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Home Science Quick Revesion Notes for Competitive Entrance Exams

16/09/2024

बचपन से लेकर वयस्कता तक, विकास के विभिन्न चरण मानव विकास में महत्वपूर्ण मील के पत्थर हैं। इस Shorts वीडियो में, हम आपको इन चरणों का त्वरित और आसान विवरण देते हैं, जिससे आपको यह समझने में मदद मिलती है कि हम जीवन भर शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से कैसे प्रगति करते हैं। चाहे आप छात्र हों, शिक्षक हों या बस जिज्ञासु हों, यह वीडियो 60 सेकंड से कम समय में मानव विकास पर आवश्यक जानकारी प्रदान करता है! आज कुछ नया और मूल्यवान सीखने के लिए अभी देखें!

31/08/2023

विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं में प्रोटीन और अमीनो एसिड के कार्यों के क्विक रिवीजन नोट्स। प्रतियोगी परीक्षाओं पूछे जाने वाले प्रश्नों के आसान और महत्त्वपूर्ण बिंदु जिन्हें रटना नहीं सिर्फ पढ़ना काफी है।

प्रोटीन मानव शरीर में आवश्यक मैक्रोमोलेक्यूल्स हैं जो अमीनो एसिड से बने होते हैं। वे विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जैसे एंजाइम के रूप में कार्य करना, अणुओं का परिवहन करना, कोशिका संरचना का समर्थन करना और प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं में सहायता करना।

पहले पढ़ें - प्रोटीन की रासायनिक संरचना, गुण ,वर्गीकरण

प्रोटीन और अमीनो एसिड का आवश्यक कार्य

प्रोटीन
के कार्य

प्रोटीन
के शरीर में आवश्यक कार्यों की एक विस्तृत श्रृंखला होती है, जिनमें शामिल हैं:

1. एंजाइम:-

प्रोटीन उत्प्रेरक के रूप में कार्य करते हैं, शरीर में रासायनिक
प्रतिक्रियाओं को तेज करते हैं, जो पाचन, चयापचय और डीएनए प्रतिकृति जैसी
प्रक्रियाओं के लिए आवश्यक हैं।

2. संरचनात्मक समर्थन:-

कोलेजन जैसे प्रोटीन त्वचा, टेंडन और हड्डियों सहित ऊतकों
को ताकत और संरचना प्रदान करते हैं।

3. परिवहन:-

हीमोग्लोबिन जैसे प्रोटीन रक्तप्रवाह के माध्यम से ऑक्सीजन और अन्य
अणुओं को ले जाते हैं।

4. हार्मोन:-

कुछ प्रोटीन रासायनिक दूत के रूप में काम करते हैं, जो वृद्धि, विकास
और चयापचय जैसी विभिन्न शारीरिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं।

5. प्रतिरक्षा प्रणाली:-

एंटीबॉडीज़ प्रोटीन होते हैं जो रोगजनकों को पहचानकर और
उन्हें निष्क्रिय करके उनसे बचाव में मदद करते हैं।

6. मांसपेशियों में संकुचन:-

प्रोटीन एक्टिन और मायोसिन मांसपेशियों की गति और
संकुचन के लिए आवश्यक हैं।

7. सेलुलर सिग्नलिंग:-

प्रोटीन कोशिकाओं के भीतर सिग्नल रिले करते हैं, बाहरी
संकेतों के प्रति प्रतिक्रियाओं का समन्वय करते हैं।

8. द्रव संतुलन:-

प्रोटीन रक्त वाहिकाओं और ऊतकों के बीच तरल पदार्थ के संतुलन को
विनियमित करने में मदद करते हैं।

9. ऊर्जा स्रोत:-

ज़रूरत के समय, ऊर्जा प्रदान करने के लिए प्रोटीन को अमीनो एसिड
में तोड़ा जा सकता है।

10. पीएच विनियमन:-

प्रोटीन शरीर के पीएच संतुलन को बनाए रखने में मदद करते हैं,
जिससे एंजाइम और कोशिकाओं का उचित कार्य सुनिश्चित होता है।

ये
कार्य शारीरिक कार्य और स्वास्थ्य के लगभग हर पहलू में प्रोटीन की महत्वपूर्ण
भूमिका को उजागर करते हैं।

इसे पढ़ें - कोशिका व कोशिका अंगों के खोजकर्ता

अमीनो
एसिड के विशिष्ट कार्य

अमीनो एसिड प्रोटीन के निर्माण खंड हैं, और उनका अनुक्रम प्रोटीन की अनूठी संरचना और कार्य को निर्धारित करता है। ऊतकों की वृद्धि, मरम्मत और रखरखाव के लिए आवश्यक विशिष्ट प्रोटीन को संश्लेषित करने के लिए शरीर विभिन्न अमीनो एसिड का उपयोग करता है।

पिछले लेख में आप ने अमीनो एसिड के प्रकार के विषय में जानकारी प्राप्त की अब निश्चित
रूप से, यहां कुछ अमीनो एसिड के कुछ विशिष्ट कार्य दिए गए हैं:

1. ट्रिप्टोफैन:-

यह सेरोटोनिन का अग्रदूत है, एक न्यूरोट्रांसमीटर जो मूड, नींद
और भूख को नियंत्रित करता है।

2. हिस्टिडाइन:-

यह हिस्टामाइन के निर्माण में शामिल होता है, जो प्रतिरक्षा
प्रतिक्रिया और पाचन में भूमिका निभाता है।

3. टायरोसिन:-

यह डोपामाइन, नॉरपेनेफ्रिन और एपिनेफ्रिन का अग्रदूत है, जो मूड,
फोकस और तनाव प्रतिक्रिया के लिए महत्वपूर्ण हैं।

4. ग्लूटामाइन:-

यह आंत के स्वास्थ्य का समर्थन करता है, प्रतिरक्षा प्रणाली के
कार्य में सहायता करता है, और कुछ कोशिकाओं के लिए प्राथमिक ऊर्जा स्रोत है।

5. सिस्टीन:-

यह डाइसल्फ़ाइड बांड के निर्माण में मदद करता है, जो प्रोटीन
संरचनाओं को स्थिर करने के लिए महत्वपूर्ण है।

6. आर्जिनिन:-

यह नाइट्रिक ऑक्साइड का अग्रदूत है, जो रक्त वाहिकाओं को आराम देने
और परिसंचरण में सुधार करने में मदद करता है।

