साधु-तुल्य' व्यक्ति के साथ अपनी पुत्री की शादी क्यों की?
दादा की पत्नी तो श्री कृष्ण की अनन्य भक्तिन थी हिं, उनकी बहू में भी भक्ति के बहुत पक्के संस्कार थे और, विपुल धन होते हुए भी दादा में ऐश अथवा विलासिता के संस्कार नहीं थे, बल्कि उनके जीवन से एक सुशील एवं धर्म प्रिय व्यक्ति की भासना आती थीं।
ब्रह्माकुमारी मनोहर इन्द्रा, बोधराज के साथ दादा की पुत्री के विवाह के प्रसंग में इस प्रकार कहती हैं:-
" मैंने दादाजी और उनके लौकिक परिवार को कई बार देखा था। दादा का एक लौकिक पुत्र,जिसका नाम 'नारायण' है, जो मेरे लौकिक भाई के साथ पढ़ता था। दादाजी की अपनी लौकिक पुत्री, 'पुट्टु'का विवाह जब बोधराज से हुआ था, तब मैंने विवाह को अपनी आंखों से देखा था। उस विवाह कि यह विशेषता थी कि उसमें शोर, कोलाहल, स्थूलता या घोर सांसारिकता देखने में नहीं आती थी। बल्कि, वह विवाह ऐसा लगता था जैसे कि कलयुग में किसी दैवी और दैवता का विवाह हो रहा हो। उस समय के दृश्य का मेरे मन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। मेरे मन में यह विचार इसलिए उठा कि मुझे आज दादा के कुटुंब का 'सात्विक-सा, वातावरण मेरे मन को बहुत भाता था।"
इस प्रकार का जीवन था दादा का। कोलकाता में उनकी हीरों की दुकान थी और और मुंबई में भी वे जवाहरात के व्यापार के सिलसिले में आते जाते रहते थे। कोलकाता और मुंबई के अतिरिक्त उनका उनका एक मकान हैदराबाद में भी था जहां पर कि वह बहुत समय से रहते थे। इन तीनों स्थानों पर उनका जीवन अब राजकुल के जैसे सुख में व्यतीत हो रहा था। यद्यपि दादा में प्रभु निष्ठा, दानवीरता आदि की विकसित भावना थी तथापि अभी घर छोड़कर वानप्रस्थी होने का संकल्प उन्हें बिल्कुल भी नहीं था भी नहीं था।
जब दादा की आयु लगभग 60 वर्ष की हुई तो उनकी पत्नी, जिनका नाम 'जसोदा' था, ने उनसे कहा- "अब तो हमें वानप्रस्थ होकर किसी एकांत स्थान पर बैठ जाना चाहिए।" परंतु दादा ने उन्हें कहा -"अभी ठहरो, अभी इतने लाख रुपया कमाया है, अभी इतने लाख और कमा लेने दो, फिर हम वानप्रस्थी हो जाएंगे।" दादा धन कमाने में बहुत सिद्ध हस्त थे और उन का विचार था कि ओर दो चार वर्ष तक धन कमाकर फिर खूब दान भी करेंगे और जीवन के बाकी दिन निराधार होकर भक्ति में गुजारेंगे। परन्तु " नर के मन कछु और है, साहब के मन और।" अनायास ही किसी किसी ईश्वरीय योजना के अनुसार, दादा की मनोवृत्ति संसार से उपराम हो गई। उन्हें अंतर्मुखता का अनुभव होने लगा। उन्हें एकांत ही प्रिय लगने लगा। मनन चिंतन में रहने लगे।
दादा को दिव्य चक्षु का वरदान
