18/06/2023
एक दम्पति ने रिटायरमेंट के बाद अपने बनाये शहर वाले मकान में अपने बेटे व बहुओं के साथ रहने का निर्णय लिया।
पहले कुछ महीने सब सही चल रहा था। लेकिन धीरे-धीरे चीजें बिगड़ने लगी।
फ़िर एक दिन ऐसा भी आया जब बेटों ने कहा,
"पिताजी आपको नहीं लगता कि यहाँ शहर में बहुत भीड़ है? आप-दोनों हमारे गाँव में खाली पड़े पुश्तैनी घर मे जाकर क्यों नहीं रह लेते?"
दम्पति, बेटों के कहने का अर्थ बख़ूबी समझ गए। और उन्होंने वह पूरी रात आँसुओं में गुजारी।
सुबह उठकर पिता ने अपने बेटों व बहुओं को कुछ पैसे देकर घूमने जाने के लिए कहा। बेटे-बहु बहुत ख़ुश होकर घूमने चले गए।
पीछे से दम्पति ने शहर वाला अपना मकान बेचा और मकान के नए मालिक से कहा कि कुछ दिन बाद बेटे आकर अपना सामान निकाल लेंगे, तब तक आप बाक़ी कमरों में रहना शुरू कर सकते है।
दम्पति आराम से गाँव मे बने पुश्तैनी घर मे जाकर रहने लगे।
बेटे-बहु घूमकर वापस आये तो सीधे गए, गाँव मे अपने पिताजी के पास।
"पिताजी आपने ऐसा क्यों किया?", दुःखी होकर बेटों ने पूछा।
"बेटे तुमने ही तो कहा था कि शांति से पुश्तैनी घर मे रहो। तो शहर की भीड़भाड़ से बचकर यहाँ आ गए।", पिता ने शांत स्वर में कहा।
"लेकिन पिताजी, आपने हमारा वो घर बेच क्यों दिया? आप ऐसा कैसे कर सकते है?", अब बेटे क्रोध को नियंत्रित करने की कोशिश में थे।
"ठीक वैसे बेटा, जैसे तुम हमें, घर से निकलने को कह सकते हो। वो घर मैंने अपनी कमाई से बनाया था, मैं जो चाहे करूँ। तुम सब नौकरी कर रहे हो। अच्छा कमा रहे हो। अपने-अपने घर बनाओ और शान से रहो। जब तक मैं हूँ तब तक ये पुश्तैनी घर मेरा है, मेरे बाद ये तुम्हारा हो जाएगा। तुम भी बुढ़ापे में शहर की भीड़ से बचकर यहाँ रहने के लिए आ जाना। जैसा कि तुमने कहा था, बहुत शांति और सुकून है यहाँ।", कहते हुए पिता बाहर निकल गए।
आपके दिल का पता नहीं, पर मेरे दिल को छू लेने के लिए ये कहानी बहुत अच्छी थी।