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30-01-2021 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन"मीठे बच्चे - तुम्हारी याद की यात्रा बिल्कुल ही गुप्त है, तुम बच्चे अभी...
30/01/2026

30-01-2021 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - तुम्हारी याद की यात्रा बिल्कुल ही गुप्त है, तुम बच्चे अभी मुक्तिधाम में जाने की यात्रा कर रहे हो''

गीत:-

धीरज धर मनुवा........

ओम् शान्ति। बच्चों को इस गीत से इशारा मिला कि धीरज धरो। बच्चे जानते हैं हम श्रीमत पर पुरुषार्थ कर रहे हैं और जानते हैं कि हम इस गुप्त योग की यात्रा पर हैं। वह यात्रा अपने समय पर पूरी होनी है। मुख्य है ही यह यात्रा, जिसको तुम्हारे सिवाए और कोई भी नहीं जानते हैं। यात्रा पर जाना है जरूर और ले जाने वाला पण्डा भी चाहिए। इसका नाम ही रखा हुआ है पाण्डव सेना। अब यात्रा पर हैं। स्थूल लड़ाई की कोई बात नहीं है। हर एक बात गुप्त है। यात्रा भी बड़ी गुप्त है। शास्त्रों में भी है - बाप कहते हैं मुझे याद करो तो मेरे पास आकर पहुचेंगे। यह यात्रा तो हुई ना। बाप सब शास्त्रों का सार बताते हैं। प्रैक्टिकल में एक्ट में ले आते हैं। हम आत्माओं को यात्रा पर जाना है अपने निर्वाण-धाम। विचार करो तो समझ सकते हैं। यह है मुक्तिधाम की सच्ची यात्रा। सब चाहते हैं हम मुक्तिधाम में जायें। यह यात्रा करने के लिए कोई मुक्तिधाम का रास्ता बताये। परन्तु बाप तो अपने समय पर आपेही आते हैं, जिस समय को कोई नहीं जानते हैं। बाप आकर समझाते हैं तो बच्चों को निश्चय होता है। बरोबर यह सच्ची यात्रा है जो गाई हुई है। भगवान ने यह यात्रा सिखाई थी। मनमनाभव, मध्याजी भव। यह अक्षर भी तुम्हारे काम के बहुत हैं। सिर्फ किसने कहा? यह भूल कर दी है। कहते हैं देह सहित देह के सम्बन्धों को भूल जाओ। इनको (ब्रह्मा बाबा को) भी देह है। इनको भी समझाने वाला दूसरा है, जिसको अपनी देह नहीं है वह बाप है विचित्र, उनको कोई चित्र नहीं है, और तो सबके चित्र हैं। सारी दुनिया चित्रशाला है। विचित्र और चित्र अर्थात् जीव और आत्मा का यह मनुष्य स्वरूप बना हुआ है। तो वह बाप है विचित्र। समझाते हैं मुझे इस चित्र का आधार लेना पड़ता है। बरोबर शास्त्रों में है भगवान ने कहा था जबकि महाभारत लड़ाई भी लगी थी। राजयोग सिखाते थे, जरूर राजाई स्थापन हुई थी। अभी तो राजाई है नहीं। राजयोग भगवान ने सिखाया था, नई दुनिया के लिए क्योंकि विनाश सामने खड़ा था। समझाया जाता है ऐसा हुआ था जबकि स्वर्ग की स्थापना हुई थी। वह लक्ष्मी-नारायण का राज्य स्थापन हुआ था। अभी तुम्हारी बुद्धि में है - सतयुग था, अभी कलियुग है। फिर बाप वही बातें समझाते हैं। ऐसा तो कोई कह न सके कि मैं परमधाम से आया हूँ तुमको वापिस ले जाने। परमपिता परमात्मा ही कह सकते हैं ब्रह्मा द्वारा, और किसके द्वारा भी कह नहीं सकते। सूक्ष्मवतन में हैं ही ब्रह्मा-विष्णु-शंकर। ब्रह्मा के लिए भी समझाया है कि वह है अव्यक्त ब्रह्मा और यह है व्यक्त। तुम अभी फरिश्ता बनते हो। फरिश्ते स्थूल वतन में नहीं होते। फरिश्तों को हड्डी मास नहीं होता है। यहाँ इस रूहानी सर्विस में हड्डी आदि सब खलास कर देते हैं, फिर फरिश्ते बन जाते हैं। अभी तो हड्डी है ना। यह भी लिखा हुआ है - अपनी हड्डियां भी सर्विस में दे दी। गोया अपनी हड्डियां खलास करते हैं। स्थूलवतन से सूक्ष्मवतनवासी बनना है। यहाँ हम हड्डी देकर सूक्ष्म बन जाते हैं। इस सर्विस में सब स्वाहा करना है। याद में रहते-रहते हम फरिश्ते बन जायेंगे। यह भी गाया हुआ है - मिरूआ मौत मलूका शिकार, मलूक फरिश्ते को कहा जाता है। तुम मनुष्य से फरिश्ते बनते हो। तुमको देवता नहीं कह सकते। यहाँ तो तुमको शरीर है ना। सूक्ष्मवतन का वर्णन अभी होता है। योग में रह फिर फरिश्ते बन जाते हैं। पिछाड़ी में तुम फरिश्ते बन जायेंगे। तुमको सब साक्षात्कार होगा और खुशी होगी। मनुष्य तो सब काल का शिकार हो जायेंगे। तुम्हारे में जो महावीर हैं वह तो अडोल रहेंगे। बाकी क्या-क्या होता रहेगा! विनाश की सीन तो होनी है ना। अर्जुन को विनाश का साक्षात्कार हुआ। एक अर्जुन की बात नहीं है। तुम बच्चों को विनाश और स्थापना का साक्षात्कार होता है। पहले-पहले बाबा को भी विनाश का साक्षात्कार हुआ। उस समय ज्ञान तो कुछ था नहीं। देखा सृष्टि का विनाश हो रहा है। फिर चतुर्भुज का साक्षात्कार हुआ। समझने लगे यह तो अच्छा है। विनाश के बाद हम विश्व के मालिक बनते हैं, तो खुशी आ गई। अभी यह दुनिया नहीं जानती कि विनाश तो अच्छा है ना। पीस के लिए प्रयत्न करते हैं परन्तु आखरीन विनाश तो होना है। याद करते हैं पतित-पावन आओ, तो बाप आयेंगे जरूर आकर पावन दुनिया स्थापन करेंगे, जिसमें हम राजाई करेंगे। यह तो अच्छा है ना। पतित-पावन को क्यों याद करते हैं? क्योंकि दु:ख है। पावन दुनिया में देवतायें हैं, पतित दुनिया में तो देवताओं के पैर आ नहीं सकते। तो जरूर पतित दुनिया का विनाश होना चाहिए। गाया हुआ भी है महाविनाश हुआ। उसके बाद क्या होता है? एक धर्म की स्थापना सो तो ऐसे होगी ना। यहाँ से राजयोग सीखेंगे। विनाश होगा बाकी भारत में कौन बचेगा? जो राजयोग सीखते हैं, नॉलेज देते हैं वही बचेंगे। विनाश तो सबका होना है, इसमें डरने की बात नहीं। पतित-पावन को बुलाते हैं जबकि वह आते हैं तो खुशी होनी चाहिए ना। बाप कहते हैं विकारों में मत जाओ। इन विकारों पर जीत पाओ वा दान दे दो तो ग्रहण छूटे। भारत का ग्रहण छूटता जरूर है। काले से गोरा बनना है। सतयुग में पवित्र देवतायें थे, वह जरूर यहाँ बने होंगे।