एक दिन ऐसा आया आया जब वे मुंबई में बबूल नाथ के मंदिर के सामने वाले अपने घर के विशाल आंगन में हो रहे सत्संग में बैठे थे, तो उन्हें एक निराला ही आंतरिक अनुभव होने लगा। सत्संग के स्थान से उठकर अपने एक कमरे में चले गए। वहां बैठे हुए थे एक अलौकिक नशा सा अनुभव कर रहे थे। उन्हें शरीर का भान नहीं था। उस अवस्था में उन्हें सबसे पहले 'विष्णु चतुर्भुज' का दिव्य साक्षात्कार हुआ। दादा ने सोचा कि 'गुरू' ने ही यह साक्षात्कार करवाएं होंगे होंगे। इसलिए उन्होंने अपने गुरु के पास जाकर बहुत खुशी में यह सब वृतांत सुनाया। परंतु गुरु के हावभाव से उन्होंने समझा कि गुरु इन बातों से बिल्कुल ही अपरिचित है और दिव्य साक्षात्कार कराना कराना और दिव्य साक्षात्कार कराना उनकी सामर्थ्य से बिल्कुल बाहर की बात है। अतः उनका मन अब अब परमपिता परमात्मा की ओर मुड़ा जो कि वास्तव में सबका सद्गुरु है। दादा के मन में निश्चय हुआ कि दिव्य दृष्टि और दिव्य बुद्धि का दाता केवल परमात्मा ही है और उस एक ही को सच्चा गुरू मानना चाहिए। उन्हें महसूस हुआ कि परमपिता परमात्मा ही ने उन्हें दिव्य चक्षु रूप वरदान दिया है अर्थात श्री विष्णु चतुर्भुज का दिव्य साक्षात्कार करवाया है।
ज्योतिर्लिंगम शिव का तथा कलियुगी सृष्टि के महाविनाश का दिव्य साक्षात्कार
कुछ समय के बाद दादा वाराणसी में चले गए। वहां भी अपने एक मित्र की वाटिका में बैठकर मनन किया करते थे। वहां एकांत में बैठ कर जब वे प्रभु चिंतन करते तो उन्हें नित्य नए अनुभव और कई दिव्य साक्षात्कार हुआ करते। तब वह अपने घर में जो पत्र लिखा करते थे, उससे यह बात स्पष्ट मालूम होती थी।
ब्रह्माकुमारी ब्रज इन्द्रा (दादा की लौकिक पुत्रवधु) कहती है कि तब दादा ने एक पत्र में लिखा:-
" खजाना बहुत है, पा रहा हूँ।" दूसरे पत्र में लिखा-" चाबी मिल गई, पा लिया, पा लिय" इस प्रकार के पांच पत्र दादा ने हम लोगों को लिखे थे। उन्हीं दिनों दादा को अनेक अलौकिक अनुभव हुए और उस स्थिति में दादा ने लिखा कि-" पा लिया जो जो था कि पाना और क्या बाकी रहा" एक दिन दादा को निराकार ज्योतिर्लिंगम शिव परमात्मा का साक्षात्कार हुआ तथा कलियुगी सृष्टि के महाविनाश का साक्षात्कार भी हुआ। दादा ने देखा कि बहुत ही भयंकर बम बनाए गए हैं। उन्हें आभास हुआ कि 5000 वर्ष पहले महाभारत युद्ध में जिन अस्त्रों का प्रयोग हुआ था और जिन्हें 'महाभारत' में 'अग्निबाण' 'ब्रह्मास्त्र' और 'मूसल' कहा गया है, यह वही अस्त्र-शस्त्र है और इन्हीं द्वारा अमेरिका तथा यूरोपवासी लोगों का महाविनाश हो रहा है।
दादा को जिन दिनों में यह साक्षात्कार हुआ, उन दिनों अभी अमेरिका ने ऐटम और हाइड्रोजन बम हिरोशिमा और नागासाकी पर नहीं फेंके थे बल्कि तब वैज्ञानिक लोग प्रयोगशाला में भी उन पर अभी प्रयोग कर रहे थे। तब रूस और अमेरिका आपस में मित्र राष्ट्र थे और जर्मनी तथा जापान के विरुद्ध उनका संयुक्त मोर्चा था। तब दादा को परमपिता परमात्मा ने दिव्य चक्षु देकर यह अग्रिम साक्षात्कार कराये थे, कि आगे चलकर यह दोनों देश एक दूसरे के शत्रु बन जाएंगे और एक विश्व युद्ध होगा जो की अंतिम होगा। उस विश्व युद्ध में अस्त्र शस्त्रों के प्रयोग से, बहुत ही थोड़े से समय में, एक अग्निज्वाला से, भारत से बाहर दूसरे देशों में एक महाविनाश हो जाएगा।