7. लाइसिन:-

यह कोलेजन संश्लेषण, प्रतिरक्षा कार्य और कैल्शियम अवशोषण के लिए
महत्वपूर्ण है।

8. मेथिओनिन:-

यह शरीर के लिए सल्फर प्रदान करता है और ग्लूटाथियोन, एक
एंटीऑक्सीडेंट सहित विभिन्न यौगिकों का अग्रदूत है।

9. ल्यूसीन, आइसोल्यूसीन, वेलिन (ब्रांच्ड-चेन अमीनो एसिड):-

ये मांसपेशियों की
वृद्धि, ऊर्जा उत्पादन और व्यायाम के बाद रिकवरी में सहायता करते हैं।

10. फेनिलएलनिन:-

यह डोपामाइन और नॉरपेनेफ्रिन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर का अग्रदूत
है।

11. ग्लाइसीन:-

यह प्रोटीन, डीएनए और क्रिएटिन जैसे महत्वपूर्ण अणुओं के संश्लेषण
में शामिल है।

याद
रखें, अमीनो एसिड की विविध भूमिकाएँ होती हैं, और उनके कार्य व्यक्तिगत आवश्यकताओं
और स्वास्थ्य स्थितियों के आधार पर भिन्न हो सकते हैं।

http://homesciencerevisionnotes.blogspot.com/2023/08/essential-functions-of-proteins-and.html

28/08/2023

प्रोटीन की रासायनिक संरचना, गुण और वर्गीकरण के क्विक रिवीजन नोट्स। प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता पाने के लिए महत्वपूर्ण बिंदु के साथ।"

शरीर के विभिन्न कार्यों के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है जो हमें कार्बोहाइड्रेट्स , वसा प्रोटीन से मिलती है |प्रोटीन अमीनो एसिड से बने आवश्यक अणु हैं जो विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे ऊतकों के रखरखाव और मरम्मत का कार्य, एंजाइमों, हार्मोनों और अन्य चीज़ों के निर्माण में सहायक हैं, जो कोशिकाओं और जीवों की संरचना और कार्यप्रणाली में योगदान करते हैं।

Read more- अनुवांनशिक रोगों की सूची

प्रोटीन शब्द का मुख्य अर्थ "पहले स्थान पर रहना " .सन 1938 में डच के निवासी मल्डर जो एक रसायनशास्त्री थे प्रोटीन को नाइट्रोजन युक्त प्रदार्थ कहा था |जिसे जीवन का मुख्य घटक कहा|हमारे शरीर में 50%प्रोटीन मांशपेशियों में ,20% हड्डियों में और 10% त्वचा में उपस्थित होता है |शेष जो भी बचता है वह शरीर के अन्य भागों में रहता है |

प्रोटीन की रासायनिक संरचना

प्रोटीन की रासायनिक संरचना में कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन और कभी-कभी सल्फर होता है। ये तत्व विभिन्न व्यवस्थाओं में मिलकर अमीनो एसिड बनाते हैं, जो प्रोटीन के निर्माण खंड हैं। क्या आप प्रोटीन संरचना के बारे में कुछ विशेष जानना चाहेंगे?

प्रोटीन मैक्रोमोलेक्यूल्स हैं जो अमीनो एसिड नामक छोटी इकाइयों से बने होते हैं। 20 विभिन्न प्रकार के अमीनो एसिड होते हैं जिन्हें विभिन्न प्रोटीन बनाने के लिए विभिन्न अनुक्रमों में व्यवस्थित किया जा सकता है। अमीनो एसिड की रासायनिक संरचना में एक अमीनो समूह (-NH2), एक कार्बोक्सिल समूह (-COOH), एक हाइड्रोजन परमाणु और एक अद्वितीय साइड चेन समूह शामिल होता है जिसे R-समूह के रूप में जाना जाता है। यह अलग-अलग आर-समूह हैं जो प्रत्येक अमीनो एसिड को उसकी विशिष्ट विशेषताएं देते हैं।

जब अमीनो एसिड पेप्टाइड बॉन्डिंग नामक प्रक्रिया के माध्यम से एक साथ जुड़ते हैं, तो वे पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला बनाते हैं। ये श्रृंखलाएं फिर विशिष्ट त्रि-आयामी आकृतियों में बदल जाती हैं, जो प्रोटीन के कार्य को निर्धारित करती हैं। अमीनो एसिड का अनुक्रम और व्यवस्था प्रोटीन की संरचना और कार्य को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जिससे उन्हें शरीर में एंजाइम, एंटीबॉडी, संरचनात्मक घटकों और बहुत कुछ जैसी आवश्यक भूमिकाएं निभाने की अनुमति मिलती है।

सल्फर युक्त अमीनो एसिड, सिस्टीन और मेथियोनीन की प्रोटीन में एक अतिरिक्त भूमिका होती है: वे डाइसल्फ़ाइड बांड बना सकते हैं जो प्रोटीन की संरचना को स्थिर करने में मदद करते हैं।

कुल मिलाकर, प्रोटीन के भीतर अमीनो एसिड की रासायनिक संरचना और व्यवस्था उनकी उल्लेखनीय विविधता और जीवित जीवों में उनके द्वारा किए जाने वाले कार्यों की विस्तृत श्रृंखला में योगदान करती है।

प्रोटीन के गुण

प्रोटीन विभिन्न प्रकार के गुण प्रदर्शित करते हैं जो उन्हें जीवित जीवों के कामकाज के लिए आवश्यक बनाते हैं। प्रोटीन के कुछ प्रमुख गुणों में शामिल हैं:

1. संरचना:-

प्रोटीन में जटिल त्रि-आयामी संरचनाएं होती हैं जो उनके कार्यों के लिए महत्वपूर्ण होती हैं। अमीनो एसिड की विशिष्ट व्यवस्था प्रोटीन के आकार और कार्य को निर्धारित करती है।

2. कार्य:-

प्रोटीन शरीर में विभिन्न भूमिका निभाते हैं, एंजाइम, संरचनात्मक घटकों, ट्रांसपोर्टरों, हार्मोन, एंटीबॉडी और बहुत कुछ के रूप में कार्य करते हैं। उदाहरण के लिए, एंजाइम जैव रासायनिक प्रतिक्रियाओं को उत्प्रेरित करते हैं, जबकि एंटीबॉडी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया में शामिल होते हैं।