तुम जानते हो हम श्रीमत से निर्विकारी बनते हैं। भगवानुवाच, यह है गुप्त। श्रीमत पर चलकर तुम बादशाही पाते हो। बाप कहते हैं तुमको नर से नारायण बनना है। सेकेण्ड में राजाई मिल सकती है। शुरू में बच्चियां 4-5 दिन भी बैकुण्ठ में जाकर रहती थी। शिवबाबा आकर बच्चों को बैकुण्ठ का भी साक्षात्कार कराते थे। देवतायें आते थे - कितना मान-शान से। तो बच्चों को दिल अन्दर लगता है बरोबर गुप्त वेष में आने वाला बाप हमको समझा रहे हैं। ब्रह्मा तन में आते हैं। ब्रह्मा का तन तो यहाँ चाहिए ना। प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा स्थापना। बाबा ने समझाया है - कोई भी आते हैं तो उनसे पूछो किसके पास आते हो? बी.के. पास। अच्छा ब्रह्मा का नाम कभी सुना है? प्रजापिता तो है ना। हम सब उनके आकर बने हैं। जरूर आगे भी बने थे। ब्रह्मा द्वारा स्थापना तो साथ में ब्राह्मण भी चाहिए। बाप ब्रह्मा द्वारा किसको समझाते हैं? शूद्रों को तो नहीं समझायेंगे। यह है ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण, शिवबाबा ने ब्रह्मा द्वारा हमको अपना बनाया है। ब्रह्माकुमार-कुमारियां कितने ढेर हैं, कितने सेन्टर्स हैं। सबमें ब्रह्माकुमारियां पढ़ाती हैं। यहाँ हमको दादे का वर्सा मिलता है। भगवानुवाच, तुमको राजयोग सिखाता हूँ। वह निराकार होने कारण इनके शरीर का आधार लेकर हमको नॉलेज सुनाते हैं। प्रजापिता के तो सब बच्चे होंगे ना! हम हैं प्रजापिता ब्रह्माकुमार-कुमारियां। शिवबाबा है दादा। उन्होंने एडाप्ट किया है। तुम जानते हो हम दादे से पढ़ रहे हैं ब्रह्मा द्वारा। यह लक्ष्मी-नारायण दोनों स्वर्ग के मालिक हैं ना। भगवान तो एक ऊंच ते ऊंच निराकार ही है। बच्चों को धारणा बड़ी अच्छी होनी चाहिए। पहले-पहले समझाओ दो बाप हैं भक्ति मार्ग में। स्वर्ग में है एक बाप। पारलौकिक बाप द्वारा बादशाही मिल गई फिर याद क्यों करेंगे। दु:ख है ही नहीं जो याद करना पड़े। गाते हैं दु:ख हर्ता सुख कर्ता। वह अभी की बात है। जो पास्ट हो जाता है उसका गायन होता है। महिमा है एक की। वह एक बाप ही आकर पतितों को पावन बनाते हैं। मनुष्य थोड़ेही समझते हैं। वह तो पास्ट की कथा बैठ लिखते हैं। तुम अभी समझते हो - बरोबर बाप ने राजयोग सिखाया, जिससे बादशाही मिली। 84 का चक्र लगाया। अभी फिर हम पढ़ रहे हैं, फिर 21 जन्म राज्य करेंगे। ऐसा देवता बनेंगे। ऐसे कल्प पहले बने थे। समझते हो हमने पूरा 84 जन्मों का चक्र लगाया। अब फिर सतयुग-त्रेता में जायेंगे तब तो बाप पूछते हैं आगे कितने बार मिले हो? यह प्रैक्टिकल बात है ना! नया भी कोई सुने तो समझेंगे 84 का चक्र तो जरूर है। जो पहले वाले होंगे उनका ही चक्र पूरा हुआ होगा। बुद्धि से काम लेना है। इस मकान में, इस ड्रेस में बाबा हम आपसे अनेक बार मिलते हैं और मिलते रहेंगे। पतित से पावन, पावन से पतित होते ही आये हैं। कोई चीज़ सदैव नई ही रहे, यह तो हो नहीं सकता। पुरानी जरूर बनती है। हर चीज़ सतो-रजो-तमो में आती है। अभी तुम बच्चे जानते हो नई दुनिया आ रही है। उसको स्वर्ग कहा जाता है। यह है नर्क। वह है पावन दुनिया। बहुत पुकारते हैं - हे पतित-पावन हमको आकर पावन बनाओ क्योंकि दु:ख जास्ती होता जाता है ना। परन्तु यह समझते नहीं कि हम ही पूज्य थे फिर पुजारी बने हैं। द्वापर में पुजारी बने। अनेक धर्म होते गये। बरोबर पतित से पावन, पावन से पतित होते आये हैं। भारत के ऊपर ही खेल है।