दादा ने गीता प्रसिद्ध अर्जुन की भाँति यह भी यह भी साक्षात्कार किया की सृष्टि में महाविनाश होने के परिणाम स्वरुप करोड़ों आत्माएं परमधाम को वैसे ही लौट रही है जैसे पतंगे प्रकाश की ओर लपकते हैं। दादा ने दिव्यदृष्टि द्वारा भारत में विकराल ग्रह युद्धों का और प्राकृतिक प्रकोपों का भी अग्रिम साक्षात्कार किया। विनाश के ये अत्यंत डरावने दृश्य देखकर दादा कांपने । दादा ने देखा कि एक बहुत बड़ी बाढ़ आई है। जीव प्राणी अत्यंत भयभीत होकर जान बचाने के लिए इधर उधर भाग रहे भाग रहे हैं परंतु वे बच नहीं पा रहे। कहीं पर अग्नि अपना महाविकराल रुप धारण करके नगरों और जीव और जीव प्राणियों को भस्मसात करती जा रही है, कहीं पर धमाके से हूं हूं से मूसलाधार वर्षा हो रही है तो कहीं पर पृथ्वी कम्पायमान हो कर फट रही है और सब जगह लोग हाहाकार कर रहे हैं और प्राणों की रक्षा के लिए भाग रहे हैं, परंतु लोग पारस्परिक युद्धों तथा प्राकृतिक प्रकोप उस से बच नहीं पा रहे हैं। दादा, जिनकी आंखों से कभी किसी ने आंसू नहीं देखे थे, उनकी आंखों से अब अश्रुधारा बह रही थी और वे कह रहे थे रहे थे-"प्रभु, बस कीजिए! बस कीजिये, प्रभु! इतना भयंकर विनाश! अब मुझे मोहिनी रूप मोहिनी रूप दिखलाइए।"
व्यापार से अवकाश
भविष्य में होने वाले महाविनाश को देखकर दादा का मन अब अपने व्यवसाय से उठ चुका था। दादा उसे समेटने के लिए वहां से कलकत्ता गये। उन्हें अब सब हीरे पत्थर की तरह दिखाई देने लगे। वह बोले, यह तो झूठा व्यापार है। उन्होंने अपने भागीदार से कहा-" अब हमें छुट्टी दो।" उसने कहा- "यह कैसे होगा?" दादा का भागीदार किसी राजा को पहचानता तक नहीं था। उसने सोचा कि दादा मुझे छोड़ जायेंगे तो बड़ी कठिनाई होगी। उसने शायद यह भी सोचा कि पता नहीं दादा क्यों नाराज हो गए हैं और पता नहीं कि वह कितना हिस्सा मांगेगे, परंतु दादा ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा-" मैं किसी मतभेद के कारण नहीं जा रहा बल्कि इसलिए जाना चाहता हूं कि मुझे अब यहां धंधा झूठा लगता है। मुझे ईश्वरीय आवाज आई है कि कलयुगी सृष्टि का महाविनाश होना है। तथा मुझे अब यह पैसा ईश्वरीय सेवा में लगाना है। मैं अभी बैठकर बैठकर आपसे कोई हिसाब-किताब नहीं करूंगा । आप बाद में अपने अपने वकील द्वारा, जैसे भी ठीक समझो, हिसाब करा देना।"
हम पहले बता आए है कि दादा के एक चाचा थे जोकी 'काका मूलचंद' के नाम से प्रसिद्ध दानी थे। दादा ने उन्हें वचन दिया था कि उनका सदाव्रत चलता रहेगा। दादा दान कार्य में उन्हें काफी आर्थिक सहयोग देते थे। अभी कलकत्ते में अब उन्हें अपने भागीदार से हिसाब करना था तो उन्हीं दिनों सिन्ध से 'काका' के बीमार पड़ जाने का तार दादा के पास आया। दादा ने भागीदार के साथ हिसाब नहीं किया बल्कि उन्हें भागीदार के वकील द्वारा हिसाब का का फैसला करने से संबंधित जो कागज मिले, उन्हीं कागजों और उसी हिसाब किताब को उन्होंने ठीक मान लिया। तब उन्होंने घर में तार दिया जिसमें लिखा था:-
