30/07/2023
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COACHINGS , COMPUTERS & ENGLISH SPEAKING INSTITUTE JUST provides speaking , computers & coaching classes from 1st to B.A. , B.Com. & B.Sc. in Kanpur
30/07/2023
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आओ कुछ पल के लिए स्कूल चलें --
*कुछ भुली बिसरी यादें -*
बचपन में स्कूल के दिनों में क्लास के दौरान शिक्षक द्वारा पेन मांगते ही हम बच्चों के बीच रौकेट गति से गिरते पड़ते सबसे पहले उनकी टेबल तक पहुंच कर पेन देने की अघोषित प्रतियोगिता होती थी.... 😀
जब कभी मैम किसी बच्चे को क्लास में कापी वितरण में अपनी मदद करने पास बुला ले,
तो टीचर की सहायता करने वाला बच्चा अकड़ के साथ "अजीमो शाह शहंशाह" बना क्लास में घूम-घूम कर कापियां बांटता और बाकी के बच्चे मुंह उतारे गरीब प्रजा की तरह अपनी बेंच से ना हिलने की बाध्यता लिए बैठे रहते। शिक्षक की उपस्थिति में क्लास के भीतर चहल कदमी की अनुमति कामयाबी की तरफ पहला कदम माना जाता था.... 😀
उस मासूम सी उम्र में उपलब्धियों के मायने कितने अलग होते थे
A) शिक्षक ने क्लास में सभी बच्चों के बीच अगर हमें हमारे नाम से पुकार लिया .....
शिक्षक ने अपना रजिस्टर स्टाफ रूम में रखकर आने बोल दिया तो समझो कैबिनेट मिनिस्टरी में चयन का गर्व होता था..... 😀
आज भी याद है जब बहुत छोटे थे तब बाज़ार या किसी समारोह में हमारे शिक्षक दिख जाए तो भीड़ की आड़ ले छिप जाते थे।
जाने क्यों,
किसी भी सार्वजनिक जगह पर टीचर को देख हम छिप जाते थे..... 😎
कैसे भूल सकते है, अपने उन गणित के टीचर को जिनके खौफ से 13, 17 और 19 का पहाड़ा याद कर पाए थे😎
कैसे भूल सकते है उन हिंदी के शिक्षक को जिनके आवेदन पत्रों से ये गूढ़ ज्ञान मिला कि बुखार नहीं ज्वर पीड़ित होने के साथ विनम्र निवेदन कहने के बाद ही तीन दिन का अवकाश मिल सकता था.... 😎
वो शिक्षक तो आपको भी बहुत अच्छे से याद होंगे जिन्होंने आपकी क्लास को स्कूल की सबसे शैतान क्लास की उपाधि से नवाज़ा था.... 😀
उन शिक्षक को तो कतई नहीं भुलाया जा सकता जो होमवर्क कॉपी भूलने पर ये कहकर कि ... "कभी खाना खाना भूलते हो❓😎” ... बेइज़्ज़त करने वाले तकियाकलाम से हमें शर्मिंदा करते थे....
शिक्षक के महज़ इतना कहते ही कि "एक कोरा पेज़ देना" पूरी कक्षा में फड़फड़ाते 50 पन्ने फट जाते थे... 😀:::
शिक्षक के टेबल के पास खड़े रहकर कॉपी चेक कराने के बदले यदि सौ दफा सूली पर लटकना पड़े तो वो ज्यादा आसान लगता था.... 😎
क्लास में शिक्षक के प्रश्न पूछने पर उत्तर याद न आने पर कुछ लड़के/ लडकियों के हाव भाव ऐसे होते थे कि उत्तर तो जुबान पर रखा है बस जरा सा छोर हाथ नहीं आ रहा😀 ये ड्रामेबाज छात्र उत्तर की तलाश में कभी छत ताकते, कभी आँखे तरेरते, कभी हाथ झटकते। देर तक आडम्बर झेलते-झेलते आखिर शिक्षक के सब्र का बांध टूट जाता -- you, yes you, get out from my class ....😎
सुबह की प्रार्थना में जब हम दौड़ते भागते देर से पहुंचते तो हमारे शिक्षकों को रत्तीभर भी अंदाजा न होता था कि हम शातिर छात्रों का ध्यान प्रार्थना में कम और आज के सौभाग्य से कौन-कौन सी शिक्षक अनुपस्थित है, के मुआयने में ज्यादा रहता था.... 😀
आपको भी वो शिक्षक याद है ना, जिन्होंने ज्यादा बात करने वाले दोस्तों की जगह बदल उनकी दोस्ती कमजोर करने की साजिश की थी....