तुम बच्चों को अब स्मृति आई है, अब तुम शिव जयन्ती मनाते हो। बाकी और कोई शिव को तो जानते ही नहीं हैं। हम जानते हैं। बरोबर हमको राजयोग सिखलाते हैं। ब्रह्मा द्वारा स्वर्ग की स्थापना हो रही है। जरूर जो योग सीखेंगे, स्थापना करेंगे वही फिर राज्य-भाग्य पायेंगे। हम कहते हैं बरोबर हम कल्प-कल्प बाप से यह राजयोग सीखे हैं। बाबा ने समझाया है - अभी यह 84 जन्मों का चक्र पूरा होता है। फिर नया चक्र लगाना है। चक्र को तो जानना चाहिए ना। भल यह चित्र न हो तो भी तुम समझा सकते हो। यह तो बिल्कुल सहज बात है। बरोबर भारत स्वर्ग था, अब नर्क है। सिर्फ वह लोग समझते हैं कलियुग अजुन बच्चा है। तुम कहते हो - यह तो कलियुग का अन्त है। चक्र पूरा होता है। बाप समझाते हैं मैं आता हूँ पतित दुनिया को पावन बनाने। तुम जानते हो हमको पावन दुनिया में जाना है। तुम मुक्ति, जीवन मुक्तिधाम, शान्तिधाम, सुखधाम और दु:खधाम को भी समझते हो। परन्तु तकदीर में नहीं है तो फिर यह ख्याल नहीं करते कि क्यों न हम सुखधाम में जायें। बरोबर हम आत्माओं का घर वह शान्तिधाम है। वहाँ आत्मा को आरगन्स न होने कारण कुछ बोलती नहीं है। शान्ति वहाँ सबको मिलती है। सतयुग में है एक धर्म। यह अनादि, अविनाशी वर्ल्ड ड्रामा है जो चक्र लगाता ही रहता है। आत्मा कभी विनाश नहीं होती है। शान्तिधाम में भी थोड़ा समय ठहरना ही पड़े। यह बहुत समझ की बातें हैं। कलियुग है दु:खधाम। कितने अनेक धर्म हैं, कितना हंगामा है। जब बिल्कुल दु:खधाम होता है तब ही बाप आते हैं। दु:खधाम के बाद है फुल सुखधाम। शान्तिधाम से हम आते हैं सुख-धाम में, फिर दु:खधाम बनता है। सतयुग में सम्पूर्ण निर्विकारी, यहाँ हैं सम्पूर्ण विकारी। यह समझाना तो बहुत सहज है ना। हिम्मत चाहिए। कहाँ भी जाकर समझाओ। यह भी लिखा हुआ है - हनूमान सतसंग में पीछे जुत्तियों में जाकर बैठता था। तो महावीर जो होंगे वह कहाँ भी जाकर युक्ति से सुनेंगे, देखें क्या बोलते हैं। तुम ड्रेस बदलकर कहाँ भी जा सकते हो, उनका कल्याण करने। बाबा भी गुप्त वेष में तुम्हारा कल्याण कर रहे हैं ना। मन्दिरों में कहाँ भी निमंत्रण मिलता है तो जाकर समझाना है। दिन-प्रतिदिन तुम होशियार होते जाते हो। सबको बाप का परिचय तो देना ही है, ट्रायल करनी होती है। यह तो गाया हुआ है, पिछाड़ी में संन्यासी, राजायें आदि आये। राजा जनक को सेकेण्ड में जीवनमुक्ति मिली। वह फिर जाकर त्रेता में अनुजनक बना। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