3. विशिष्टता:-

प्रोटीन अक्सर अपनी अंतःक्रियाओं में उच्च विशिष्टता प्रदर्शित करते हैं। उदाहरण के लिए, एंजाइम आमतौर पर अपनी सटीक बाइंडिंग साइटों के कारण विशेष सब्सट्रेट्स के साथ विशिष्ट प्रतिक्रियाओं को उत्प्रेरित करते हैं।

4. विकृतीकरण:-

तापमान, पीएच, या अन्य पर्यावरणीय कारकों में परिवर्तन से प्रोटीन विकृत या प्रकट हो सकता है। यह उनकी संरचना और कार्य को बाधित कर सकता है, जिससे वे निष्क्रिय हो सकते हैं।

5. घुलनशीलता:-

प्रोटीन की घुलनशीलता भिन्न-भिन्न होती है। कुछ पानी में घुलनशील होते हैं, जबकि अन्य को क्रियाशील बने रहने के लिए विशिष्ट परिस्थितियों या सेलुलर डिब्बों की आवश्यकता होती है।

6. लचीलापन:-

प्रोटीन गठनात्मक परिवर्तन प्रदर्शित कर सकते हैं, जिससे उन्हें विभिन्न परिस्थितियों के अनुकूल होने और विभिन्न कार्य करने की अनुमति मिलती है। यह लचीलापन अन्य अणुओं के साथ उनकी बातचीत के लिए महत्वपूर्ण है।

7. बंधन:-

कई प्रोटीन अपने कार्यों को पूरा करने के लिए अन्य अणुओं, जैसे सब्सट्रेट, सहकारक, या अन्य प्रोटीन से बंधते हैं। यह बंधन प्रतिवर्ती या अपरिवर्तनीय हो सकता है।

8. संचार:-

कुछ प्रोटीन सिग्नलिंग अणुओं के रूप में कार्य करते हैं, कोशिकाओं के भीतर या कोशिकाओं के बीच सूचना प्रसारित करते हैं। उदाहरण के लिए, हार्मोन विभिन्न शारीरिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं।

9. विनियमन:-

प्रोटीन कोशिकाओं के भीतर प्रक्रियाओं को विनियमित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उदाहरण के लिए, प्रतिलेखन कारक डीएनए से जुड़कर जीन अभिव्यक्ति को नियंत्रित करते हैं।

10. विविधता:-

संभावित अमीनो एसिड अनुक्रमों की विशाल संख्या विशिष्ट संरचनाओं और कार्यों के साथ प्रोटीन की एक विस्तृत श्रृंखला की अनुमति देती है।

कुल मिलाकर, इन गुणों का अनूठा संयोजन प्रोटीन को लगभग हर जैविक प्रक्रिया और गतिविधि में भाग लेने में सक्षम बनाता है, जिससे वे जीवन के लिए मौलिक बन जाते हैं।

प्रोटीन का वर्गीकरण:-

प्रोटीन को आमतौर पर उनके पोषण मूल्य और अमीनो एसिड संरचना के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। वर्गीकरण इस प्रकार हैं:

1. प्रोटीन का पोषण मूल्य वर्गीकरण-

1. संपूर्ण प्रोटीन:-

इनमें सभी आवश्यक अमीनो एसिड पर्याप्त मात्रा में होते हैं, जो उन्हें पोषण की दृष्टि से संतुलित बनाते हैं। स्रोतों में मांस, मछली, अंडे और डेयरी जैसे पशु उत्पाद शामिल हैं।

2. अपूर्ण प्रोटीन:-

इनमें एक या अधिक आवश्यक अमीनो एसिड की कमी होती है, इसलिए ये अपने आप में पोषण की दृष्टि से संतुलित नहीं होते हैं। स्रोतों में अधिकांश पौधे-आधारित खाद्य पदार्थ जैसे सेम, दाल, अनाज और सब्जियां शामिल हैं।

3. पूरक प्रोटीन:-

विभिन्न अपूर्ण प्रोटीन स्रोतों के संयोजन से एक संपूर्ण प्रोटीन प्रोफ़ाइल बनाई जा सकती है। उदाहरण के लिए, बीन्स और चावल का एक साथ सेवन करने से व्यापक अमीनो एसिड स्पेक्ट्रम मिलता है।

2. अमीनो एसिड का पोषण संबंधी वर्गीकरण-

मनुष्यों के लिए उनके पोषण संबंधी महत्व के आधार पर अमीनो एसिड को तीन मुख्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:

1. आवश्यक अमीनो एसिड:-

ये अमीनो एसिड शरीर द्वारा उत्पादित नहीं किए जा सकते हैं और इन्हें आहार से प्राप्त किया जाना चाहिए। नौ आवश्यक अमीनो एसिड हैं: हिस्टिडीन, आइसोल्यूसीन, ल्यूसीन, लाइसिन, मेथिओनिन, फेनिलएलनिन, थ्रेओनीन, ट्रिप्टोफैन और वेलिन।

2. गैर-आवश्यक अमीनो एसिड:-

शरीर इन अमीनो एसिड को स्वयं संश्लेषित कर सकता है, इसलिए उन्हें सीधे आहार से प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है। उदाहरणों में एलेनिन, एस्पेरेगिन, एसपारटिक एसिड और ग्लूटामिक एसिड शामिल हैं।

3. सशर्त अमीनो एसिड:-

ये अमीनो एसिड आमतौर पर गैर-आवश्यक होते हैं, लेकिन बीमारी या तनाव जैसी कुछ स्थितियों में ये आवश्यक हो जाते हैं। उदाहरणों में आर्जिनिन, सिस्टीन, ग्लूटामाइन, टायरोसिन, ग्लाइसिन, ऑर्निथिन, प्रोलाइन, सेरीन और सेलेनोसिस्टीन शामिल हैं।

विविध आहार के माध्यम से आवश्यक अमीनो एसिड के सेवन को संतुलित करना प्रोटीन संश्लेषण, एंजाइम गतिविधि और समग्र स्वास्थ्य सहित विभिन्न शारीरिक कार्यों का समर्थन करने के लिए महत्वपूर्ण है।

याद रखें, एक विविध आहार जिसमें प्रोटीन स्रोतों का मिश्रण शामिल है, यह सुनिश्चित करने में मदद कर सकता है कि आपको अपने शरीर के लिए आवश्यक सभी आवश्यक अमीनो एसिड मिल रहे हैं।

