सृजन

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सृजन अर्थाथ अन्तश की अभिव्यक्ति द्वा?

07/01/2026

लो चले ,
बीते वक्त की ओर,
जहां न कोई फिक्र,
न कोई झोल /
बस चारों ओर,
धूम धड़का /
मस्ती का माहौल //
वो काटो की ,
तारों वाला खुला मैदान ,
जहां खेलते,
बड़े हुए हम नादान /
कभी गुल्ली डंडा,
कभी पकड़न पकड़ाई,
किसी कोने में छिप कर बैठे,
खेलते छिपन छिपाई,//
पीठ छिल जाती,
घुटने जिस जाते /
चप्पल का तो पता नहीं,
हाथ पैर धूल से सन जाते ,
क्रिकेट के मैदान में
गिटी फोर भी खेल जाते //
बचपन बहुत खूबसूरत,
न लौटे दोबारा,
हम ही बार बार,
उन गलियों में,
घूम आते हर दिन,
दोपहरी दोबारा //
स्वरचित रचना,
रचना बहल,
कानपुर (उ प्र)

23/12/2025

देखो,
कभी पड़े
वक्त की मार |
तो कभी ,
मौसम बईमान ||
ठंड में शरीर ,
सिकुड़ जाएं |
तो कभी गर्मी ,
पसीना बहाएं ||
बारिश का तो ,
पूछो नहीं भाई |
बस ,जगह जगह
जल भराई| ||
जल संरक्षण की,
यह कैसी मिसाल |
कही ढसी कार,
तो कही कमरा
तैरता शयन गार ||
हैं प्रभुजी,
हम पर दया बरसाओ,
हमारी नैया पार लगाओ |
कल आज कल,
बस तुम्ही हो,
जो इस जीवन पहेली
को सुलझाओ ||
स्वरचित रचना,
रचना बहल,
कानपुर(उ.प)

16/11/2025
26/10/2025

देखो ,
दिए जल गए,
अंधकार भी ,
मिट गया ,
हुआ रोशन
हर गलियारा ,
रात का भी ,
वक्त बदल गया *****
आंखों में भी ,
चमक नई,
चेहरे पर ,
मुस्कुराहट कई ,
मन में रही
उथल पुथल
गम भी न जाने ,
,कहा गुम हुआ ******
स्वरचित रचना,
रचना बहल,
कानपुर, उ.प्र.

25/09/2025

#सृजन

16/09/2025
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