" अल्लिफ़ को अल्लाह मिला,
बे को मिली झूठी बादशाही।
आई तार अल्लिफ़ को,
हुआ रेल का राही।।"
यहाँ 'अल्लिफ़' का अर्थ पहले व्यक्ति अर्थात दादा से है और 'बे' उनके भागीदार का वाचक है। ऐसा तार देखकर विचार चलता था कि पता नहीं दादा को क्या हुआ है। फिर दादा सिन्ध में आए तो उनका जीवन बिल्कुल ही बदला हुआ था।
मृत्यु दशा का साक्षात्कार
हाँ, तो ब्लॉग में काका मूल चंद की बीमारी की बात चल रही थी। दादा के पहुंचने से पहले ही काका मूलचन्द ने शरीर छोड़ दिया था। उनकी मृत्यु के बाद एक दिन दादा उनकी कोठी पर एकांत में बैठे थे। वहाँ उन्हें काका मूलचंद की मृत्यु का साक्षात्कार हुआ। उन्हें दिखाई दिया की आत्मा मस्तक से अलग होती गई। सत्ता छोड़ते-छोड़ते वह पांव के अंगूठे तक आई। फिर थर्मामीटर के पारे की तरह धीरे धीरे ऊपर चढ़ते चढ़ते मस्तक तक आई। इस प्रकार उन्हें मृत्यु दशा का साक्षात्कार हुआ। काका मूलचंद की मृत्यु दशा के साक्षात्कार के लगभग 1 सप्ताह के अंदर दादा को एक और साक्षात्कार हुआ। दादा ने देखा कि विष्णु उनके सामने प्रकट होकर कह रहे हैं-'अहम् चतुर्भुज तत् त्वम्'। फिर श्री कृष्ण, जगन्नाथ जी, बद्रीनाथ जी और केदारनाथ जी बारी बारी आये और उन सभी ने ऐसे ही कहाँ। इन साक्षात्कारों से जहां दादा को बहुत हर्ष हुआ. वहाँ इस बात पर उनका विचार भी चलने लगा कि- "मुझे तत् त्वम्" का जो वरदान दिया गया है, उसका वास्तव में क्या भाव है? यह साक्षात्कार मुझे किसने कराये?
उन दिनों दादा के 'गुरु' भी आए हुए थे। दादा ने उनके आगमन पर 25000 रूपये खर्च किए। उन्होंने एक बहुत बड़ी सभा की थी। उसमें बहुत लोग बैठे थे, परंतु मुझे दादा का उठना बैठना बहुत निराला लगा। दादा थे तो साकार अर्थात शरीरधारी परंतु मुझे ऐसा लगा कि उनका शरीर उनसे दूर है। गुरु का भाषण चल रहा था परंतु दादा सभा से उठ गए। इससे पहले कभी भी दादा सभा से उठकर नहीं गए थे। मेरा ध्यान दादा की ओर गया। मैंने जसोदा जी, जोकि दादा की धर्म पत्नी थीं, को दादा के पास भेजा। जसोदा जी के जाने के बाद मुझे ख्याल आया कि मैं भी जाऊँ। मैं दादा के कमरे में गई। मैं दादा के पास बैठ गई और जसोदा जी गुरु की सभा में लोट गई| (उपयुक्त वृतान्त - दादा कि पुत्रवधू ब्रह्माकुमारी मनोहर इन्द्रा कि शब्दों में )
विश्व के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण वृत्तान्त
मैंने देखा कि दादा अर्थात बाबा के नेत्रों में इतनी लाली थी कि ऐसे लगता था कि जैसे उनमें कोई लाल बत्ती जग रही हो। उनका चेहरा भी एकदम लाल था। और कमरा भी प्रकाशमय हो गया था। मैं भी शरीर भान से अलग हो गई। आवाज यह की:-
"निजानन्द स्वरूपं, शिवोहम् शिवोहम्
ज्ञान स्वरूपं शिवोहम् शिवोहम्
प्रकाश स्वरूपं, शिवोहम्, शिवोहम्।"
फिर दादा के नयन बंद हो गये।
