Shri badrinath Ved vedang sanskritmahavidyalaya joshimath chamoli

Shri badrinath Ved vedang sanskritmahavidyalaya joshimath chamoli प्राच्य एवं आधुनिक शिक्षा का महत्वपू?

श्री बदरीनाथ वेद वेदांग संस्कृत विद्यालय जोशीमठ में उत्तराखंड संस्कृत अकादमी द्वारा आयोजित संस्कृत छात्र प्रतियोगिता के ...
28/09/2023

श्री बदरीनाथ वेद वेदांग संस्कृत विद्यालय जोशीमठ में उत्तराखंड संस्कृत अकादमी द्वारा आयोजित संस्कृत छात्र प्रतियोगिता के द्वितीय दिवस का उद्घाटन पूर्व धर्माधिकारी आचार्य भुवन चन्द्र उनियाल ने वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ माँ सरस्वती के चित्र का अनावरण कर दीप प्रज्वलित कर किया उन्होंने अपने सम्बोधन में संस्कृत को ज्ञान ,विज्ञान की भाषा बताया विशिष्ट अतिथि राजकीय महाविद्यालय के असिटेंट प्रोफेसर डॉक्टर चरणसिंह राणा "केदारखण्डी" ने कहा कि संस्कृत भाषा और भारतीय संस्कृति एक दूसरे का पर्याय हैं। उन्होंने कहा कि संस्कृत में भी भारत अपने सम्पूर्ण स्वरूप में अभिव्यक्त होता है। केदारखण्डी ने संस्कृत भाषा को लेकर महर्षि श्रीअरविन्द के विचारों की मीमांसा करते हुए कहा कि श्रीअरविन्द संस्कृत को भारत की राष्ट्रभाषा बनते हुए देखना चाहते थे। इस तरह के आयोजनों से संस्कृत और संस्कृति के लिए वातावरण निर्मित होता है।
आज कनिष्ट वर्ग की प्रतिस्पर्धा सम्पन्न हुई
खंण्ड संयोजक अरविंद प्रकाश पंत ने समस्त अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि उत्तराखंड संस्कृत अकादमी के माध्यम से उत्तराखंड सरकार संस्कृत के प्रसार और प्रचार के लिये प्रतिबद्ध है,तथा
इस प्रकार के कार्यक्रमों से संस्कृत तथा संस्कृति के प्रसार की चेतना का विस्तार होगा
समापन समारोह में पुरुस्कार वितरण किया गया
पुरुस्कारों की घोषणा खंण्ड सयोंजक द्वारा की गई
वरिष्ठ वर्ग में संस्कृत नाटक में श्री बदरी नाथ वेदवेदांगसंस्कृत विद्यालय जोशीमठ प्रथम
समूह गान श्री बदरीनाथ वेदवेदांग संस्कृत विद्यालय प्रथम
द्वितीय स्थान संस्कृत महाविद्यालय
तृतीय सरस्वती विद्या मंदिर
समूह नृत्य में प्रथम श्री बदरी नाथ वेदवेदांग संस्कृत विद्यालय
द्वितीय आदर्श बालिका इंटर कालेज
तृतीय राजकीय इंटर कालेज जोशीमठ
वाद विवाद में संस्कृत विद्यालय के नितिन प्रसाद सती एवम रोहित थपलियाल प्रथम तथा संस्कृत महाविद्यालय के प्रदीप चंद्र
पीयूष चंद्र ने द्वितीय स्थान
आशुभाषण में प्रथम मनीष डिमरी तथा वेदांत सती द्वितीय सरस्वती विद्या मंदिर के अमन पंवार तृतीय रहे ,श्लोकोच्चारण में प्रथम संस्कृत महा विद्यालय के मनीष डिमरी द्वितीय संस्कृत विद्यालय के वेदांत सती सरस्वती विद्या मंदिर के कुमारी आशा ने तृतीय स्थान प्राप्त किया
कनिष्ट वर्ग के समूह गान में प्रथम राजकीय बालिका इंटर कालेज एवम माधवाश्रम
विद्यालय ने प्रथम, द्वितीय बालिका इंटर कालेज तृतीय स्थान पर एम जी इंटर कालेज
वाद विवाद में प्रथम संस्कृत विद्यालय के छात्र श्लोक मैठाणी ,सुजल स्थान प्राप्त किया
आशु भाषण में सरस्वती विद्या मंदिर
द्वितीय माधवाश्रम , तृतीय संस्कृत विद्यालय रहे
श्लोकोचारण में संस्कृत विद्यालय के दीपेश
द्वितीय स्थान पर दो विद्यालय स्वामी प्रवनानंद और ज्योति विद्यालय रहे
श्री भगत सिंह राणा हिमाद ,श्रीमती आशा पंवार श्री लक्ष्मी प्रसाद त्रिपाठी ने प्राप्त निर्णयों की समीक्षा की तथा गौर सिंह खत्री ने समस्त प्रतिभागियों और प्रभारी शिक्षक शिक्षिकाओं को धन्यवाद ज्ञापित किया