30/01/2026
गीत:-तू प्यार का सागर है.....  ओम् शान्ति।रूहानी बाप बैठ रूहानी बच्चों को रोज़-रोज़ समझाते हैं कि बच्चे आत्म-अभिमानी होक...
23/01/2026

गीत:-

तू प्यार का सागर है.....

ओम् शान्ति।

रूहानी बाप बैठ रूहानी बच्चों को रोज़-रोज़ समझाते हैं कि बच्चे आत्म-अभिमानी होकर बैठो। ऐसे नहीं बुद्धि बाहर में भटकती रहे। एक बाप को ही याद करना है। वही ज्ञान का सागर है, प्रेम का सागर है। कहते हैं एक ज्ञान की बूँद भी बस है। बाप कहते हैं मीठे-मीठे बच्चे रूहानी बाप को याद करो तो तुमको यह वर्सा मिल जायेगा। अमरपुरी वैकुण्ठ में चले जायेंगे। बाकी इस समय जो सिर पर पापों का बोझ है वह उतारना है। कायदे प्रमाण, विवेक अनुसार तुम बच्चों को समझाया जाता है। जो ऊंच ते ऊंच थे वही फिर अन्त में नीचे तपस्या कर रहे हैं। राजयोग की तपस्या एक बाप ही सिखलाते हैं कहते हैं तुम विश्व के मालिक थे। यथा राजा रानी तथा प्रजा.. प्रवृत्ति मार्ग में पवित्र देवी-देवता थे फिर देवतायें वाम मार्ग में जाते हैं। बाप का ही गायन है तू प्यार का सागर है। अब प्यार की बूँद नहीं होती। यह है ज्ञान की बात सारी विश्व राइटियस बन जाती है। अ

