किसी से शिकायत नहीं... और सबसे है
नहीं जानता कि ....ये मर्ज मुझे कबसे है
गिरगिटों को गले लगाता रहा ............
शिकवा तुझसे नहीं है साथी.. पर रब से है।
Prayash - Kavy Sangrah
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करता रहूंगा ख्याल तेरा सारी रात भर।
उम्मीद है कि तुम भी मुझे याद करोग़े।
स्वलिखित
डरता नहीं हूँ मै किसी भी सवाल से
रहता हूँ चुप मै फिर भी अनर्गल बवाल से
राजीव सच रहेगा जीवन का फलसफा
निकलोगे सर उठाकर हर झूठे जाल से।
दुनिया धोखा देगी बाबा तुम दोगे मेरा साथ
दोनों हाथ संभालो प्रभु जी पकड़ लो मेरा हाथ
(स्वलिखित.... राजीव मिश्रा)
मिर्ची मुक्तक 01 (स्वलिखित)
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हम तुम्हारे ...जितने नीच ....नहीं है
जिसमें तुम खिल सको वो कीच नहीं है
बेशक तुम झूठ का पुलिंदा हो लेकिन
सच हार जाय ऐसी हम चीज नहीं है।
जानते हो.. बेईमान हो.. अकड़े हुए हो
झूठ की ही राह..... फिर पकड़े हुए हो
सोचो तुम भी पेड़ हो फलदार फिर भी
सच को अपने पाप से जकड़े हुए हो।
नफ़रते तुम ही करो ये ही तो है जागीर तेरी
स्वार्थ में डूबे हुए हो क्यों सुनोगे बात मेरी।
जलने वाले
अपने हो तो
उजाला
और ज्यादा होता है
बेइज्जती का
क्योंकि वे
कोई मौका नहीं
छोड़ते..आपको
सामाजिक रूप से
नीचा दिखाने का
....
किसी अपने के
कंधे पर
बंदूक चलाने का..
सह लो
क्योंकि शकुनि
की परिणति
तो तुमने ही नहीं
दुनिया ने सुनी है
...
रामलीला पर्व पर मां सीता के चरणों में एक स्वलिखित रचना
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अब फिर तुम्हें मिलेंगी गालियां
होगी बेज्जती, मिलेगा देश निकाला
सीता तुम्हें फिर से तैयार रहना होगा
किसी धोबी के लांछन को सहने के लिए
देनी होगी बार-बार अग्नि परीक्षा
क्योंकि यहां झूठ का बोलबाला है
और सच का मुह काला है
असत्य आसानी से जीत जाता है
और सत्य अपनी अस्मत के लिए
पूरा जीवन गुजार देता है
पर हे मा, हे सत्य स्वरूपा सीता
तुम्हें न तो कभी अपने सत्य को साबित करने की आवश्यकता थी, न है, न पड़ेगी
बल्कि जब भी कोई हारेगा
परेशान हो रहा होगा
तब तुम्हें ही ध्यान करके अपनी प्रेरणा बनाएगा
और अपना मार्ग प्रशस्त करेगा।
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