प्रोटीन संरचना और कार्य के आधार पर वर्गीकरण

प्रोटीन को उनकी संरचना और कार्य के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। मुख्य वर्गीकरण हैं:

1. सरल प्रोटीन:-

ये केवल अमीनो एसिड से बने होते हैं और इनमें गैर-अमीनो एसिड घटकों की कमी होती है। उदाहरणों में एल्ब्यूमिन और ग्लोब्युलिन शामिल हैं।

2. संयुग्मित प्रोटीन:-

इनमें अमीनो एसिड के साथ-साथ कार्बोहाइड्रेट, लिपिड या धातु जैसे अन्य घटक होते हैं। हीमोग्लोबिन और लिपोप्रोटीन इसके उदाहरण हैं।

3. रेशेदार प्रोटीन:-

इन प्रोटीनों में लंबे, रेशेदार आकार होते हैं और ये अक्सर संरचनात्मक भूमिकाओं में शामिल होते हैं। उदाहरणों में कोलेजन और केराटिन शामिल हैं।

4. गोलाकार प्रोटीन:-

इनका आकार अधिक सघन, गोलाकार होता है और ये अक्सर एंजाइमेटिक और नियामक कार्यों में शामिल होते हैं। हीमोग्लोबिन और एंजाइम इसके उदाहरण हैं।

5. एंजाइम:-

ये एक प्रकार का प्रोटीन है जो जैविक उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है, जो शरीर में रासायनिक प्रतिक्रियाओं को तेज करता है।

6. हार्मोनल प्रोटीन:-

ये संदेशवाहक प्रोटीन हैं जो शारीरिक कार्यों को विनियमित करने में मदद करते हैं। उदाहरणों में इंसुलिन और वृद्धि हार्मोन शामिल हैं।

7. संरचनात्मक प्रोटीन:-

ये यांत्रिक सहायता प्रदान करते हैं और कोशिकाओं और ऊतकों के आकार को बनाए रखने में मदद करते हैं। कोलेजन इसका प्रमुख उदाहरण है।

8. परिवहन प्रोटीन:-

ये ऑक्सीजन जैसे पदार्थों को कोशिका झिल्ली के पार ले जाते हैं। हीमोग्लोबिन एक प्रसिद्ध परिवहन प्रोटीन है।

9. भंडारण प्रोटीन:-

ये बाद में उपयोग के लिए अमीनो एसिड को संग्रहीत करते हैं। उदाहरणों में दूध में कैसिइन और फेरिटिन शामिल हैं, जो शरीर में आयरन का भंडारण करता है।

10. रक्षात्मक प्रोटीन:-

ये विदेशी आक्रमणकारियों के खिलाफ प्रतिरक्षा प्रणाली की रक्षा में भूमिका निभाते हैं। एंटीबॉडीज़ एक प्रकार का रक्षात्मक प्रोटीन है।

11. संकुचनशील प्रोटीन:-

ये मांसपेशियों के संकुचन के लिए जिम्मेदार होते हैं। एक्टिन और मायोसिन प्रमुख संकुचनशील प्रोटीन हैं।

प्रत्येक वर्गीकरण जीवित जीवों की संरचना और कार्यों को बनाए रखने में एक विशिष्ट भूमिका निभाता है।



http://homesciencerevisionnotes.blogspot.com/2023/08/chemical-structure-properties.html

30/04/2023

मार्विन मुण्डेल का परिवर्तन के वर्ग

(Marvin Mundell's Classes of Change)

कार्य सरलीकरण लोगों की दो प्रकार से मदद करता है। एक तो वह कार्यकर्ता जो किसी प्रयोग शाला में जाकर कार्य सरलीकरण के निश्चित गति , समय व शक्ति की बचत करने की आसान विधियों का ज्ञान प्राप्त करता है। दूसरा यदि कार्यकर्ता में कार्य सरलीकरण के प्रति मानसिक रूप से रूचि जाग्रत की जाये तो काम करने में थकान व नीरसता में कमी आ जाती है।

कार्य सरलीकरण का विचार मार्विन मुण्डेल द्वारा 1940 में purdue university में बताया। उन्होंने कार्य सरलीकरण के तरीकों को पाँच समूहों में वर्गीकृत किया ।प्रत्येक समूह में कार्यकर्ता की कार्य विधि में विभिन्न प्रकार के परिवर्तन उत्पन्न करता है। मुण्डेल के परिवर्तन वर्ग में कुछ समय बाद में ग्रास एवं क्रैण्डल ने पाँच बिन्दुओं को बदल कर तीन बिन्दु बनाये। जिनमें तीसरे ,चौथे ,पाँचवे बिन्दु को एक ही वर्ग सम्मलित कर दिया।

{ मुण्डेल का परिवर्तन के वर्ग के पाँच बिन्दु }

1- हाथ
और शरीर की गति में परिवर्तन--

इस बिन्दु में कार्य सरलीकरण के कुछ
प्रकार निम्न है।

समय के अनुसार काम की गतियों का उपयोग।

गुरुत्वाकर्षण के प्रयोग से कार्य करना।

गृह कार्यों में दायें हाथ के साथ-साथ बाएँ हाथ का भी प्रयोग करना।

कार्यकर्ता के द्वारा कार्य की विभिन्न क्रियाओं में कमी लाने का
प्रयास करना।

दैनिक दिनचर्या में कार्य चरणों के क्रम के अगले चरण को दिमाग में
रखना चाहिए।

आवश्यकता अनुसार चरणों के क्रम में परिवर्तन करना।

कार्यकर्ता को अपने कार्य में कौशल प्राप्त करना चाहिए।

कार्यकर्ता को अपने कार्यों में लय का ज्ञान होना चाहिए।

कार्यकर्ता को अपनी गलतियों से सीख लेनी चाहिए।

कार्यकर्ता को गृहकार्य करने के लिए शारीरिक स्थितियों में परिवर्तन
लाना चाहिए।

2- कार्य
संग्रह , स्थान और उपकरण में परिवर्तन --

इस वर्ग में कार्यकर्ता के कार्य
स्थल को व्यवस्थित करके व उपकरणों का
प्रयोग करके कार्यकर्ता की गति व कार्य के चरणों में कमी लाई जा सकती है। जिसके
लिए निम्न परिवर्तन किये जाते है।