मुझे आज तक तक वह अद्भुत दृश्य नहीं भूलता भूलता है, न ही वह आवाज भुलाई जा सकती है। वह वातावरण ही अविस्मरणीय था और उस समय कि वह अशरीरी अवस्था भी मुझे अच्छी तरह याद है।
दादा के नयन खुले तो वे ऊपर नीचे कमरे में चारों ओर आश्चर्य से देखने लगे। उन्होंने जो कुछ देखा था उस की स्मृति में वे लवलीन थे। मैंने पूछा-"बाबा, आप क्या देख रहे हैं?"बाबा बोले-"कौन था? एक लाईट थी। कोई माईट(Might) शक्ति थी। कोई नई दुनिया थी। उसके बहुत ही दूर, ऊपर सितारों की तरह कोई थे थे और जब वह स्टार नीचे आते थे तो कोई राजकुमार बन जाता था तो कोई राजकुमारी बन जाती थी। एक लाइट माईट ने कहा -" यह ऐसी दुनिया तुम्हें बनानी है" परंतु उसने कुछ बताया नहीं कि कैसे बनानी है। मैं यह दुनिया कैसे बनाऊंगा!!' वह कौन था'- कोई माईट थी।"
यह दादा के तन में परमपिता परमात्मा शिव की प्रवेशता थी |
उस दिन दादा बहुत गहन विचार में थे। वह गहरी सोच करते और फिर कहते थे-"वह कौन था? वह कौन सी शक्ति है जो शक्ति है जो है जो जो मुझे ऐसे ज्ञान युक्त दिव्य साक्षात्कार कराती हैं और इनके पीछे का रहस्य क्या है" दादा के परिवार वाले भी इस सोच में रहते थे कि पता नहीं दादा को क्या हो गया है। दादा आप बहुत ही अन्तर्मुखी हो गए हैं और वह आत्म चिंतन में ही तल्लीन होते थे। स्वयं दादा को भी आगे चलकर यह रहस्य स्पष्ट हुआ कि परमपिता परमात्मा शिव ने दादा के तन में प्रवेश होकर अपना परिचय दिया था और उन्होंने ही दादा को कलयुग सृष्टि के महाविनाश का तथा आने वाली सहयोगी सृष्टि का भी साक्षात्कार कराया था और इस पावन सृष्टि की स्थापना अर्थ उन्हें निमित्त अथवा माध्यम बनने का निर्देश दिया था।
अंतरात्मा में गीता ज्ञान का गीता ज्ञान का स्फुरण और दिव्य विवेक की प्राप्ति
अब दादा को अंदर ही अंदर ऐसा अनुभव हुआ जैसे कि भगवान का अव्यक्त अथवा गुप्त रूप में उन्हें गीता ज्ञान दे रहे हों। अब उनकी अंतरात्मा में गीता ज्ञान का स्फुरण हो रहा था और साथ-साथ उस ज्ञान में स्थिति और अनुभूति का भी रसास्वादन कर रहे थे। उनकी बुद्धि को स्वतः ही यह समझ भी प्राप्त हो रही थी की गीता में भगवान के वास्तविक महावाक्य कौन से है और उनका उद्देश्य क्या है? गोया अब उन्हें दिव्य विवेक की प्राप्ति हुई और इस सत्यता में उनका विश्वास और दृढ़ हुआ कि 'गीता' ही एक ऐसा शास्त्र है जिसमें स्वयं भगवान के महावाक्य । परंतु अब जबकि स्वयं भगवान उंहें ईश्वरीय ज्ञान दे रहे थे और उनकी अनुभूति करा रहे थे तो गीता शास्त्र, जिसे वह नित्यप्रति पढ़ा करते थे, अब उनसे स्वतः ही छूट गया था। दादा को ऐसा अनुभव होता था कि वह अर्जुन है और स्वयं भगवान उनकी ज्ञान पिपासा को तृप्त कर रहे हैं। अब भगवान स्वयं भक्तों की आशा पूर्ण करने के लिए और गीता में दिया हुआ अपना वचन निभाने के लिए फिर से गुप्त वेश में आए हैं।
दादा को अब यह निश्चय हो गया कि मैं यह देह नहीं हूँ, मैं एक अविनाशी आत्म