मैं आज भी दावा कर सकता हूं
कि एक या दो शिक्षक शर्तिया ऐसे होते है जिनके शिर के पीछे की तरफ़ अदृश्य नेत्र का वरदान मिलता है,
ये शिक्षक ब्लैक बोर्ड में लिखने में व्यस्त रहकर भी चीते की फुर्ती से पलटकर कौन बात कर रहा है का सटीक अंदाज़ लगाते थे😀
वो शिक्षक याद आये या नहीं जो चाक का उपयोग लिखने में कम और बात करते बच्चों पर भाला फेंक शैली में ज्यादा लाते थे 😀
हर क्लास में एक ना एक बच्चा होता ही था, जिसे अपनी बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन करने में विशेष महारत होती थी और ये प्रश्नपत्र थामे एक अदा से खड़े होते थे... मैम, आई हैव आ डाउट इन क्वैशच्यन नम्बर 11 ....हमें डेफिनेशन के साथ उदाहरण भी देना है क्या❓उस इंटेलिजेंट की शक्ल देख खून खौलता😎
परीक्षा के बाद जांची हुई कापियों का बंडल थामे कॉपी बांटने क्लास की तरफ आते शिक्षक साक्षात सुनामी लगते थे.... 😎
ये वो दिन थे, जब कागज़ के एक पन्ने को छूकर खाई 'विद्या कसम' के साथ बोली गयी बात, संसार का अकाट्य सत्य, हुआ करता था😀
मेरे लिए आज तक एक रहस्य अनसुलझा ही है कि खेल के पीरियड का 40 मिनिट छोटा और इतिहास का पीरियड वही 40 मिनिट लम्बा कैसे हो जाता था❓😎
सामने की सीट पर बैठने के नुकसान थे तो कुछ फायदे भी थे। मसलन चाक खत्म हुई तो मैम के इतना कहते ही कि "कोई भी जाओ बाजू वाली क्लास से चाक ले आना" सामने की सीट में बैठा बच्चा लपक कर क्लास के बाहर, दूसरी क्लास में " मे आई कम इन" कह सिंघम एंट्री करते.... 😀
"सरप्राइज़ चेकिंग" पर हम पर कापियां जमा करने की बिजली भी गिरती थी, सभी बच्चों को चेकिंग के लिए कॉपी टेबल पर ले जाकर रखना अनिवार्य होता था। टेबल पर रखे जा रहे कॉपियों के ऊंचे ढेर में अपनी कॉपी सबसे नीचे दबा आने पर तूफ़ान को जरा देर के लिए टाल आने की तसल्ली मिलती थी😀
वो निर्दयी शिक्षक जो पीरियड खत्म होने के बाद का भी पांच मिनिट पढ़ाकर हमारे लंच ब्रेक को छोटा कर देते थे। चंद होशियार बच्चे हर क्लास में होते हैं जो मैम के क्लास में घुसते ही याद दिलाने का सेक्रेटरी वाला काम करते थे "मैम कल आपने होमवर्क दिया था।" जी में आता था इस आस्तीन की औलाद को डंडों से धुन के धर दो😎
तमाम शरारतों के बावजूद ये बात सौ आने सही है कि बरसों बाद उन शिक्षक के प्रति स्नेह और सम्मान बढ़ जाता है, अब वो किसी मोड़ पर अचानक मिल जाएं तो बचपन की तरह अब हम छिपेंगे तो कतई नहीं.. 😀
आज भी जब मैं अपने विद्यालय या महाविद्यालय की बिल्डिंग के सामने से गुजरता
हूं तो लगता है कि एक दिन था जब ये बिल्डिंग मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा थी। अब उस बिल्डिंग में न मेरे दोस्त हैं, न हमको पढ़ाने वाले वो शिक्षक। बच्चों को लेट एंट्री से रोकने गेट बंद करते स्टाफ भी नहीं दिखते जिन्हें देखते ही हम दूर से चिल्लाते थे “गेट बंद मत करो भैय्या प्लीज़” वो बूढ़े से बाबा भी नहीं हैं जो मैम से हस्ताक्षर लेने class मे आते थे ....