आज श्री बदरीनाथ वेद वेदांग संस्कृत महाविद्यालय जोशीमठ के तीन दिवसीय खेल एवं सांस्कृतिक प्रतियोगिता का समापन मुख्य अतिथि ...
22/12/2022

आज श्री बदरीनाथ वेद वेदांग संस्कृत महाविद्यालय जोशीमठ के तीन दिवसीय खेल एवं सांस्कृतिक प्रतियोगिता का समापन मुख्य अतिथि डाक्टर मोहन सिंह रावत ,राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य डाक्टर विश्वनाथ खाली विशिष्ट अतिथि पूर्व प्राचार्य आचार्य रामदयाल मैदुली ,प्रभारी प्राचार्य आचार्य प्रदीप पुरोहित के द्वारा प्रतिभागियों एवं विजेताओं को पुरस्कार वितरण द्वारा हुआ
इस अवसर पर समापन समारोह में मुख्य अतिथि डाक्टर मोहन सिंह ने संस्कृत भाषा को ज्ञान विज्ञान की कुंजी कहा,तथा संस्कृत भाषा को भविष्य की भाषा कहा
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य डाक्टर विश्वनाथ खाली ने खेल एवम सांस्कृतिक कार्यक्रमों को शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग बताया तथा ऐसे कार्यक्रमों के आयोजनों को आवश्यक बताया
पूर्व प्राचार्य आचार्य रामदयाल मैदुली ने इस प्रकार के कार्यक्रमों को छात्र छात्राओं के सर्वागीण विकास में सहायक कहा
प्रधानाचार्य अरविंद पंत , प्रदीप पुरोहित ने आगन्तुक अतिथियों का स्वागत किया तथा सम्पन्न हुए कार्यक्रमों के विषय मे जानकारी दी तथा इसे जिला और राज्यस्तर पर आयोजित करने की आवश्यकता बताई
शारीरिक शिक्षा के प्रमुख देवीप्रसाद भट्ट के निर्देशन में दूसरी बार यह आयोजन किया गया,कार्यक्रम की
व्यवस्था आचार्य श्री कृष्ण मैठाणी गौर सिंह खत्री
के निर्देशन में संपादित की गई
समापन समारोह का संचालन आचार्य वाणी विलास के द्वारा किया गया

16/12/2022
आज  छात्रों के साथ पर्ण खण्डेश्वरी गढ़ी मंदिर में आध्यात्म के रंग में, प्रकृति का साम्य ईश्वरजो परमाणु से ब्रमांड में व्य...
16/12/2022

आज छात्रों के साथ पर्ण खण्डेश्वरी गढ़ी मंदिर में आध्यात्म के रंग में,
प्रकृति का साम्य ईश्वर
जो परमाणु से ब्रमांड में व्याप्त है

27/07/2016

भारतीय ज्योतिष के अनुसार सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को ‘दिनमान’ तथा सूर्यास्त से सूर्योदय तक ‘रात्रिमान’ कहते हैं . सूर्य की गति और उत्तर – दक्षिण के स्थानों के भेद के कारण इनके मानों में में अंतर होता हैं जब सायन सूर्य मेष पर जाता है सब जगह दिन और रात्रि बराबर होते है अर्थात अयनांश जोड़ने पर सूर्य मेष पर होता है .इसी प्रकार जब सायन सूर्य कर्क पर होता है तब उत्तरी अक्षांश में दिन सबसे बड़ा और रात्रि सबसे छोटी होती है . जब सूर्य तुला पर जाता है तब भी रात्रि और दिन बराबर होते हैं अब सायन सूर्य मकर पर जाता है तब रात्रि सबसे बड़ी और दिन सबसे छोटा होता है , किन्तु दक्षिण अक्षांश में इसके विपरीत होता है . प्रायः उत्तरी अक्षांश में २२, २३ मार्च एवं २२ ,२३ सितम्बर को दिन रात्रि बराबर होते हैं .२२ , २३ जून का दिन सबसे बड़ा और रात्रि सबसे छोटी और २२,२३ दिसम्बर को सबसे बड़ी रात्रि और सबसे बड़ा दिन होता है . भारतवर्ष उत्तरी अक्षांश में ही स्तिथ है .