कार्य संग्रह के स्थान पर रखी वस्तुओं व उपकरणों को उनके प्रथम
उपयोगों के अनुसार व्यवस्थित किया जाना चाहिए। जैसे बर्तनों के संग्रह का स्थान
सिंक के ऊपर होना चाहिए ,बर्तनों को धोने के उपरांत पोंछने के बजाय हवा से सूखने
देना।

प्रायः प्रयोग किये जाने वाले तेल -मसलों, चीनी , नमक आदि को खाना पकाने के स्थान के पास
ही रखना। सब्जी को काटने व धोने के उपयोग में आने वाले बर्तन व उपकरण को उन्हीं के
स्थान पर रखना।

कार्य को सरल बनाने वाले उपकरणों का प्रयोग किया जाना चाहिए। जैसे घर
की सफाई के लिए वैक्यूम क्लीनर का प्रयोग ,जूसर व मिक्सर का प्रयोग ,कपड़े धोने के
लिए वाशिंग मशीन का प्रयोग ,कई बर्तनों को एक साथ उठाने के लिए ट्रे या थाली का
प्रयोग करना।

कार्य स्थल में अलमारियों को कार्य करता की शारीरिक ऊँचाई के अनकूल
होना चाहिए। अलमारियों के अधिक चौड़ा या ऊँचा होने पर कार्यकर्ता को अपनी भुजाओं व
कंधों को ऊपर उठाना पड़ेगा। अलमारियों के नीचे होने पर उसे झुक कर काम करना पड़ेगा। जिससे उसकी कमर में दर्द होने लगेगा। कार्यकर्ता की शारीरिक स्थिति के अनुसार
कार्य स्थल का समायोजन होने पर अनावश्यक दबाब व थकान नहीं होगी।

कार्य करने के लिए सही ऊँचाई व सही प्रकार की कुर्सी या स्टूल होना
चाहिए। जिसमें बैठ के काम करने से पैरों की थकान को कम किया जा सकता है।

3- उत्पादन
क्रम में परिवर्तन -

कार्य कर्ता को जब कम समय में अधिक काम करना होता है तब उत्पादन
क्रम में परिवर्तन करके काम को सरलीकृत किया जा सकता है।

प्रेशर कुकर का उपयोग एक साथ कई व्यंजन को तैयार करना। वाशिंग मशीन
में कपड़े धोने के साथ ही घर की साफ सफाई भी करना।

ऐसे स्थान जहाँ पर पानी
गिरने या गन्दगी अधिक लगने वाली जगहों पर कपड़े के कवर बिछाने की बजाय
प्लास्टिक कवर का उपयोग किया जाये। जिन वस्तुओं या उपकरणों का उपयोग कभी-कभी होता है उनको अलमारी के अन्दर या
ढक कर रखा जाये।

कार्य को सरल बनाने के लिए व समय और शक्ति की बचत करने के लिए भोज्य
पदार्थ को पकाने में पहले से तैयार मिश्रण का उपयोग करना।

4- अंतिम उत्पाद में परिवर्तन --

इसके अंतर्गत तैयार भोज्य पदार्थों के रंगरूप , बनावट में परिवर्तन लाकर , किसी
काम के अंतिम स्थिति के आकर में परिवर्तन
लाकर ,रोज के कार्यों के लिए साधारण साज सज्जा का प्रयोग करके कार्य को सरल बनाया
जा सकता है। उदाहरण --

सब्जी को काटते समय सामान्य आकर न होना।

सलाद को सजा कर न परोसा जाना।

खाना परोसते समय सूखे व्यंजनों के लिए अलग -अलग बर्तनों का प्रयोग न करके थाली में
ही परोसना।

बिस्कुट ,केक को साधारण ढंग से ही सजाना।

टेबल नैपकिन को सजावटी तरीके के बजाय सिर्फ तह लगाकर रखना।

5- कच्चे
माल में परिवर्तन--

इसके अंतर्गत ऐसी वस्तुओं का उपयोग करना जिससे समय व श्रम की बचत हो
सके।

बाजार में उपलब्ध पर्दार्थो का उपयोग जैसे गुलाब जामुन ,इडली ,डोसा. के तैयार उत्पाद
पिसे हुए मसालों का उपयोग करना।

साफ पैक खाद्य उत्पाद ,फ्रोज़न खाद्य प्रदार्थ ,अचार ,डिब्बा बंद
सामग्री का उपयोग करना।

पर्दे ,चादरों व टेबल मैट्स के लिए ऐसे कपड़ों का चुनाव करना जिसमें
प्रेस करने की आवश्यकता न हो और उन पर धूल भी कम जमा हो।

सफाई करने के लिए कागज के नैपकिन का प्रयोग किया जाये तो उसे धोने की आवश्यकता नहीं होगी।

हरी मटर को छीलने की बजाय फ्रोजन मटर का प्रयोग करना।

READ MORE--

कार्य सरलीकरण का अर्थ मुख्य तत्व व तकनीक ( Meaning, Main Elements and technique of Work Simplification)

अनुवांनशिक रोगों की सूची (Short Notes In Hindi)

पोषण के क्षेत्र में राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय संगठन (Rashtriy aur Antarrashtriy Swasthya Sangathan)

क्या है टीकाकरण (What is vaccination?)

हॉर्मोन्स क्या होते है (what is Hormones in hindi )

http://homesciencerevisionnotes.blogspot.com/2023/04/marvin-mundells-classes-of-change.html

30/04/2023

कार्य सरलीकरण
का अर्थ ,मुख्य तत्व और तकनीक (Meaning, Main Elements and technique of Work Simplification)

कार्य सरलीकरण
का अर्थ (Meaning of Work Simplification) --

किसी
कार्य को सबसे सरल, शीघ्र और आसान करने के सुविधाजनक तरीके से करना। जो हाथ व शरीर की गति पर निर्भर करता है। जिससे समय व
शक्ति का कम उपयोग करना पड़े कार्य सरलीकरण कहलाता है।

कार्य
सरलीकरण का विचार मार्विन
मुण्डेल द्वारा दिया गया था। सबसे पहले अमरीका की कम्पनी "अमेरिकन
हार्ट एसोसिएशन " ने इसका प्रयोग उधोगों में किया। इस एसोसिएशन ने अपंग
स्त्रियों व रोग पीड़ित महिलाओं के पास ऊर्जा की मात्रा में कमी को देखते हुए
कार्य सरलीकरण पर बल दिया।

