20/12/2017
मैं मेरे मन को लेकर कई बार ठहरा, ज़िन्दगी चलने को कहती थी, वक़्त देता था पहरा,
हर सुबह आती थी नये आफताब लेकर,
मुझ पर तो सजता था यादों का सेहरा,
और फिर एक रोज़ यूँ वफ़ा पूँछ बैठी मेरी क़िस्मत पे सवालात,
क्या रहते हो खुश और भले हैं हालात,
मुझको उसने ये यकीन दिलाया है,
ये मंजिल नहीं बस एक राह-ए-सराय है,
उठो चलो कुछ और कदम,
कारवां है यह दुनिया का,
मिलेंगे बिछड़ेंगे यहाँ आप और हम,
तब से कोशिश है कि रुकना ना हो,
रखता हूँ खुद के करीब, किसी का शिक़वा न हो,
और जो हैं अज़ीज़ दिल के ,
सुकून से दिल में वो रहा करते है,
आँख से ओझल तो क्या ख्यालों में मिला करते है,
ये वो हैं जो करते है सांसों संग ज़िन्दगी को पूरा,
नहीं रहता कोई मलाल और कोई ख्वाब अधूरा,
अब यही रहती है समेटूं खुद को ,
रोशन करूँ मन सभी के,
वक़्त देता रहे मोहलत और लम्हें,.........