वो दिन तो नही है अब
लेकिन दोस्तों
वो दिन याद बहुत आते है
जिसने भी लिखा कमाल का लिखा---- पांचवीं तक स्लेट की बत्ती को जीभ से चाटकर कैल्शियम की कमी पूरी करना हमारी स्थाई आदत थी लेकिन इसमें पापबोध भी था कि कहीं विद्यामाता नाराज न हो जायें ।
*पढ़ाई का तनाव हमने पेन्सिल का पिछला हिस्सा चबाकर मिटाया था ।*
"पुस्तक के बीच *पौधे की पत्ती* *और मोरपंख रखने* से हम होशियार हो जाएंगे ऐसा हमारा दृढ विश्वास था"।
कपड़े के थैले में किताब कॉपियां जमाने का विन्यास हमारा रचनात्मक कौशल था ।
*हर साल जब नई कक्षा के बस्ते बंधते तब कॉपी किताबों पर जिल्द चढ़ाना हमारे जीवन का वार्षिक उत्सव था ।*
*माता पिता को हमारी पढ़ाई की कोई फ़िक्र नहीं थी , न हमारी पढ़ाई उनकी जेब पर बोझा थी* ।
सालों साल बीत जाते पर माता पिता के कदम हमारे स्कूल में न पड़ते थे ।
*एक दोस्त को साईकिल के डंडे पर और दूसरे को पीछे कैरियर पर बिठा* हमने कितने रास्ते नापें हैं , यह अब याद नहीं बस कुछ धुंधली सी स्मृतियां हैं ।
*स्कूल में पिटते हुए और मुर्गा बनते हमारा ईगो हमें कभी परेशान नहीं करता था , दरअसल हम जानते ही नही थे कि ईगो होता क्या है ?*
पिटाई हमारे दैनिक जीवन की सहज सामान्य प्रक्रिया थी ,
"पीटने वाला और पिटने
वाला दोनो खुश थे" ,
पिटने वाला इसलिए कि कम पिटे , पीटने वाला इसलिए खुश कि हाथ साफ़ हुवा।
*हम अपने माता पिता को कभी नहीं बता पाए कि हम उन्हें कितना प्यार करते हैं,क्योंकि हमें "आई लव यू" कहना नहीं आता था* ।
आज हम गिरते - सम्भलते , संघर्ष करते दुनियां का हिस्सा बन चुके हैं , कुछ मंजिल पा गये हैं तो कुछ न जाने कहां खो गए हैं ।
*हम दुनिया में कहीं भी हों लेकिन यह सच है , हमे हकीकतों ने पाला है , हम सच की दुनियां में थे ।*
कपड़ों को सिलवटों से बचाए रखना और रिश्तों को औपचारिकता से बनाए रखना हमें कभी नहीं आया इस मामले में हम सदा मूर्ख ही रहे ।
अपना अपना प्रारब्ध झेलते हुए हम आज भी ख्वाब बुन रहे हैं , शायद ख्वाब बुनना ही हमें जिन्दा रखे है, वरना जो जीवन हम जीकर आये हैं उसके सामने यह वर्तमान कुछ भी नहीं ।
*हम अच्छे थे या बुरे थे पर हम एक साथ थे, काश वो समय फिर लौट आए ।*
*"एक बार फिर अपने बचपन के पन्नो को पलटिये, सच में फिर से जी उठेंगे”...*
24/06/2020
24/11/2019
Try to raed ...😉
एक दिलचस्प गणित ।
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जीवन का एक सुन्दर गणीत इसे देखें, समझें और इसपर चिंतन करें ।
यदीA, B, C, D, E, F, G, H, I, J, K, L, M, N, O, P, Q, R, S, T, U, V, W, X, Y, Z = 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18, 19, 20, 21, 22, 23, 24, 25, 26
यानी A to Z का मान यदी इस प्रकार लें जहां :
A=1, B=2, C=3, D=4, E=5, F=6, G=7, H=8, I=9, J=10, K=11, L=12, M=13, N=14, O=15, P=16, Q=17, R=18, S=19, T=20, U=21, V=22, W=23, X=24, Y=25, Z=26
तो .......
Hard Work:
H+A+R+D+W+O+R+K= 8+1+18+4+23+15+18+11=98%
Knowledge:
K+N+O+W+L+E+D++E=
11+14+15+23+12+5+4+7+5=96%
Luck:
L+U+C+K=
12+21+3+11=47%
यानी इनमें से कोई भी 100% स्कोर नही कर सकता, तो फिर वह क्या है जो 100% कर सकता है ?????
Money?? जी नही, यह, 72% है
Leadership?? जी नही, यह भी सीर्फ 97% ही है ।
तब ??
सभी समस्याओं समाधान करना संभव है, यदी हमारा एक परफेक्ट ATTITUDE या दृष्टिकोण हो ।
जी हां, सीर्फ हमारा ATTITUDE ही हमारे जीवण को कर सकता है 100% सफल ...........