ब्रिटेन
में सप्ताह में 40 घंटे काम की बात कही गई। जिसमें का ,मनोरंजन ,आराम
के लिए दिन के 24 घंटो को 8:8:8 में बता गया।

कार्य सरलीकरण
के मुख्य तीन बिंदु है।(There are three main points of work simplification)

1.धन (Money) 2.समय (Time) 3.शक्ति (Energy)

कार्य सरलीकरण तकनीक को अपनाने से धन समय व शक्ति की बचत होती
है।

कार्य सरलीकरण के तीन मुख्य तत्व है|

1. कार्य (Work) 2. कार्यकर्ता (Worker) 3. कार्यक्षेत्र (Work Place)

कार्य सरलीकरण को तीन कारक प्रभावित करते है।

कार्य विधि- कार्य करने की उचित विधि का प्रयोग करना।

कार्यकर्ता -कार्य कर्ता को कार्य कौशल होना।

कार्यक्षेत्र - कार्य करने का क्षेत्र कार्य कर्ता की शारीरिक स्थिति
के अनकूल होना।

कार्य के पहुंच का दायरा (Work Area fo Reach)

अधिकतम क्षेत्र -- लगभग 210 सेंटी मीटर

सामान्य क्षेत्र -- 80 से 90 सेंटी मी. तक

प्रभावी क्षेत्र --145 सेंटी
मी.

लोगों
में कार्य सरलीकरण के लिए रूचि जागृत करने के निम्न तरीके है।

जीवन की अवस्थाओं के दौरान कार्य भार की अधिकता
समय व शक्ति का ज्ञान देना ।

कार्य
सरलीकरण के उद्देश्य व उससे मिलने वाले लाभों का ज्ञान देना।

लोगों को
नये विचारों और तकनीकों के प्रति प्रेरित करना।

अशिक्षित
महिलाओं को फिल्मों के माध्यम से कार्य सरलीकरण की जानकारी देना।

कार्य
सरलीकरण के तरीकों का प्रदर्शन के द्वारा जानकारी देना

कार्य सरलीकरण तकनीक (Techniques of Work Simplification)

औपचारिक तकनीक (Formal Techniques) –

इस तकनीक में एक प्रयोग आवश्यकता होती है। इसके साथ ही इस विधि को
जानने वाले किसी कुशल व्यक्ति की भी आवश्यकता पड़ती है।



अनौपचारिक विधि (Informal Techniques) -

इसे पेन पेंसिल विधि भी कहते है। और ( Man
Analysis Method ) भी
कहा जाता है। इस विधि को कोई भी साधारण व्यक्ति कर सकते है।



1.सायकल ग्राफ विधि (Cycle Graph Method) –

इसमें फोटो ग्राफिक यंत्र का प्रयोग
किया जाता हैइसे क्रोनो सायकल ग्राफ (Chronocycle Graph) के नाम से भी जाना जाता है। कार्यकर्ता की
हाथ की बीच की ऊँगली में एक बल्ब वाली
अंगूठी पहनाई जाती है बल्ब के द्वारा उसकी गति का ग्राफ बनता जाता है। परिणामों
को रिकार्ड करके यह देखा जाता है कि काम
लयपूर्ण था या अलयपूर्ण।



1.प्रोसेस चार्ट (Process Chart) -

इस चार्ट में
कार्यकर्ता के कार्य के सभी चरणों का शोध किया जाता है। इन चरणों के प्रकारों
को प्रतीकों के द्वारा वर्गीकृत किया
जाता है।

प्रतीक प्रतीक का नाम

o एक
स्थान से दूसरे स्थान की गति

O एक ही स्थान पर खड़े हो कर काम करना।

☐ अवरोध अर्थात कोई काम नहीं हो रहा है।

⛛ पूरी प्रक्रिया का निरीक्षण।

● एक साथ दो कार्य करना। डग टेलिंग एक साथ दो या दो से अधिक काम करना

प्रोसेस चार्ट को बनाने के लिए दो लोगों
की आवश्यक होता है। एक कार्यकर्ता दूसरा निरीक्षण कार्य व रिकार्ड बनाने के लिए।

2.माइक्रोमोशन फिल्म विश्लेषण (Micromotion Film Analysis)-

यह एक शोध तकनीक है। इसमें हाथ व शरीर
की‌‌ छोटी-छोटी क्रियाओं का अध्ययन किया जाता
है। इसके साथ ही काम को पूर्ण करते समय उपकरणों के प्रयोग का भी अध्ययन किया
जाता है। कार्यकर्ता के प्रत्येक काम की गति विधि का रिकार्ड बनाया जाता है।

2.आपरेशन चार्ट (Operation Chart) -

यह प्रोसेस चार्ट की ही तरह ही कार्य
करता है। केवल अन्तर यह होता है की
इसमें दोनों हाथों की क्रिया का अध्ययन अलग-अलग
किया जाता है। इसमें प्रतीक चिन्हों का प्रयोग किया जाता हैं।

प्रतीक प्रतीक का नाम

o दोनों भुजाओं की गति का अध्ययन

O उँगलियों की गति का अध्ययन

⛛ भुजा ,उँगलियों के आलस्य का अध्ययन

3.स्टॉप वाच विधि (Stopwatch Techniques) -

इस विधि में समय को महत्व दिया जाता
है। इसमें कार्यकर्ता के काम के समय की इकाई को गिना जाता है। यह विधि में समय
मापक इकाई (Time measurement Unit ) का प्रयोग किया जाता है। जिसमें समय के 1
सेकेण्ड के 0. 36 वाँ भाग या एक मिनट का
.0006 भाग को नापा जा सकता है। आजकल इलेक्ट्रॉनिक विधि से 1 मिनट के 00001333 वाँ भाग को भी नापा जा
सकता है।



3.मल्टी मैन चार्ट (Multiman Chart) -

प्रोसेस चार्ट की प्रकार ही अध्ययन
प्रक्रिया है परन्तु इसमें एक व्यक्ति का नहीं बल्कि एक से अधिक लोगों का एक साथ
कार्य करने का अध्ययन किया जाता है। इसमें प्रोसेस चार्ट व आपरेशन चार्ट दोनों
के प्रतीक चिन्हों का प्रयोग कर सकते
है। खुद के प्रतीक चिन्ह भी बना सकते है। इसमें कार्य में उत्पन्न रुकावटों का
तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है।