तुम जानते हो अभी हमारे ऊपर बृहस्पति की दशा है, तब हम स्वर्ग में जाने का पुरूषार्थ कर रहे हैं।ो सच-सच स्वर्ग में जाने का पुरूषार्थ हम कर रहे हैं अथवा स्वर्ग का मालिक बनने का पुरूषार्थ कर रहे हैं। ऐसे कभी कोई नहीं कहेंगे कि यह स्वर्ग जा रहे हैं। कहेंगे यह क्या कहते हो, मुख बन्द करो। मनुष्य तो हद की बातें सुनाते हैं। बाप तुम्हें बेहद की बातें सुनाते हैं। तुम बच्चों को बहुत पुरूषार्थ करना चाहिए। बहुत नशा चढ़ना चाहिए। जिन्होंने कल्प पहले पुरूषार्थ किया, जो पद पाया है वही पायेंगे। अनेक बार तुम बच्चों को माया पर जीत पह फिर तुमने हार भी खाई है। यह भी ड्रामा बना हुआ तो बच्चों को बड़ी खुशी होनी चाहिए। मृत्युलोक से अमरलोक में जा रहे हो। स्टूडेन्ट लाइफ इज़ दी बेस्ट। इस समय तुम्हारी बेस्ट लाइफ है, इसे कोई भी मनुष्य नहीं जानते। भगवान खुद आकर पढ़ाते हैं, ये। तुम्हारे पास तो एम आब्जेक्ट है। यह सत्य नारायण की कथा, अमरकथा... यह सब तुम्हारी है
अभी तुम बच्चों पर बृहस्पति की दशा है। बच्चों को खुशी होनी चाहिए हम इतने साहूकार बनते हैं। कोई देवाला मारते हैं तो राहू की दशा कहा जाता है। तुम अपनी दशा पर हर्षित रहो। भगवान बाप हमको पढ़ाते हैं। भगवान किसको पढ़ाते हैं क्या? तुम बच्चे जानते हो हमारी यह स्टूडेन्ट लाइफ दी बेस बाबा कहते हैं जब फुर्सत मिले तो लक्ष्मी-नारायण के चित्र के सामने जाकर बैठो। रात को भी बैठ सकते हो। इन लक्ष्मी-नारायण को देखते-देखते सो जाओ। अहो बाबा हमें ऐसा बनाते हैं! तुम ऐसा अभ्यास करके देखो, कितना मजा आता है। फिर सुबह को उठकर अनुभव सुनाओ। लक्ष्मी-नारायण का चित्र और सीढ़ी का चित्र सबके पास होना चाहिए। स्टूडेन्ट जानते हैं, हमको कौन पढ़ाते हैं। उनका चित्र भी है। सारा मदार है पढ़ाई के ऊपर। स्वर्ग का मालिक तो बनेंगे। बाकी पद का मदार है पढ़ाई पर। बाबा कहते हैं यह पुरूषार्थ करो - मैं आत्मा हूँ शरीर नहीं। मैं बाबा से वर्सा लेता हूँ। कितनों का कल्याण किया है। कितनों को बाप का पैगाम दिया है। बाप भी पैगम्बर है और कोई को भी पैगम्बर नहीं कहेंगे। तुमको बाप मैसेज देते हैं जो तुम सबको सुनाओ। ब। अब हमको वापिस जाना है फिर वहाँ हम ही विश्व के मालिक होंगे। एक गीत भी है बाबा तुमसे हमको सारे विश्व की बादशाही मिलती है। सारा धरती, समुद्र, आकाश हमारे हाथ में होगा। माया बड़ी दुस्तर है। बच्चे तुम्हें इन विकारों पर जीत पानी है तब ही जगतजीत बनेंगे। माया भी कम नहीं है। अभी तुम पुरूषार्थ कर इन लक्ष्मी-नारायण जैसा बनते हो। इन जैसी ब्युटी और किसी की हो न सके। यह है नैचुरल ब्युटी।
ो। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

ओम् शान्ति। रूहानी बाप रूहानी बच्चों प्रति कहते हैं - मीठे-मीठे बच्चों, जैसे लौकिक बाप को बच्चे प्यारे लगते हैं वैसे बेह...
23/12/2025

ओम् शान्ति। रूहानी बाप रूहानी बच्चों प्रति कहते हैं - मीठे-मीठे बच्चों, जैसे लौकिक बाप को बच्चे प्यारे लगते हैं वैसे बेहद के बाप को भी बेहद के बच्चे प्यारे लगते हैं। बाप बच्चों को शिक्षा, सावधानी देते हैं कि बच्चे ऊंच पद पायें। यही बाप की चाहना होती है। तो बेहद के बाप की से श्रृंगारते हैं। तुमको दोनों बाप बहुत अच्छी रीति श्रृंगारते हैं कि बच्चे ऊंच पद पायें। अलौकिक बाप भी खुश होते हैं तो पारलौकिक बाप भी खुश होते हैं, जो अच्छी रीति पुरुषार्थ करते हैं, उन्हों को देखकर गाया भी जाता है फालो फादर। तो दोनों को फालो करना है। एक है रूहानी बाप, दूसरा फिर यह है अलौकिक फादर। तो पुरुषार्थ कर ऊंच पद पाना है।

