08/01/2024
कल शाम अचानक घर के दरवाज़े की घंटी बजी। मैं बाहर गया तो बाहर भगवा ध्वज लिए 20-25 आदमी औरतों की टोली खड़ी थी। उन में से एक के हाथ में कुछ काग़ज़ थे जिन के ऊपर मुझे स्वस्तिक जैसा कुछ बना दिखा। वो बोला आपको श्री राम की अयोध्या मैं प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण देने आये हैं। छुट्टी का दिन था। सुबह से किसी से चोंच नहीं लड़ाई थी। वकील जब तक ज़ुबानी जंग ना लड़ ले और मास्टर दो चार छात्रों की कुटाई ना कर ले तब तक उनका दिन पूरा नहीं होता। मैं तो सुबह से भरा बैठा था। उस व्यक्ति में एक हलाल करने को ताज़ा मुर्ग़ा दिखाई दिया। मैंने कहा भाई आप श्री राम के कुनबे से, गाँव से, गोत्र से कहाँ से हो और ये निमंत्रण किस नाते देने आये हो। वो बोला हम राम भक्त हैं। तो मैंने कहा भाई सारे हिन्दू राम भक्त होते हैं ना? वो बोला हाँ। तो मैंने पूछा मैं मुसलमान हूँ क्या। मैं भी तो फिर राम भक्त ही हुआ। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा भाई मैं राम के तुझ से ज्यादा नज़दीकी हूँ। तुम संबोधन में श्री राम बोलते हो मैं राम राम जी बोलता हूँ। तुम्हारे संबोधन में राम एक बार आते हैं मेरे संबोधन में दो बार। तुम जिस श्री राम को जानते हो वो एक भव्य मंदिर में रहते हैं और मैं जिस श्री राम को जानता हूँ वो प्रकृति के हर कण में बसता है। फूल पत्तियों ने वो, पशु पक्षियों में वो, जल में वो, अग्नि में वो, नभ में वो, थल में वो। मेरा राम किसी मंदिर में बंद हो कर नहीं रह सकता। मेरा राम किसी ऐसे घर में नहीं रह सकता जिसके कपाट कोई इंसान खोलता बंद करता हो। मेरा राम स्वच्छंद परिंदा है जिसकी परवाज़ हर कण तक है।मैंने उसको कहा तुम को अपने श्री राम के दर्शन करने के लिए किसी के निमंत्रण पर अयोध्या जाना पड़ता है लेकिन मैं तो सुबह उठता हूँ तो मेरे श्री राम वायु रूप में मेरे चेहरे को अपना मीठा स्पर्श कर देते हैं। अपनी साइकिल ले कर निकलता हूँ तो पक्षी बन कर मेरे श्री राम मेरे संग उड़ते चलते हैं। मेरे श्री राम सुबह की ओस बन कर मेरा चेहरा धोते हैं और सूर्य की किरण वन कर भीगे चेहरे को सुखाते हैं। मेरे श्री राम तो हर पल मेरे साथ रहते हैं। मेरे श्री राम तो अब भी हम दोनों का वार्तालाप सुन रहे हैं।अगर तुम को नज़र नहीं आ रहे तो तुम क्या ख़ाक राम भक्त को। अगर राम भक्त होते तो तुम को मेरे काँधे पर हाथ रखे मेरे श्री राम दिख जाते और तुम को निमंत्रण देने की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती। मैंने कहा जाओ भाई ये निमंत्रण उसको दो जिसके पास श्री राम ना हों लेकिन ऐसा कोई इंसान तुमको मिलेगा नहीं क्योंकि राम तो घट घट में है। फिर मैंने उसको कबीर का दोहा सुनाया,
“कस्तूरी कुण्डली बसै मृग ढ़ूँढ़ै बन माहि। ऐसे घटी घटी राम हैं दुनिया देखै नाँहि॥”
बस इतना सुन मुँह बिचका कर वो टोली चलने लगी तो मैंने कहा भाई लोगो ये निमंत्रण नहीं एक झुनझुना है जो आपके हाथ में थमा दिया है ताकि आप इसे बजाते रहो और देश हित के असली मुद्दों की तरफ़ तुम्हारा ध्यान ही ना जाये। मुझे अपने श्री राम से मिलने कहीं नहीं जाना होता ना ही किसी निमंत्रण की आवश्यकता होती। मेरा राम और मैं राम का और हम दोनों के बीच किसी का कोई स्थान नहीं।
राम राम सभी भाई बंधुओ को...🙏🏻🙏🏻