4.मैमो मोशन अध्ययन (Memomotion Study)-

इस विधि में कार्यकर्ता की गतिविधि को नापा जाता है।
इसके लिए एक फ्रेम का प्रयोग किया जाता है। जिसके प्रयोग से कार्यकर्ता के समय व
घुमाव का अध्ययन करके उसका रिकार्ड
बनाया जाता है

4.पाथवे चार्ट (Path Way Chart) -

इस तकनीक का सर्वप्रथम श्रीमती गिल बर्थ ने
अपने साहित्य में प्रयोग किया। इस विधि में पिन और धागे का प्रयोग किया जाता है।
इसमें कार्यकर्ता के कार्य स्थल का फ्लोर ၀प्लान तख्ते पर बनाया जाता है। उस पर
कार्य कर्ता के कार्य करते समय उसके मुड़ने
की जगह पर पिन लगाकर व उसके मार्ग को धागे मापा जाता है

Important Notes-

‌‌ खड़े होकर काम करने से कम थकान होती है क्योंकि बैठ क्र काम करने पर हमारे पूरे शरीर में ग्लूकोज़ ढंग से नहीं पहुँचता है। जिसके कारण शरीर में लैक्टिक एसिड बनने लगता है। जिसके कारण शारीरिक थकान होती है। मांशपेशियों की थकान को आरगोमीटर से नापा जाता है।

Importent Link-

मार्विन मुण्डेल का परिवर्तन के वर्ग(Marvin Mundell's Classes of Change)

अनुवांनशिक रोगों की सूची (Short Notes In Hindi)

पोषण के क्षेत्र में राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय संगठन (Rashtriy aur Antarrashtriy Swasthya Sangathan)

क्या है टीकाकरण (What is vaccination?)

हॉर्मोन्स क्या होते है (what is Hormones in hindi )

http://homesciencerevisionnotes.blogspot.com/2023/04/meaning-main-elements-and-technique-of.html

19/04/2023

क्या है टीकाकरण

घातक संक्रामक बीमारी के विरुद्ध बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए टीके लगाए जाते हैं। शिशुओं के शरीर में प्रवेश कराए जाने वाले विशिष्ट प्रकार के एन्टीजन की प्रक्रिया को टीकाकरण (वैक्सीनेशन) कहते हैं।इसे दो तरीकों से दिया जाता है। प्राथमिक -इंजेक्शन के रूप में, दूसरा गौण - बूस्टर डोज़ या मुंह में सीधा डालकर दिया जाता है। टीकाकरण बच्चों को जन्म से पांच वर्ष की उम्र तक दिया जाता है।

टीकाकरण विश्व स्तरीय अभियान है जो महत्वपूर्ण बीमारियों से लोगों को सुरक्षा प्रदान करता है। यह बीमारियां जीवन खतरे का कारण बन सकती हैं। टीको के माध्यम से विभिन्न संक्रामक बीमारियों से बचाव के लिए एक शक्तिशाली तंत्र विकसित किया गया है।

टीकाकरण के महत्व:-

टीकाकरण के महत्व को समझने के लिए, हमें बीमारी की विस्तारपूर्वक समझ की आवश्यकता होती है। बीमारी के लक्षण के बाद उपचार शुरू करना आमतौर पर असफल होता है। इसलिए, वैक्सीनेशन बच्चों में बीमारी के खिलाफ प्रतिरक्षा झमता विकसित करने में सक्षम होता है। यह जीवन की अवधि बढ़ाता है।

वैक्सीन से हमारे शरीर में कुछ विशिष्ट ऊर्जा उत्पन्न होती है। जो शरीर को रोगों से लड़ने में मदद करती है। इसके बाद हम रोग से बचाव के लिए पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं। वैक्सीनेशन के माध्यम से, अनेक रोग जैसे पोलियो, टीबी, मुम्मी, जानलेवा बुखार, हेपेटाइटिस और कोविड-19 जैसे रोगों से बचाव किया जा सकता है। वैक्सीनेशन से समाज को जागरूक किया जाता है।

टीकाकरण के लाभ:-

बच्चों को संक्रामक रोगों से बचाव करता है।

टीकाकरण के बाद भी रोग होने पर उसकी तीव्रता कम रहती है।

टीकाकरण रोगों से बचाव के कारण दवा पर होने वाले खर्च से भी बचाव होता है।

शरीर पर रोगों का हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता है।

बल मृत्यु देर में कमी आती है।

शिशुओं को विभिन्न बीमारियों से बचाने हेतु टीके :---

चेचक:-

चेचक को शीतला के नाम से भी जानते है। इस टीके का अविष्कार 'जेनर' ने 1798 ने किया। इसके द्वारा 'वैक्सीनिया वायरस' या 'COW POX VIRUS' को शरीर में प्रविष्ट कराकर सक्रिय रोग प्रतिरोधक झमता उपार्जित की जाती है। यह टीका बच्चों में तीन बार दिया जाता है।

प्राथमिक टीका 0 -3 माह में बाहु पर त्रिकोणिका पेशी (Deltoid Muscle) पर , दूसरा 5 वर्ष की आयु में अग्र बाहु (Fore Arm )पर दबाब विधि द्वारा लगाया जाता है , तीसरा 8 वर्ष की आयु में लगाया जाता है।

बी. सी. जी. (Bacille Calmette Guerin )

यह टीका पहली बार 1 माह की उम्र में तपेदिक (झयरोग ) Tuberculosis के लिए दिया जाता है। जिसकी खोज दो वैज्ञानिकों 'Calmtte और Guerin' ने किया था। इस टीको को लगाने के लिए ट्यूबर क्यूलिन टेस्ट किया जाता है। जो बच्चे निगेटिव होते है उन्हें लगाया जाता है। यह बाह के ऊपरी भाग पर लगता है इसके लगने के 6 सप्ताह से 3 माह के बीच गाँठ का निर्माण होता है। दूसरा टीका 5 -7 वर्ष की आयु में लगता है।

डी. पी. टी. (Triple Antegen )