तुम जब भट्ठी में थे तो सबका ताज सहित फोटो निकाला गया था। बाप ने तो समझाया है लाइट का ताज कोई होता नहीं। यह एक निशानी है पवित्रता की, जो सबको देते हैं। ऐसे नहीं कोई सफेद लाइट का ताज होता है। यह पवित्रता की निशानी समझाई जाती है। पहले-पहले तुम रहते हो सतयुग में। तुम ही थे ना। बाप भी कहते हैं, आत्मायें और परमात्मा अलग रहे बहुकाल...... तुम बच्चे ही पहले-पहले आते हो फिर पहले तुमको ही जाना है। मुक्तिधाम के गेट्स भी तुमको खोलने हैं। तुम बच्चों को बाप श्रृंगारते हैं। पियरघर में वनवाह में रहते हैं। इस समय तुमको भी साधारण रहना है। न ऊंच, न नीच। बाप भी कहते हैं साधारण तन में प्रवेश करता हूँ। कोई भी देहधारी को भगवान कह नहीं सकते। मनुष्य, मनुष्य की सद्गति कर नहीं सकते। सद्गति तो गुरू ही करते हैं। मनुष्य 60 वर्ष के बाद वानप्रस्थ लेते हैं फिर गुरू करते हैं। यह भी रस्म अभी की है जो फिर भक्तिमार्ग में चलती है। आजकल तो छोटे बच्चे को भी गुरू करा देते हैं। भल वानप्रस्थ अवस्था नहीं है परन्तु अचानक मौत तो आ जाता है ना इसलिए बच्चों को भी गुरू करा देते हैं। जैसे बाप कहते हैं तुम सभी आत्मायें हो, हक है वर्सा पाने का। वह कह देते हैं गुरू बिगर ठौर नहीं पायेंगे अर्थात् ब्रह्म में लीन नहीं होंगे। तुमको तो लीन नहीं होना है। यह भक्ति मार्ग के अक्षर हैं। आत्मा तो स्टार मिसल, बिन्दी है। बाप भी बिन्दी ही है। उस बिन्दी को ही ज्ञान सागर कहा जाता है। तुम भी छोटी आत्मा हो। उसमें सारा ज्ञान भरा जाता है। तुम फुल ज्ञान लेते हो। पास विद् ऑनर होते हैं ना। ऐसे नहीं कि शिवलिंग कोई बड़ा है। जितनी बड़ी आत्मा है, उतना ही परम आत्मा है। आत्मा परमधाम से आती है पार्ट बजाने। बाप कहते हैं मैं भी वहाँ से आता हूँ। परन्तु मुझे अपना शरीर नहीं है। मै रूप भी हूँ, बसन्त भी हूँ। परम आत्मा रूप है, उनमें सारा ज्ञान भरा हुआ है। ज्ञान की वर्षा बरसाते हैं तो सभी मनुष्य पाप आत्मा से पुण्य आत्मा बन जाते हैं। बाप गति सद्गति दोनों देते हैं। तुम सद्गति में जाते हो बाकी सब गति में अर्थात् अपने घर में जाते हैं। वह है स्वीट होम। आत्मा ही इन कानों द्वारा सुनती है। अब बाप कहते हैं मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों वापस जाना है, उसके लिए पवित्र जरूर बनना है। पवित्र बनने बिगर कोई भी वापिस जा न सके। मैं सबको ले जाने आया हूँ। ।। यहाँ समझाया जाता है इसमें आमदनी बहुत है। पवित्र रहने से 21 जन्मों की राजधानी मिलती है तो एक जन्म पवित्र रहना कोई बड़ी बात थोड़ेही है। बाप कहते हैं तुम काम चिता पर बैठ बिल्कुल ही काले बन गये हो। श्रीकृष्ण के लिए भी कहते हैं गोरा और सांवरा, श्याम सुन्दर। यह समझानी इस समय की है। काम चिता पर बैठने से सांवरे। इनके ही बहुत जन्मों के अन्त में बाप प्रवेश कर गोरा बनाते हैं। अभी तुमको एक बाप को ही याद करना हैĺप्रेरणा से कुछ भी मिलता नहीं है। बाप तो सम्मुख आकर तुम बच्चों को पढ़ाते हैं। यह पाठशाला है ना। बाप कहते हैं मैं तुमको राजाओं का राजा बनाता हूँ। यह राजयोग है। अभी तुम मूलवतन, सूक्ष्मवतन, स्थूलवतन को जान गये हो। इतनी छोटी आत्मा कैसे पार्ट बजाती है। है भी बना-बनाया। इनको कहा जाता है अनादि-अविनाशी वर्ल्ड ड्रामा। ड्रामा फिरता रहता है, इसमें संशय की कोई बात नहीं। बाप सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझाते हैं, तुम स्वदर्शन चक्रधारी हो। तुम्हारी बुद्धि में सारा चक्र फिरता रहता है। तो उससे तुम्हारे पाप कट जाते हैं। l


। फिर ऊंच ते ऊंच यह वर्सा लक्ष्मी-नारायण, इन जैसा ऊंच बनना है।यहाँ तो बाप कहते हैं आंसू आया तो फेल। अम्मा मरे तो हलुआ खाओ.... आजकल तो बाम्बे में भी कोई बीमार पड़ते वा मरते हैं तो बी.के. को बुलाते हैं कि आकर शान्ति दो। तुम समझाते हो आत्मा ने एक शरीर छोड़ दूसरा लिया, इसमें तुम्हारा क्या जाता। रोने से क्या फायदा। कहते हैं, इनको काल खा गया.. ऐसी कोई चीज़ है नहीं। यह तो आत्मा आपेही एक शरीर छोड़ जाती है। अपने समय पर शरीर छोड़ भागती है। बाकी काल कोई चीज़ नहीं है। सतयुग में गर्भ महल होता है, सज़ा की बात ही नहीं। वहाँ तुम्हारे कर्म अकर्म हो जाते हैं। माया ही नहीं जो विकर्म हो। तुम विकर्माजीत बनते हो। पहले-पहले विकर्माजीत संवत चलता है फिर भक्ति मार्ग शुरू होता है तो विक्रम संवत शुरू होता है। इस समय जो विकर्म किये हैं उन पर जीत पाते हो, नाम रखा जाता है विकर्माजीत। फिर द्वापर में विक्रम राजा हो जाता, विकर्म करते रहते हैं। सुई पर अगर कट चढ़ी हुई होगी तो चुम्बक खींचेगा नहीं। जितना पापों की कट उतरती जायेगी तो चुम्बक खीचेगा। बाप तो पूरा प्योर है। तुमको भी पवित्र बनाते हैं योगबल से। जैसे लौकिक बाप भी बच्चों को देख खुश होते हैं ना। बेहद का बाप भी खुश होता है बच्चों की सर्विस पर। बच्चे बहुत मेहनत भी कर रहे हैं। सर्विस पर तो हमेशा एवररेडी रहना है। तुम बच्चे हो पतितों को पावन बनाने वाले ईश्वरीय मिशन। अभी तुम ईश्वरीय सन्तान हो, बेहद का बाप है और तुम सब बहन-भाई हो। बस और कोई संबंध नहीं। मुक्तिधाम में है ही बाप और तुम आत्मायें भाई-भाई फिर तुम सतयुग में जाते हो तो वहाँ एक बच्चा, एक बच्ची बस, यहाँ तो बहुत संबंध होते हैं - चाचा, काका, मामा...आदि।