07/07/2016

The Vedas may full of hymns and religious invocation , but they tell stories ,speculate about the world and – true to the argumentative propensity already in view –ask difficult questions . a basic doubt concern the very creation of the world : did someone make it , was it a spontaneous emergence , and there a god who knows what really happened ?
from The argumentative indian

07/07/2016

The Vedas may full of hymns and religious invocation , but they tell stories ,speculate about the world and – true to the argumentative propensity already in view –ask difficult questions . a basic doubt concern the very creation of the world : did someone make it , was it a spontaneous emergence , and there a god who knows what really happened ?

19/04/2016

The tolerance of variation in different walks of life has also had other – if less regal – support through Indian history , including in Sanskrit drama , with criticism and ridicule of narrow minded persecution , for example in Sudrka in mrichchakatikam and mudrarakshasam. It finds expression also in Sanskrit poetry , with celebration in diversity perhaps most elegantly expressed in Kalidasa which applauds the beauty of varieties of human customs and behavior through the imagined eye of cloud that carries a message of longing from a banished husband to his beloved wife , as the cloud slowly journeys across fifth century india .
साभार ‘’ The Argumentative Indian ‘’ by Amritya sen

22/02/2016

भारतीय वैज्ञानिक उपलब्धि पर विचार करते समय यह बात स्पष्ट दिखती है कि विज्ञान का उद्देश्य प्रकृति को जीतना नहीं है , बल्कि मनुष्य और और प्रकृति को एक परस्पराकांक्षी युग्म के रूप में स्थापित करना है और सृष्टि चक्र को पथच्युत होने से रोकना है . प्राचीन भारत में ऐसा न था की आखेट वर्जित हो , पशु वध न होता हो , किन्तु यह था कि प्रजनन की ऋतुओं में आखेट वर्जित किया जाता था , जिससे सृष्टि का संतुलन बिगड़ने न पाये . पेड़ से लकड़ी तोड़ी जाती थी , लेकिन नयी शाखा तोड़ना पाप समझा जाता था . कृषि विकास के साथ –साथ बृक्ष रोपण और पशु संवर्धन को महत्व देने के पीछे भी यह प्रयोजन था की कोई भी विकास अपने आप में पूर्ण नही होता है .
साभार ; ‘हिन्दू धर्म’
सनातन की खोज
विद्या निवास मिश्र

21/08/2015

सत्कार्यवाद सांख्य दर्शन का अत्यंत सूक्ष्म एवं वैज्ञानिक सिदान्त है . यह सांख्य दर्शन का मुख्य आधार है . इसके अनुसार कार्य की सत्ता उसकी उत्पत्ति से पूर्व कारण में विद्यमान होती है . अर्थात कार्य अपने सार रूप में कारन में उत्पत्ति से पहले विद्यमान रहता है . कार्य और कारण केवल अकारिक भेद हैं तात्विक नहीं . दोनों अभिन्न हैं . किन्तु दर्शन के कुछ अन्य सम्प्रदाय जैसे न्याय वैशेषिक , बोद्ध आदि इस मत को नहीं मानते .यदि उत्पत्ति के पूर्व ही कार्य की सत्ता कारण में विद्यमान थी तब उत्पन्न होने का क्या अर्थ रह जाता ? उदाहरण के लिए यदि मिटटी में घड़ा पहले से विद्यमान था तो फिर कुम्हार को चाक घुमाने की आवश्यकता क्यों होती ? यदि कार्य पहले ही उपादान –कारन में विद्यमान था तो फिर कारण और कार्य का भेद किस अधर पर किया जा सकता है ? मिटटी और घड़ा के लिए एक ही नाम का प्रयोग क्यों नहीं करते ? मिटटी का लोदा ही घड़े का काम क्यों नहीं देता ? यदि घट और मृतिका में स्वरुप और आकार की भिन्नता है तब तो यह स्वीकार करना होगा कि कार्य में कोई वस्तु एसी है जो कारण में नहीं थी अर्थात कार्य वास्तविक रूप से कारण में विद्यमान नहीं था . इसलिए यह मानना सर्वथा युक्तिसंगत एवं व्यवाहरिक है कि कार्य की उत्पति से पूर्व कारण विद्यमान नहीं था .
किन्तु सांख्य ऐसा नहीं मानता , सांख्य के अनुसार यद्यपि कारण कार्य से भिन्न दिखायी देता है और नाम भी दोनों का एक नहीं है फिर भी वस्तुतः कारण कार्य से भिन्न नहीं है , भिन्नता धर्म की है इसी कारण कार्य अभिन्नता और धर्म भिन्नता की दृष्टि से सांख्य कारों को भेदसहिष्णु अभेदवादी कहा जाता है .उनकी दृष्टि से सत सनातन और आभाव रहित है ; और इसलिए असत से सतउत्पन्न नहीं हो सकता है .

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