A+T+T+I+T+U+D+E=
1+20+20+9+20+21+4+5=100
#अतः_दृष्टिकोण_बदलें_जीवन_बदल_जायगा।
22/06/2019
JUST english ...
कृपया फिर से सोचियेगा जरुर
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सीबीएसई बोर्ड की बारहवीं की परीक्षा का रिजल्ट आया है। 2 बच्चों ने 500 में से 499 अंक हासिल किये हैं। बच्चे बधाई के पात्र हैं। मौजूदा शिक्षा व्यवस्था रुलाई की पात्र है। पेपर सेट करने वाले दुहाई के पात्र हैं और कॉपियाँ जाँचने वाले कुटाई के पात्र हैं।
जिस बोर्ड के अंतर्गत पढ़ रहे बच्चे 500 में से 499 अंक ले आएं उस बोर्ड के मेम्बरान को साइकिल के नीचे कूद कर जान दे देनी चाहिए। जिस पेपर में बच्चों के 100 में से 100 अंक आएँ, उसकी पेपर सेटर समिति के हर सदस्य को मुँह खोलकर अंदर थोड़ा थोड़ा काला हिट स्प्रे करना चाहिए। चुल्लू भर पानी भी इनके लिए ज्यादा होगा। ये अंक बच्चों की प्रतिभा की निशानी कतई नहीं हैं, ये एक पूरी शिक्षा व्यवस्था की दिमागी रूप से दिवालिया हो जाने की निशानी है। और कॉपी जांचने वाले महानुभावों के कहने ही क्या? ये अंक-कुबेर जन्म नहीं अवतार लेते हैं।
हिंदी के प्रश्नपत्र में 4 काव्यांशों के काव्य सौन्दर्य पूछे गए थे। इन चार कवियों की तस्वीरों पर फिर से हार चढ़ा देना चाहिए और उनकी रचनाओं को सिलेबस से निकालकर बाहर कर देना चाहिए, कि भैया आपकी रचना की अंतिम समीक्षा आ चुकी है और उसके 10 में से 10 नंबर देकर अन्यतम होने की पुष्टि की जा चुकी है। आपकी रचना की ओवरहालिंग हो चुकी है, उससे नए विचार उठने की कोई संभावना अब बची नहीं है। आचार्य महोदय के बैठने के लिए नामवर सिंह जी की कुर्सी लाई जानी चाहिए। अंग्रेजी पेपर में एक लेटर टू द एडिटर लिखना था जिसमें महिलाओं की समसामयिक समस्याएँ और उसके सुधार पर अपने विचार लिखने थे। महिला आयोग की अध्यक्ष को अपनी कुर्सी तुरंत उन अध्यापिका महोदया के लिए छोड़ देनी चाहिए जिन्होंने पूरे अंक देकर ये पुष्टि कर दी कि महिलाओं की सभी समस्याएं समझी जा चुकी हैं और उनकी स्थिति सुधार के अंतिम तरीके आ चुके हैं । साइंस/ मैथ में सैकड़ा मारने वाले छात्रों के दल को उनके शिक्षक महोदय और कापी जाँचने वाले दानवीर कर्ण के नेतृत्व में PISA *(प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट असेसमेंट-अंतर्राष्ट्रीय छात्र मूल्यांकन कार्यक्रम)* में भेज देना चाहिए, जहाँ से आखिरी भारतीय दस्ता 2009 में भाग आया था और वापस तबसे गया ही नहीं । *तब भारत के ये शतकवीर पूरे विश्व में नीचे से दूसरे स्थान पे आए थे* । पर दोष इन मासूमों का नहीं है, दोष इन कमबुद्धि अध्यापकों, रट्टोत्पादी आकलन व्यवस्था का है ।
इसी आकलन व्यवस्था से निकले रट्टूबसंत कोचिंगो की लिफ्ट से आइआइटी/एम्स के माले पे जाएंगे। फिर सफलता की लिफ्ट चढ़कर मल्टीनेशनल कंपनियों में जाएंगे, और फिर विश्व की मल्टीनेशनल कंपनियां कहेंगी कि भारतीय छात्रों की एम्प्लोयाबिलिटी ही नहीं है। हमें इनकी फिर से ट्रेनिंग करानी पड़ती है। अरे कैसे एम्प्लोयाबिलिटी नहीं है मियाँ? मंटूआ के प्रैक्टिकल में 30 में 30 नंबर आये थे इंटर में। गज़बे बात करते हैं आप भी। और *जब एप्पल का कोफाउंडर कह देता है कि ‘भारत के छात्रों में रचनात्मकता नहीं है’ तो आप फनफना जाते हैं ।* आपका फनफनाना जायज है। कोई आपके गुल्लुओं को ऐसा कैसे कह सकता है? तो आप मग्गूदाई भारतीय शिक्षा व्यवस्था के दिए इन शतकधारी अण्डों को सेइये, दुलराइये, इनके साथ फोटो खिंचाईये। उनकी मार्कशीट को व्हाट्सएप्प का स्टेटस बनाइये । असल जीवनसंग्राम में ये कितना उपयोगी होंगे, ये सोचने का विषय है ।