र विनाश होता है। अभी अनेक धर्म होने कारण कितना हंगामा है। तुम 100 परसेन्ट सालवेन्ट थे। फिर 84 जन्मों के बाद 100 परसेन्ट इनसालवेन्ट बन पड़े हो। अब बाप आकर सबको जगाते हैं। अब जागो, सतयुग आ रहा है। सत्य बाप ही तुमको 21 जन्मों का वर्सा देते हैं। भारत ही सचखण्ड बनता है। । वहाँ सदैव खुशी रहती है। वह है ही सुखधाम। इनको कहा जाता है पुरुषोत्तम संगमयुग। बाप कहते हैं इस पुरुषार्थ से तुम यह बनने वाले हो। तुम्हारे चित्र भी बनाये थे, बहुत आये फिर सुनन्ती, कथन्ती भागन्ती हो गये। बाप आकर तुम बच्चों को बहुत प्यार से समझाते हैं। बाप, टीचर प्यार करते हैं, गुरू भी प्यार करते हैं। सतगुरू का निंदक ठौर न पाये। तुम्हारी एम ऑब्जेक्ट सामने खड़ी है। उन गुरूओं के पास तो एम आब्जेक्ट कोई होती

वह कोई पढ़ाई नहीं है, यह तो पढ़ाई है। इनको कहा जाता है युनिवर्सिटी कम हॉस्पिटल, जिससे तुम एवरहेल्दी, वेल्दी बनते हो। सब जानते हैं प्राचीन सतयुग में इन्हों का ही राज्य था, उनके ऊपर कोई नहीं। डीटी राज्य को ही पैराडाइज कहा जाता है। अभी तुम जानते हो फिर औरों को बताना है। सबको कैसे पता पड़े जो फिर ऐसा कोई उल्हना न दे कि हमको पता नहीं पड़ा। तुम सबको बतलाते हो फिर भी बाप को छोड़कर चले जाते हैं। यह हिस्ट्री मस्ट रिपीट। बाबा के पास आते हैं तो बाबा पूछते हैं - आगे कभी मिले हो? कहते हैं हाँ बाबा 5 हज़ार वर्ष पहले हम मिलने आये थे। बेहद का वर्सा लेने आये थे, कोई आकर सुनते हैं, कोई को साक्षात्कार होता है ब्रह्मा का तो वह याद आता है। फिर कहते हैं हमने तो यही रूप देखा था। बाप भी बच्चों को देख खुश होते हैं। तुम्हारी अविनाशी ज्ञान रत्नों से झोली भरती है ना। यह पढ़ाई है। 7 दिन का कोर्स लेकर फिर भल कहाँ भी रह मुरली के आधार पर चल सकते हैं, 7 दिन में इतना समझायेंगे जो फिर मुरली को समझ सकेंगे। बाप तो बच्चों को सब राज़ अच्छी रीति समझाते रहते हैं। अच्छा!

का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।धारणा के लिए मुख्य सार:-1) स्वदर्शन चक्र फिराते पापों...
23/12/2025

का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) स्वदर्शन चक्र फिराते पापों को भस्म करना है, रूहानी पढ़ाई से अपना पद श्रेष्ठ बनाना है। किसी भी परिस्थिति में आंसू नहीं बहाने हैं।

2) यह वानप्रस्थ अवस्था में रहने का समय है, इसलिए वनवाह में बहुत साधारण रहना है। न बहुत ऊंच, न बहुत नीच। वापस जाने के लिए आत्मा को सम्पूर्ण पावन बनाना है।

18-12-2025 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा" उत्तर:-जो बच्चे सर्विस के लिए एवररेडी रहते हैं, अलौकिक और पारलौकिक दोनों बाप क...
23/12/2025

18-12-2025 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"


उत्तर:-जो बच्चे सर्विस के लिए एवररेडी रहते हैं, अलौकिक और पारलौकिक दोनों बाप को पूरा फालो करते हैं, ज्ञान-योग से आत्मा को श्रृंगारते हैं, पतितोंको पावन बनाने की सेवा करते हैं, ऐसे बच्चों को देख बेहद के बाप को बहुत खुशी होती है। बाप की चाहना हैं मेरे बच्चे मेहनत कर ķj पद पायें।