डिफ्थीरिया ,कुकर खाँसी(Pertussis) ,टिटनेस इन तीनों बीमारियों से बचाने के लिए ट्रिपल एंटीजन का टीका लगाया जाता है.जिसको तैयार करने के लिए तीनों रोगों के जीवाणुओं का "जीव विष" मिला कर तैयार किये जाते है। यह टीका तीसरे ,चौथे व पाँचवे माह में लगता है। इसके बाद दूसरे वर्ष में बूस्टर डोज दी जाती है। जिसको देने के पश्चात बुखार आता है और टीकाकरण के स्थान पर पीड़ा होती है।

A.T.S.(Anti Tetanus Serum) टिटनेस

वैसे तो डी.पी.टी. के टीके में टिटनेस का टीका सम्मलित रहता है। जब कोई अधिक जल जाए ,या गहरी चोट लग जाने पर डॉक्टर उस मरीज को अलग से "एण्टी टिटनेस सीरम" का टीका लगवाने की सलाह दी जाती है। यह केवल उन्ही व्यक्तियों को लगता है जिन्हे पहले "टिटनेस टॉक्साइड" के टीके न लगाए गए हो। गर्भावस्था में टिटनेस टॉक्साइड का तीन टीके शुरुआत के प्रत्येक माह में लगते है।

पोलियो का टीका

पोलियो रोग में 'तंत्रिका तंत्र' प्रभावित होता है। जिससे बालकों में पक्षाघात हो जाता है। यह महामारी रोग है। पोलियो का टीका तरल बूँदों के रूप में जन्म के तीसरे ,चौथे और पांचवें माह में दिए जाते है। सर्वप्रथम 1957 में 'साक वैक्सीन' नाम से पोलियो वैक्सीन का अविष्कार हुआ। फिर 1961 में 'सेबिन्स वैक्सीन' को निर्मित किया गया। एक व दो वर्ष की आयु होने पर पोलियो की बूस्टर डोज दी जाती है।

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हैजे का टीका

हैजा तीव्र संक्रामक रोग है। यह महामारी का रूप ले लेता है। यह मई से अक्टूबर तक इसका प्रकोप अधिक रहता है। "मृत विब्रियो कॉलेरी जीवाणु" से हैजे का टीका तैयार किया जाता है। इसकी एक बोतल में 8 अरब जीवाणु रहते है। इस टीके के लगने के 8 दिन बाद प्रतिकारिता उत्पन्न हो जाती है।

टायफायड और पैराटायफायड का टीका

टायफायड और पैराटायफायड का टीका दोनों ही संचारी रोग है। परन्तु टायफायड की प्रकृति तीव्र होती है जबकि पैराटायफायड धीमी प्रकृति का रोग है। इस रोग के रोगाणु "बैसिलस टाइफोसस और बैसिलस पैराटाइफोसस" आँतों में प्रवेश करके रक्त के साथ पुरे शरीर में फैलते है। इन्ही में मृत जीवाणुओं से T.A.B.(Typhoid-Parathphoid A and B) वैक्सीन को बनाया गया है। बच्चो को ये टीका 1 से 2 वर्ष के अंदर ही 4 से 6 सप्ताह के अंतर पर दो बार लगवाए जाते है। जो एक वर्ष तक शरीर पर प्रभाव डालता है। बूस्टर डोज प्रति वर्ष गर्मियों के शुरुआती दिनों में देना चाहिए।

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हॉर्मोन्स क्या होते है (what is Hormones in hindi )

टीकाकरण चार्ट

टीकाकरण संबंधित आवश्यक जानकारी :--

प्रत्येक टीका निर्धारित आयु व समय पर ही लगवाना चाहिए।

संक्रामक रोग ,तेज बुखार ,उल्टी व दस्त या रक्त कैंसर होने पर टीके नहीं लगवाने चाहिए।

टीका लगने के आधा घंटे पहले या आधा घंटा बाद तक कुछ बी खाने या पीने के लिए नहीं देना चाहिए।

जिन वैक्सीनों को एक साथ दिया जाता है उन्हें एक साथ ही लगवाना चाहिए।

ट्रिपल वैक्सीन व पोलियो वैक्सीन डॉक्टर के परीक्षण के बाद ही दिया जाना चाहिए।

ट्रिपल वैक्सीन व पोलियो वैक्सीन देने से एक घंटे पहले व 6 घंटे बाद तक कुछ भी खाने व पीने को नहीं दिया जाना चाहिए।

FAQ-

QUS- 1.भारत में टीकाकरण कार्यक्रम क्या है?

ANS- वर्ष1975 में राष्ट्रीय टीकाकरण नीति के द्वारा EPI (Expanded Program of Immunization)शुभारंभ किया गया। जिसे 1985 में बदलकर Universal Immunization Program (UIP) के रूप में पूरे भारत वर्ष में चलाया गया।

QUS-2. टीकाकरण के बाद बुखार आने के क्या कारण हैं?

ANS- वैक्सीन का बच्चे के शारीरिक तंत्र पर सामान्य प्रभाव डालना ही बुखार आने का कारण होता है।

QUS-3. बीसीजी का टीका लगवाने के बाद बच्चे की बांह पर कोई निशान ना उभरे तो क्या करना चाहिए ?

ANS- बीसीजी का टीका लगवाने के बाद बच्चे की बांह पर कोई निशान ना उभरे तो बच्चे को फिर से टीका नहीं लगवाना की चाहिए ।

QUS-4. टिटनेस वैक्सीन का आविष्कार कब हुआ ?

ANS- सर्वप्रथम टिटनेस के एन्टीसेरम की खोज जर्मन फिजियोलॉजिस्ट 'एमिल वॉन बेहरिंग' ने 1890 विकसित किया था। टिटनेस टॉक्साइड वैक्सीन का आविष्कार 1924 में हुआ था। 1948 में डी.टी.पी.संयुक्त टीके का पहली बार उपयोग किया गया।

QNS-5. टीकाकरण का जनक कौन है?

ANS- टीकाकरण के जनक अंग्रेजी भौतिकशास्त्री, वैज्ञानिक डॉ एडवर्ड जेनर थे। जिन्होंने सन्‌ 1796 पहले चेचक के टीके के आविष्कार किया। एडवर्ड जेनर को "इम्यूनोलॉजी का पिता" भी कहा जाता है। यह टीका एक बच्चे जेम्स फिप्स को लगाया था।

QNS-6. राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस पहली बार कब मनाया गया ?

ANS- 16 मार्च 1995 को पहली बार टीकाकरण दिवस मनाया गया था|

http://homesciencerevisionnotes.blogspot.com/2023/04/blog-post_19.html

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