सुना है 499 वाली एक बिटिया परेशान है कि उसका 1 नंबर इसलिए कम रह गया क्यूँकि वो सोशल मीडिया पर अपना समय देती थी। उसे पूरी तरह से एंटीसोशल ना बन पाने का दुःख है। मुझे उससे सहानुभूति है। उसके रिश्तेदारों को उसे तुरंत एक आइसक्रीम देनी चाहिए और सर पर हाथ फेरते हुए कहना चाहिए, “बेटा सब ठीक हो जायेगा”। अंततः एक बार फिर से 12th के परिणामों की बहुत बहुत बधाई। मैं इन शतकवीरों पर गुलाब की पंखुड़ियाँ और सीबीएसई पर बाकी का गमला फेंकना चाहता हूँ।
वैसे भैया थोड़ी सी कसर रह गयी बोर्ड से भी कि एक नम्बर कम रह गया ।
उम्मीद तो थी कि 500 में से 501आने का, पर किया ही क्या जा सकता है!
हमारे समय में बिहार बोर्ड में हिंदी में कभी किसी के 80 से ज्यादा नंबर कभी आए हुए ही नहीं है चाहे वो बंदा किताब ही साथ लेके क्यों ना बैठ जाए। इन बहिनजीयों से किसी पद्य की ढंग से व्याख्या भी करा दी जाए तो हमारे समय के मास्साब आधे नंबर भी मुश्किल से दें।
भारतीय शिक्षा व्यवस्था भारत के भविष्य को गर्त की ओर ले जा रही है और इसमें सबसे बड़ा रोल ये मूल्यांकन करनेवाले निभायेंगे। सब नम्बर के पीछे दौड़े जा रहे हैं। पैरेंट्स लहालोट हो रहे हैं। ये 499/500 के नाम पर लोगो को उस बाजारवाद के उस रेस में खड़ा करना है जहाँ ये मार्क्स ही सब कुछ है बाकी दुनिया बेकार ।
बड़ी खतरनाक स्थिति बनती आ रही है
एक ओर cbse जो ये कांड करती आ रही है कुछ वर्षों से और दूसरी ओर एसएससी और रेलवे जैसे चयन आयोग जो normalization जैसे फार्मूला का प्रयोग करके बच्चों को उल्लू बना रही है.... यहाँ 200 में 210 नम्बर भी आते हैं। अब ये 210 नम्बर किनके आते हैं जो दिन रात मेहनत कर रहे होते हैं या जो 10 लाख में नौकरी हथिया लेते हैं। सवाल पूछिये तो बताते हैं सभी चीजें confidential है।
किस ओर जा रही है शिक्षा व्यवस्था ...
मूल्यांकन के नाम पर ये भविष्य के साथ अन्याय है ,,
एक बच्चे ने एक दिन एक पेपर देकर कहा मुझे केवल यही बता दिजीये... classteacher ने दिया है Exam में यही आयेंगे... उस पेपर मे 15 Q. थे जब बाद मे paper आया तो पता चला वही 12 Q. उस Exam paper में थे । यही स्थिति आज रांची के सब औटोनॉमस कॉलेजों की भी है ।
मुझे कोई टॉपर न समाज़सेवा करते हुए दिखा ....न ही कुछ आविष्कार करते हुए औऱ न ही एक जिंदादिल इंसान के रूप में ...ये सब कोई बड़ी सी कारपोरेट नौकरी पाएंगे औऱ भोग विलास में लिप्त हो जाएंगे ....
अधिकतर तो टॉपर रहने के अहं में ही दुनिया से विरक्त हो जाते हैं .....
हमसब अभिभावक भी मार्क्स के चकाचौंध से गदगद होकर अपने बच्चों को नम्बर रेस का घोड़ा बनाकर उनको ऐड़ लगाने में ही व्यस्त हैं।
कभी भी "मार्क्स की हाय हाय" से फुर्सत मिले तो काबिलियत पर भी सोचिएगा जरा, ये जीवन और जेब दोनो के लिये हितकारी होगा ...
Try to give practical education...
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