18-12-2025 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन“मीठे बच्चे - बेहद का बाबा आया है तुम बच्चों का ज्ञान से श्रृंगार करने, ...
23/12/2025

18-12-2025 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन
“मीठे बच्चे - बेहद का बाबा आया है तुम बच्चों का ज्ञान से श्रृंगार करने, ऊंच पद पाना है तो सदा श्रृंगारे हुए रहो''

ओम शांति17.12.2022             ★【परमात्म शिक्षाएं】★1) शिवबाबा कहता है कि,*बाहर की चीजों को मत ठीक करने की कोशिश करो, अपन...
18/12/2025

ओम शांति
17.12.2022

★【परमात्म शिक्षाएं】★

1)
शिवबाबा कहता है कि,
*बाहर की चीजों को मत ठीक करने की कोशिश करो, अपने अंदर को ठीक कर लो।* आप अपने अंदर को देखते रहो, बाहर मुझे समर्पण कर दो।

सारी दुनिया बाहर की चीजों पर ही तो चल रही है, वह सब बाहर का ठीक करना चाह रही हैं....पर उससे क्या हुआ? ठीक हो गया?
और अब भगवान किसलिए आया है...? आपके अंदर को ही तो ठीक करने आया है।

तो बस खाली अंदर ही देखते रहो अपने ... अपने संकल्पों को check करो कि;
वह शांत हैं?
वह तो कहीं ऊपर-नीचे नहीं हो रहे?
उनके अंदर तो शुभ भावना है ना पूरी?
वह person to person change तो नहीं हो रही?
सब कुछ stable है ना मेरे अंदर?
मैं भीतर से जागा हुआ हूँ ना?

बस मुझे तो अपने मन की स्थिति का ध्यान रखना है, कि मेरी भाव-भावना शुभ रहे और हल्की रहे...।

2)
नष्टोमोहा का मतलब ही है प्रेम स्वरूप। जब तुम प्रेम स्वरूप बन जाओगे, तो तुम्हारा मोह नष्ट होता है। और इसके लिए कुछ भी होता है तो छोड़ना ही तो है और करना ही क्या है...!

**छोड़ना अर्थात, अपना हर संकल्प मन-बुद्धि से परमात्मा पिता को सौंप देना, समर्पण कर देना।

3)
हमने तन को स्वच्छ रखा, शुद्ध भोजन दिया, जो कि बहुत अच्छी बात है ... परन्तु क्या अपने मन को भी स्वच्छ रखा, शुद्ध आहार दिया...? एक शुद्ध मन हमेशा बेफिक्र और निश्चिन्त होता है। यदि मन में डर (भय) है, चिन्ता है, तो यह शुद्ध भोजन नहीं हुआ ... मतलब मन में अशुद्धि है।

4)
सिर्फ ज्ञान की points, repeat करना, सुनना वा सुनाना ही स्व-चिन्तन नहीं है। लेकिन स्व-चिन्तन अर्थात् अपनी सूक्ष्म कमज़ोरियों को, अपनी छोटी-छोटी गलतियों को चिन्तन करके मिटाना, परिवर्तन करना - यही है स्व-चिन्तक बनना।

ज्ञान का मनन तो सभी बहुत अच्छा करते हैं, लेकिन ज्ञान को स्वयं के प्रति यूज़ कर धारणा स्वरूप बनना, स्वयं को परिवर्तन करना - इसकी ही marks, final result में मिलती हैं।

5)
Consciousness का high होना अर्थात हद से बेहद में जाना। तो जितनी हमारी consciousness बेहद में जाती है, उतना ही स्थूल (दुनियावी) जो बातें हैं, वो ज़्यादा ठहरती नहीं हैं हमारे अंदर। क्योंकि हद के consciousness में हद की बातें ठहर जाती हैं ... और जब बेहद की consciousness हो जाती है हमारी, तो स्थूल अर्थात दुनियावी कोई भी बात या फिर परिस्थिति का हम पर प्रभाव नहीं पड़ता।

प्रश्नः-डबल अहिंसक बनने वाले बच्चों को कौन सा ध्यान रखना है?उत्तर:-1. ध्यान रखना है कि ऐसी कोई वाचा मुख से न निकले जिससे...
17/12/2025

प्रश्नः-डबल अहिंसक बनने वाले बच्चों को कौन सा ध्यान रखना है?
उत्तर:-1. ध्यान रखना है कि ऐसी कोई वाचा मुख से न निकले जिससे किसी को भी दु:ख हो क्योंकि वाचा से दु:ख देना भी हिंसा है। 2. हम देवता बनने वाले हैं, इसलिए चलन बहुत रॉयल हो। खान-पान न बहुत ऊंचा, न नीचा हो।
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